scorecardresearch

धर्म: नए जमाने के नए भगवान शनिदेव

जिंदगी में व्यस्तता बढ़ी तो कॉफी से लेकर मटर-पनीर तक इंस्टेंट मिलने लगे. अब लोगों ने इंस्टेंट फल देने वाला भगवान भी तलाश लिया है. शनि देव 21वीं सदी के तेजी से लोकप्रिय होते भगवान हैं.

अपडेटेड 20 जनवरी , 2013

अब क्या लोग इंस्टेंट राहत देने वाली दवा या इंस्टेंट कॉफी की तरह इंस्टेंट फल देने वाला भगवान भी तलाशने लगे हैं? नौ ग्रहों में से एक शनि की लोकप्रियता को देखते हुए तो यही लगता है, जिन्हें त्वरित फल देने वाला माना जाता है. बात ज्यादा पुरानी नहीं है, ज्यादा से ज्यादा पंद्रह साल, जब शनि ग्रह से भगवान बन गए. यह उनकी बढ़ती लोकप्रियता का ही सबूत है कि अब मंदिरों में नवग्रह मंदिर के अलावा उनका मंदिर अलग होता है. जहां नहीं होता, वहां नौ ग्रहों के मुकाबले उनकी मूर्ति का कद बड़ा होता है. शनि को खास तवज्जो मिलना लाजिमी है क्योंकि पंडितों के मुताबिक वे इंस्टेंट फल देने वाले भगवान हैं. नई दिल्ली के खडग़ सिंह मार्ग स्थित प्राचीन शनि मंदिर के पुजारी पं. खीमानंद जोशी कहते हैं, ''हर कोई अपने काम का रिजल्ट जल्द से जल्द चाहता है और शनि हर काम का त्वरित फल देते हैं.”

शनि की लोकप्रियता का आलम यह है कि देश के बेहद प्रतिष्ठित विज्ञान शिक्षा संस्थानों में से एक दिल्ली आइआइटी के मुख्य एंट्रीगेट के ठीक बाहर शनि देव का बड़ा-सा मंदिर है, जहां अन्य भक्तों के साथ-साथ मन्नत मांगने के लिए आइआइटी के छात्र भी अच्छी-खासी संख्या में आते हैं. एक दिसंबर, शनिवार को  दिल्ली आइआइटी में चल रहे कैंपस प्लेसमेंट का असर कैंपस के बाहर स्थित इस मंदिर में साफ दिख रहा था, जहां ढेरों आइआइटियन प्लेसमेंट में शामिल होने से पहले शनि के दर्शन के लिए जुटे थे.Shanidev

इन्हीं में से एक आइआइटी के फाइनल ईयर के छात्र अभिनव लितकर बताते हैं, ''छह साल से हर शनिवार को शनि मंदिर आता हूं, उनमें मेरी गहरी आस्था है.” यहीं मौजूद एक डॉक्टर दंपती भी बड़ी आस्था और विश्वास के साथ शनि देव के दर्शन कर रहे थे. महरौली के रहने वाले डॉ. अमित अग्रवाल हर शनिवार अपनी पत्नी और बेटी के साथ शनि मंदिर आते हैं.

लेकिन कुछ पंडित शनि को इतना महत्व देने से खुश नहीं हैं. दिल्ली के जंगपुरा स्थित श्री सनातन धर्म मंदिर के मुख्य पुजारी 76 वर्षीय पं. विशंभर दयाल शनि की लोकप्रियता बढऩे का दोष मीडिया पर मढ़ते हुए कहते हैं, ''शनि को टीवी ने स्टार बनाया है. चैनलों पर आने वाले ढेरों बाबा शनि के नाम पर लोगों को डराते हैं. व्यावसायिक सोच वाले लोगों ने ही शनि और साईं बाबा के महत्व को बढ़ाया है. यहां तक कि लोग इन्हें भगवान का दर्जा देने लगे हैं.”

शनि की लोकप्रियता के पीछे आस्था से ज्यादा हाथ आस्था के ठेकेदारों का है, यह कहना गलत नहीं होगा. इन दिनों शनि मंदिर खासा फायदे का सौदा है. माह भर में दूसरे भगवानों के मंदिर में जितनी कमाई होती है उससे कहीं ज्यादा शनि मंदिर में हो जाती है. इस बात की पुष्टि करते हैं प्राचीन शनि मंदिर के पास शनि देव को चढ़ाई जाने वाली सामग्री की दुकान लगाने वाले नम्दे.

वे कहते हैं, ''हर शनिवार सुबह चार बजे से रात के एक बजे तक पूजन सामग्री की लगभग दस हजार प्लेटें बिक जाती हैं जबकि बाकी दिन कोई नहीं आता.” पास ही स्थित एक जूस सेंटर के संचालक 47 वर्षीय अशोक कुमार कहते हैं, ''आम दिनों के मुकाबले शनिवार को चार गुना ज्यादा लोग मंदिर आते हैं इसलिए हमें रात एक बजे तक दुकान खुली रखनी पड़ती है.”

क्या लोग शनि देव के प्रकोप से डरते हैं? केएचडी हंबोल्ड्ट वेज, इंडिया में चीफ मैनेजर, एडमिनिस्ट्रिेशन ए.के.शर्मा कहते हैं, ''बिलकुल नहीं, वे तो दोस्त की तरह हैं.” अपने परिवार के साथ हर शनिवार को छतरपुर स्थित शनिधाम दर्शन के लिए आने वाले शर्मा शनि में अपनी आस्था के लिए एक घटना को वजह मानते हैं. 2007 में उनके बेटे के शरीर में रसौली का पता चला, जो कैंसर भी हो सकता था. शर्मा के मुताबिक वे दाती महाराज के पास शनिधाम क्या गए, उसके बाद से रसौली गायब हो गई और इस चमत्कार के साथ शनि में उनकी आस्था और प्रबल हो गई. गलगोटिया यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग कर रहे 22 साल के अजीत पुरी हर रोज शनि को इसलिए तेल चढ़ाते हैं क्योंकि ऐसा करने से उनमें 'सुरक्षा’ की भावना आती है.

दिल्ली और आसपास के इलाकों में शनि को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले छतरपुर स्थित शनिधाम ट्रस्ट के संस्थापक दाती महाराज कहते हैं, ''पिछले 45 साल से मैं लोगों को बता रहा हूं कि शनि शत्रु नहीं, मित्र हैं. मेरा प्रयास रंग लाया है.” उन्होंने शनिधाम में अष्टधातु से बनी शनिदेव की 21 फुट ऊंची और आठ टन वजनी मूर्ति बनवाई है, जिसके दर्शन के लिए हर शनिवार श्रद्घालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है.Shani

वैसे शनि की लोकप्रियता का फायदा आम लोगों को भी मिलता है. इसी का उदाहरण है उज्जैन से सात किमी दूर स्थित शनि मंदिर. कुछ साल पहले तक वीरान रहने वाले इस मंदिर में अब हर शनिवार 3,000-4,000 लोग दर्शन के लिए आते हैं. इसका असर यह हुआ कि आवागमन के साधन बढ़ गए, सड़क बन गई और इलाके के लोगों को रोजगार मिल गया. देखते ही देखते मंदिर के इर्द-गिर्द पूजन सामग्री की दो दर्जन से ज्यादा दुकानें हो गईं.

एक दुकानदार के मुताबिक पांच साल पहले प्रति दिन बमुश्किल 300 रु. कमाई होती थी जो आज पांच गुना हो गई है. इसी तरह, हरिद्वार में रुड़की रोड पर शनि परिवार नामक एक ट्रस्ट ने महज पंद्रह साल पहले एक शनि मंदिर बनाया और इसका 'श्री शनेश्वर देवस्थान प्राचीन सिद्धपीठ’ नाम से जोरदार प्रचार किया. आज यहां दर्शन के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है. यहां के मुख्य पुजारी पं. महेश्वर प्रसाद चमोला बताते हैं, ''शनिवार को लगभग 2,000 लोग दर्शन के लिए आते हैं.”

एक ओर गली-मोहल्लों में शनि मंदिर धड़ाधड़ उगते जा रहे हैं वहीं दिल्ली के छतरपुर गांव स्थित आद्या कात्यायनी शक्तिपीठ इस मामले में अलग है. इस मंदिर में शनि और साईं बाबा को छोड़कर हर देवता का मंदिर है. यहां के मुख्य पुजारी पं. शंकरलाल झा कहते हैं, ''शनि और साईं को व्यवसायीकरण ने भगवान बनाया है. हमारे यहां नए दौर के भगवानों के मंदिर नहीं हैं.” मगर भक्त इस बात को क्या जानें: उन्हें तो यही चाहिए कि भगवान चाहे जो हो, बस उनकी मांग पूरी कर दे.

—साथ में प्रवीण कुमार भट्ट, देहरादून में और महेश शर्मा, उज्जैन में

Advertisement
Advertisement