समझौतावादी
राजधर्म यही वह सूत्र था, जिसका पालन करने की सलाह वाजपेयी ने 2002 के दंगों के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को दी थी. इसे खुलेआम मोदी को फटकारे जाने के रूप में देखा गया था. लेकिन हक्रते भर बाद ही, गोवा में एक अन्य भाषण में वे बिल्कुल अलग सुर में थे. तो क्या वे अपना ही राजधर्म निबाहने में नाकाम रहे?
पणजी में मंडोवी नदी के किनारे पेड़-पौधों से घिरी शांत गली में आबाद गोवा का मैरिएट होटल कोई ऐसा स्थान नहीं है जिसे हिंदुस्तान के मौजूदा दौर के सियासी इतिहास को तय करने के लिहाज से आदर्श जगह के तौर पर देखा जा सके.
सूरज और रेत, आरामतलबी और मौज-मस्ती की इस जमीं पर यह होटल अपने मेहमानों को गोवा में शानदार छुट्टियां मनाने का मौका देने पर नाज करता है. अप्रैल 2002 में अलबत्ता इस होटल में समुद्रतटों से मुहब्बत करने वाले सैलानियों ने नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने डेरा डाला हुआ था. पार्टी के दिग्गजों की यह बैठक उस सियासी तूफान को दबाने की गरज से बुलाई गई थी जो उस वक्त पार्टी और उसके बाहर भी छाया हुआ था.
कार्यकारिणी की यह बैठक गुजरात दंगों की पृष्ठभूमि में हो रही थी. महज कुछ हफ्तों पहले इन दंगों ने 900 से ज्यादा लोगों की जान ले ली थी. कयास लगाए जा रहे थे कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई में भाजपा के रहनुमा इस बैठक में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की किस्मत का फैसला करेंगे. चौबीस घंटे और सातों दिन चलने वाला टेलीविजन और ब्रेकिंग न्यूज का लगातार शोर-शराबा अभी नया-नया ही था.
हम कुछ मुट्टी भर चैनल ही थे और आधुनिक जमाने की गलाकाट स्पर्धा भले न हो, पर हर कोई बड़ी खबर सबसे पहले बताना चाहता था. तब मैं प्रधानमंत्री के सर्वशक्तिमान प्रिसिंपल सेक्रेटरी ब्रजेश मिश्र और भाजपा के मुख्य कर्ताधर्ता प्रमोद महाजन के साथ लगातार संपर्क में था. दोनों ने मुझसे वादा किया था कि कोई भी बड़ी खबर वे मुझे बताते रहेंगे.
बेहद अहम बैठक से ठीक पहले मिश्र ने मुझे फोन किया और कहा, "मैं समझता हूं आप बड़ी खबर के लिए तैयार हो सकते हैं, पीएम ने फैसला लिया है कि मिस्टर मोदी को जाना होगा!'' बेहद उत्साह से मैं खबर "ब्रेक'' करने की तैयारी कर ही रहा था कि मिश्र ने एक घंटे रुकने के लिए कहा और साथ ही ये भी कहा, "मैं तस्दीक न कर दूं तक तक कुछ मत करना,'' वह तस्दीक कभी नहीं आई. इसके बजाय मीडिया को जानकारी देने के लिए महाजन बैठक से निकलकर होटल की लॉबी में आए.
उन्होंने बताया, "पार्टी ने नरेंद्रभाई का पूरा समर्थन करने का फैसला लिया है, गुजरात में मुख्यमंत्री नहीं बदला जाएगा.'' खबर तेजी से फैलने लगी और मैं हैरानी से सोच रहा था कि इस बीच ऐसा क्या नाटकीय बदलाव हुआ कि जो चीज "तय'' मानी जा रही थी, उसे अब मुख्यमंत्री में भरोसे के जबरदस्त समर्थन के तौर पर देखा जा रहा था.
महाजन ने बाद में माना कि वाजपेयी मोदी को हटाना चाहते थे, पर पार्टी के दूसरे नेताओं ने उनकी बात को नामंजूर कर दिया. इन "दूसरों'' में खुद महाजन भी शामिल थे और पार्टी के पितृपुरुष तथा उस वक्त उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी भी. उन्होंने कहा, "हमें लगा कि इस मोड़ पर नरेंद्रभाई को हटाने से गलत संदेश जाएगा.
काडर और गुजरातियों की बड़ी तादाद उनके साथ है और एक साल के भीतर हमें राज्य में चुनावों में उतरना होगा, इसलिए हमें लगा कि दबाव में उनसे हटने के लिए नहीं कहना चाहिए.''
बाद में हमें पता चला कि बैठक शुरू होने से ठीक पहले मोदी मंच पर आए और नाटकीय अंदाज में उन्होंने इस्तीफे की पेशकश की. मिनटों के भीतर उनके प्रति समर्थन का शोर गूंजने लगा. इसकी अगुआई आडवाणी कर रहे थे, वह एक शख्स जो भाजपा के भीतर वाजपेयी की हैसियत के बराबर खड़ हो सकता था. यह गुजरात के ताकतवर नेता के पीछे लामबंदी का सुनियोजित कदम मालूम देता था. वाजपेयी ने मिजाज भांप लिया और खामोश रहे.
अगली शाम वाजपेयी ने गोवा में तीखा सार्वजनिक भाषण दिया, जिस पर पार्टी के लोगों ने दिल खोलकर तालियां बजाईं. यह कवि-राजनीतिज्ञ की वाक्पटुता का जाना-पहचाना प्रदर्शन था, फर्क सिर्फ यह था कि गीत के छंदों की जगह बलशाली आक्रामकता ने ले ली थी.
अब उन्होंने उस "जेहादी मानसिकता'' की बात की, जो अल्पसंख्यकों की बड़ी आबादी वाले हर इलाके में मौजूद है और इसके बरअक्स "हमारी'' (हिंदू) सहिष्णुता को रखा. फिर दंगों की चिनगारी को भड़काने वाली रेल में आग लगाए जाने की गोधरा की घटना के संदर्भ में उन्होंने अर्थपूर्ण हाव-भाव से कहा, "लेकिन आग किसने लगाई? आग फैली कैसे? ''
यह उस प्रधानमंत्री का उत्तेजक भाषण था जिनके बारे में हमसे कहा गया था कि वे सांप्रदायिक दंगों को रोकने में राज्य सरकार की नाकामी से व्यथित थे और जिन्होंने मुख्यमंत्री को हटाने की ठान ली थी.
कुछ ही दिनों पहले मैं अहमदाबाद हवाई अड्डे पर था, जब वाजपेयी ने राहत शिविरों का दौरा करने के बाद मोदी को असरदार फटकार लगाई थी और उनसे "अपने राज धर्म का पालन करने के लिए'' कहा था. उनकी बगल में बैठे पश्चाताप से भरे दिखाई दे रहे मुख्यमंत्री को बड़बड़ाते सुना जा सकता था कि "हम भी वही कर रहे हैं साहब.''
तो अहमदाबाद और पणजी के बीच अचानक आखिर क्या बदल गया था? 2004 में आम चुनावों से ठीक पहले मैंने एक इंटरव्यू में वाजपेयी से पूछा कि उन्होंने उस राष्ट्रीय कार्यकारिणी में गुजरात के नेतृत्व के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाने का रास्ता क्यों चुना?
उनका गूढ़ जवाब था, "पार्टी का फैसला था, कोई और विकल्प नहीं था.'' उनके जवाब से लाचारगी का एहसास जाहिर होता था. बहुत कुछ ऐसा लगता था कि मानो प्रधानमंत्री और देश के सबसे लोकप्रिय नेता होने के बावजूद वे अपनी सीमा स्वीकार करने को मजबूर हों.
मैंने उनसे गुजरात से गोवा के बीच उनका रुख बदलने के बारे में पूछा, तो उनका उत्तर और भी अर्थपूर्ण था. उन्होंने कहा, "जब मैं शुरुआत में गुजरात गया, तब मुझे पता नहीं था कि हिंदुओं को इतनी क्रूरता से जिंदा जला दिया गया था. जब मैं गोवा पहुंचा तो यह बात मेरे ध्यान में लाई गई; इससे पहले तक मैं सोच रहा था कि यह सामान्य दंगा था.''
प्रधानमंत्री वाजपेयी को गोधरा में 59 कार सेवकों को रेल के डिब्बे में जला दिए जाने की घटना के बारे में पता नहीं होगा, इस बात की बहुत ही कम संभावना है. ज्यादा संभावना इस बात की है कि उन्हें यह एहसास हो गया था कि मोदी के भविष्य को लेकर बाकी पार्टी उनके साथ एक राय नहीं थी. जहां राजनेता वाजपेयी कहीं ज्यादा कड़ा फैसला ले सकते थे, वहां तपे-तपाए सियासतदां वाजपेयी इससे बाहर निकलने का रास्ता खोज रहे थे.
वफादार स्वयंसेवक और पार्टी का कार्यकर्ता होने की उनकी पहचान और तमाम हिंदुस्तानियों का नेता होने की उनकी पहचान के बीच एक नैतिक धुंधलापन था जिसने शायद उन्हें समझौता करने को मजबूर किया. एक अहम मोड़ पर मास्क या मुखौटा गिर चुका थारू अपने मुख्यमंत्री को "राज धर्म'' के पालन की याद दिलाने वाले प्रधानमंत्री ने गोवा में उस दिन खुद अपने अंतःकरण को नजरअंदाज कर दिया.
लेखक टीवी टुडे नेटवर्क के कंसल्टिंग एडिटर हैं. उनकी नई किताब है न्यूजमैनः ट्रैकिंग इंडिया इन द मोदी एरा
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