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धर्म: ताकि न हो श्रद्धा का श्राद्ध

बीते ढाई दशक में उदारीकरण की ग्लोबल आंधी ने धर्म और आस्था के तंबुओं को झकझोर दिया है. लेकिन धर्म और आधुनिकता में हर जगह टकराव नहीं है. कई बार दोनों की जुगलबंदी भी दिखती है. पीयूष बबेले और आशीष मिश्र धर्म के सामने मौजूद चुनौतियों का जायजा ले रहे हैं.

धर्म और आस्था
धर्म और आस्था
अपडेटेड 20 जनवरी , 2013

भारत में लोग पाखंडी बाबाओं की कितनी भी आलोचना क्यों न कर लें, लेकिन बिरले ही होंगे जो गेरुआ या दूसरे धार्मिक लिबास देखकर शीश न नवा दें. पर हाल के वर्षों में जिस तरह से कई छोटे-बड़े, असली-नकली यानी हर किस्म के बाबा विवादों में घिरे हैं, उससे खटका होने लगा है कि कहीं हम अधर्मयुग की देहरी पर पांव तो नहीं रख रहे. जमीन पर अवैध कब्जा, हत्या, अप्राकृतिक यौन संबंध से लेकर वेश्यावृत्ति का रैकेट चलाने सरीखे गंभीर आरोप धर्म गुरुओं पर लग चुके हैं.

शायद ही कोई धर्म इन प्रवृत्तियों से परे रह पाया है. धर्म के नाम पर व्यापार करने और पैसा ऐंठने के आरोप तो बीते जमाने की बात हो गए. यहां तक कि प्रतिष्ठित कथावाचक और शंकराचार्य की गद्दी पर बैठे महानुभावों का दामन भी इन छींटों से नहीं बच पाया. ऐसे में आस्तिक मन पूछता है कि किस देहरी पर शीश नवाएं और किससे अपना पिंड छुड़ाएं. संत कबीर तो कहते थे—कबीर आप ठगाइए और न ठगिए कोय—लेकिन यहां तो पता ही नहीं चल रहा कि ठग ने साधु का वेश धर लिया है या साधु ही ठग हो गए हैं. और सबसे बड़ी विडंबना यह कि इन ढोंगियों के चक्कर में भले संत भी गेहूं के साथ घुन हुए जा रहे हैं.

फरवरी, 2010 में जब शिवमूर्ति द्विवेदी उर्फ इच्छाधारी बाबा चित्रकूट वाले को पुलिस ने दक्षिण दिल्ली के पॉश इलाके से देह व्यापार के आरोप में दबोचा तो लोगों की श्रद्धा को कुछ ऐसा ही झटका लगा था. नाच-नाचकर आरती करने वाले इस बाबा के साथ छह कॉल गर्ल और दो दलाल भी पुलिस के हत्थे चढ़े थे. रामचरित मानस के रचयिता तुलसीदास की कर्मभूमि चित्रकूट से अपना नाता बताने वाले इस ठग ने रईसजादों के लिए लड़कियां सप्लार्ई करने के लिए साधु का चोला ओढ़ा था. यह बाबा आज तिहाड़ जेल में चक्की पीस रहा है. उसकी इस हरकत ने पूरे साधु समाज की छवि को कलंकित कर दिया.Nityanand

इसी तरह जनवरी, 2011 में बड़ा दिलचस्प लेकिन शर्मनाक मामला गोपेश्वर कृष्ण की भूमि वृंदावन में सामने आया. एक महिला पुलिस के पास पहुंची कि उसे कंप्यूटर ठीक करने वाला दुकानदार ब्लैकमेल कर रहा है. यह महिला यहां के एक स्थानीय युवा कथावाचक राजेंद्र शर्मा की पत्नी थीं. जब पुलिस ने मामले को खोदना शुरू किया तो पता चला कि कथावाचक दंपती का निजी कंप्यूटर खराब हो गया था और उन्होंने इसे सुधारने के लिए एक दुकानदार को दिया था.

कंप्यूटर वाले ने कंप्यूटर कितना सुधारा यह तो राम जानें लेकिन उसमें उसे ऐसी कई फिल्में मिल गईं जिनमें कथावाचक और उनकी पत्नी की विभिन्न मुद्राओं में अभिसाररत वीडियो क्लिपिंग्स थीं. ये फिल्में मथुरा औैर वृंदावन के विभिन्न घाटों और स्थानों पर फिल्माई गई थीं. ये सब ऐसे पवित्र स्थान थे कि जिनका नाम लेने से ही आदमी के भव सागर से तर जाने की मान्यता है. लेकिन यहां तो बाबाजी घाटों को ही तार रहे थे.

क्लिपिंग्स में सिर्फ पति-पत्नी होते तो भी गनीमत थी, वहां तो नाबालिग बच्चों से लेकर पशु योनि के प्राणी भी कुंठा का शिकार नजर आ रहे थे. मामला उजागर हुआ तो धर्म धरा में बवाल मच गया. पुलिस ने कथावाचक के पास से मूवी कैमरा, सीडी, बच्चों, पत्नी और कुछ विदेशियों के साथ बाबा की कई घंटे की वीडियो फिल्में जब्त कीं. फर्जी साधु पर अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने की धारा 377 और आइटी एक्ट की धारा 67बी के तहत मामला दर्ज किया गया.

बाबा की एक करतूत से संत बिरादरी कलंकित हो गर्ई और इस बात पर बाहरी दुनिया का कम ही ध्यान गया कि बाबा को गिरफ्तार करने का आंदोलन वृंदावन के साधु समाज ने ही चलाया था. और सच्चे साधुओं के बीच इस फर्जी आदमी की कोई हैसियत नहीं थी. दक्षिण भारत के प्रतिष्ठित स्वामी नित्यानंद पहले एक अभिनेत्री के साथ आपत्तिजनक वीडियो के सार्वजनिक होने के बाद जगहंसार्ई झेल चुके हैं.

धर्म क्षेत्र में पनप रही इस नई संस्कृति के बारे में हरिद्वार के बाबा हठयोगी कहते हैं कि हर भगवाधारी साधु नहीं होता. समाज को ढोंगियों के प्रति सजग रहना चाहिए. इस सवाल पर कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई प्रतिष्ठित बाबा सेक्स स्कैंडल, हत्या और प्रॉपर्टी विवाद जैसे मामलों में फंसे हैं और खुद हरिद्वार में एक दशक में कई महंतों की हत्या प्रॉपर्टी विवाद के कारण हुई है, हठयोगी ने कहा, ''जहां तक सेक्स स्कैंडल की बात है तो मैं इतना ही कहूंगा कि यह कमजोरी बहुत पुरानी है.Religion

सेक्स मनुष्य की मूलभूत जरूरत है और बहुत कम ही संन्यासी हैं जो इस पर नियंत्रण रख सकें.” अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए बाबा कहते हैं, ''महर्षि विश्वामित्र का मन भी मेनका नाम की अप्सरा पर आसक्त हुआ था. धर्मग्रंथों में संन्यासियों के प्रेम में पडऩे की बहुत-सी कथाएं हैं. लेकिन तब के साधु इन संबंधों को छुपाते नहीं थे. आज के साधुओं में अपनी कमजोरी स्वीकारने की ताकत नहीं है, इसीलिए उनके किस्से जब सामने आते हैं तो आपकी भाषा में स्कैंडल बन जाते हैं.”

हरिद्वार, ऋषिकेश और काशी जैसी धर्मनगरियों में कई मंदिर, मठ साधुओं की शरणस्थली रहे हैं लेकिन धर्मनगरियों में कलियुग का प्रवेश नहीं हुआ हो ऐसी बात नहीं. ऋषिकेश में जहां गंगा के घाट खत्म होते हैं वहां एक तरफ बाबा मस्तराम का घाट है और दूसरी तरफ चौरासी कुटिया है. इन दोनों जगहों पर आपको ऐसे बाबाओं की टोली मिल जाएगी जिनका अध्यात्म चिलम के दम से आगे नहीं जाता. इनकी पहली प्राथमिकता फिरंगी महिलाएं होती हैं, जिन्हें ये बड़े आत्मीय ढंग से चिलम का कस लगवाते नजर आते हैं.

आबादी से जरा दूर होने के कारण बाबा मस्तराम के रेत के घाट पर विदेशी सैलानी दिनभर सुलफा और गांजे का दम लगाते रहते हैं. स्थानीय लोगों की मानें तो चौरासी कुटिया के आसपास बनीं झुग्गियां दरअसल नशे के अवैध कारोबार की चौकियां हैं.

सैलानियों के इस तरह के स्वभाव के बारे में परमार्थ निकेतन के स्वामी चिदानंद सरस्वती कहते हैं, ''हमारे आश्रम में बड़ी संख्या में विदेशी श्रद्घालु आते हैं. आप पूरी दिनचर्या का खुद अध्ययन करें तो यहां योग और ध्यान के अलावा कुछ नहीं दिखाई देगा. आश्रम में नशा प्रतिबंधित है.” वे शांत भाव से आगाह करते हैं, ''पिछले दो दशक में धर्म के क्षेत्र में खूब धन आया है. इसकी एक वजह तो यह है कि धर्मप्रेमी जन धर्म का प्रसार करना चाहते हैं. लेकिन ढोंगी साधु ऐसे लोगों से पैसा ऐंठने में लगे हैं. यह श्रद्धा का श्राद्ध है. इससे सावधान रहना पड़ेगा.” काशी में भी साधु-संन्यासियों को संदेह की नजरों से देखा जा रहा है. तीर्थ पुरोहित भाऊ आचार्य तोड़पे कहते हैं, ''वाराणसी में ऐसे बाबाओं की अच्छी-खासी तादाद है, जो विदेशी महिलाओं के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करते हैं.” उनका दावा है कि ''काशी के अस्सी इलाके के कुछ गेरुआ वस्त्रधारियों का तो काम ही विदेशी महिलाओं के साथ शारीरिक संबंध बनाना है.”

आश्रमों और बाबाओं के जीवन में बढ़ रही भव्यता और पानी की तरह बहता पैसा तो साधु महात्माओं के गलत गतिविधियों में लिप्त होने का कारण तो नहीं? इस सवाल पर चिदानंद सरस्वती कहते हैं कि जहां दिव्यता होनी चाहिए वहां भव्यता आ रही है. सुख-भोग इतना करीब आने के बाद मन के संयम की खिड़कियों के पट खुलने में ज्यादा वक्त नहीं लगता. साधुओं को इस बारे में सजग रहना चाहिए. सरस्वती बताते हैं, ''कुछ साल पहले किसी चैनल ने ऐसे साधुओं का स्टिंग किया था जो ब्लैक मनी को व्हाइट करते हैं. वे लोग मेरे पास भी आए थे लेकिन मैंने मना कर दिया. स्टिंग के साथ मुझे और उन साधुओं को भी दिखाना चाहिए था जो गलत काम के लिए तैयार नहीं हैं. सत्य टुकड़ों में नहीं दिखाया जा सकता, वह समग्र ही होता है.”Religion

वैसे धर्म में धन का प्रवेश भी समग्रता में हो रहा है. काशी में कर्मकांड का तरीका अब होटल और लॉज के रास्ते भी तय होने लगा है. होटल और लॉज के मैनेजर अब यह तय करने लगे हैं कि उनके यहां टिकने वाले श्रद्धालु किस पुरोहित से कर्मकांड कराएंगे. इसके लिए बाकायदा होटल को कमीशन भी मिलता है.

वाराणसी रेलवे स्टेशन के सामने होटल चलाने वाले आर.सी. सिन्हा बताते हैं कि होटल की वेबसाइट पर इस बात की जानकारी उपलब्ध है कि काशी में अलग-अलग कर्मकांडों के क्या रेट हैं. हर होटल के अपने पुरोहित हैं जो उन होटलों में रहने वाले सैलानियों को कर्मकांड की सुविधा मुहैया कराते हैं. सिन्हा बताते हैं, ''चार लोगों के दो कमरे में तीन दिन ठहरने और एक व्यक्ति का जनेऊ संस्कार का पैकेज 20 से 25 हजार रु. के बीच ठहरता है. यजमानों को अब फायदा यह है कि इंटरनेट से ही अपनी बुकिंग कराकर पैकेज चुन सकते हैं. इससे उन्हें काशी में भटकना नहीं पड़ता है.”

काशी में बड़ी संख्या में नकली पंडे भी कर्मकांड करा रहे हैं. वाराणसी के तीर्थ पुरोहित भाऊ आचार्य तोड़पे बताते हैं कि गंगा के किनारे बसने वाली जातियां जैसे मल्लाह, निषाद, नाई जाति से जुड़े लोग भी पंडे का रूप धारण कर कर्मकांड करवा रहे हैं. कर्मकांड से जुड़े लोगों की कोई निगरानी संस्था न होने से ऐसे लोगों पर नजर रख पाना संभव नहीं है. यही वजह है कि गंगा के किनारे कर्मकांड कराने के रेट भी अलग-अलग हैं. यजमान की हैसियत देखकर पिंडदान के लिए 500 रु. से 5,000 रु. लिए जा रहे हैं. तोड़पे कहते हैं कि ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिसमें यजमानों ने कर्मकांड के बदले पंडों के हाथों ठगे जाने की शिकायत काशी के बड़े पुरोहितों से की है.

वैसे कई बार साधु भी शिकार बन जाते हैं. पिछले साल हरिद्वार के महानिर्वाणी अखाड़े में एक साधु सुधीर गिरि की हत्या कर दी गई. हत्या के बाद गिरि के कमरे से कंडोम और इसी तरह की बहुत-सी सामग्री मिली, जिसके किसी साधु से के यहां मिलने की उम्मीन नहीं की जाती. इस हत्याकांड के बारे में अखाड़े के सचिव महंत रवींद्र पुरी ने ज्यादा बात करने से मना कर दिया.

पुरी के शब्दों में, ''मामला अदालत में है. आप जिस तरफ इशारा कर रहे हैं वे बातें मैं अपने मुंह से नहीं कह सकता.” वैसे धर्म में आ रहे अधर्म के व्यापक प्रश्न पर उन्होंने कहा कि समय के हिसाब से आश्रम ट्रस्टों के पास पैसा भी आया है पर महंत की हैसियत धार्मिक कार्य कराने वाले मैनेजर भर की है.

बदलाव की लहर इस्लाम में भी देखी जा सकती है. टोपी-दाढ़ी और बुर्का पहनने वाले हैं तो आधुनिक वस्त्र पहनने वालों की संख्या भी कम नहीं. महिलाएं भी आधुनिक शिक्षा और नौकरियों में जा रही हैं. परंपरा और आधुनिकता का टकराव मुसलमानों में प्रमुखता से नजर आता है. फतवों का सिलसिला जारी है लेकिन उनकी परवाह हर कोई नहीं करता. यह देखना दिलचस्प है कि आधुनिकता से मुठभेड़ करते समाज में धर्मस्थलों की ऊंचाई और भव्यता भी साथ-साथ बढ़ रही है. मुसलमानों के लिए शिक्षा और नौकरी तथा पसमांदा मुसलमानों के लिए आरक्षण अब एजेंडे पर काफी ऊपर है.

बहरहाल पूजा-पाठ और कर्मकांडों ने जिस तरह से तेजी के साथ व्यवसाय का रूप धरा है उसने भारतीय संस्कृति के सामने एक चुनौती खड़ी कर दी है. संत बिरादरी तकनीकी के साथ कदमताल कर रही है तो कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिन्होंने समाज का भरोसा भगवा वस्त्रधारियों पर से कम किया है. जरूरत ऐसी परंपरा तैयार करने की है जिसमें धार्मिक वेश की आड़ में गलत काम करने वालों के लिए कोई जगह न रहे.

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