तारीख थी 11 अक्तूबर. दोपहर बाद तीन बजने वाले थे कि मेरा फोन घनघनाने लगा. ‘अननोन नंबर’ (अनजान नंबर) देखकर मैं सोचने लगा कि किसका हो सकता है. सचिन तेंडुलकर से तो सुबह ही लंबी-चौड़ी बातचीत हुई है, वे तो हो नहीं सकते. वे भला क्यों फोन करेंगे. इसी उधेड़बुन में मैंने फोन उठाया. सचिन बिना लाग-लपेट के बोले, “मुझे लगा कि आपको बता दूं कि मैंने वेस्ट इंडीज शृंखला के बाद रिटायर होने का मन बना लिया है. मैंने अपना फैसला बीसीसीआइ को बता दिया है.”
कुछ देर तक तो मुझे समझ में ही नहीं आया. पिछले ढाई साल से उनकी आत्मकथा पर काम करने के दौरान उनसे इस बारे में कई बार बात हुई है. हमने रोज भी सुबह में इस मामले पर बात की थी. फिर भी मुझे इसका कतई अंदाजा न था. कुछ देर सन्न रहने के बाद जैसे मैंने होश संभाला. लेकिन सचिन की आवाज शांत और संतुलित थी, “भावुक मत बनो. अंजलि (उनकी पत्नी) और अजित (उनके भाई) भावुक हो रहे हैं. मुझे रिटायरमेंट के पहले ही रिटायर क्रिकेटर की तरह न पेश करो.” और फिर हंसकर बोले, “मुझे अभी तो दो टेस्ट खेलना है और मैं ठीक से खेलना चाहता हूं.”
सचिन वेस्ट इंडीज शृंखला की योजना बनाना शुरू कर चुके थे. उन्हें अंदाजा था कि अगले कुछ हफ्तों में उनके इर्दगिर्द क्या होने वाला है इसलिए उन्होंने तय किया था कि इस भावुकता के ज्वार और उत्तेजना से खुद को अलग रखेंगे. अब वक्त अलविदा कहने की वेला की तैयारी का था. आधी रात बीत चुकी थी और मास्ट ब्लास्टर सचिन जगे हुए थे. वे समूचे भारत को अपने आगोश में ले चुकी घोषणा से संतुलन कायम करने की कोशिश कर रहे थे; वे उस हकीकत को स्वीकार करने की कोशिश कर रहे थे कि उन्होंने क्रिकेट के खेल को अलविदा कहने का फैसला किया है जो 30 साल से उनकी जिंदगी रहा है.
चालीस साल की उम्र के बाद रिटायर जीवन कैसा होगा? वे 19 नवंबर के बाद क्या करेंगे? क्या भविष्य की योजनाएं तैयार कर ली गई हैं? ये कठिन सवाल हैं और अभी इनके कोई निश्चित जवाब नहीं हैं. सचाई तो यह है कि उन्होंने भी अभी इस पर विचार ही नहीं किया है. जो सचिन को जानते हैं, उन्हें पता है कि वे अभी रिटायरमेंट का सामना करने को तैयार नहीं हैं. अभी उनके सामने एक दायित्व पूरा करने को हैः आखिरी बार भारत के लिए मैदान में उतरने का. अभी तो उनके दिमाग में यही छाया हुआ है. रिटायर होने के बाद उनके लिए तीन अलग-अलग संभावनाएं हैं. एक, जैसा कि नीता अंबानी ने पुष्टि की है, सचिन 2014 आइपीएल में मुंबई इंडियन के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. दूसरे, राज्यसभा सदस्य के रूप में, सचिन हमेशा ही जमीनी स्तर पर खेल के विकास में योगदान करने की इच्छा पालते आए हैं. उन्होंने इसी साल मानव संसाधन विकास और खेल मंत्रालयों को आगे की योजनाओं के बारे में एक अध्ययन पत्र पेश किया है. वे उन योजनाओं पर आगे काम करना चाहेंगे. आखिर में, वे घर पर अंजलि और बच्चों—अर्जुन और सारा—के साथ समय बिताना चाहते हैं जो उनके खेल में व्यस्तता के कारण अधूरा-सा रह गया है.
अब वे अपना किटबैग खूंटी पर टांगने का फैसला कर चुके हैं, तो उनके लिए क्रिकेट का अर्थ क्या रह जाएगा? इसी सवाल के जवाब में उनके रिटायरमेंट के बाद जिंदगी का राज जानने में मदद मिल सकेगी. सीधे-सीधे कहें तो क्रिकेट ही उनकी जिंदगी है. यही उनका जज्बा, जीविका, उद्यम और पेशा है. मैंने 2012 के प्रारंभ में ऑस्ट्रेलिया टेस्ट शृंखला के बीच में उनसे उनकी रिटायरमेंट योजना के बारे में पूछा था. मैं उनसे जानना चाह रहा था कि उनके जीवन पर जो किताब मैं लिख रहा हूं, उसे समेटने के बारे में उनके क्या विचार हैं. उन्होंने तपाक से कहा, “अभी हम उस पर बात न करें तो अच्छा. हम देखेंगे कि कब हम उस मुकाम पर पहुंचते हैं.” यह कहते हुए उनकी आंखों में उभरी आशंकाओं को पढ़ पाना मुश्किल नहीं था. मानो वे क्रिकेट खेलने के लिए ही पैदा हुए हैं और उसे एक दिन छोड़ देने का विचार ही उनके लिए डरावना है. अंत में शायद रिकॉर्ड, प्रशंसाएं, आंकड़े कुछ भी मायने नहीं रखते. बस वे यही चाहते हैं कि बल्ला उठाएं और अपने 22 गज के मंदिर की ओर दौड़ जाएं. वही उनका एकमात्र आश्रय है और उसे ही अब वे छोडऩे जा रहे हैं.

सचिन के अलविदा कहने का ख्याल जाहिर करने के कई दिन बाद मैंने उनसे आग्रह किया कि पुस्तक के अगले अध्याय के लिए वे कुछ समय निकाल लें. यह दर्ज करना जरूरी है कि किस बात ने उन्हें घोषणा करने को प्रेरित किया. सचिन ने कोई रुचि नहीं दिखाई. उनका ध्यान वेस्ट इंडीज के मैच की तैयारी में लगा था. उसमें वे बेहतरीन प्रदर्शन करना चाहते थे. उन्होंने कहा, “यह शृंखला खत्म होने के बाद हम किताब पर ध्यान दें. अभी मैं अगले कुछ हफ्ते अभ्यास पर ध्यान देना चाहता हूं.” यह निष्कर्ष निकालना आसान था कि वे सही फ्रेम में आने के लिए हरियाणा के खिलाफ रणजी ट्रॉफी मैच खेलेंगे.
लेकिन लाहली में उनके साथ क्या होना है, इसका अंदाजा हमें नहीं था. उन्होंने पहले दिन का खेल खत्म होने पर लिखा, “पिच पर काफी हरियाली थी.” वे पहली पारी में 5 रन बनाकर अचानक उठी गेंद पर आउट हो गए थे. दूसरी पारी में मुंबई 236 रनों का पीछा करते हुए शुरुआती विकेट गंवा चुकी थी. सचिन जानते थे कि उन्हें क्या करना है. यही वे 24 साल से करते आए हैं. इस बार उन्होंने मुंबई के लिए आखिरी मैच जिताऊ 79 रनों की पारी खेली. उन्हें पता था कि सारा देश देख रहा है. वे यह भी जानते थे कि इतिहास में पहली बार रणजी ट्रॉफी के मैचों के प्रति दीवानगी सास-बहू सीरियल जैसी टीआरपी हासिल कर लेगी.
मैच खत्म होने के बाद उन्होंने लिखा, “वाकई अच्छी तैयारी हुई. पिच में गेंदबाजों के लिए काफी कुछ था. ईश्वर महान है.” क्या वे दक्षिण अफ्रीका शृंखला की तैयारी की बात कर रहे थे या कोलकाता और वानखेड़े के दो मैचों की? क्या वे, एक पल को, यह भूल गए कि वे दक्षिण अफ्रीका नहीं जा रहे हैं? उन्हें हरी घास वाली पिच ईडन गार्डेन या वानखेड़े में तो नहीं मिलने वाली थी, तो फिर किसकी तैयारी की बात कर रहे थे?
सचिन कोलकाता में 3 नवंबर की रात पहुंचे. यानी किसी टेस्ट मैच के लिए आम तौर पर पहुंचने वाले समय से एक दिन पहले. अगली सुबह 10 बजे से भारतीय टीम का अभ्यास चल रहा था. वे 4 तारीख को ही तड़के की उड़ान पकड़ सकते थे. उन्हें घर पर दिवाली न मनाना मंजूर था लेकिन उनके लिए अपने 199 वां टेस्ट का अभ्यास छोडऩा मंजूर नहीं था. हम 4 नवंबर को ताज बंगाल होटल में मिले तो बारीकियों पर उनके ध्यान को जान सके. सचिन अपने बल्ले के साथ मशगूल थे. बल्ले के हत्थे के नीचे लोगो थोड़ा उधड़ा हुआ था. मैंने उनसे पूछा कि यह कैसे हुआ, “आखिरी मौके पर बल्ले का लैमिनेशन किया गया और जब आप उछाल भरी पिच पर खेलते हैं तो, जैसा लाहली में था, किनारा लग सकता है. मैं यह मौका नहीं देना चाहता.” इतनी बारीकी पर ध्यान खेल ही नहीं, किसी भी क्षेत्र में अपवाद स्वरूप ही देखने को मिलती है. उनके एक प्रमुख प्रतिद्वंद्वी एलन डोनाल्ड कहते हैं, “उनकी तैयारी ही उन्हें पोंटिंग और लारा से अलग करती है. यही पिछले ढाई दशकों से उनके बने रहने का राज है.”
ईडन में पहले दिन दो अप्रत्याशित दर्शक भी थे अंजलि और अर्जुन. उन दोनों में से किसी के आने की उम्मीद नहीं थी और सचिन उन्हें देखकर चौंक गए. अंजलि दो हफ्ते से कह रही थीं कि वे कोलकाता नहीं जाना चाहतीं क्योंकि इससे सचिन का ध्यान बंटेगा. आखिरी मौके पर वे खुद को रोक नहीं पाईं. अंजलि कहती हैं, “मिसेज नीता अंबानी के जन्मदिन की पार्टी में मेरी एक अजीज दोस्त ने मुझसे कहा कि कुछ दिनों बाद तुम अपने जीवन में यह मौका कभी नहीं पा सकोगी. वह बड़ा डरावना एहसास था और जब सचिन कोलकाता के लिए निकलने लगे तो उन्होंने कहा कि आखिरी बार मैं किसी टेस्ट मैच में शहर से बाहर जाने के लिए तुम्हें गुडबाइ कह रहा हूं. वे एयरपोर्ट के लिए निकले तो मैं अपने आंसू नहीं रोक पाई. तभी मैंने कोलकाता जाने का इरादा बना लिया.”

सचिन अर्जुन के साथ अंजलि को देखकर खुश हो गए. पहले दिन के खेल के बाद वे अपने कमरे में उनके साथ एक घंटे बिता पाए. उन्होंने अर्जुन को एक गेंद दी जिसे वह मुंबई ले गया. अंजलि हंसकर कहती हैं, “हम घंटेभर साथ रहे लेकिन उस दौरान भी एक बार भी सचिन ने बल्ले को अपने से दूर नहीं किया.” वे अगले दिन अपनी पारी की तैयारी में लगे थे.
हालांकि यह जरूरी नहीं कि अच्छी तैयारी से हमेशा अच्छे नतीजे निकलें. गेंद सचिन के घुटने के ऊपर पैड पर लगी और अंपायर निगेल लांग की उंगली उठ गई जबकि गेंद साफ-साफ स्टंप के ऊपर जा रही थी.
सचिन जान गए कि अब मौका खत्म. रोहित शर्मा के पहले ही टेस्ट में शतक की बदौलत भारत रनों का अंबार लगा रहा था और शमी अहमद की अच्छी गेंदबाजी से वेस्ट इंडीज ढेर हो गई थी. सचिन के पास अब बल्लेबाजी करने की वानखेड़े में बस दो संभावनाएं थीं. वे यह सोचकर कुछ हैरान भी थे कि उनके मामले में बेहतरीन अंपायर सिमोन टॉफेल, अलीम डार, रॉड टक्कनर और निगेल लांग क्यों कई बार साधरण चूक कर बैठते हैं. क्या उनकी छवि अंपायरों पर अतिरिक्त दबाव बना देती है? सचिन इन सवालों को बहस के लिए छोड़कर अपने आखिरी टेस्ट के लिए मुंबई रवाना हुए. अंजलि अपने पति की शानदार सफलता देखना चाहती थीं लेकिन वे दिल मसोस कर रह गईं.
हालांकि कोलकाता ने आंशिक रूप से इस निराशा की भरपाई की. शानदार विदाई की छाप उनके मन पर हमेशा बनी रहेगी. सौरभ गांगुली ने जैसे अपने क्रिकेट के सबसे प्यारे दोस्त सचिन को गले लगाया, उससे ईडन गार्डेन के दर्शक भी दंग रह गए. सचिन तो बेहद भावुक थे ही. उन्हें इससे भी खुशी हुई कि 199 किलो गुलाब की पंखुडिय़ां उन पर नहीं डाली गईं, जैसी कि पहले योजना थी. उनके एक करीबी दोस्त विवेक पालकर ने ठहाका लगाते हुए कहा, “वह तो दब ही जाता.” इस पर कोलकाता पहुंचे उनके एक और बचपन के दोस्त ने चुटकी ली, “कम से कम उसमें से अच्छी खुशबू आती.” वे उनका मैच देखने गए थे.
वानखेड़े की वेला आई तो सचिन फिर तैयारी में जुट गए. वे उसी चीज की तैयारी करने लगे जिसके लिए उन्हें जाना जाता है—परफेक्शन की तैयारी.
यह मौका उनके लिए इसलिए भी खास है कि पहली बार उनकी मां रजनी दर्शकों में शामिल होंगी. कोलकाता टेस्ट खत्म होने के फौरन बाद सचिन ने कानपुर में अपने दोस्तों को अपनी बीमार मां के लिए एक जोड़ी विशेष जूतों की याद दिलाई, ताकि उन्हें वानखेड़े में चलने में आसानी हो. स्टेडियम में एक रैंप उनकी निगरानी में बना ही है.
आखिरी टेस्ट की पूर्व संध्या पर सचिन के करीबी दोस्तों ने उनके सम्मान में एक पार्टी का आयोजन किया. इसका आयोजन बचपन के दोस्त सुनील हर्षे ने किया है. वे इसे महान खिलाड़ी को ‘सचिन गैंग’ की ओर से निजी उपहार कहते हैं. इंडिया टुडे के 12 नवंबर को ‘सलाम सचिन’ कान्क्लेव में अंजलि ने कहा, “हम हर पल को जीना चाहते हैं. हर भावना हमारे लिए विशेष है. सचिन और मैं इन दिनों को हमेशा याद रखेंगे.” वे इन दिनों को याद रखेंगे लेकिन एक राष्ट्र के रूप में हम सभी 24 वर्षों को कभी नहीं भूल पाएंगे.
(इंडिया टुडे ग्रुप के सलाहकार संपादक (खेल) बोरिया मजूमदार सचिन तेंडुलकर के आधिकारिक जीवनीकार हैं. )
कुछ देर तक तो मुझे समझ में ही नहीं आया. पिछले ढाई साल से उनकी आत्मकथा पर काम करने के दौरान उनसे इस बारे में कई बार बात हुई है. हमने रोज भी सुबह में इस मामले पर बात की थी. फिर भी मुझे इसका कतई अंदाजा न था. कुछ देर सन्न रहने के बाद जैसे मैंने होश संभाला. लेकिन सचिन की आवाज शांत और संतुलित थी, “भावुक मत बनो. अंजलि (उनकी पत्नी) और अजित (उनके भाई) भावुक हो रहे हैं. मुझे रिटायरमेंट के पहले ही रिटायर क्रिकेटर की तरह न पेश करो.” और फिर हंसकर बोले, “मुझे अभी तो दो टेस्ट खेलना है और मैं ठीक से खेलना चाहता हूं.”
सचिन वेस्ट इंडीज शृंखला की योजना बनाना शुरू कर चुके थे. उन्हें अंदाजा था कि अगले कुछ हफ्तों में उनके इर्दगिर्द क्या होने वाला है इसलिए उन्होंने तय किया था कि इस भावुकता के ज्वार और उत्तेजना से खुद को अलग रखेंगे. अब वक्त अलविदा कहने की वेला की तैयारी का था. आधी रात बीत चुकी थी और मास्ट ब्लास्टर सचिन जगे हुए थे. वे समूचे भारत को अपने आगोश में ले चुकी घोषणा से संतुलन कायम करने की कोशिश कर रहे थे; वे उस हकीकत को स्वीकार करने की कोशिश कर रहे थे कि उन्होंने क्रिकेट के खेल को अलविदा कहने का फैसला किया है जो 30 साल से उनकी जिंदगी रहा है.
चालीस साल की उम्र के बाद रिटायर जीवन कैसा होगा? वे 19 नवंबर के बाद क्या करेंगे? क्या भविष्य की योजनाएं तैयार कर ली गई हैं? ये कठिन सवाल हैं और अभी इनके कोई निश्चित जवाब नहीं हैं. सचाई तो यह है कि उन्होंने भी अभी इस पर विचार ही नहीं किया है. जो सचिन को जानते हैं, उन्हें पता है कि वे अभी रिटायरमेंट का सामना करने को तैयार नहीं हैं. अभी उनके सामने एक दायित्व पूरा करने को हैः आखिरी बार भारत के लिए मैदान में उतरने का. अभी तो उनके दिमाग में यही छाया हुआ है. रिटायर होने के बाद उनके लिए तीन अलग-अलग संभावनाएं हैं. एक, जैसा कि नीता अंबानी ने पुष्टि की है, सचिन 2014 आइपीएल में मुंबई इंडियन के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. दूसरे, राज्यसभा सदस्य के रूप में, सचिन हमेशा ही जमीनी स्तर पर खेल के विकास में योगदान करने की इच्छा पालते आए हैं. उन्होंने इसी साल मानव संसाधन विकास और खेल मंत्रालयों को आगे की योजनाओं के बारे में एक अध्ययन पत्र पेश किया है. वे उन योजनाओं पर आगे काम करना चाहेंगे. आखिर में, वे घर पर अंजलि और बच्चों—अर्जुन और सारा—के साथ समय बिताना चाहते हैं जो उनके खेल में व्यस्तता के कारण अधूरा-सा रह गया है.
अब वे अपना किटबैग खूंटी पर टांगने का फैसला कर चुके हैं, तो उनके लिए क्रिकेट का अर्थ क्या रह जाएगा? इसी सवाल के जवाब में उनके रिटायरमेंट के बाद जिंदगी का राज जानने में मदद मिल सकेगी. सीधे-सीधे कहें तो क्रिकेट ही उनकी जिंदगी है. यही उनका जज्बा, जीविका, उद्यम और पेशा है. मैंने 2012 के प्रारंभ में ऑस्ट्रेलिया टेस्ट शृंखला के बीच में उनसे उनकी रिटायरमेंट योजना के बारे में पूछा था. मैं उनसे जानना चाह रहा था कि उनके जीवन पर जो किताब मैं लिख रहा हूं, उसे समेटने के बारे में उनके क्या विचार हैं. उन्होंने तपाक से कहा, “अभी हम उस पर बात न करें तो अच्छा. हम देखेंगे कि कब हम उस मुकाम पर पहुंचते हैं.” यह कहते हुए उनकी आंखों में उभरी आशंकाओं को पढ़ पाना मुश्किल नहीं था. मानो वे क्रिकेट खेलने के लिए ही पैदा हुए हैं और उसे एक दिन छोड़ देने का विचार ही उनके लिए डरावना है. अंत में शायद रिकॉर्ड, प्रशंसाएं, आंकड़े कुछ भी मायने नहीं रखते. बस वे यही चाहते हैं कि बल्ला उठाएं और अपने 22 गज के मंदिर की ओर दौड़ जाएं. वही उनका एकमात्र आश्रय है और उसे ही अब वे छोडऩे जा रहे हैं.

सचिन के अलविदा कहने का ख्याल जाहिर करने के कई दिन बाद मैंने उनसे आग्रह किया कि पुस्तक के अगले अध्याय के लिए वे कुछ समय निकाल लें. यह दर्ज करना जरूरी है कि किस बात ने उन्हें घोषणा करने को प्रेरित किया. सचिन ने कोई रुचि नहीं दिखाई. उनका ध्यान वेस्ट इंडीज के मैच की तैयारी में लगा था. उसमें वे बेहतरीन प्रदर्शन करना चाहते थे. उन्होंने कहा, “यह शृंखला खत्म होने के बाद हम किताब पर ध्यान दें. अभी मैं अगले कुछ हफ्ते अभ्यास पर ध्यान देना चाहता हूं.” यह निष्कर्ष निकालना आसान था कि वे सही फ्रेम में आने के लिए हरियाणा के खिलाफ रणजी ट्रॉफी मैच खेलेंगे.
लेकिन लाहली में उनके साथ क्या होना है, इसका अंदाजा हमें नहीं था. उन्होंने पहले दिन का खेल खत्म होने पर लिखा, “पिच पर काफी हरियाली थी.” वे पहली पारी में 5 रन बनाकर अचानक उठी गेंद पर आउट हो गए थे. दूसरी पारी में मुंबई 236 रनों का पीछा करते हुए शुरुआती विकेट गंवा चुकी थी. सचिन जानते थे कि उन्हें क्या करना है. यही वे 24 साल से करते आए हैं. इस बार उन्होंने मुंबई के लिए आखिरी मैच जिताऊ 79 रनों की पारी खेली. उन्हें पता था कि सारा देश देख रहा है. वे यह भी जानते थे कि इतिहास में पहली बार रणजी ट्रॉफी के मैचों के प्रति दीवानगी सास-बहू सीरियल जैसी टीआरपी हासिल कर लेगी.
मैच खत्म होने के बाद उन्होंने लिखा, “वाकई अच्छी तैयारी हुई. पिच में गेंदबाजों के लिए काफी कुछ था. ईश्वर महान है.” क्या वे दक्षिण अफ्रीका शृंखला की तैयारी की बात कर रहे थे या कोलकाता और वानखेड़े के दो मैचों की? क्या वे, एक पल को, यह भूल गए कि वे दक्षिण अफ्रीका नहीं जा रहे हैं? उन्हें हरी घास वाली पिच ईडन गार्डेन या वानखेड़े में तो नहीं मिलने वाली थी, तो फिर किसकी तैयारी की बात कर रहे थे?
सचिन कोलकाता में 3 नवंबर की रात पहुंचे. यानी किसी टेस्ट मैच के लिए आम तौर पर पहुंचने वाले समय से एक दिन पहले. अगली सुबह 10 बजे से भारतीय टीम का अभ्यास चल रहा था. वे 4 तारीख को ही तड़के की उड़ान पकड़ सकते थे. उन्हें घर पर दिवाली न मनाना मंजूर था लेकिन उनके लिए अपने 199 वां टेस्ट का अभ्यास छोडऩा मंजूर नहीं था. हम 4 नवंबर को ताज बंगाल होटल में मिले तो बारीकियों पर उनके ध्यान को जान सके. सचिन अपने बल्ले के साथ मशगूल थे. बल्ले के हत्थे के नीचे लोगो थोड़ा उधड़ा हुआ था. मैंने उनसे पूछा कि यह कैसे हुआ, “आखिरी मौके पर बल्ले का लैमिनेशन किया गया और जब आप उछाल भरी पिच पर खेलते हैं तो, जैसा लाहली में था, किनारा लग सकता है. मैं यह मौका नहीं देना चाहता.” इतनी बारीकी पर ध्यान खेल ही नहीं, किसी भी क्षेत्र में अपवाद स्वरूप ही देखने को मिलती है. उनके एक प्रमुख प्रतिद्वंद्वी एलन डोनाल्ड कहते हैं, “उनकी तैयारी ही उन्हें पोंटिंग और लारा से अलग करती है. यही पिछले ढाई दशकों से उनके बने रहने का राज है.”
ईडन में पहले दिन दो अप्रत्याशित दर्शक भी थे अंजलि और अर्जुन. उन दोनों में से किसी के आने की उम्मीद नहीं थी और सचिन उन्हें देखकर चौंक गए. अंजलि दो हफ्ते से कह रही थीं कि वे कोलकाता नहीं जाना चाहतीं क्योंकि इससे सचिन का ध्यान बंटेगा. आखिरी मौके पर वे खुद को रोक नहीं पाईं. अंजलि कहती हैं, “मिसेज नीता अंबानी के जन्मदिन की पार्टी में मेरी एक अजीज दोस्त ने मुझसे कहा कि कुछ दिनों बाद तुम अपने जीवन में यह मौका कभी नहीं पा सकोगी. वह बड़ा डरावना एहसास था और जब सचिन कोलकाता के लिए निकलने लगे तो उन्होंने कहा कि आखिरी बार मैं किसी टेस्ट मैच में शहर से बाहर जाने के लिए तुम्हें गुडबाइ कह रहा हूं. वे एयरपोर्ट के लिए निकले तो मैं अपने आंसू नहीं रोक पाई. तभी मैंने कोलकाता जाने का इरादा बना लिया.”

सचिन अर्जुन के साथ अंजलि को देखकर खुश हो गए. पहले दिन के खेल के बाद वे अपने कमरे में उनके साथ एक घंटे बिता पाए. उन्होंने अर्जुन को एक गेंद दी जिसे वह मुंबई ले गया. अंजलि हंसकर कहती हैं, “हम घंटेभर साथ रहे लेकिन उस दौरान भी एक बार भी सचिन ने बल्ले को अपने से दूर नहीं किया.” वे अगले दिन अपनी पारी की तैयारी में लगे थे.
हालांकि यह जरूरी नहीं कि अच्छी तैयारी से हमेशा अच्छे नतीजे निकलें. गेंद सचिन के घुटने के ऊपर पैड पर लगी और अंपायर निगेल लांग की उंगली उठ गई जबकि गेंद साफ-साफ स्टंप के ऊपर जा रही थी.
सचिन जान गए कि अब मौका खत्म. रोहित शर्मा के पहले ही टेस्ट में शतक की बदौलत भारत रनों का अंबार लगा रहा था और शमी अहमद की अच्छी गेंदबाजी से वेस्ट इंडीज ढेर हो गई थी. सचिन के पास अब बल्लेबाजी करने की वानखेड़े में बस दो संभावनाएं थीं. वे यह सोचकर कुछ हैरान भी थे कि उनके मामले में बेहतरीन अंपायर सिमोन टॉफेल, अलीम डार, रॉड टक्कनर और निगेल लांग क्यों कई बार साधरण चूक कर बैठते हैं. क्या उनकी छवि अंपायरों पर अतिरिक्त दबाव बना देती है? सचिन इन सवालों को बहस के लिए छोड़कर अपने आखिरी टेस्ट के लिए मुंबई रवाना हुए. अंजलि अपने पति की शानदार सफलता देखना चाहती थीं लेकिन वे दिल मसोस कर रह गईं.
हालांकि कोलकाता ने आंशिक रूप से इस निराशा की भरपाई की. शानदार विदाई की छाप उनके मन पर हमेशा बनी रहेगी. सौरभ गांगुली ने जैसे अपने क्रिकेट के सबसे प्यारे दोस्त सचिन को गले लगाया, उससे ईडन गार्डेन के दर्शक भी दंग रह गए. सचिन तो बेहद भावुक थे ही. उन्हें इससे भी खुशी हुई कि 199 किलो गुलाब की पंखुडिय़ां उन पर नहीं डाली गईं, जैसी कि पहले योजना थी. उनके एक करीबी दोस्त विवेक पालकर ने ठहाका लगाते हुए कहा, “वह तो दब ही जाता.” इस पर कोलकाता पहुंचे उनके एक और बचपन के दोस्त ने चुटकी ली, “कम से कम उसमें से अच्छी खुशबू आती.” वे उनका मैच देखने गए थे.
वानखेड़े की वेला आई तो सचिन फिर तैयारी में जुट गए. वे उसी चीज की तैयारी करने लगे जिसके लिए उन्हें जाना जाता है—परफेक्शन की तैयारी.
यह मौका उनके लिए इसलिए भी खास है कि पहली बार उनकी मां रजनी दर्शकों में शामिल होंगी. कोलकाता टेस्ट खत्म होने के फौरन बाद सचिन ने कानपुर में अपने दोस्तों को अपनी बीमार मां के लिए एक जोड़ी विशेष जूतों की याद दिलाई, ताकि उन्हें वानखेड़े में चलने में आसानी हो. स्टेडियम में एक रैंप उनकी निगरानी में बना ही है.
आखिरी टेस्ट की पूर्व संध्या पर सचिन के करीबी दोस्तों ने उनके सम्मान में एक पार्टी का आयोजन किया. इसका आयोजन बचपन के दोस्त सुनील हर्षे ने किया है. वे इसे महान खिलाड़ी को ‘सचिन गैंग’ की ओर से निजी उपहार कहते हैं. इंडिया टुडे के 12 नवंबर को ‘सलाम सचिन’ कान्क्लेव में अंजलि ने कहा, “हम हर पल को जीना चाहते हैं. हर भावना हमारे लिए विशेष है. सचिन और मैं इन दिनों को हमेशा याद रखेंगे.” वे इन दिनों को याद रखेंगे लेकिन एक राष्ट्र के रूप में हम सभी 24 वर्षों को कभी नहीं भूल पाएंगे.
(इंडिया टुडे ग्रुप के सलाहकार संपादक (खेल) बोरिया मजूमदार सचिन तेंडुलकर के आधिकारिक जीवनीकार हैं. )

