शैली और काबिलियत के मामले में सचिन तेंडुलकर का प्रतिद्वंद्वी वेस्ट इंडीज के ब्रायन लारा को ही माना जाता है. इनमें कौन बेहतर है, और तकनीक, पारी की शुरुआत तथा मानसिक मजबूती के मामले में दोनों में क्या फर्क है, इन सवालों पर दो दशकों से समालोचक उलझते रहे हैं. लारा ने आजतक के खेल संपादक विक्रांत गुप्ता को बताया कि उनमें और सचिन में क्या भिन्नताएं हैं. बातचीत के अंशः
आप पारी की शुरुआत और उसके बाद अपनी मानसिक अवस्था के बारे में क्या कहना चाहेंगे? यह सचिन से कितना अलग है?
मैं किसी मैच के पहले जमकर अभ्यास करता रहा हूं. मेरे विचार से इस मामले में मेरा और सचिन का रवैया एक जैसा है. माइकल जॉर्डन ने कभी कहा था कि वे इतनी कड़ी मेहनत से तैयारी करते हैं कि खेल के दौरान उन्हें सब कुछ नियंत्रण में लगने लगता है. उनके लिए कुछ भी अपरिचित नहीं रहता, सब कुछ सहज हो जाता है. पारी के बीच में मुझमें गेंदबाजी पर हावी होकर जीतने का नशा छा जाता था. मेरी समझ में सचिन इसके विपरीत गेंदबाजों को कुछ ओवर देकर सही वक्त पर धुनाई करने में यकीन रखते हैं. यानी मेरा तरीका ज्यादा धूम-धड़ाका मचाने वाला है.

आपकी शैली—जैसे, खड़े होने की भंगिमा, बैकलिफ्ट, स्ट्रोक में विविधता, पारी के बीच में अचानक तेज या मद्धिम हो जाना वगैरह—दूसरे गेंदबाजों के मुकाबले इतनी अलग कैसे है?
मैं गेंद पर तगड़ा प्रहार करने के लिए बल्ले को तेजी से बैकलिफ्ट करता हूं. मैं खासकर भारतीय उपमहाद्वीप के स्पिनरों के खिलाफ फुटवर्क का ज्यादा इस्तेमाल करता हूं. मैं आराम से खड़ा रहने की कोशिश करता हूं और गेंद पर टूट पडऩे की बजाए उसे बल्ले पर आने देता हूं. सचिन भी पैरों का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं. वे अपने तरीके से गेंदबाजों पर काबू पाते हैं, उनके शॉट मुझसे ज्यादा पारंपरिक होते हैं.
आप में बड़ी पारी खेलने की अनोखी काबिलियत थी. कैसे आप इतने घंटों तक एकाग्रता बनाए रखते थे?
मैंने जब पहला टेस्ट शतक लगाया तो रोहन कन्हाई वहां थे. उन्होंने मुझे शाबाशी दी लेकिन अचानक वे मेरे पास आए और कहने लगे कि और ध्यान लगाओ और बड़ा स्कोर बनाओ. तब से मैं हमेशा बड़े स्कोर पर ध्यान लगाता रहा.
अगर आप भारतीय टीम में वीरेंद्र सहवाग, राहुल द्रविड़, सौरभ गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण के साथ होते तो क्या आपकी शैली बदल जाती? और इसके उलट सचिन अगर वेस्ट इंडीज में होते तब क्या करते?
मुझे ऐसा नहीं लगता. मेरे लिए बल्लेबाजी टीम के लिए रन बटोरना रही है. मुझे नहीं लगता कि किसी भी टीम में खेलते हुए मेरी शैली बदलती. लेकिन इन खिलाडिय़ों के रहते अपनी जगह बनाने के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती. मैं मजाक में कहता हूं लेकिन यह बात पूरी तरह बेमानी नहीं है कि सचिन को वेस्ट इंडीज टीम में आसानी होती.
वह कौन-सी एक चीज आप सचिन से सीखना चाहते और सचिन आपसे?
मैं उनकी तरह शांत चित्त होकर खेलना सीखता. वे कभी घबराते या ऊबते नहीं हैं. सचिन शायद मेरे जैसा स्वाभाविक खेल सीखना चाहते.
आप पारी की शुरुआत और उसके बाद अपनी मानसिक अवस्था के बारे में क्या कहना चाहेंगे? यह सचिन से कितना अलग है?
मैं किसी मैच के पहले जमकर अभ्यास करता रहा हूं. मेरे विचार से इस मामले में मेरा और सचिन का रवैया एक जैसा है. माइकल जॉर्डन ने कभी कहा था कि वे इतनी कड़ी मेहनत से तैयारी करते हैं कि खेल के दौरान उन्हें सब कुछ नियंत्रण में लगने लगता है. उनके लिए कुछ भी अपरिचित नहीं रहता, सब कुछ सहज हो जाता है. पारी के बीच में मुझमें गेंदबाजी पर हावी होकर जीतने का नशा छा जाता था. मेरी समझ में सचिन इसके विपरीत गेंदबाजों को कुछ ओवर देकर सही वक्त पर धुनाई करने में यकीन रखते हैं. यानी मेरा तरीका ज्यादा धूम-धड़ाका मचाने वाला है.

आपकी शैली—जैसे, खड़े होने की भंगिमा, बैकलिफ्ट, स्ट्रोक में विविधता, पारी के बीच में अचानक तेज या मद्धिम हो जाना वगैरह—दूसरे गेंदबाजों के मुकाबले इतनी अलग कैसे है?
मैं गेंद पर तगड़ा प्रहार करने के लिए बल्ले को तेजी से बैकलिफ्ट करता हूं. मैं खासकर भारतीय उपमहाद्वीप के स्पिनरों के खिलाफ फुटवर्क का ज्यादा इस्तेमाल करता हूं. मैं आराम से खड़ा रहने की कोशिश करता हूं और गेंद पर टूट पडऩे की बजाए उसे बल्ले पर आने देता हूं. सचिन भी पैरों का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं. वे अपने तरीके से गेंदबाजों पर काबू पाते हैं, उनके शॉट मुझसे ज्यादा पारंपरिक होते हैं.
आप में बड़ी पारी खेलने की अनोखी काबिलियत थी. कैसे आप इतने घंटों तक एकाग्रता बनाए रखते थे?
मैंने जब पहला टेस्ट शतक लगाया तो रोहन कन्हाई वहां थे. उन्होंने मुझे शाबाशी दी लेकिन अचानक वे मेरे पास आए और कहने लगे कि और ध्यान लगाओ और बड़ा स्कोर बनाओ. तब से मैं हमेशा बड़े स्कोर पर ध्यान लगाता रहा.
अगर आप भारतीय टीम में वीरेंद्र सहवाग, राहुल द्रविड़, सौरभ गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण के साथ होते तो क्या आपकी शैली बदल जाती? और इसके उलट सचिन अगर वेस्ट इंडीज में होते तब क्या करते?
मुझे ऐसा नहीं लगता. मेरे लिए बल्लेबाजी टीम के लिए रन बटोरना रही है. मुझे नहीं लगता कि किसी भी टीम में खेलते हुए मेरी शैली बदलती. लेकिन इन खिलाडिय़ों के रहते अपनी जगह बनाने के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती. मैं मजाक में कहता हूं लेकिन यह बात पूरी तरह बेमानी नहीं है कि सचिन को वेस्ट इंडीज टीम में आसानी होती.
वह कौन-सी एक चीज आप सचिन से सीखना चाहते और सचिन आपसे?
मैं उनकी तरह शांत चित्त होकर खेलना सीखता. वे कभी घबराते या ऊबते नहीं हैं. सचिन शायद मेरे जैसा स्वाभाविक खेल सीखना चाहते.

