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सचिन की उपलब्धि के करोड़ों अनुयायी

रनों का विशाल पहाड़ खड़ा करने वाले सचिन तेंडुलकर का करियर सामूहिक विफलताओं के बीच एक अकेले की असाधारण विजय का अनोखा उदाहरण

अपडेटेड 26 नवंबर , 2013
पत्रकार को इस फेर में नहीं पडऩा चाहिए कि उसके लिखे का कैसा स्वागत होगा, उसे तो बस बैठकर लिख डालना चाहिए. लेकिन खिलाड़ी सचिन तेंडुलकर पर सीधे कलम चलाने के पहले मुझे जरा सचिन तेंडुलकर रूपी विषय पर एकाध बातें कर लेने दीजिए. मैंने उन पर बहुत लिखा है फिर भी मुझे हर बार खुशी और संतोष का एहसास होता है.

उन्हें खेलते देखना जितना आनंददायक है, उनके बारे में लिखना भी वैसा ही है— मौके-बेमौके उनके बहुआयामी और प्रेरणास्पद अंदाज की तरह. कई बार मेरे पेशे में किसी खिलाड़ी और उसके प्रदर्शन को बिना किसी उम्दा उदाहरण के ही 'प्रेरणास्पद’ कह दिया जाता है, यह जाने बगैर कि उससे सचमुच किसी को प्रेरणा मिली है या सिर्फ उत्साहितभर होकर रह गया है.

लेकिन तेंडुलकर के मामले में अनायास सतर्क हो जाना पड़ता है क्योंकि उन पर कलम चलाते वक्त आप यह सोचकर अपना श्रेष्ठ पेश करने की कोशिश करते हैं कि लोग इसे जरूर पढ़ेंगे, समझेंगे और गंभीरता से विचार करेंगे.

इसमें आश्चर्य नहीं कि उनके बारे में सोचकर ही मन खुश हो जाता है. तेंडुलकर का समय भी काफी हो-हल्ले और हंगामे वाला है. पिछली चौथाई सदी में तेजी से उभर रहे औसत क्रिकेट पत्रकारों का काफी समय मैदान में तीखे तेवरों, उग्र बयानों और मैदान के बाहर घपलों-घोटालों में ही ध्यान लगाने में बीता है.

वाकई, हम लेखकों को जितनी तेंडुलकर की दरकार है, उतनी ही उनके प्रशंसकों की. उन्होंने समय-समय पर हमें यह याद दिलाया है कि हम क्रिकेट पर ही क्यों लिखना चाहते हैं. तेंडुलकर जितनी आसानी से श्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं, उसने हमें फिर से अपने जवान प्रशंसक के संपर्क में रहने का अवसर दे दिया. इसी वजह से कभी-कभी हम लोग उनके संदर्भ को खो बैठते हैं, भावुक हो उठते हैं. उनकी महानता में हमने अपना कुछ स्वार्थ विकसित कर लिया है—कुल मामलों में वित्तीय स्वार्थ, भले ही मेरा नहीं सही.

पिछले कुछ वर्षों में उसकी परीक्षा भी हुई है. वे बेतरह संघर्ष करते देखे गए. कई मौकों पर उन्हें देख ऐसा लगा कि मरणोपरांत कोई योद्धा अपने युद्ध पोशाक में घोड़े पर बैठाकर किला तोडऩे भेज दिया गया हो. इसलिए खेल से उनकी विदाई का दुख तो है मगर एक तरह की राहत भी है क्योंकि अब तेंडुलकर को झेलते नहीं देखना पड़ेगा.

हम आखिरकार उस दुविधा से भी बाहर निकल पाएंगे कि उनके शून्य को कौन भरेगा. फिलहाल तो उनकी जगह कोई नहीं ले सकता, बस उनका उत्तराधिकारी ही तलाशना होगा. फुटबॉल टीमें प्रसिद्ध और नामी खिलाडिय़ों की जर्सी के नंबर अलग रख देती हैं, ताकि उनका उत्तराधिकार किसी पर बोझ न बने. लेकिन किसी को तो भारतीय टीम में चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करनी ही पड़ेगी, शायद विराट कोहली करें.

कोहली बेशक बेजोड़ खिलाड़ी हैं लेकिन उन्हें तेंडुलकर की ही तरह अपने दौर को कठिन मेहनत से परिभाषित करना होगा. लेकिन किन्हीं कमजोरियों की वजह से उनकी ख्याति नहीं होनी चाहिए क्योंकि मुझे डर है, आजकल खेल में बड़ी तेजी से बाहरी तत्वों का प्रभाव पडऩे लगा है. यही हमारे समय की विडंबना है. अब खूब पैसे वाला बन जाना आसान है लेकिन महान खिलाड़ी बनना बेहद मुश्किल है.

ऐसे में हम तेंडुलकर की महानता को कैसे समझें? आप क्रिकेट की महानता की पूर्व शर्तों को दो हिस्सों में बांट सकते हैं. पहला पहलू है प्रदर्शन और उपलब्धि. तेंडुलकर पूरे दौर में लगातार एक ही पैमाने पर खेलते रहे हैं. उन्होंने रनों का विशाल पहाड़ बनाया. उन्होंने खेल के मैदान में जो कमाल किया, वह खेलकूद की दुनिया में एक युग बन गया. और यह सब उन्होंने कभी बेमन से सिर्फ वक्त काटने के लिए नहीं किया.

उनका स्टैंडर्ड लगातार कायम रहा, उन्होंने उसको कभी गिरने नहीं दिया. क्रिकेट में हम 'फॉर्म’ की बात करते हैं. यह एक तरह की मध्यवर्ती अवस्था है. यह मूड, दौर या लहर की तरह आता-जाता रहता है. लेकिन तेंडुलकर का मामला अपवाद है, ब्रेडमैन के बाद किसी बल्लेबाज के मामले में 'फॉर्म’ इस कदर अप्रासंगिक नहीं लगा. बेशक उनके अच्छे और बुरे दिन रहे हैं, लेकिन यह उनके अपने बनाए पैमाने से तय होते हैं कि किसी गेंदबाज को लेकर उनमें दुविधा है या फिर किसी खास परिस्थिति में बेहद दबाव महसूस कर रहे हैं.

अगर कभी उन्होंने खुद को मुश्किल में पाया तो दर्शकों को यह एहसास नहीं होने दिया. अगर तेंडुलकर पिछले वर्ल्ड कप के बाद रिटायर हो गए होते तो उनके मामले में 'फॉर्म’ की चर्चा कभी नहीं होती. और शायद उनका दमदार बल्ला हमेशा बुलंदी पर होता. भारतीय टीम के चयनकर्ताओं की बेशक अपनी चुनौतियां रही हैं, लेकिन एक मायने में वह आसान भी रही है. उन्हें हर बार सिर्फ 10 खिलाडिय़ों को ही चुनने की जरूरत रहती थी, तेंडुलकर तो टीम की सूची में हमेशा शामिल रहते थे, बशर्ते वे उपलब्ध हों.

महानता का दूसरा पहलू आंकड़ों और संदर्भों का है. जरा इस पर गौर कीजिए. तेंडुलकर 199 टेस्ट खेल चुके हैं. इनमें भारत 71 में जीता और 56 हार गया. पहली नजर में यह आंकड़ा उतना नहीं चौंकाता, जितना उनका व्यक्तिगत रिकॉर्ड. यह रिकी पोंटिंग के जीत-हार के आंकड़ों के सामने फिसड्डी साबित होता है, जैसे वे 168 टेस्ट खेले तो 108 में उनकी टीम जीती और सिर्फ 31 में ही हार का मुंह देखना पड़ा.

इसी तरह 463 एकदिवसीय इंटरनेशनल मैचों में तेंडुलकर खेले तो 234 मैच भारत जीता. ऑस्ट्रेलिया के 375 एकदिवसीय मैचों में पोंटिंग खेले और उनकी टीम 262 मैच जीत गई. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि तेंडुलकर के दौर में भारत का भाग्य औसत सफलता का ही रहा है, खासकर विदेशी धरती पर. और इस पूरे दौरे में भारत सिर्फ एक ही वर्ल्ड कप हासिल कर पाया, जो पोंटिंग के मामले में ट्रॉफियों, ट्रिंकेट और अन्य प्रशंसा पत्रों की ढेर के सामने कुछ भी नहीं है.

न ही तेंडुलकर उस मैच में कुछ खास कर पाए, जिसकी ट्रॉफी उन्हें समर्पित की गई. कोहली ने बाद में कहा, ''उन्होंने पिछले 21 साल तक राष्ट्र का सम्मान अपने कंधों पर उठाए रखा है. इसलिए अब समय आ गया है कि हम उन्हें अपने कंधों पर उठाएं.”

बतौर कप्तान तेंडुलकर का दौर ऐसा बेमानी साबित हुआ कि उन्होंने कुछ विरोधी स्वरों के बाद ही समर्पण कर दिया और कभी इस भूमिका की कतार में खड़े नहीं हो पाए. वे बतौर अगुआ 25 टेस्ट मैचों में सिर्फ चार ही मैच जीत पाए. यह उनके करियर पर कोई धब्बा नहीं, बल्कि एक शून्य की तरह है. न उन्होंने कप्तानी में कोई छाप छोड़ी, न कप्तानी का उन पर कोई असर हुआ.

अगर यहीं रुक जाएं तो हम ज्यादा कुछ नहीं जान पाएंगे. तेंडुलकर के रिकॉर्ड की जरा गावसकर से तुलना कीजिए. गावसकर ने 125 टेस्ट खेले, जिसमें भारत 23 जीत पाया और 34 हार गया. वे 108 एक दिवसीय खेले, जिसमें भारत 49 जीता और 56 हार गया. इस तरह गावसकर के करियर का कुल जमा यह है कि एक टेस्ट ड्रॉ किया और एक एकदिवसीय हार गए.

लेकिन तेंडुलकर का दौर वह है, जिसमें भारत दुनिया की बाकी टीमों से मामूली नहीं, बल्कि अच्छी बढ़त हासिल करने के लिए दमखम पाने का संघर्ष कर रहा था और उसने वह हासिल करके दिखाया. इसके सबूत में अनेक आंकड़े खड़े हैं. यह कठिन संक्रमण का दौर रहा है, जिसमें भारतीयों ने बाकी दुनिया के मुकाबले अपने बारे में धारणा बदली है. इस इंडिया शाइनिंग के प्रतीक के रूप में तेंडुलकर बेहद गौरवान्वित नहीं दिखे हैं.

वे शांत और विनम्र बने रहे हैं. लेकिन उन्होंने अपने पुराने और नए दौर में गौरवान्वित स्थान हासिल करके अपने देश को अजेय बनाने में काफी मदद की है. उन्होंने क्रिकेट और अपने देशवासियों के लिए एक नया संसार खोल दिया और इसी वजह से यह खेल और देश उनका सम्मान करता है.

जीत-हार के अनुपात में एक तरह का नैतिक सबक भी है. अपने दौर के सबसे मजबूत बल्लेबाज के मैदान में होने के बावजूद भी भारत सिर्फ एक-तिहाई टेस्ट ही जीत पाया. दूसरे शब्दों में कहें तो तेंडुलकर महान बेशक हैं, लेकिन वे अकेले कोई कामयाबी की इमारत नहीं खड़ी कर सकते. इसके लिए महान टीम की जरूरत होती है. जैसा कि पोंटिंग के करियर के दौरान ज्यादातर रहा है और उनकी टीम आला स्तर पर रही है.

तेंडुलकर कई अनोखी टीमों में कुछ अनोखे खिलाडिय़ों के साथ खेल चुके हैं. लेकिन भारत को नंबर-वन टेस्ट टीम की हैसियत थोड़े समय के लिए मिल पाई है. एकदिवसीय मैचों की तालिका में तो वह कभी सबसे ऊपर नहीं रही. इस तरह कहा जा सकता है कि गावसकर ने जो मिशन शुरू किया, तेंडुलकर ने उसे आगे बढ़ाया, लेकिन शायद कोई अकेला उसे पूरा नहीं कर सकता.

महानतम क्रिकेट हीरो भी अपने अकेले दम पर दुनिया का सिरमौर नहीं बन सकता, खासकर अब जबकि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट तीन हिस्सों में बंट गया है. भारतीय क्रिकेट की बुलंद इमारत के निर्माण में द्रविड़, गांगुली, लक्ष्मण, सहवाग, धोनी, कुंबले और जहीर ने तेंडुलकर की मदद की, अब कोहली, धवन, पुजारा और रोहित को उसकी बुलंदी बनाए रखनी है. इस तरह तेंडुलकर का करियर व्यक्तिगत विजय की इबारत है, जिससे सामूहिकता के महत्व का भी पता चलता है.

इसी तरह, तेंडुलकर का करियर एक व्यक्ति की अनोखी प्रगति में लाखों अन्य लोगों की पैरों की आहट है. यह शायद दूसरे मैदानों से अधिक स्वाभाविक रूप से एथिलीटों के बारे में कहा जा सकता है, लेकिन तेंडुलकर तो उस दूसरी जमात में हैं, जिसे जी.के. चेस्टरटन अपने प्रसिद्ध उक्ति में कहते हैं, ''महान वह होता है जो दूसरों को छोटा साबित कर देता है, लेकिन असली महान व्यक्ति वह होता है जो हर मनुष्य को महानता का अनुभव कराता है.”

और तेंडुलकर के मामले में खासकर भारत में हर महिला-पुरुष, गरीब-धनी, कमजोर-ताकतवर, और साथ ही जहां भी क्रिकेट खेला जाता है, उसके लोग शामिल हैं. इसमें पत्रकार भी हैं.
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