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पाकिस्‍तानी अर्थव्‍यवस्‍था का कहीं दम न निकल जाए

पाकिस्तान की नई हुकूमत को अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए सख्त उपाय करने होंगे. क्या वह करेगी?

अपडेटेड 11 मई , 2013

अधिकतर लोगों के अनुमान से उलट पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था ने बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन वक्त बीतने के साथ ही नाजुक मसले और नाजुक होते जा रहे हैं.

सबसे बड़ी मुश्किल फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व (विदेशी मुद्रा भंडार) का लगातार कम होना है. प्रधानमंत्री के वित्तीय सलाहकार ने अप्रैल में वाशिंगटन में हुई आइएमएफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) और विश्व बैंक की सालाना बैठक में भाग लेकर लौटने के बाद कहा कि आइएमएफ ने नवंबर, 2008 में लिए गए कर्ज का बकाया चुकाने में मदद करने के लिए पाकिस्तान को 5 अरब डॉलर के कर्ज की पेशकश की है. भुगतान संतुलन के भीषण संकट से जूझ रहे पाकिस्तान ने विश्व बैंक से 2008 में कर्ज लिया था. उस समय विदेशी मुद्रा भंडार एक महीने में होने वाले आयात के भुगतान से भी कम रह गया था और बैंक के पास करेंसी खत्म हो चुकी थी. पाकिस्तान का वित्तीय ढांचा धराशायी होने के कगार पर था; शेयर बाजार ‘‘ठप्प’’ हो गया था और म्यूचुअल फंड की सभी निकासी रुक गई थी.

रुपए के मूल्य में भारी गिरावट और विदेशी मुद्रा खातों के बंद होने की अफवाहों के बीच लोग डॉलर खरीदने के लिए दौड़ पड़े थे जिससे देश की विदेशी मुद्रा बाहर जाने लगी थी और बैंकिंग प्रणाली से भारी मात्रा में नकद निकलता जा रहा था. इसकी वजह से महज एक साल में पाकिस्तानी रुपए की कीमत में 25 फीसदी की गिरावट आ गई थी. इस तेज गिरावट से घबराए लोगों ने अपने रुपए को तेजी से डॉलर में बदला और पूंजी की दिशा दुबई की ओर मुड़ गई.

आज, उन दिनों की यादें फिर से सार्वजनिक चर्चा में ताजा होने लगी हैं. एक बार फिर रुपया कमजोर पडऩे लगा है और इससे पहले कि सरकार प्रशासनिक उपायों के जरिए इसे मजबूत करती दिसंबर में डॉलर के मुकाबले उसकी कीमत 100 की मनोवैज्ञानिक सीमा को थोड़े समय के लिए लांघ गई. सरकार के किए गए उपायों से रुपए की स्थिति में कुछ सुधार हुआ लेकिन अप्रैल के अंतिम सप्ताह बैंकों के आपसी लेन-देन में रुपए ने निश्चित तौर पर फिर से 100 रु. प्रति डॉलर के आंकड़े को छुआ. मुद्रा बाजार के कई खिलाडिय़ों का अनुमान है कि अवमूल्यन का यही रुझान रहा तो मुल्क में नई सरकार के शपथ ग्रहण के समय तक रुपया इससे भी ज्यादा कमजोर हो जाएगा.

इस समय भी सबसे बड़ी चिंता कम होता विदेशी मुद्रा भंडार है. पाकिस्तान के स्टेट बैंक द्वारा जारी अंतिम आंकड़ों के अनुसार कुल नकद विदेशी मुद्रा भंडार जुलाई, 2011 में 18.3 अरब डॉलर के शीर्ष पर था जहां से गिरता हुआ वह आज 12 अरब डॉलर पर जा पहुंचा है. लेकिन यह आंकड़ा भ्रामक हो सकता है क्योंकि इसमें 5.1 अरब डॉलर कॉमर्शियल बैंकों का हिस्सा है जबकि पाकिस्तान के स्टेट बैंक का सिर्फ 6.8 अरब डॉलर, जो एक महीने के आयात के लिए भी पर्याप्त नहीं होगा.

2008 के वित्तीय संकट में बैंकर से वित्त मंत्री के पद तक पहुंचने वाले शौकत तरीन कहते हैं, ‘‘मुझे नहीं लगता है कि हम अभी उतने बुरे स्तर तक पहुंचे हैं.’’ पदभार संभालने के चंद हफ्तों के भीतर उन्होंने आइएमएफ की बैठक में पाकिस्तान के नजरिए को सामने रखा था. हालांकि, उन्होंने ‘‘अगली सरकार के गठन के दो से तीन महीने के भीतर’’ मुद्रा भंडार को वापस समृद्ध करने के लिए ठोस कदम उठाने की अहमियत की ओर भी इशारा किया. खाली होते भंडार के अतिरिक्त अगली बड़ी चुनौती राजकोषीय घाटा है. सरकार बरसों से घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 4 फीसदी तक लाने की कोशिश कर रही है लेकिन यह 7 फीसदी से नीचे नहीं जा रहा.

इसके कई कारण हैं. पहला है पावर क्षेत्र की सब्सिडी जो उपभोक्ताओं को मिल रही दर में करीब 75 फीसदी की बढ़ोतरी करने के बावजूद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) सरकार के लिए सिरदर्द बन गई. इसके बावजूद पीपीपी के निवर्तमान वित्त मंत्री ने जोर-शोर से घोषणा कर दी थी कि पांच वर्षों में पाकिस्तान सरकार ने अकेले बिजली सब्सिडी में एक लाख करोड़ रु. से अधिक का भुगतान किया जो कुल वार्षिक राजस्व संग्रह का लगभग आधा है.

यह आंकड़ा बहुत बड़ा है. लेकिन किसी को नहीं मालूम कि अपने राजनैतिक वजूद को खतरे में डाले बगैर इसे कैसे घटाया जाए. इसका नतीजा है ‘‘सर्कुलर डेट’’ -तेल आयात के स्तर पर लगातार बढ़ रही देनदारियां जहां अंतत: देश के ऊपर ऋण का बोझ बनता जा रहा है. यूएएड के साथ किए गए योजना आयोग के एक अध्ययन के मुताबिक पिछले वित्तीय वर्ष के अंत तक सर्कुलर डेट (ऋण) 847 अरब रु. तक पहुंच गया था. यह बहुत ज्यादा वृद्धि है क्योंकि यही आंकड़ा इस सरकार के सत्ता में आने के समय 100 अरब डॉलर से भी कम था. इसी अध्ययन में दिखाया गया है कि बिजली संकट की वजह से पाकिस्तान की विकास दर 4 फीसदी कम है.

देश में बिजली और प्राकृतिक गैस में सबसे ज्यादा शेयर रखने वाली निर्माण कंपनियों के संगठनों में से एक इनग्रो के पूर्व सीईओ असद उमर कहते हैं, ‘‘पाकिस्तान किसी भी हाल में इससे निकल नहीं सकता. पावर ब्यूरोक्रैसी में हमें जल्द से जल्द प्रोफेशनल मैनेजमेंट की जरूरत है.’’ उमर देश के शीर्ष राजनैतिक वर्ग को आर्थिक सुधारों के लिए प्रेरित करने के लिए अपना कॉर्पोरेट करियर छोड़कर इमरान खान की पार्टी में शामिल हो गए और उनके आर्थिक सलाहकार बन गए.

घरेलू ऋण में हो रही बढ़ोतरी पाकिस्तान के लिए चिंता का सबब है. ऐसे कानून भी हैं जिसमें सरकार को खास हिदायत दी गई है कि कुल ऋण स्तर जीडीपी के 60 फीसदी से ज्यादा न बढ़े. पर अन्य कानूनों की तरह यह कानून भी बेअसर हो रहा है. इसकी मुख्य वजह यह है कि इसमें कहीं इस बात को चिन्हित नहीं किया गया है कि निर्धारित ऋण सीमा का उल्लंघन होने पर किस तरह के प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. 

पाकिस्तान के स्टेट बैंक के पूर्व गवर्नर सलीम रजा का कहना है कि कर्ज को दी जा रही इतनी अहमियत भ्रामक है. क्योंकि ‘‘असली मुद्दा टैक्स और जीडीपी का अनुपात है’’ जो दर्शाता है कि देश कितना कर्ज ले सकता है. वे बताते हैं, ‘‘हमारा टैक्स-जीडीपी अनुपात 9 फीसदी है.’’ उनका कहना है कि अन्य उभरते बाजारों के लिए आदर्श मानक 18 और 25 फीसदी के बीच कहीं भी हो सकता है. ‘‘सरकार के राजस्व का करीब 40 फीसदी हिस्सा कर्ज की किस्त चुकाने में खर्च हो जाता है.’’ पाकिस्तान की पूरी बैंकिंग प्रणाली में लगी धनराशि जीडीपी का 35 फीसदी है जबकि कुल घरेलू देनदारी 40 प्रतिशत है. यानी पाकिस्तान में कुल ऋण का आकार बैंकिंग प्रणाली में लगे कुल धन से कहीं अधिक है. जबकि अधिकतर देशों में हिसाब-किताब इसके ठीक उलट है.

पाकिस्तान के आर्थिक प्रबंधकों को लंबे समय से यह सवाल मथता रहा है कि वे आर्थिक स्थायित्व के साथ विकास का तालमेल किस तरह बैठाएं. भारी मात्रा में विदेशी मदद आने के कारण यह सवाल फौरी तौर पर हाशिए पर चला जाता रहा है, जैसा कि मुशर्रफ की सरकार के समय हुआ. लेकिन बाद की सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस बात की थी कि घटती विदेशी आर्थिक मदद और देसी-विदेशी पात्रों की बढ़ती अपेक्षाओं के बीच वे मुद्रास्फीति और वित्तीय घाटे जैसे बुनियादी आर्थिक संकेतकों को दुरुस्त रखने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था में फिर से कैसे नई जान डाली जाए.

पाकिस्तान पर कुदरत मेहरबान रही है और इसी वजह से यह बार-बार उबरता रहा है. लेकिन अब जल संकट बढ़ रहा है जिससे कृषि अर्थव्यवस्था चरमरा रही है और हमारी खाद्यान्न सुरक्षा खतरे में है. लेकिन इन जटिल चुनौतियों से निबटने का पाकिस्तान ने एक ही उपाय निकाला-कोई फैसला ही न करो. एक ओर जहां पाकिस्तान में एक सरकार जा रही है और दूसरी अभी आई नहीं है, वहीं यह मुल्क एक बार फिर उसी दुविधा के दौर में है.

हुसैन आर्थिक पत्रकार हैं जो कराची में रहते हैं

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