पाकिस्तान को बने हुए 66 साल गुजर चुके हैं लेकिन इस देश में पहली बार सत्ता का लोकतांत्रिक हस्तांतरण होने जा रहा है. चुनी हुई सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा कर लिया है, स्वतंत्र चुनाव आयोग का गठन हुआ है और साफ-सुथरे तथा निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिए कमान तटस्थ केयरटेकर निजाम को सौंप दी गई है. लेकिन हिंसा का डर साफ नजर आ रहा है. सामान्य हालात में भी चुनाव के दौरान माहौल पूरी तरह से गर्माया रहता है-नेता पूरे जोश के साथ प्रचार करते हैं, चुनावी सभाएं होती हैं, चप्पे-चप्पे पर रैलियों का आयोजन होता है और मेले जैसा आलम रहता है. पाकिस्तान में ऐसा लगता है कि चुनाव प्रचार पूरी तरह से टेलीविजन स्क्रीन्स के लिए किया जाता है, गली-मोहल्लों के लिए नहीं.
पंजाब के बाहर चुनावी सरगर्मियां कुछ खास नहीं हैं, यहां चुनाव प्रचार इतना उत्तेजना भरा होता है कि प्रत्याशी कभी-कभार यही भूल जाते हैं कि वह किस पार्टी के साथ है. मसलन, पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआइ) के मुखिया इमरान खान जो अब तक तालिबान से मिली रियायत के कारण बड़ी रैलियां करते आए हैं, अनजाने में एक रैली में वोटरों से पीएमएल-एन को वोट देने को कह बैठे, ‘‘अब जाएं और शेर (पीएमएल-एन का चुनाव चिन्ह) पर मुहर लगाएं.’’ अपनी इस गलती के बाद वे हंसे और खुद को कुछ ऐसे दुरुस्त किया, ‘‘बल्ले पे, शेर का तो मैं शिकारी हूं.’’
तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी मियां नवाज शरीफ इमरान के मुंह से गलती से निकली बात पर चुटकी लेने से नहीं चूके, ‘‘हमारे दुश्मन तक चाहते हैं कि आप शेर पर मुहर लगाएं.’’ लोगों में पीएमएल-एन की संभावनाओं को लेकर खास उत्साह नहीं है.
करीब 1.3 करोड़ ऐसे युवा वोटर हैं जो पहली बार वोट देंगे. ये युवा इमरान खान को वोट दे सकते हैं. शेखूपुरा की रैली में नवाज ने श्रोताओं से कहा कि वे हाथ उठाकर दिखाएं कि उनमें कितने नौजवान हैं. जब भीड़ ने पूरे उत्साह से उनका जवाब दिया, तो वे पंजाबी में बोले, ‘‘लो दस्सो, सारी यूथ ते शेखूपुरा जमा होइ ऐ नवाज शरीफ दे जलसे ते. ओ जेडे बाकी यूथ दी गल्लां करदे ने, ओ कित्थे ने? ओ केडी यूथ दी गल्लां करदें नें? (सारे नौजवान तो शेखपुरा में नवाज शरीफ की सभा में इकट्ठा हैं. वे कहां हैं जो बाकी नौजवानों की बात करते हैं. वे किन नौजवानों की बात करते हैं).’’
पाकिस्तान में पहली बार वोट देने वाले 30 फीसदी वोटर हैं. उनके पास एक दिक्कत तीसरा विकल्प भी है पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी). दो दलों वाली मुख्यधारा की राजनीति में अगर गठबंधन की भी संभावना हो तो भविष्यवाणी करना आसान होता है लेकिन तीन दलों की ऐसी लड़ाई जिसमें हरेक किसी दूसरे से गठजोड़ करने की बजाए विपक्ष में बैठना पसंद करता हो, वहां सियासी विश्लेषकों का काम जरा मुश्किल हो जाता है. एक दिक्कत और है: कुछ आतंकी समूहों के गठजोड़ तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के मामले में देखें तो-जिसके निशाने पर पिछली सरकार के वाम झुकाव वाले सारे मध्यमार्गी गठबंधन सहयोगी हैं जैसे पीपीपी, अवामी नेशनल पार्टी (एएनपी) और मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम)-ऐसा लगता है कि ये चुनाव सिर्फ पंजाब में होने जा रहे हैं जो अन्य की तुलना में आतंकवाद से कम ग्रस्त है और जहां असली प्रतिद्वंद्वी पीएमएल-एन और पीटीआइ हैं. ये दोनों ही पार्टियां आतंकवाद पर नरम रवैया रखती हैं. खान पर तालिबानी समर्थक होने के आरोप लगते रहे हैं जबकि शरीफ बंधुओं ने सांप्रदायिक आतंकी संगठनों का चुनावी गठबंधन बनाया.
आतंक का खौफ हर जगह पसरा है. जैसा पिछले साल पाकिस्तान और अमेरिका की दोहरी नागरिकता के चलते सुप्रीम कोर्ट के हाथों बरखास्त हुई पीपीपी की पूर्व सांसद फरहनाज इस्फहानी कहती हैं, ‘‘जब तक इन तीन वाम झुकाव वाले दलों को निशाना बनाने वाली आतंकी कार्रवाइयों पर रोक नहीं लगेगी, तब तक चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं हो सकते. जम्हूरियत के तौर पर पाकिस्तान के विकास के लिए जरूरी है कि बिना किसी झंझट के एक चुनी हुई सरकार दूसरी चुनी हुई सरकार के हाथों में ऐतिहासिक रूप से सत्ता सौंपे.’’
अप्रैल के अंत में कराची में हुई दो संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंसों में पीपीपी, एएनपी और एमक्यूएम के नेताओं ने खैबर पख्तूनख्वा और सिंध में तालिबानी हमले में मारे गए अपने कार्यकर्ताओं के बावजूद चुनाव लडऩे का संकल्प जताया. साजिश की कहानियों में यकीन रखने वाले कहते हैं कि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की होने वाली वापसी के मद्देनजर जान-बूझ्कर उदारपंथी दलों को सत्ता से बाहर रखा जा रहा है.
रक्षा और राजनैतिक मामलों के विश्लेषक हसन अस्करी रिजवी कहते हैं, ‘‘यह (टीटीपी से खतरा) इस्लामी और दक्षिणपंथी दलों के लिए बिलकुल साफ संकेत है कि वे या तो तालिबान को समर्थन जारी रखें या फिर उन्हें कूटनीतिक लाभ दें.’’ वे कहते हैं, ‘‘तालिबान और आतंक की सीधी निंदा करने वालों पर खतरा है.’’
सुरक्षा कारणों से पीपीपी के चुनाव प्रचार अभियान में खलल पड़ा है. उसके चेयरमैन बिलावल भुट्टो जरदारी को वीडियो टेप के जरिए अपना रिकॉर्ड किया हुआ संदेश लोगों तक पहुंचाकर चुनाव प्रचार की कमान संभालने को मजबूर होना पड़ा है. वे कहते हैं, ‘‘मैं आपके बीच रहकर चुनाव प्रचार करना चाहता था. मैं अपने हर कार्यकर्ता के साथ मुल्क की गलियों में जाना चाहता था. दुनिया जानती है कि हमने जम्हूरियत के लिए अपनी जान की कुरबानी दी है.’’
पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में 342 सीटें हैं, जिसमें से 272 राष्ट्रीय सीटों पर प्रत्यक्ष चुनाव होते हैं और इसमें से पीपीपी को 60 से ज्यादा सीटें नहीं मिलेंगी. इनमें भी अधिकतर सिंध से होंगी. बाकी की 70 सीटों में से 60 महिलाओं और 10 सीटें गैर-मुसलमानों के लिए आरक्षित रखी गई हैं. पीएमएल-एन को 90 सीटें आने की उम्मीद है जिनमें अधिकतर पंजाब से होंगी. 2008 में चुनाव में दोनों पार्टियों की आई सीटों के मुकाबले इस बार यह बड़ा बदलाव होगा. इनके वोट काटने का काम इमरान खान और निर्दलीय उम्मीदवार करेंगे.
चुनाव नतीजों के बाद अगर इमरान किसी के साथ नहीं आए, तो जरदारी और शरीफ दोनों को ही निर्दलीय और दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों पर अतिरिक्त सीटों के लिए निर्भर रहना होगा क्योंकि अब तक इमरान की पार्टी ने दोनों के साथ किसी तरह के गठबंधन की बात को खारिज किया है. सारे संकेत एक कमजोर और अस्थिर गठबंधन सरकार की ओर जा रहे हैं जो विपरीत स्थिति में पाकिस्तान को पटरी पर लाने के लिए जरूरी कड़े आर्थिक और राजनैतिक फैसले लेने में अक्षम साबित होगी.
टीवी ऐंकर असमा शिराजी कहती हैं, ‘‘कई लोग यह मानते हैं कि पीपीपी और पीएमएल-एन को तो आजमाया जा चुका है इसलिए अब इमरान खान की बारी है. जहां तक मेरा मानना है, पंजाब में पीएमएल-एन और पीटीआइ के बीच बराबरी का मुकाबला होगा, लेकिन पीपीपी अभी खेल से बाहर नहीं हुई है. वह अब भी 55 से 60 सीटें ला सकती है. नवाज शरीफ ने पीपीपी या पीटीआइ के साथ गठबंधन बनाने की बात को नकारा नहीं है और उन्हें राष्ट्रपति जरदारी के जरिए शपथ लेने में दिक्कत नहीं होगी.’’ एक हालिया भाषण में शरीफ ने राष्ट्रपति पद की बात भी की थी. सूत्रों के मुताबिक, पीएमएल-एन के भीतर यह बात शुरू हो चुकी है कि अगर पार्टी सत्ता में आती है तो नवाज शरीफ राष्ट्रपति बनेंगे या प्रधानमंत्री.
मोटे तौर पर सर्वेक्षणों और विश्लेषणों में पीएमएल-एन का सितारा मजबूत बताया जा रहा है. नवाज शरीफ ’80 के दशक के इकलौते बचे हुए लोकप्रिय नेता हैं. दूसरी बेनजीर थीं. पंजाब में उनके पारंपरिक वोट बैंक और रूढ़िवादी समर्थकों को छोड़ दें तो शरीफ ने फौजी और सियासी सत्ता से टकरा कर अपनी हैसियत बनाई है.आइएसआइ के दक्षिणपंथी गठजोड़ इस्लामी जम्हूरी इत्तेहाद (आइजेआइ) से वे अलग हो गए थे और आज तक उन्होंने खुद को जनरल जियाउल हक की विरासत से दूर ही रखा है. उनकी राजनीति मोटे तौर पर आर्थिक तरक्की और सैन्य सत्ता के बरक्स नागरिक सत्ता के आग्रह के लोकप्रिय मुहावरों पर टिकी है.
चुनाव विश्लेषकों की राय अलग-अलग है. कुछ का मानना है कि पीएमएल-एन को पंजाब से 100 से ज्यादा सीटें आएंगी और वह गठबंधन सरकार बनाने की स्थिति के बहुत करीब होगा. दूसरे मानते हैं कि यह मुमकिन नहीं क्योंकि इमरान खान की लोकप्रियता इसमें सेंध लगाएगी. इमरान खान ने पाकिस्तान को दुनिया के नक्शे पर क्रिकेट के माध्यम से स्थापित किया और इसीलिए वे आज हीरो हैं. उनका व्यक्तित्व करिश्माई है और वे समाज सेवक भी हैं. हालांकि उनकी आलोचना इसलिए होती रही है क्योंकि उन्होंने कभी भी सीधे तौर पर अमेरिका विरोधी तालिबानियों या भारत विरोधी जेहादियों की निंदा नहीं की. वे जब भी भारत या पश्चिम के लोगों को संबोधित करते हैं, बार-बार यही कहते हैं कि वे भारत विरोधी नेता नहीं हैं और प्रतिक्रियावादी नहीं हैं.
हालांकि यह सब इस बात को तय नहीं करेगा कि कौन किसे वोट देता है. पाकिस्तान में मतदान का औसत 45 फीसदी रहता है. तीन प्रांतों खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान और सिंध में जारी खून-खराबे के कारण मतदान कम रह सकता है. अगर कहीं मतदान बढ़ेगा तो वह अकेले पंजाब में, वह भी शहरी इलाकों में जहां खान की लोकप्रियता है. इन चुनावों में पीटीआइ की संभावनाएं बड़े पैमाने पर युवाओं के वोट देने पर टिकी हैं.
पाकिस्तान के अखबार डॉन के असिस्टेंट एडिटर साइरिल अलमीदा कहते हैं, ‘‘मेरी समझ यही कहती है कि फिलहाल हवा शरीफ के पक्ष में है, हालांकि पीटीआइ और इमरान की बारी बाद में आती है. 2002 में वोटिंग की उम्र 18 साल करने का फायदा सबसे ज्यादा इमरान खान ले रहे हैं क्योंकि किसी अन्य नेता ने युवा वोटों को इस तरह लुभाने की कोशिश नहीं की है. देखना यह है कि युवा वोट देने आते हैं या नहीं.’’
द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के एग्जिक्यूटिव एडिटर एम. जियाउद्दीन कहते हैं, ‘‘इमरान खान पाकिस्तान की सियासत में ताजा हवा का झोंका हैं लेकिन उन्हें अभी काफी दूरी तय करनी है क्योंकि हम अब भी पुराने सियासी तंत्र में फंसे पड़े हैं जहां बिरादरी ज्यादा मायने रखती है. इससे हमें दूर हटना होगा हालांकि इस चुनाव में ऐसा होने नहीं जा रहा.’’ वे मानते हैं कि खान को 50 सीटें मिल सकती हैं और ज्यादातर पंजाब से, ‘‘अगर पीटीआइ ने पंजाब में पीएमएल-एन को नुकसान पहुंचाया तो नवाज शरीफ के पास भरपाई के लिए कोई जगह नहीं होगी. इसका मतलब यह हुआ कि संसद में किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा.’’
शरीफ के, जो अभी से ही यह सोचकर ऐसा व्यवहार करने लगे हैं कि उन्होंने चुनाव जीत लिया हो, पास आज के पाकिस्तान की मोटी समझ है. आधुनिक गैजेट, इलेक्ट्रॉनिक्स, कैमरा, संगीत के दीवाने शरीफ को आधुनिकता और चकाचौंध पसंद है. वे अकसर आर्थिक तरक्की का मतलब मोटरगाडिय़ों के लिए सड़क बनाने, बुलेट ट्रेन चलाने, भूमिगत मेट्रो स्टेशन बनाने, सड़कें चौड़ी करने, खजूर के पेड़ों से गलियों को सजाने आदि से लगाते हैं. यह शायद शेर शाह सूरी और दूसरे महान मुगल सुल्तानों वाले खयालात को दर्शाता है या फिर उनके दिमाग में पश्चिम एशिया की तस्वीर है जहां उन्होंने अपने राजनैतिक प्रवास का अधिकांश हिस्सा गुजारा और जो कोरी रेत से आज आधुनिक न्यूयॉर्क जैसा बन चुका है.
वे इसी तर्ज पर ग्वादर के तट पर सात सितारा होटलों वाला शहर बसाना चाहते हैं और बुर्ज दुबई जैसी गगनचुंबी मीनारें खड़ी करना चाहते हैं. उन्हें यह नहीं पता कि ऐसे विशाल प्रोजेक्ट के लिए पैसा कहां से आएगा. 2012 में पाकिस्तान इतने विदेशी निवेश को आकर्षित करता था जो उसके जीडीपी का 12 फीसदी हुआ करता था (जो 2007 में लगभग 22 फीसदी था) और शरीफ के पास अमीरों पर टैक्स लगाकर अपने खजाने में इजाफा करने की कोई योजना नहीं है.
आधुनिकता का मजा गरीब नहीं ले सकता लेकिन शरीफ के पास गरीबी हटाने का कोई विजन ही नहीं है. शरीफ जानते हैं कि वे टैक्स लगाए बगैर अर्थव्यवस्था का उदारीकरण नहीं कर सकते बावजूद इसके कि उनके अपने समर्थक ही टैक्स विरोधी हैं और उनके पास इस समस्या का कोई हल नजर नहीं आता. पाकिस्तान में अकसर भावनाएं विवेक पर हावी हो जाती हैं. मियां नवाज शरीफ बखूबी जानते हैं कि राष्ट्रवाद, पहचान और आत्मसम्मान जैसी बातों का इस्तेमाल कैसे और कब किया जाए. वे अपने रूढ़िवादी समर्थकों को उदार मूल्यों की घुट्टी पिलाकर खुद से दूर नहीं कर सकते. यही वजह है कि उनका राजनैतिक राष्ट्रवाद मजहबी रंग लिए होता है और उसमें विचारधारा का धुंधलापन कायम रहता है.
शरीफ ने 1998 में परमाणु परीक्षण करके और पाकिस्तान को आधिकारिक तौर पर परमाणु संपन्न राष्ट्र घोषित करके एक राष्ट्रवादी के तौर पर खुद को स्थापित किया था. तब से लेकर अब तक जब भी भारत के साथ शांतिपूर्ण रिश्ते बहाल करने की बात आई है, उन्होंने उस घटना का और उससे स्थापित हुई अपनी विश्वसनीयता का हवाला दिया है. और लोगों के राष्ट्रवाद और देशभक्ति पर सवाल उठते रहे, लेकिन शरीफ की अमन संबंधी पहल पर उसी शिद्दत से सवाल नहीं उठाए गए.
जहां तक फौज और नागरिक सत्ता के रिश्तों का सवाल है, शरीफ ने एक ओर देश में जम्हूरियत को मजबूत करने और दूसरी ओर भारत के साथ अमन का रास्ता अपनाने के लिए बेनजीर भुट्टो के साथ चार्टर ऑफ डेमोक्रेसी (सीओडी) पर दस्तखत किए थे. वे इस बात को मानते हैं कि जब तक भारत के साथ आर्थिक साझेदारी नहीं होगी तब तक यह क्षेत्र तरक्की नहीं कर सकता. यदि ऐसा हुआ तो पाकिस्तान को फायदा ही होगा, नुकसान नहीं. कुछ विश्लेषक मानते हैं कि शरीफ भले ही फौज पर लगाम न कसें, लेकिन वे उसके सामने घुटने भी नहीं टेक देंगे.
नागरिक-फौज टकराव को तब तक नहीं सुलझाया जा सकता जब तक पाकिस्तान में लोकतंत्र बेखटके काम नहीं करे. हाल ही में जनरल कयानी के चुनाव समय पर होने के कई आश्वासनों के बावजूद, फौज अब भी नेताओं को लेकर आशंकित है. चुनाव के बाद भ्रम की स्थिति फौज और अन्य अलोकतांत्रिक ताकतों को फायदा पहुंचा सकती है. जानकारों का मानना है कि लोकतंत्र को बचाने के लिए आखिरकार पीपीपी और पीएमएल-एन को साथ आना ही होगा. अपनी पूरी सियासी जिंदगी एक-दूसरे के खिलाफ जी-जान से जंग में जुटे रहे दो ऐसे दुश्मनों के लिए यह सबसे बड़ी विडंबना होगी, लेकिन मुख्यधारा की दो सबसे बड़ी पार्टियों के बीच गठबंधन कहीं ज्यादा मजबूत सरकार दे सकेगा. इन सारी अटकलों पर 11 मई को फैसला होना है. फैसला पाकिस्तानी लोकतंत्र का भी होना है.
मेहमल लाहौर की पत्रकार हैं और साउथ एशियन फ्री मीडिया एसोसिएशन की डिप्टी सेक्रेटरी जनरल हैं

