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सचिन तेंडुलकर: गेंदबाजों के लिए खौफ

सचिन का 5 फुट 5 इंच का कद तेज गेंदबाजों के मन में हमेशा एक तरह की दहशत पैदा करता रहा है.

अपडेटेड 26 नवंबर , 2013
जरा इस परिदृश्य पर गौर करें: एक असली तेज गेंदबाज अपने रन-अप के छोर पर खड़ा है. लंबा-तड़ंगा, चेहरे पर सफेद रंग का पेंट; वह दौडऩा शुरू करता है, रफ्तार पकडऩे के साथ उसके हाथ और पैर एक लय में चल रहे हैं.

यह वह डरावना नजारा है जो अच्छे-अच्छे बल्लेबाजों को रातभर चैन से सोने नहीं देता. वे यही सोचकर करवट बदलते रहते हैं कि अगली सुबह वे कैसे उस गेंदबाज का सामना करेंगे.

अब जरा क्रीज पर खड़े सचिन की तस्वीर देखें. 5 फुट 5 इंच का उनका कद काफी छोटा दिखता है. उनका बल्ला ऑफ. स्टंप की सीध में है. उनकी सौम्य नजरें हेलमेट के पीछे से झांक रही हैं. ताज्जुब की बात है कि ये सौम्य नजरें दो दशकों से दुनियाभर के तेज गेंदबाजों के दिलों में खौफ पैदा करती आ रही हैं.

सचिन में ऐसा क्या है जिससे निपटना गेंदबाजों के लिए बड़ा दु:स्वप्न बन जाता है? गेंदबाजों को समझ में नहीं आता था कि वे सचिन को कैसी गेंद करें, जिससे वे उनके स्ट्रेट ड्राइव, कवर ड्राइव और गेंद को बल्ले से छूकर सीमा के पार पहुंच जाने से बच सकें. उनके खिलाफ  गेंदबाजी करना सचमुच कितना मुश्किल होता था?

सियालकोट में सचिन की पहली सीरीज के चौथे टेस्ट में उनके चेहरे पर एक बाउंसर फेंकने वाले वकार यूनुस कहते हैं कि उस घटना को लोगों के सामने सही ढंग से नहीं पेश किया गया था. पाकिस्तान के पूर्व कप्तान ने इंडिया टुडे  को बताया, ''पहली बात, मैं नहीं समझता कि गेंद उतनी जोर से उन्हें लगी थी, जितनी बयान की जाती रही है.

मैं करीब 145 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से गेंद फेंक रहा था. लेकिन वह दस्ताने से टकराकर सचिन के चेहरे पर लग गई. वे नीचे बैठ गए. हमने आपस में बात की, हाथ मिलाया और एक मिनट के भीतर वे खेलने के लिए खड़े हो गए.”
वकार यूनुस
वकार कहते हैं कि उस घटना को बहुत बड़ा रूप दे दिया गया. 1989 के दौरे से पहले भारत के अंडर-19 दौरे के समय पाकिस्तानी टीम ने अजय जाडेजा से 16 साल के जिस लड़के के बारे में सुना था, उसने दोबारा अपने ऊपर किसी गेंदबाज को हावी नहीं होने दिया. बकौल वकार, ''मुझे याद है कि हमने अपनी पहली टीम मीटिंग में उनको लेकर ज्यादा चिंता नहीं जताई की थी.

हम तो कृष्णमाचारी श्रीकांत, मोहम्मद अजहरुद्दीन, कपिल देव और मनोज प्रभाकर जैसे अहम खिलाडिय़ों के बारे में सोच रहे थे. लेकिन दौरा खत्म होते-होते सचिन के बारे में हमारी राय पूरी तरह बदल चुकी थी.”

अगले कुछ वर्षों में जब भारत और पाकिस्तान नियमित रूप से एकदिवसीय मैच खेलने लगे तो पाकिस्तान के ड्रेसिंग रूम में सारी बातचीत का मुद्दा यही होता था कि सचिन को कैसे थामा जाए. ''हम समझ चुके थे कि अगर हमने उन्हें पहले कुछ ओवरों में आउट नहीं किया तो वे हमें भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं.”

वकार कहते हैं कि सचिन के खेल में कोई खास कमजोरी नहीं थी, जिसका फायदा उठाया जा सके, और वक्त के साथ उनकी बल्लेबाजी और भी निखरती चली गई, ''एक तेंज गेंदबाज के तौर पर आप किसी बल्लेबाज को एक ही पैटर्न पर अलग-अलग तरह की गेंदें फेंकते हैं और उसे गलती करने के लिए मजबूर करते हैं.

मैंने अब तक जितने भी बल्लेबाजों के खिलाफ गेंदबाजी की है, उनमें सचिन उस पैटर्न को पढऩे में सबसे अच्छे थे. लेकिन मैंने हमेशा महसूस किया है कि सचिन को पारी की शुरुआत में तेज रफ्तार से अपनी ओर आती गेंदों को खेलने में कुछ हद तक मुश्किल होती थी.”

1990 के दशक के एक और महान गेंदबाज एलन डोनाल्ड ने 1997 में भारत के दक्षिण अफ्रीका दौरे से पहले सचिन के बारे में इतना ज्यादा सुन रखा था कि उन्होंने वेस्ट इंडीज के तेज गेंदबाज कर्टली एंब्रोस और कोर्टनी वाल्श से सलाह ली, क्योंकि वे दोनों सचिन को कई बार एलबीडब्लू आउट कर चुके थे.

वे कहते हैं, ''आम तौर पर तेज गेंदबाज अपने रहस्य किसी को नहीं बताते, लेकिन वे जानते थे कि मैं किसके खिलाफ खेलने जा रहा था. इसलिए उन्होंने भलमनसाहत दिखाते हुए सचिन के खेल के बारे में मुझे जरूरी जानकारियां दे दीं.”

एंब्रोस और वाल्श ने डोनाल्ड को बताया कि वे सचिन को शुरू में ही पूरी लंबाई की गेंदें डालें और उन्हें खेलने के लिए मजबूर करें. उन्होंने बताया कि सचिन आराम से क्रीज पर खड़े रहते हैं और उन गेंदों को छोड़ देते हैं, जिन्हें वे नहीं खेलना चाहते.

डोनाल्ड के शब्दों में, ''उन्होंने सलाह दी कि मैं उन्हें फुल लेंथ और ऑफ  स्टंप के बाहर तिरछी गेंदें फेंकूं.” सलाह काम आई लेकिन सिर्फ एक बार. सचिन टेस्ट सीरीज में एक बड़ा शतक लगाने में कामयाब रहे. डोनाल्ड तीन टेस्ट मैंचों में उन्हें सिर्फ एक बार आउट कर सके.
शोएब अख्तर
सचिन का करियर 1990 के दशक के मध्य में जब तेजी से आगे बढ़ रहा था तो हर गेंदबाज के लिए सबसे मुश्किल काम यह होता था कि उनके खिलाफ  किस तरह की तैयारी की जाए. पाकिस्तान के शोएब अख्तर कहते हैं, वे जानते थे कि उन्हें सचिन को बाकी खिलाडिय़ों से अलग रखकर देखना होगा. ''मैंने कभी भी सचिन के साथ गाली-गलौज नहीं की.

कुछ खिलाड़ी ऐसे होते हैं जिन्हें छोड़ देना ही बेहतर रहता है. वे ऐसे खिलाड़ी हैं जो त्यौरियों का जवाब ज्यादा जोर से बल्ला चलाकर देते हैं.” 'रावलपिंडी एक्सप्रेस’ अख्तर ने 1999 में लगातार दो गेंदों पर राहुल द्रविड़ और सचिन को आउट करके नाटकीय अंदाज में अपना टेस्ट करियर शुरू किया था.

अख्तर कहते हैं, उन्हें यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि सचिन के खिलाफ उनकी ज्यादातर योजनाएं विफल रही हैं. ''मैं सोचता था, अगर मैं ऐसी बॉल करूंगा तो वे इस तरह खेलेंगे, और तब मुझे आउट करने का मौका मिल जाएगा.

2003 के विश्व कप में मैंने उन्हें यह सोचकर ऑफ स्टंप के बाहर शॉर्ट पिच गेंद फेंकने की कोशिश की कि वे गेंद को पुल करेंगे. लेकिन उन्होंने उसे प्वाइंट के ऊपर से उठाकर छक्का जड़ दिया. इस शॉट ने उन्हें मशहूर कर दिया था.”

अख्तर हंसते हुए बताते हैं, ''फिर मैंने उनके शरीर पर गेंद करने का फैसला किया. लेकिन उन्होंने मेरी गेंद को फ्लिक कर दिया. मैंने फुल लेंथ गेंद फेंकी, उन्होंने उसे सीधे खेल दिया.” वे इसी तरह गेंदबाजों की लय बिगाड़ दिया करते थे.

नेट पर और घरेलू क्रिकेट में सचिन के खिलाफ शायद सबसे ज्यादा गेंदबाजी कर चुके जवागल श्रीनाथ कहते हैं कि सचिन के खिलाफ गेंदबाजी करते समय आपका दिमाग हर वक्त चलते रहना चाहिए. अगर आपने पहले से कोई योजना बनाई है, तो वे उसे कभी कामयाब नहीं होने देंगे.

अगर आप उन्हें नहीं रोक पाए तो आपके हाथ से खेल निकल जाएगा. श्रीनाथ कहते हैं, ''मैं दक्षिण अफ्रीका के तेज गेंदबाज फैनी डि विलियर्स को जानता हूं जो सचिन से एक कदम आगे सोच सकते थे और उन्हें हमेशा आउट करने में कामयाब रहते थे.”

सचिन के साथ दशकभर से ज्यादा समय तक खेल चुके श्रीनाथ कहते हैं कि सचिन गेंदबाजों की तरकीबों को इतनी अच्छी तरह से जानते थे कि वे दूसरे छोर पर खड़े बल्लेबाज को बताते रहते थे कि गेंदबाज अगली बार कैसी गेंद फेंकने वाला है.

उनके शब्दों में, ''सचिन बताते रहते थे, अब यह ऊपर डालेगा या थोड़ा छोटा मारेगा. उनका अंदाजा 90 फीसदी सही होता था.”

बेशक, सचिन में कई कमजोरियां भी थीं. लेकिन वे उन कमजोरियों को दूर कर लिया करते थे. अपनी इसी खूबी की वजह से दूसरों के मुकाबले हमेशा आगे रहते थे. 2003-04 में ऑस्ट्रेलिया दौरे के समय सिडनी में 241 रन बनाकर उन्होंने अपने इसी गुण का परिचय दिया था.

बल्लेबाजी की यही तो कला है कि आप अपनी मजबूतियों का फायदा उठाएं और कमजोरियों को ज्यादा से ज्यादा दूर करें. इसी कला ने तो छोटे कद के एक खिलाड़ी को दुनिया में क्रिकेट के शिखर पर विराजमान कर दिया है.    

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