यह 1986 की सर्दियों की बात है. लखनऊ के शांत-से कैंट इलाके में मेरे चाचा श्यामबाबू सक्सेना हमारे घर की छत पर टेनिस की गेंद से मुझे प्रैक्टिस करा रहे थे. वे दिल्ली यूनिवर्सिटी के क्रिकेट हलके में प्रतिष्ठित खिलाड़ी रह चुके थे और बाद में अकसर मुंबई के मैदानों पर भी उपस्थिति दर्ज कराई थी. प्रैक्टिस के बीच में ही उन्होंने किसी खुफिया जानकारी का सा खुलासा करने के अंदाज में मुझसे कहा कि वे एक ऐसी बात बताने जा रहे हैं जिसे मैं कहीं लिख लूं और कभी न भूलूं.
उन्होंने कहा कि वे एक लड़के का नाम बताने जा रहे हैं, जो एक दिन दुनिया का महान भारतीय बल्लेबाज बनेगा. मैंने उसी समय एक पेंसिल और कागज उठा लिया और उस लड़के का नाम नोट करने के लिए बैठ गया. अंदर से मैं उसी तरह की जिज्ञासा से लबरेज था, जैसा कि आठ साल की उम्र का कोई बच्चा किसी रहस्य को जानने के लिए बेताब हो सकता था. दो दशक बाद कागज का वह टुकड़ा मुझे तीसरी क्लास की अपनी एक किताब के बीच दबा हुआ मिला. हालांकि कागज पर मेरी लिखावट धुंधली पड़ गई थी, फिर भी गलत स्पेलिंग में लिखा नाम पढ़ा जा सकता थाः ‘सचिन तेंडोलकर.’
उस समय सचिन की उम्र यही कोई 13 साल थी. मुंबई में युवा खेल लेखक और बाद में अखबार के संपादक बने सुनील वारियर मिड डे के लिए सचिन का इंटरव्यू ले रहे थे. उन्होंने स्कूल के टूर्नामेंट्स में शानदार प्रदर्शन किया था. उसकी स्कैन कॉपी हाल ही में ट्विटर पर नजर आई. वारियर ने लिखा था, “सचिन धीमी बल्लेबाजी करना पसंद नहीं करते. वे हमेशा आक्रमण पसंद करते हैं. उनकी एकमात्र महत्वाकांक्षा शतक ठोकना है.” लेख खत्म करने से पहले उसमें भविष्यवाणी की गई थी, “लगता है, एक और संदीप पाटील तैयार हो रहा है!” यह बड़ी बात है कि किसी पत्रकार ने पूरे आत्मविश्वास के साथ महज 13 साल की उम्र के किसी खिलाड़ी की प्रतिभा को पहचानकर एक बड़ा खिलाड़ी बनने की भविष्यवाणी कर दी थी. दिलचस्प यह है कि सचिन ने जो कुछ भी किया, उसने पाटील की उपलब्धियों को भी कहीं पीछे छोड़ दिया है.
तो फिर सचिन नाम के इस नायक की महिमा को आप कहां से शुरू करेंगे और कहां खत्म? वे उन राष्ट्रीय नायकों से बिल्कुल अलग हैं, जिन्हें हम अब तक जानते आए हैं, क्योंकि उन्होंने न सिर्फ एक नई पीढ़ी को तैयार किया है, बल्कि उसे आगे बढ़ाया है. वे न ही देश का चेहरा हैं और न ही देश की आवाज. न ही वे उम्मीद की किरण हैं और न ही अनिष्ट के सूचक. जब तक हम इन बातों को समझ पाते, वे उससे पहले ही यहां मौजूद थे. वे हमारे लग्जरी की गिरफ्त में फंसने या टेक्नोलॉजी के मोहपाश में फंसने से पहले ही यहां थे. उनका आगाज एकदम सहज-सरल समय में हुआ था. लेकिन वे हमें जटिल लगने वाले संसार में ले गए, जिसमें सिर्फ एक ही चीज स्थिर थी, और बाकी सब कुछ बदल रहा था. वे हमें जमीन पर रहते हुए सितारों तक पहुंचने की प्रेरणा देते रहे.

हर तरह के दोषों से बचा हुआ तो कोई भी नहीं है, सचिन भी नहीं. असफलताओं का स्वाद उन्होंने भी चखा है. दूसरे इंसानों की तरह उनसे भी गलतियां हुई हैं—मैदान पर भी और मैदान से बाहर भी. अब बिक चुकी उनकी ड्यूटी-फ्री फेरारी कार इस बात का सबूत है कि उन्हें भी विलासिता की चीजें लुभाती रही हैं. रिकॉर्ड बनाने से उन्हें इतना प्रेम रहा है कि कई बार उन पर टीम के हित की अनदेखी करने का भी आरोप लगा. खासकर शतक बनाने के मामले में. एकदिवसीय और टेस्ट मैचों के उनके आंकड़ों को जोड़कर देखें तो उनका 100वां शतक सबको याद होगा. इसे बनाने में उन्हें 2011 से 2012 तक साल भर का समय लग गया. वे कई बार मैच से जुड़े दबाव का सामना उस तरह नहीं कर पाए, जैसा वी.वी.एस. लक्ष्मण, एम.एस. धोनी और अब विराट कोहली ने किया है. हालांकि उन्हें भगवान का दर्जा दिया जाता है पर इस हैसियत के विपरीत वे कभी सफल रहे तो कभी विफल.
रूसी-अमेरिकी संगीतकार इगोर स्त्राविंस्की से एक टीवी इंटरव्यू में पूछा गया कि उनके जीवन का सबसे महान पल कौन-सा था? क्या उस समय जब उन्होंने सिंफनी पूरी की थी? क्या उस समय जब उन्होंने उसे आर्के स्ट्रा पर बजते हुए सुना था? क्या उस रात जब उसे 20वीं सदी की सबसे महान संगीत रचनाओं में गिना गया था? उनका जवाब था, नहीं, नहीं, नहीं. उनके अनुसार सबसे महान पल वह था, जब वे पियानो पर सही लय पकडऩे की कोशिश कर रहे थे और तीन या चार घंटों के बाद उन्हें वह लय मिल गई थी. उन्होंने कहा, “यही वह लम्हा था. उस खुशी का कोई मुकाबला नहीं.” सचिन से पहले कई राष्ट्रीय नायक हो चुके हैं और उनके बाद भी कई सुपरस्टार आएंगे. लेकिन कम-से-कम हमारे समय में जैसे सुर उन्होंने छेड़े हैं, वैसा शायद ही कोई और छेड़ पाएगा.
किस्से, आंकड़े, संस्मरण और इन सबका असर उस समय और भी आकर्षक बन जाता है, जब उनसे जुड़ा शख्स सम्मोहित करने वाला हो. अंत में यह सचिन का क्रिकेट ही है, जो उन्हें बेमिसाल बनाता है. बाकी बातें कोई मायने नहीं रखती. हम उन्हें इसी के लिए हमेशा याद रखेंगेः ‘तेडोलकर’ सरीखे लम्हों के लिए, जिन्होंने हमारी जिंदगी पर गहरा असर डाला है.
उन्होंने कहा कि वे एक लड़के का नाम बताने जा रहे हैं, जो एक दिन दुनिया का महान भारतीय बल्लेबाज बनेगा. मैंने उसी समय एक पेंसिल और कागज उठा लिया और उस लड़के का नाम नोट करने के लिए बैठ गया. अंदर से मैं उसी तरह की जिज्ञासा से लबरेज था, जैसा कि आठ साल की उम्र का कोई बच्चा किसी रहस्य को जानने के लिए बेताब हो सकता था. दो दशक बाद कागज का वह टुकड़ा मुझे तीसरी क्लास की अपनी एक किताब के बीच दबा हुआ मिला. हालांकि कागज पर मेरी लिखावट धुंधली पड़ गई थी, फिर भी गलत स्पेलिंग में लिखा नाम पढ़ा जा सकता थाः ‘सचिन तेंडोलकर.’
उस समय सचिन की उम्र यही कोई 13 साल थी. मुंबई में युवा खेल लेखक और बाद में अखबार के संपादक बने सुनील वारियर मिड डे के लिए सचिन का इंटरव्यू ले रहे थे. उन्होंने स्कूल के टूर्नामेंट्स में शानदार प्रदर्शन किया था. उसकी स्कैन कॉपी हाल ही में ट्विटर पर नजर आई. वारियर ने लिखा था, “सचिन धीमी बल्लेबाजी करना पसंद नहीं करते. वे हमेशा आक्रमण पसंद करते हैं. उनकी एकमात्र महत्वाकांक्षा शतक ठोकना है.” लेख खत्म करने से पहले उसमें भविष्यवाणी की गई थी, “लगता है, एक और संदीप पाटील तैयार हो रहा है!” यह बड़ी बात है कि किसी पत्रकार ने पूरे आत्मविश्वास के साथ महज 13 साल की उम्र के किसी खिलाड़ी की प्रतिभा को पहचानकर एक बड़ा खिलाड़ी बनने की भविष्यवाणी कर दी थी. दिलचस्प यह है कि सचिन ने जो कुछ भी किया, उसने पाटील की उपलब्धियों को भी कहीं पीछे छोड़ दिया है.
तो फिर सचिन नाम के इस नायक की महिमा को आप कहां से शुरू करेंगे और कहां खत्म? वे उन राष्ट्रीय नायकों से बिल्कुल अलग हैं, जिन्हें हम अब तक जानते आए हैं, क्योंकि उन्होंने न सिर्फ एक नई पीढ़ी को तैयार किया है, बल्कि उसे आगे बढ़ाया है. वे न ही देश का चेहरा हैं और न ही देश की आवाज. न ही वे उम्मीद की किरण हैं और न ही अनिष्ट के सूचक. जब तक हम इन बातों को समझ पाते, वे उससे पहले ही यहां मौजूद थे. वे हमारे लग्जरी की गिरफ्त में फंसने या टेक्नोलॉजी के मोहपाश में फंसने से पहले ही यहां थे. उनका आगाज एकदम सहज-सरल समय में हुआ था. लेकिन वे हमें जटिल लगने वाले संसार में ले गए, जिसमें सिर्फ एक ही चीज स्थिर थी, और बाकी सब कुछ बदल रहा था. वे हमें जमीन पर रहते हुए सितारों तक पहुंचने की प्रेरणा देते रहे.

हर तरह के दोषों से बचा हुआ तो कोई भी नहीं है, सचिन भी नहीं. असफलताओं का स्वाद उन्होंने भी चखा है. दूसरे इंसानों की तरह उनसे भी गलतियां हुई हैं—मैदान पर भी और मैदान से बाहर भी. अब बिक चुकी उनकी ड्यूटी-फ्री फेरारी कार इस बात का सबूत है कि उन्हें भी विलासिता की चीजें लुभाती रही हैं. रिकॉर्ड बनाने से उन्हें इतना प्रेम रहा है कि कई बार उन पर टीम के हित की अनदेखी करने का भी आरोप लगा. खासकर शतक बनाने के मामले में. एकदिवसीय और टेस्ट मैचों के उनके आंकड़ों को जोड़कर देखें तो उनका 100वां शतक सबको याद होगा. इसे बनाने में उन्हें 2011 से 2012 तक साल भर का समय लग गया. वे कई बार मैच से जुड़े दबाव का सामना उस तरह नहीं कर पाए, जैसा वी.वी.एस. लक्ष्मण, एम.एस. धोनी और अब विराट कोहली ने किया है. हालांकि उन्हें भगवान का दर्जा दिया जाता है पर इस हैसियत के विपरीत वे कभी सफल रहे तो कभी विफल.
रूसी-अमेरिकी संगीतकार इगोर स्त्राविंस्की से एक टीवी इंटरव्यू में पूछा गया कि उनके जीवन का सबसे महान पल कौन-सा था? क्या उस समय जब उन्होंने सिंफनी पूरी की थी? क्या उस समय जब उन्होंने उसे आर्के स्ट्रा पर बजते हुए सुना था? क्या उस रात जब उसे 20वीं सदी की सबसे महान संगीत रचनाओं में गिना गया था? उनका जवाब था, नहीं, नहीं, नहीं. उनके अनुसार सबसे महान पल वह था, जब वे पियानो पर सही लय पकडऩे की कोशिश कर रहे थे और तीन या चार घंटों के बाद उन्हें वह लय मिल गई थी. उन्होंने कहा, “यही वह लम्हा था. उस खुशी का कोई मुकाबला नहीं.” सचिन से पहले कई राष्ट्रीय नायक हो चुके हैं और उनके बाद भी कई सुपरस्टार आएंगे. लेकिन कम-से-कम हमारे समय में जैसे सुर उन्होंने छेड़े हैं, वैसा शायद ही कोई और छेड़ पाएगा.
किस्से, आंकड़े, संस्मरण और इन सबका असर उस समय और भी आकर्षक बन जाता है, जब उनसे जुड़ा शख्स सम्मोहित करने वाला हो. अंत में यह सचिन का क्रिकेट ही है, जो उन्हें बेमिसाल बनाता है. बाकी बातें कोई मायने नहीं रखती. हम उन्हें इसी के लिए हमेशा याद रखेंगेः ‘तेडोलकर’ सरीखे लम्हों के लिए, जिन्होंने हमारी जिंदगी पर गहरा असर डाला है.

