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भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने वाले वाजपेयी

मई में पाकिस्तानी सेना ने नियंत्रण रेखा पार कर करगिल की अहम चोटियों पर कब्जा जमा लिया. पाकिस्तान धमकाने लगा कि भारत ने पूर्ण युद्ध की घोषणा की तो वह परमाणु हथियारों के प्रयोग से पीछे नहीं हटेगा.

20 मई, 1998-विस्फोटके बाद पोकरण परीक्षण रेंज के पास वाजपेयी, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और जॉर्ज फर्नांडीस
20 मई, 1998-विस्फोटके बाद पोकरण परीक्षण रेंज के पास वाजपेयी, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और जॉर्ज फर्नांडीस

दबंग

पोकरण-2, 1998 वाजपेयी के करियर का सबसे चमकदार लम्हा था. उन्होंने परमाणु परीक्षण कर अनुकरणीय दूरदृष्टि, साफ नजरिये और दृढ़ विश्वास का परिचय दिया. इससे भारत को अपनी एटमी हथियार क्षमता बढ़ाने का मौका मिला और अमेरिका के साथ सिविल न्यूक्लियर डील की आधारशिला रखी गई, जिससे भारत के खिलाफ चला आ रहा परमाणु भेदभाव हमेशा के लिए खत्म हो गया.

दिल्ली के साउथ ब्लॉक के अंतिम छोर पर स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय में शायद देश में सबसे ज्यादा शांति पसरी नजर आती है. एक बड़ी मेज के अलावा, दो साधारण सोफा सेट जिन पर आगंतुक धक्का-मुक्की करके बैठते हैं.

सामने की दीवार पर महात्मा गांधी की एक तस्वीर टंगी रहती है. 19 मार्च, 1998 को दोबारा प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद इस दफ्तर में आए अटल बिहारी वाजपेयी ने कुछ भी नहीं बदला था. अगले ही दिन उन्होंने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के प्रमुख ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष आर. चिदंबरम को अपने दफ्तर बुलाया और परमाणु परीक्षण की संभावनाओं पर चर्चा की.

 कार्यालय संभालने के बाद इतनी जल्दी परमाणु मुद्दे पर आगे बढऩे के वाजपेयी के फैसले से लोग हैरान रह गए. बहुत कम लोग ही जानते थे कि मई 1996 में प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल में ही उन्होंने परमाणु परीक्षण का आदेश दिया था, पर 13 दिनों में ही उनकी सरकार गिर जाने के कारण वह फैसला रद्द करना पड़ा. उन्हें 1998 में भी यह बात कचोट रही थी. वाजपेयी भली-भांति जानते थे कि वे गठबंधन वाली नाजुक सरकार की अगुआई कर रहे हैं और वक्त बीता जा रहा है. इसलिए उन्होंने तेजी दिखाई.

जब कलाम और चिदंबरम को उनके कार्यालय लेकर आया गया तब वाजपेयी अपनी मेज के पीछे बैठे थे. चिदंबरम मीटिंग के लिए अपने साथ प्लास्टिक शीट पर कुछ डायग्राम बना कर लाए थे. वाजपेयी ने ब्रजेश मिश्र को भी बुलाया था, जिन्हें पिछली दोपहर ही उनका मुख्य सचिव नियुक्त किया गया था.

चिदंबरम सीधे मुद्दे पर आ गए. उन्होंने वाजपेयी को बताया कि प्रधानमंत्री के रूप में 1996 में उन्हें जो पिछली ब्रीफिंग दी गई थी, तब से लेकर आज तक, टीम हाइड्रोजन बम बनाने की स्थिति में पहुंच चुकी है. वाजपेयी यह सुनकर बड़े खुश हुए. फिर इलस्ट्रेशन के जरिये चिदंबरम ने परमाणु बम और हाइड्रोजन बम का फर्क समझाया.

लेकिन जब परमाणु ऊर्जा प्रमुख बहुत ज्यादा विस्तार में जाने लगे तो वाजपेयी थोड़े अनमने-से दिखे. फिर वे कलाम की ओर मुड़े और पूछा, कितने दिन लगेंगे? कलाम का जवाब था, "सर, टी माइनस 30 डेज.''

जब वाजपेयी कुछ भ्रमित-से लगे तो कलाम मुस्कराए और बताया कि इसका मतलब परीक्षण का आदेश पारित होने वाले दिन से अगले 30 दिनों से है. वाजपेयी ने उन्हें परीक्षण की तैयारी शुरू करने को कहा और यह कहते हुए बैठक समाप्त कर दी कि वाजपेयी उन्हें बता देंगे कि वे कब आदेश पारित करेंगे.

इस बीच, प्रधानमंत्री ने मिश्र से परमाणु परीक्षण के प्रभावों का आकलन करने और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से निबटने की रणनीति तैयार करने को कहा. कुछ दिनों बाद मिश्र ने वाजपेयी को वस्तुस्थिति बताई. उन्होंने कहा कि परीक्षणों की जमीन पिछली सरकारों द्वारा पहले ही तैयार की जा चुकी है.

भारत के चारों ओर की सामरिक स्थिति खराब हो गई थी. अब पाकिस्तान समेत कई देश मिसाइलों से लैस थे, वे संभवतः मिसाइल परमाणु हथियार ढोने वाली क्षमता से भी लैस थे, जो भारत के लिए खतरा पैदा कर सकते थे.

इसके अलावा, 1996 में व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी) पर हस्ताक्षर करने के साथ भारत के लिए परमाणु परीक्षण का दरवाजा तेजी से बंद हो रहा था. संधि की समीक्षा सितंबर में होनी तय थी जिसमें भारत के इस संधि पर हस्ताक्षर की बात उठती.

 मुश्किलों की चर्चा करते हुए मिश्र ने कहा कि विदेशी मुद्रा भंडार उच्च है, आर्थिक विकास में गिरावट आई है और मंदी की आहट आ रही है. इसकी भी आशंका थी कि अमेरिका भारत पर चौतरफा प्रतिबंधों की घोषणा करेगा और खाड़ी देशों पर भारत को तेल नहीं देने का दबाव बनाएगा.

पर भारत की सुरक्षा के लिए परमाणु शक्तिसंपन्न देश होने के लिहाज से यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी. अगर भारत को परीक्षण के बाद आने वाले तूफान का सामना करना है तो उसे इसकी तैयारी के लिए छह महीने चाहिए.

वाजपेयी, मिश्र की बातें ध्यान से और चुपचाप सुनते रहे. वे उस फैसले का भार महसूस कर रहे थे जो वे लेने वाले थे. इतने वर्षों के अपने अनुभव से, बिना तर्कों के पहाड़ों का बोझ महसूस किए, किसी भी समस्या के मूल तक पहुंचने में वाजपेयी ने महारत हासिल कर ली थी.

उनके सोच में सीधापन था जो उन्हें तेजी से निर्णय लेने में मदद करता था. वे मानते थे कि अगर भारत को महानता हासिल करनी है, तो उसे सैन्य रूप से भी शक्तिशाली होना पड़ेगा. उन्होंने अपने एक सहयोगी से कहा था, "हमें रक्षा में आत्मनिर्भर होना है. हम अपनी रक्षा को दूसरों के भरोसे नहीं छोड़ सकते कि वह आएगा और मदद करेगा.''

वाजपेयी कई विरोधाभासों वाले व्यक्ति थे. उन्हें खुद को शांति का मसीहा कहा जाना भी पसंद था. उनकी कविताओं में यह इच्छा झलकती है. परीक्षण से कई साल पहले उन्होंने पाकिस्तान और भारत के बीच शांति का आह्वान करते हुए एक मर्मस्पर्शी कविता जंग न होने देंगे लिखी थीः प्यार करें या वार करें...खून एक ही बहना है//जो हम पर गुजरी है/बच्चों के संग न होने देंगे. फिर भी 1998 के परीक्षणों के बाद कई लोगों की राय थी कि वाजपेयी ने इलाके को विनाशकारी परमाणु संघर्ष के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया था.

मैं भारत के परमाणु बम के इतिहास पर एक किताब लिख रहा था, इसलिए परीक्षण के बाद मैंने वाजपेयी से मिलने के लिए समय मांगा. मैंने उनसे कई प्रश्न पूछे जिनमें से एक था कि चूंकि वे हमेशा से शांति बहाली का संदेश देते रहे हैं, परमाणु परीक्षण का निर्णय करते वक्त क्या उनके मन में भी महाभारत के अर्जुन की तरह कोई वैचारिक द्वंद्व था. कुछ पलों की खामोशी के बाद उन्होंने अपने चिर-पिरिचत अंदाज में कहा, "बहुत ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं थी.

हमें तो बस इसे पूरा करना था.'' बाद में एक समारोह में अपनी कविताओं की एक ऑडियो रिकार्डिंग जारी करते हुए उन्होंने इसे स्पष्ट किया, "यह विरोधाभासी प्रतीत हो सकता है कि एक व्यक्ति जो शांति की कविताएं लिखता है, उसने परमाणु बम विस्फोट कराया. अंतद्र्वंद्व रहे होंगे पर मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूं कि कोई अंतर्विरोध नहीं था.''

परिस्थितियां ऐसी थीं कि वाजपेयी के लिए अच्छी स्थिति बनती गई. परमाणु बम को लेकर आरएसएस की भावना उग्र-राष्ट्रवाद को देखते हुए इस विस्फोट के साथ ही वे कट्टरपंथियों की आंखों के तारे हो जाते और वाजपेयी के गद्दी पर होने से उनके एजेंडे के कमजोर पडऩे की उनकी आशंकाएं मिट जातीं.

वाजपेयी समझते थे कि परमाणु हथियार क्षमता और ताकत के प्रतीक थे और इससे भारत को गर्व करने को कुछ मिलेगा. परीक्षण से निकली कुछ आभा तो निश्चित रूप से उनके व्यक्तित्व के साथ जुडऩी तय थी और वे दुविधा में रहने वाले नेता की अपनी छवि को एक झटके में मिटा देते.

11 मई, 1998 परीक्षण का दिन तय किया गया. उस दिन उन्होंने दिल्ली के रेस कोर्स रोड के अपने आधिकारिक आवास पर चार लोगों को बुलाया था—गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी, रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस, वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा और योजना आयोग के उपाध्यक्ष जसवंत सिंह.

उन सभी को राजस्थान में पोकरण रेंज से आने वाली खबर का बेसब्री से इंतजार था. वे प्रधानमंत्री की डाइनिंग टेबल के चारों ओर कुर्सियों पर चुपचाप बैठे थे क्योंकि परीक्षण के लिए निर्धारित समय से कुछ घंटों की देर हो चुकी थी.

कलाम ने आखिरकार पोकरण से परीक्षण की सफलता की खबर देने के लिए मिश्र को फोन किया. मिश्र ने वह खबर वाजपेयी और उनके चारों तरफ बैठे कैबिनेट मंत्रियों को सुनाई. प्रधानमंत्री के चेहरे पर सुखद मुस्कान फैल गई.

बाद में, वाजपेयी ने मुझे बताया, "इस क्षण का वर्णन करना मुश्किल है, पर मैं उस समय संतुष्टि और खुशी का अनुभव कर रहा था.'' खबर सुनते ही फर्नांडीस और आडवाणी की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए थे. मंत्रियों ने एक दूसरे से हाथ मिलाया और विदा ली.

वाजपेयी तब अपने घर से बाहर आए जहां आनन-फानन में बुलाए गए प्रेस रिपोर्टर्स उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे. इसके कुछ मिनट पहले उनके भरोसेमंद सहयोगी प्रमोद महाजन ने सूझबूझ का परिचय देते हुए चबूतरे के पीछे भारतीय ध्वज को खासतौर पर बैकड्रॉप में लगवा रखा था.

वाजपेयी ने एक संक्षिप्त बयान पढ़ा जिसमें कहा गया था कि परमाणु परीक्षण सफल रहे और उन्होंने वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को इस उपलब्धि पर बधाई दी. 1974 के विस्फोट के बाद इंदिरा गांधी के बयान से एक महत्वपूर्ण बदलाव दर्शाते हुए, जिसके बारे में वाजपेयी ने बाद में खुद बताया था, उन्होंने परमाणु विस्फोटों का वर्णन करते हुए उसके लिए "शांतिपूर्ण'' शब्द का उपयोग नहीं किया.

दो दिन बाद 13 मई को पोकरण में भारत ने दो और सफल परीक्षण किए पर इस बार इनकी तीव्रता कम थी. भारत की परमाणु स्थिति पर टिप्पणी में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाते हुए वाजपेयी ने इंडिया टुडे को एक साक्षात्कार में समझायाः "हम अपनी कार्रवाई को हिचकिचाहट के किसी अनावश्यक आवरण से नहीं ढंकना चाहते हैं. भारत अब परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र है लेकिन हमारा इरादा हमेशा शांतिपूर्ण रहा है और आगे भी रहेगा.''

भारत के 1998 के विस्फोट के एक पखवाड़े बाद जवाबी कार्रवाई करते हुए पाकिस्तान ने भी जब छह परमाणु परीक्षण किए, तो वाजपेयी आश्वस्त हो गए कि अब दोनों देशों के बीच तनाव कम हो जाएगा. उन्होंने अपने एक सहयोगी से कहा, "अब जबकि दोनों देशों ने जता दिया है कि दोनों ही परमाणु हथियारसंपन्न हैं, हम युद्ध में जाने का जोखिम नहीं उठा सकते. इससे हम एक दूसरे के करीब आ जाएंगे और सहयोग के लिए रास्ता खुल जाएगा.''

वाजपेयी सही और गलत दोनों रहे होंगे. इसके नौ महीने बाद 20 फरवरी, 1999 को उन्होंने दोनों देशों के बीच तनाव घटाने और परमाणु युद्ध की आशंका को कम करने के तरीके खोजने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ शिखर वार्ता के लिए बस से लाहौर तक का सफर करके इतिहास रच दिया.

लगा कि एक बड़ी सफलता मिल गई है. पर पाकिस्तान ने कुछ महीनों में ही भरोसे का गला घोंट दिया. मई में पाकिस्तानी सेना ने नियंत्रण रेखा पार कर करगिल की अहम चोटियों पर कब्जा जमा लिया. पाकिस्तान धमकाने लगा कि भारत ने पूर्ण युद्ध की घोषणा की तो वह परमाणु हथियारों के प्रयोग से पीछे नहीं हटेगा.

इस बीच, अमेरिका और कई अन्य यूरोपीय देशों ने परीक्षण के कारण भारत और पाकिस्तान के खिलाफ कड़े प्रतिबंध लगा दिए. वाजपेयी इसके लिए तैयार थे. उन्होंने कहा, "मुझे भरोसा था कि देशवासी परमाणु परीक्षण के कारण देश के सामने आने वाली किसी भी चुनौती का सामना करने में समर्थ थे.

अर्थव्यवस्था बुनियादी रूप से मजबूत स्थिति में थी और मेरा मानना है कि जब बात देश की सुरक्षा की हो तो हमारे लोग कोई भी बलिदान करने को तैयार रहते हैं.'' उनका आकलन सही था. वर्ष 2000 में सुलह के संकेत देते हुए अमेरिका ने भारत पर लगे प्रतिबंधों को हटा लिया और राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भारत के पहले दौरे पर आए—दो दशकों में ऐसा करने वाले वे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति थे.

परमाणु परीक्षणों को लेकर वाजपेयी की स्पष्टता, दृढ़ विश्वास और साहस के कारण देश के परमाणु इतिहास में उनका नाम अमर रहेगा. 2005 में उनके उत्तराधिकारी डॉ. मनमोहन सिंह के भारत-अमेरिका नागरिक परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर के बाद भारत के खिलाफ लगा परमाणु भेदभाव पूरी तरह खत्म हो गया. ठ्ठ

वाजपेयी ने कहा, "मेरे लिए उस पल की व्याख्या करना मुश्किल है, पर मुझे संतुष्टि और खुशी का अनुभव हुआ.''

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