राजस्थान में उद्यमी होना मुश्किलों भरा है, फिर भी कुछ लोग हमेशा कई क्षेत्रों में एक साथ अच्छा काम करते हैं. मसलन, आर.के. मार्बल समूह ने संगमरमर और सीमेंट में बेहद शानदार प्रदर्शन किया है, कजारिया सरीखे विभिन्न समूहों ने नीमराणा और भिवाड़ी में चमत्कार कर दिखाया है. राजस्थान में कारोबार युवाओं और बुजुर्गों, दोनों की महागाथा है.
संगमरमर से सौंदर्य प्रसाधन? दुनिया भर में मशहूर आर.के. मार्बल समूह के जाने-माने पाटनी परिवार के सदस्य विनीत पाटनी संगमरमर और कॉस्मेटिक्स, दोनों ही कारोबारों में पूरी तरह माहिर हैं. उनके परिवार ने हिंदुस्तान के मार्बल उद्योग में मानक स्थापित किए हैं और यही वजह है कि उन्हें स्टोन और प्रोसेसिंग इंडस्ट्री की गहरी जानकारी और तकनीकी बातों का अच्छा तजुर्बा है.
ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ वेल्स की डिग्री के साथ-साथ इस उद्योग की बारीक जानकारी के दम पर उन्होंने भावी जरूरतों को समझ-बूझकर पत्थरों को देखने का अंदाज ही बदल दिया है. उनका ताजातरीन उद्यम नाइंटी डिग्री स्टोन प्रा.लि. उनके पुराने उद्यम का ही विस्तार है.
सुरेश कुमार

आर.के. मार्बल का नाम हिंदुस्तान में स्थित दुनिया की सबसे बड़ी संगमरमर के उत्पाद बनाने वाली कंपनी के तौर पर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है.
इसके अलावा वे वंडर सीमेंट वी.के. ब्रान्ड नाम से सीमेंट उत्पादन भी करते हैं और दुनिया भर में पत्थर की कई खदानों के मालिक तथा कुदरती पत्थरों के अगुआ मैन्युफैक्चरर और प्रोसेसर में से एक हैं.
नाइंटी डिग्री स्टोन पत्थरों में निष्णात विशेषज्ञ कंपनी है. यह दुनिया भर के ग्रेनाइट, बलुआ पत्थर, क्वॉर्टजाइट, मार्बल सरीखे पत्थरों पर विशिष्ट डिजाइन, नक्काशी और फॉर्मेट पेश करती है.
संगमरमर के कारोबार ने जहां कुछ लोगों की कामयाबी की कहानी लिखी है, वहीं एक लिहाज से संगमरमर के विकल्प ने अशोक कजारिया को बनाया है. उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई साल 1969 में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया से की थी.
इससे पहले वे सौ फीसदी निर्यात करने वाली कंपनी कजारिया एक्सपोर्ट लि. को आगे बढ़ाकर अपने करियर की शुरुआत कर चुके थे. कजारिया एक्सपोर्ट के बाद उन्होंने सिरेमिक की ग्लेज्ड टाइल के निर्माण के लिए कजारिया सिरेमिक्स लि. को भी प्रमोट किया.
पहला संयंत्र स्पेन की टोडाग्रेस के तकनीकी सहयोग से उत्तर प्रदेश के सिकंदराबाद में लगाया गया जो प्रति वर्ष 10 लाख वर्ग मीटर फ्लोर टाइल्स के निर्माण की क्षमता से लैस था. इधर वे सिकंदराबाद संयंत्र की क्षमता को धीरे-धीरे बढ़ाते रहे, उधर दूसरा संयंत्र उन्होंने 1998 में राजस्थान के ही भिवाड़ी में लगाया.
आज कजारिया के पास 2.8 करोड़ वर्ग मीटर क्रलोर और वॉल टाइल्स बनाने की क्षमता है और इसके अलावा वे विट्रिफाइड यानी कांच सरीखी बनाई गई तथा दूसरी महंगी टाइलों का आयात भी करते हैं. कजारिया सिरेमिक्स लि.
देश से सिरेमिक टाइलों का निर्यात करने वाली सबसे बड़ी कंपनी भी है. कजारिया को ''बिजनेस सुपरब्रांड" के दर्जे से भी नवाजा गया है—वह अकेली हिंदुस्तानी टाइल निर्माता कंपनी है जिसे लगातार 5वीं बार यह दर्जा हासिल हुआ है. कजारिया इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (फिक्की) की एग्जीक्यूटिव कमिटी के सदस्य और इंडियन काउंसिल ऑफ सिरेमिक टाइल्स ऐंड सैनिटरीवेयर (आइसीसीटीएएस) के डायरेक्टर भी हैं.

कंपनी ने गुजरात और राजस्थान में मैन्युफैक्चरिंग सुविधा की स्थापना के साथ सैनिटरीवेयर और नल-टोंटियों के निर्माण में भी कदम रखा है और इसके उत्पादों को ''केरोविट" के ब्रान्ड नाम से बेचा जाता है.
कंपनी ने 31 मार्च, 2017 को खत्म हुए साल में 2,850 करोड़ रु. का राजस्व हासिल किया और 253 करोड़ रु. का खालिस मुनाफा कमाया.
अगर आपके चारों तरफ शानदार कंपनियां हों, तो कोई न कोई ऐसा भी जरूर होना चाहिए जो उनकी कहानियां बयान कर सके. राजस्थान में लंबे वक्त से किसी कारगर और असरदार पब्लिक रिलेशंस एजेंसी की भारी कमी थी जो ग्राहकों और मीडिया की तेजी से बदलती जरूरतों को भी पूरा कर सके.
मैयोइट और राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास तथा निवेश निगम (आरआइआइसीओ) में मीडिया की जिम्मेदारी संभाल चुके पूर्व अधिकारी जगदीप सिंह ने यह बीड़ा उठाया और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर पीआर फर्म की स्थापना की.
गुलाबी शहर में 6 साल पहले जब से स्पार्क पीआर ने काम शुरू किया है इसने शहर में राज्य सरकार के साथ ही निजी क्षेत्र के बड़े आयोजनों में से कुछ का काम संभाला है. उनके संभाले गए ज्यादा बड़े और प्रतिष्ठित आयोजनों में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (जेएलएफ), जयपुर जूलरी शो (जेजेएस), रिसर्जेंट राजस्थान (आरआर) और ग्लोबल राजस्थान एग्रीटेक मीट (जीआरएएम या ग्राम) के अलहदा संस्करण शामिल हैं.
उनके कुछ मौजूद ग्राहकों में जयपुर का पूर्व राजपरिवार, जवाहर कला केंद्र, राज्य सरकार का पुरातत्व और संग्रहालय महकमा, कलकत्ता इलेक्ट्रिक सप्लाई कॉर्पोरेशन, आइआइएचएमआर, रामबाग पैलेस, जयपुर मैरियट वगैरह प्रमुख हैं. स्पार्क पीआर के सीनियर एडवाइजर जगदीप सिंह कहते हैं, ''हमने अपने ग्राहकों के कार्यक्रमों को बेरोकटोक कवर करने की सुविधा मीडिया को मुहैया करवाई है.
हमने छोटे, सारगर्भित और पठनीय प्रेस नोट मुहैया करवाने, कोट या उद्धरणों के साथ-साथ आमने-सामने इंटरव्यू दिलवाने वगैरह के लिहाज से बुनियादी बातों का पालन किया है." मगर जगदीप सिंह ने काम में दक्षता के साथ-साथ अपने अनौपचारिक रवैए की बदौलत भी लोकप्रियता हासिल की है. वे मीडिया के लोगों को अतिरिक्त जानकारी मुहैया करवाते हैं जिसे सरकार की पीआर शाखा मुहैया करवा पाने में नाकाम हो जाती है.

राजस्थान एनआरआइ थोड़े कम ही मशहूर हैं. इन्हीं में कम चर्चित कामयाबी की एक कहानी पूर्व बैंक कर्मचारी वी.पी. शर्मा की है जो पीटी मित्र आदिपरकासा टीबीके (एमएपी समूह), इंडोनेशिया के ग्रुप सीईओ हैं.
शर्मा एमएपी के साथ बतौर संस्थापक ग्रुप सीईओ 1990 में जुड़े थे. इंडोनेशियाई खुदरा कारोबार में उनके योगदान और एमएपी की अगुआई के लिए शर्मा को 2007 में अन्स्र्ट ऐंड यंग आंत्रपे्रन्योर ऑफ द ईयर (इंडोनेशिया) अवॉर्ड और 2012 तथा 2015 में सीएनबीसी के एशिया बिजनेस लीडर्स अवॉर्ड के लिए बतौर फाइनलिस्ट मनोनीत किया गया था.
उनकी अगुआई में एमएपी ने इन सालों के दौरान अभूतपूर्व तरक्की की जो नवंबर, 2014 में उसके आइपीओ के साथ सबसे ऊंचे मुकाम पर पहुंच गई.
आज एमएपी इंडोनेशिया की अग्रणी लाइफस्टाइल रिटेलर कंपनी है जिसके पास 26,000 से ज्यादा कर्मचारी, 2,200 से ज्यादा रिटेल स्टोर (वियतनाम और थाइलैंड की दुकानों सहित) और स्पोर्ट्स फैशन, डिपार्टमेंट स्टोर, किड्स, फूड ऐंड बीवरेज तथा लाइफस्टाइल उत्पाद सहित किस्म-किस्म की चीजों से भरा पोर्टफोलियो शामिल है.
इस प्रतिष्ठितब्रान्ड में कई दूसरों के अलावा स्टारबक्स, जारा, मार्क्स ऐंड स्पेंसर, एसओजीओ या सोगो, एसईआइबीयू या सेइबू, रीबोक भी शामिल हैं. एमएपी को 2012 में फॉर्चून इंडोनेशिया की मोस्ट एडमायर्ड कंपनीज (टॉप 20) और 2011 में फोर्ब्स इंडोनेशिया की शीर्ष 40 कंपनियों में चुना गया था. रिटेल कारोबार के अलावा एमएपी स्पोर्ट्स, किड्स और लाइफस्टाइल ब्रान्डों की अगुआ वितरक भी है.
वापस राजस्थान की ओर लौटें, तो मयूर यूनिकोटर्स ने हिंदुस्तान के सुपीरियर सिंथेटिक लेदर क्षेत्र में जबरदस्त कामयाबी हासिल की है और कई बाजारों में असली लेदर को बेदखल कर दिया है. साल 1992 में चमड़े के कद्रदानों की खातिर विश्वस्तरीय उत्पाद बनाने के लिए मयूर की स्थापना की गई थी. यह अपनी दक्षता, प्रतिबद्धता, गुणवत्ता नियंत्रण के कठोर उपायों और मूल्य संवर्धन के ऊंचे स्तर की बदौलत जल्दी ही अपने क्षेत्र का अगुआ बन गया.

सुरेश कुमार पोद्दार की अगुआई में आज मयूर ने पीयू/पीवीसी और पीयू-पीवीसी सिंथेटिक लेदर के मैन्युफैक्चरर के तौर पर 485 करोड़ रु. का टर्नओवर हासिल करके अपनी पहचान बनाई है. उनके साथ उच्च शिक्षा प्राप्त इंजीनियर और टेक्नोक्रेट हैं जो ग्राहकों को बेहतरीन देने में यकीन करते हैं.
मयूर ने इन-हाउस फैब्रिक निटिंग और प्रोसेसिंग सुविधाएं विकसित की हैं जो अगस्त 2012 से काम कर रही हैं. यह फोर्ड, क्रिसलर, जीएम इंडिया, बाटा और कई दुनिया भर की अन्य दिग्गज कंपनियों के लिए तेज रफ्तार से उत्पादों का निर्माण करती है.
पेशेवर दुनिया ने कई पुरस्कारों के साथ मयूर और उसके उत्पादों को मान्यता दी है जिनमें 2012 में एशिया प्रशांत क्षेत्र में ''फोर्ब्स एशिया टॉप 200 अंडर 1 बिलियन डॉलर एंटरप्राइजेज", 2015 में एसीएमए की ओर से एक्सपोर्ट एक्सीलेंस अवॉर्ड और प्रोडक्टिविटी काउंसिल अवॉर्ड तथा कई अन्य शामिल हैं.
पोद्दार 1968 में महज 22 साल की उम्र में नेशनल लेदर क्लॉथ कंपनी के कमिशन एजेंट के तौर पर चमड़े के व्यापार और वितरण में दाखिल हुए. उस वक्त वे हिंदुस्तान मोटर्स और बाटा को सप्लाई किया करते थे.
1976 में उन्हें पूर्वी भारत की डिस्ट्रिब्यूटरशिप मिली. उसके बाद जल्दी ही उन्हें मारुति को सप्लाई करने के लिए उसी (मारुति) के संयंत्र के नजदीक कहीं मैन्युफैक्चरिंग सुविधा स्थापित करने की पेशकश की गई.
1987 में उन्होंने एक और कारोबार शुरू किया और औद्योगिक जूते बनाने के लिए मयूर लेदर प्रोडक्ट्स लिमिटेड की आधारशिला रखी—ये जूते एक जर्मन कंपनी के कामगारों के पहनने के लिए थे.
तभी उन्हें एहसास हुआ कि फुटवियर, लेडीज बैग्ज और कार की अपहोल्स्टरी में सिंथेटिक लेदर का बहुत इस्तेमाल होता है. उन्होंने मयूर यूनीकोटर्स लिमिटेड (एमयूएल) को पहले दिन से ही पब्लिक लिमिटेड कंपनी बनाने का फैसला किया.
आज एमयूएल दुनिया भर के शीर्ष ऑटोमोबाइल कॉर्पोरेशन को सप्लाई करती है. वे अगुआ फुटवियर ब्रान्ड को भी सप्लाई करते हैं. मयूर दुनिया भर में होने वाली प्रतिष्ठित प्रदर्शनियों में हिस्सा लेती है और फर्निशिंग, वस्त्र तथा चमड़े की चीजों के उद्योगों के लिए कई किस्म के अच्छे गुणवत्तापूर्ण उत्पाद सप्लाई करती है. पोद्दार सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और समर्पित रोटैरियन भी हैं. पोद्दार बड़े उत्सुक गोल्फर भी हैं.
वे जयपुर जिले के 100 स्कूलों में अव्वल सुविधाओं, बेहतर साफ-सफाई और खेलों के लिए अच्छे मैदानों को बढ़ावा देने में निवेश करके इस इलाके के बच्चों को शिक्षित विश्व नागरिक बनाने का मंसूबा बना रहे हैं. उनका मकसद 32,000 छात्र-छात्राओं की जिंदगी को बेहतर बनाना है.
मगर लगता यही है कि राजस्थान में संगमरमर ने ही कइयों का करियर बनाया है. धूत संगमरमर के चेयरमैन और सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ स्टोंस के वाइस चेयरमैन अशोक धूत 1993 में खनन और कृषि वस्तुओं के अपने पारिवारिक कारोबार से हटकर स्टोन हैंडीक्राफ्ट के क्षेत्र में आ गए. एक दशक के भीतर ग्राहकों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए धूत दस्तकारों को ऑर्डर देने की बजाए खुद अपनी फैक्टरी लगाने और अपने कामकाज को कॉर्पोरेट शक्ल देने में सक्षम हो गए.
उन्होंने काम को रफ्तार देने के लिए ताजातरीन टेक्नोलॉजी अपनाई. उन्होंने घरेलू बाजार में भी मांग बढ़ती देखी और जल्दी ही अपने मुख्य कारोबार निर्यात की बजाए घरेलू बाजार पर ही ध्यान केंद्रित किया. आज 25 होटल उनके नक्काशीदार पत्थरों का इस्तेमाल कर रहे हैं. अपनी पत्नी और बेटे राघव की मदद से वे कामयाबी की नई नक्काशियां उकेर रहे हैं.
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