छप्पन वर्षीय जफर इकबाल और उनके आधे से भी कम उम्र के 26 वर्षीय संदीप सिंह खेल के दो ऐसे अलग-अलग दौर से ताल्लुक रखते हैं जिसमें इन्फ्रास्ट्रक्चर और अन्य सुविधाओं में भारी सुधार हुआ है, लेकिन नतीजों में नाटकीय गिरावट आई है. इकबाल 1980 में मॉस्को ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम का हिस्सा रहे हैं, जबकि संदीप सिंह को लंदन ओलंपिक 2012 में सबसे निचले पायदान पर रहने की बदनामी झेलनी पड़ी. एसोसिएट एडिटर जी. एस. विवेक से बातचीत में हॉकी के इन दोनों सितारों ने राष्ट्रीय खेल की हालत, उसके अतीत और वर्तमान पर रोशनी डाली.
भारतीय हॉकी में लगातार गिरावट आती जा रही है. आखिर क्यों?
जफर इकबाल: काफी पहले हम महाशक्ति थे. हम अब सुधार के लिए कठोर प्रयास कर रहे हैं, लेकिन दूसरे देश हमारे मुकाबले बहुत तेजी से सुधार कर रहे हैं. अब उनके पास ऐसे बहुत से उम्दा खिलाड़ी हैं, जैसा कि पहले हमारे पास रह चुके हैं. हमारे पास कई ऐसे उम्दा खिलाड़ी हैं जो एक जगह पर ही फाइट कर रहे हैं. खुद संदीप का ही उदाहरण लें. वह विश्व स्तरीय ड्रैग फ्लिकर है, लेकिन दुर्भाग्य से आपको इस देश में उसकी जगह लेने वाला कोई दूसरा व्यक्ति नहीं मिल रहा. हमारे पास 4-5 विश्व स्तरीय खिलाड़ी हैं, बाकी सिर्फ औसत खिलाड़ी हैं. आपको यदि ओलंपिक जीतना है तो 11-12 विश्वस्तरीय खिलाड़ी होने चाहिए जिनके पास तेज दिमाग, भरपूर स्टेमिना और रफ्तार हो.
संदीप सिंह: कई अच्छे खिलाड़ी आ रहे हैं, लेकिन हमारे पास एक बैक-अप सिस्टम होना चाहिए. जब तक हम किसी संभावित बैक-अप खिलाड़ी को तैयार करते हैं, वह टीम से बाहर हो जाता है. यह हमारी टीम की बड़ी समस्या है. टीम के सदस्यों के प्रशिक्षण और काम के बोझ पर अच्छी तरह से नजर रखनी चाहिए.
लंदन ओलंपिक से पहले कई अच्छे प्रदर्शन को देखते हुए लोगों में मेडल की उम्मीद बंध गई थी. लेकिन अंतिम स्थान पर रहकर टीम ने अपनी लोकप्रियता पर बट्टा लगा दिया.
संदीप: खिलाडिय़ों ने अच्छा करने के लिए कड़ी मेहनत की थी. ओलंपिक की तैयारी के दौरान भी हमारा प्रशिक्षण बहुत अच्छा चल रहा था और हमने कई मैच खेले थे. दुर्भाग्य से खेल के पहले हमने इसकी अति कर ली और यह हमारे खिलाफ गया. खिलाड़ी के तौर पर हमने अपना सर्वश्रेष्ठ करने का प्रयास किया, लेकिन हमारी तैयारी का आकलन गलत साबित हुआ और हम थक गए.
जफर: मुझे याद है कि भारत ने 1968 के ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीता था. उन दिनों ब्रॉन्ज मेडल जीतने की बात पचाना बहुत मुश्किल होता था. अब तो किसी भी मेडल को एक बोनस के तौर पर ही देखा जाता है. उन दिनों ब्रॉन्ज मेडल जीतने के बाद हमें अपना चेहरा छुपाकर घूमना पड़ता था. हम कभी भी अपने हाथ में हॉकी स्टिक लेकर नहीं चलते थे क्योंकि इससे लोग यह जान जाते कि हम हॉकी खिलाड़ी हैं और कोई हमारे साथ दुव्र्यवहार कर सकता था. लोग हॉकी में गोल्ड के अलावा और किसी मेडल को तवज्जो नहीं देते थे.
पुराने जमाने में प्रधानमंत्री भी क्लब मैच देखने जाया करते थे. अब तो हॉकी मैचों में मुश्किल से ही दर्शक मिलते हैं. युवा भी हॉकी से नहीं जुड़ पा रहे. आखिर क्यों?
जफर: यह खेल अपनी लोकप्रियता खो रहा है क्योंकि युवा ऐसे खेलों को तरजीह दे रहे हैं जिसमें ज्यादा पैसा हो. हॉकी इंडिया एक लीग (एचआइएल) की शुरुआत करने जा रहा है ताकि हॉकी के खिलाड़ी भी कुछ धन कमा सकें. ऐसी चीजें बहुत महत्वपूर्ण हैं. रणजी ट्रॉफी खेलने वाले क्रिकेटर भी देश की तरफ से हॉकी खेलने वाले खिलाडिय़ों से ज्यादा पैसा पा रहे हैं.
संदीप, यह सवाल आपसे है. एचआइएल को बड़ा बदलाव लाने वाला माना जा रहा है. आपके हिसाब से ऐसी प्रोफेशनल लीग से किस हद तक पैसा जुट सकता है और दर्शकों की रुचि कायम हो सकती है?
संदीप: लोग ज्यादातर विभिन्न देशों के बीच मैच देखने जाते हैं. उनके लिए दुनियाभर के अच्छे खिलाडिय़ों का एक साथ जुटकर खेलते देखना एक अलग अनुभव होगा. हमारे खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय सितारों से काफी कुछ सीख पाएंगे और अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर पाएंगे.
भारत में प्रशंसकों की प्रतिक्रिया आम तौर पर अति के करीब हो जाती है.
संदीप: जब आप हारते हैं, तो वे आपके पास आते हैं और यह उम्मीद करते हैं कि आप हार की वजह बताएं. कभी-कभी वे नाराज भी हो जाते हैं, लेकिन ज्यादातर उनका रवैया और आपको देखने का उनका तरीका ही बदला होता है. ओलंपिक के बाद उनका कहना था कि उनके पास ऐसी टीम है जो सभी मैच हार गई. लेकिन जब आप जीतते हैं, जैसा कि हमने कॉमनवेल्थ खेलों में देखा था, लोग पागल हो जाते हैं. हॉकी इस मामले में भाग्यशाली रही है कि इसे एक बड़े वर्ग का पूरा समर्थन मिल रहा है. वास्तव में 2010 के कॉमनवेल्थ खेलों और यहां तक कि लंदन 2012 में भी स्टेडियम भरा देख हमें काफी आश्चर्य हुआ था. मुझे उम्मीद है कि हमें अच्छे नतीजे हासिल होंगे और इसकी खुशी मनाने वाले कट्टर समर्थक भी मिलेंगे.
जफर: मुझे लगता है कि पहले के मुकाबले अब दर्शकों की सोच में भारी बदलाव आया है. मुझे भी यह देखकर ताज्जुब हुआ कि अब बहुत से दर्शक टीम का समर्थन करने के लिए आते हैं. यह हमारे दौर के मुकाबले बड़ा बदलाव है. तब तो लोग बहुत नाराज हो जाते थे. जब हम हारते थे तो हमें जनता की खूब गाली सुननी पड़ती थी.
खिलाड़ी अक्सर सुविधाओं की कमी का रोना रोते हैं. सत्तर के दशक में यह बहुत सामान्य बात हुआ करती थी.
जफर: 1982 के एशियाई खेलों के दौरान हमें उसी नेशनल स्टेडियम में ही ठहराया गया था, जहां हम खेलते थे और हमें फर्श पर सोना पड़ता था. कोई चारपाई या कूलर नहीं मिलता था और एसी का तो नाम ही नहीं सुना गया था. विश्व कप के दौरान भी हम स्टेडियम की डॉर्मिटरी में ठहरते थे और साफ कहूं, हमें इससे कोई परेशानी महसूस नहीं होती थी. हमारे आसपास के लोग ही नाराज होते थे और यह बात उठाते थे कि हम जिस तरह की सुविधाओं के हकदार हैं, वे नहीं दी जा रहीं. हमारे पास कभी कोई वीडियो नहीं था. हम विरोधी टीमों का खेल देखने के लिए स्टेडियम जाते और उनके खेल का अध्ययन करते. उस जमाने में ट्रेनिंग कई बार थका देने वाली होती थी. हमें एक फुटबॉल मैदान के 40 चक्कर लगाने को कहा जाता. हमें बालू में दौडऩा पड़ता. हमारे पास कोई साइकोलॉजिस्ट या फिजियोथेरेपिस्ट नहीं था. हमारे टीम के कोच बालकिशन अकेले ही इन सबकी जिम्मेदारी संभालते थे.
संदीप: सौभाग्य से अब काफी चीजें बेहतर हो गई हैं (मुस्कराते हैं). हमें अच्छी जगहों पर ठहराया जाता है. हमारे पास एक स्पेशलिस्ट ट्रेनर, एक स्पेशलिस्ट डाइटिशयन और एक वीडियो एनालिस्ट है. हां, हमारे पास भी कोई साइकोलॉजिस्ट नहीं है. हमें वास्तव में अब इसकी जरूरत है ताकि हम मानसिक रूप से मजबूत हो सकें.
जफर, देश में पैदा हुए बेहतरीन फॉरवर्ड खिलाडिय़ों में से आप किसी भी पीढ़ी की टीम में फिट हो सकते हैं, लेकिन क्या संदीप भी एक सर्वकालिक टीम में जगह पा सकते हैं?
जफर: जब हम यूरोपीय टीमों से खेलते थे तो हमें अक्सर 7-8 पेनाल्टी कॉर्नर मिलते, लेकिन हम मुश्किल से ही किसी को गोल में बदल पाते. तब 70 मिनट के खेल में करीब 50 मिनट हम विरोधी टीम के हाफ में ही रहते, लेकिन शॉर्ट कॉर्नर का फायदा नहीं उठा पाते. इसके विपरीत वे कभी-कभी आगे जाते हैं और अपने शॉर्ट कॉर्नर के मौके का फायदा उठाते हैं. तो हां, यदि संदीप हमारे साथ होता तो हम काफी बेहतर कर पाते. संदीप: धन्यवाद, जफर भाई.

