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पाकिस्‍तान में हिंदुओं को सुरक्षा नहीं दे पाती सरकार

पाकिस्तान सरकार अपनी तमाम तोपों और बंदूकों के बावजूद धार्मिक अल्पसंख्यक माने जाने वाले लोगों को सुरक्षा नहीं दे पा रही है.

अपडेटेड 11 मई , 2013

सत्तरहवीं सदी के मशहूर गणितज्ञ और दार्शनिक ब्लेज पास्कल ने कहा था, ‘‘इंसान अपनी धार्मिक आस्था के नाम पर कुकृत्य सर्वाधिक संगठित और जोशीले तरीके से करता है.’’ उनका कहा गुजरात में 2002 में हुए दंगे पर लागू होता है. वैसे ही यह आज के पाकिस्तान पर भी सटीक बैठता है जहां आपकी धार्मिक संबद्धता-चाहे वह पैदाइशी हो या फिर ग्रहण की हुई-आपको कब्र तक पहुंचा सकती है. यहां कातिल लगातार बिना किसी डर के कत्ल करते जाते हैं और पुलिस या फौज इसमें खास दखल नहीं देती. ऐसे कई पाकिस्तानी हैं जो दूसरे मजहब के लोगों से तो नफरत करते हैं लेकिन अपने मजहब के लोगों से भी उन्हें लगाव नहीं है. कई लोगों ने मजहब के नाम पर की जाने वाली ज्यादतियों की ओर से मुंह मोड़ लिया है.

यहां हिंदुओं और ईसाइयों के साथ जो कुछ हुआ है, वह आश्चर्य की बात नहीं है. ये दोनों समुदाय भारत के बंटवारे को लेकर कभी उत्साहित नहीं रहे. इन पर बंटवारे के फौरन बाद 1949 का ऑब्जेक्टिव्ज रिजॉल्यूशन थोपकर इन्हें ‘‘अल्पसंख्यक’’ में तब्दील कर दिया गया और इस तरह मरदूदों और विजातीयों को हाशिए पर धकेल दिया गया. कुछ ने इसे किस्मत मान लिया और चुपचाप पड़े रहे. कुछ और थे जिन्होंने मुस्लिम से जान पडऩे वाले नाम रख लिए. जो बेहतर स्थिति में थे, वे पलायन कर बाहर चले गए और अपने साथ नकदी और कीमती सामान भी लेते गए. एक बार फिर यहां से दूसरे धर्म के लोगों का पलायन पिछले कुछ वर्षों में जोर पकड़ चुका है.

पाकिस्तान की 20 करोड़ आबादी में 1.7 फीसदी हिंदू हैं. यह संख्या घट रही है क्योंकि हिंदू परिवार भारत में पनाह मांग रहे हैं. पाकिस्तान हिंदू काउंसिल के अध्यक्ष रमेश कुमार वंकवानी के मुताबिक इसकी वजह ‘‘अपहरण, बलात्कार, लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन, फिरौती के लिए कारोबारियों को अगवा कर लिया जाना और ब्लैकमेलिंग व वसूली है.’’ इसके अलावा दफ्तरों में किया जाने वाला भेदभाव कई योग्य हिंदू युवकों को बेरोजगार और हताश कर चुका है.

पाकिस्तान में रह रहे ईसाइयों को और ज्यादा मुश्किलें झेलनी पड़ रही हैं. मार्च में ईसाइयों के 100 से ज्यादा मकान और दो छोटे गिरजाघरों को लाहौर में गुस्साए मुसलमानों ने आग के हवाले कर दिया. एक ईसाई सफाईकर्मी सावन मसीह पर आरोप लगाया गया कि उसने अपने एक मुस्लिम दोस्त से हुई बहस के दौरान ईशनिंदा कर दी थी. इससे पहले 2009 में एक अफवाह उड़ी थी कि कुछ ईसाइयों ने कुरान का एक पन्ना फाड़ दिया, जिसकी प्रतिक्रिया में गोजरा शहर में 20,000 मुसलमानों की भीड़ ने 50 ईसाई मकानों में आग लगा दी थी. इसी तरह 1997 में शांतिनगर नाम का एक गांव नष्ट कर दिया गया था.

इस घटनाक्रम के दौरान हालांकि जो सबसे ज्यादा सदमे में हैं, वे हैं यहां के शिया और अहमदी समुदाय के लोग. पाकिस्तान बनने को लेकर इनमें उत्साह की कोई कमी नहीं थी. खुद गुजराती शिया परिवार में पैदा हुए मोहम्मद अली जिन्ना मानते थे कि हिंदू और मुस्लिम तो कभी चौन से एक साथ नहीं रह सकते लेकिन मुसलमान एक साथ रह सकते हैं. उन्होंने अहमदिया नेता चौधरी जफरुल्ला खान द्वारा दो राष्ट्र के सिद्धांत के पक्ष में दी गई दलीलों की काफी सराहना की थी और 1947 में उन्हें पाकिस्तान का पहला विदेश मंत्री भी बना दिया था. जिन्ना तो जल्दी गुजर गए, लेकिन जफरुल्ला खान की किस्मत में बेबसी के दिन देखना लिखा था. वही हुआ जिसका डर थारू बंटवारा हो जाने के बाद पाकिस्तान में बहस चल पड़ी कि इस्लाम का कौन-सा संस्करण सही है. इस बहस ने काफी जहर घोलने का काम किया. अपने ही भाई-बंधुओं की हत्या के मूल में यही सवाल है जो पाकिस्तान को दिन-ब-दिन कमजोर करता जा रहा है.

हाल तक पाकिस्तानी शिया खुद को धार्मिक अल्पसंख्यक नहीं समझते थे. भुट्टो ने 1974 में  जब अहमदियों को गैर-मुस्लिम घोषित किया था, तो सुन्नियों के साथ शियाओं ने भी इस फैसले का समर्थन किया था. लेकिन आज शिया घबराए हुए हैं क्योंकि सुन्नी कट्टरपंथियों की मांग है कि उन्हें भी काफिर घोषित किया जाए. कबाइली इलाके ऐसी अलगाववादी लड़ाई में उलझे पड़े हैं: कुर्रम, पराचिनार और हंगू शिया-सुन्नियों की कब्रगाह में तब्दील हो चुके हैं, जिनमें ज्यादा कब्रें शियाओं की ही हैं. शहरी जीवन में भी तेजी से असुरक्षा और अलगाव पनपता जा रहा है. इसे कराची के शिया मोहल्लों से समझा जा सकता है जो तकरीबन किलेबंद हो चुके हैं. इसके बावजूद एक आत्मघाती हमलावर बारूद भरी कार लेकर अब्बास टाउन में घुस ही गया और उसके बाद के नजारे में सिर्फ टूटे हुए अपार्टमेंट और बालकनी से लटके इंसानी गोश्त के टुकड़े बचे रह गए.

यहां की आबादी में करीब 20 फीसदी शियाओं की अलग से पहचान करने का सिलसिला गेस्टापो वाली शैली में जारी है. पिछले साल फौज की वर्दी पहने कुछ लोगों ने रावलपिंडी से गिलगित जा रही चार बसें रुकवा ली थीं. अब्बास या जाफरी जैसे शिया नाम वाले लोगों को छांटा गया और कुछ मिनट बाद जमीन पर 46 लाशें पड़ी दिखाई दीं. मस्तुंग और क्वेटा में हजारा शियाओं का किया गया नरसंहार यहां बार-बार दोहराया गया है.

शिया तो फिर भी इतनी संख्या में हैं कि खुद को बचाने के जतन कर लेते हैं, लेकिन अहमदियों के साथ ऐसा नहीं है. रावलपिंडी में उनके इकलौते धर्मस्थल पर 5,000 की आक्रोशित भीड़ ने यह मांग करते हुए हमला बोला था कि वहां लगे सुरक्षा कैमरे और बैरिकेड हटाए जाएं. बाद में इस धर्मस्थल को बंद कर देना पड़ा.

स्कूलों में पढ़ रहे अहमदिया बच्चों का धर्म पता लगते ही उन्हें निकाल दिया जाता है और उन्हें खुद को मुस्लिम कहने से रोका जाता है. मानसेरा के एक हाइस्कूल में एक अहमदी छात्र रहील अहमद के नाम में कादियानी जोड़ दिया गया और इस तरह यूनिवर्सिटी में पढऩे के अवसर से उस लड़के को महरूम कर दिया गया.

यहां तक कि अहमदियों को मरने के बाद भी चौन नहीं हैरू खत्म-ए-नबुव्वत संगठन में खबर आई कि 17 साल की एक शिक्षिका नादिया हनीफ  को जिसकी 10 दिन पहले बीमारी से मौत हो चुकी थी, अहमदी होने के बावजूद कसूर के चंदासिंह गांव के एक मुस्लिम कब्रिस्तान में दफनाया गया है. इसके बाद उसकी कब्र को तुरंत खोद दिया गया और लाश को दोबारा दफनाए जाने के लिए बाहर निकाल दिया गया.

अगले महीने चुनाव के बाद नई सरकार आ जाएगी लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि कातिल अपनी मर्जी से यहां कत्ल करते हैं, सरकार या फौज के कहने पर नहीं. पाकिस्तान की सरकार अपनी तमाम तोपों और बंदूकों के साथ चुपचाप बैठी बस तमाशा देखती रहती है. कुछ लोग इसे उसकी कमजोरी मानते हैं तो कुछ दूसरे मिलीभगत. सच्चाई जो हो, लेकिन तथ्य यह है कि गुप्तचर एजेंटों की भारी तादाद भी मजहबी दहशतगर्दों का सुराग नहीं लगा पाई है.

अगर सरकार कभी आतंकियों को निशाने पर लेने का दम भी भरती है, तो अदालत में उन्हें सजा नहीं होती. पिछले साल एक स्वयंभू शिया हत्यारे मलिक इशक को सिर्फ  इसलिए छोड़ दिया गया क्योंकि जज उससे डर गए थे और उन्होंने अदालत में उसका मेहमान की तरह स्वागत किया था.

बंटवारे को तो उलटा नहीं जा सकता, भले ही आरएसएस के चरमपंथी उसके ख्वाब देखते रहें. बंटवारे के बाद की स्थितियों को दुरुस्त करने के लिए पाकिस्तान को एक ऐसे राज्य के रूप में खुद को गढऩा होगा जो अपने हर नागरिक के साथ बराबरी से व्यवहार करता हो और जिहाद के प्रति यहां कायम उत्साह को कुचल देना होगा. यह नामुमकिन नहीं है. भारत इस काम में पाकिस्तान की मदद कर सकता है. बस उसकी भाषा को नरम बनाने और आपसी रिश्तों को गर्मजोशी से भरने की दरकार है. पाकिस्तान के लड़ाके इस्लामियों का असर कम करने में यह कदम दूर तक असर छोड़ सकता है.

लेखक कायदे-आजम यूनिवर्सिटी, इस्लामाबाद में भौतिकी पढ़ाते हैं.

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