रात होते ही खपरैल वाले इस झोपड़ीनुमा ढांचे में रहने वाली 43 नन्हीं बच्चियों को खौफ घेर लेता था, पता नहीं आज किसकी बारी आ जाए. इस सरकारी आश्रम का शिक्षाकर्मी मन्नूराम गोटी और चौकीदार दीनानाथ नागेश हर रात शराब पीकर बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाते. यह खेल लंबे समय से चल रहा था और दोनों वहशी अब तक बारह लड़कियों का बचपन तार-तार कर चुके थे.
आदिवासी लड़कियों को प्राथमिक स्तर तक की शिक्षा निशुल्क उपलब्ध करवाने के मकसद से आदिम जाति कल्याण विभाग ने दो साल पहले यह कन्या आश्रम शुरू किया था जो उन्हीं निर्बोध कन्याओं के लिए जीवनभर का दु:स्वप्न बन गया. आश्रम की लड़कियों को बुनियादी सुविधाएं भी हासिल नहीं थीं. नहाने के लिए उन्हें गांव के तालाब पर जाना पड़ता था. वहां पर शौचालय भी नहीं था.
बलात्कारी शिक्षाकर्मी और चौकीदार के लिए इससे अच्छी बात क्या हो सकती थी कि जिन कमरों में लड़कियां सोती थीं उनके दरवाजों में कुंडियां और खिड़कियों में पल्ले नहीं थे, यानी लड़कियां खुद को बचाने की खातिर दरवाजा तक बंद नहीं कर सकती थीं. आश्रम अधीक्षक बबीता मरकाम इस घिनौनी सचाई से वाकिफ थी. लेकिन लड़कियों को उन वहशी दरिंदों को सौंपकर वह हर रात अपने घर चली जाती थी. और भी हैरानी की बात यह है कि आश्रम में जो कुछ भी चल रहा था, उसकी सचाई पूरे गांव को पता थी.
पीडि़त लड़कियों ने पिछले साल अगस्त में उप-सरपंच सुकालूराम नेताम को अपनी आपबीती सुनाई थी. इस मामले को लेकर पंचायत की बैठक भी हुई थी जिसमें आरोपियों को अर्थदंड लगाकर छोड़ दिया गया था. दिल्ली गैंग रेप के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन को देखकर पीडि़त छात्राओं में हौसला उपजा और उन्होंने गुमनाम खत से कलेक्टर को शिकायत की. तब जाकर मामला सतह पर आया.

