अब से दो दशक पहले का दौर कुछ वैसा ही था जैसे धरती के नीचे के दो टेक्टोनिक प्लेट एक दूसरे से रगड़ खा रहे हों और सतह पर सब कुछ तहस-नहस हो रहा हो, गोलियां चलीं, सिर कटे, धड़ गिरे, घर जले, बच्चे अनाथ हुए और फिर सब कुछ शांत हो गया. एक गुबार-सा था, जो उठा और चला गया.
अयोध्या, दिसंबर 2012: अयोध्या के कारसेवकपुरम के राम मंदिर निर्माण कार्यशाला में पत्थर तराशने वाली मशीनें खामोश हैं. यहां हलचल के नाम पर चार कारीगर एक कोने में छेनी लिए पत्थरों पर फूल-पत्तियों के डिजाइन उकेर रहे हैं. 1990 के आस-पास यहां सैकड़ों मजदूरों के हथौड़ों और कई मशीनों का शोर गूंजा करता था.
पूरे परिसर में रखे हजारों पत्थरों के टुकड़ों पर अब काई जम चुकी है. मंदिर के नाम पर अब पैसा भी नहीं आ रहा है. मंदिर निर्माण कार्यशाला धन की कमी से जूझ रही थी, इस वजह से इसे 2007 से सितंबर 2011 तक बंद रखना पड़ा. अक्तूबर, 2011 में इसे फिर से चालू किया गया और अब इसे किसी तरह जिंदा रखने की कोशिश हो रही है.
2012 अयोध्या के लिए ही नहीं देश के लिए भी एक निर्णायक साल है. 1991 से इस सीट पर लगातार जीत रही बीजेपी 2012 में पहली बार यहां से हार गई. बीजेपी के लल्लू सिंह को समाजवादी पार्टी के पवन पांडे ने हिंदुत्व के गढ़ में हराया. अयोध्या में मुसलमान वोट सिर्फ 15 फीसदी हैं. जाहिर है बीजेपी के लल्लू सिंह को हिंदुओं ने हराया. और उस पार्टी ने हराया जिसके नेता मुलायम सिंह को हिंदुवादी मुल्ला मुलायम कहा करते हैं.
हालांकि कुछ लोग हैं जो दोनों रंग की सांप्रदायिकता की लाश को उसी तरह ढो रहे हैं, जैसे बंदर की मां अपने मरे बच्चे को सीने से चिपकाए इधर से उधर घूमती है. बीजेपी सिर्फ अयोध्या में नहीं हारी है. गंगा-यमुना के जिस मैदान में उसे सबसे ज्यादा खाद मिली, उस उत्तर प्रदेश में उसे पिछले विधानसभा चुनाव में 15 फीसदी (1996 में 32.51 फीसदी) वोट मिले, जबकि बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 16.46 फीसदी वोट और 91 सीटें मिलीं.
पिछले लोकसभा चुनाव में उसे सबसे बड़ी सफलता कर्नाटक से मिली, जो लिंगायत समुदाय के नेतृत्व में बने सामाजिक समीकरण का नतीजा था, और राम मंदिर वहां कोई मुद्दा नहीं था. गुजरात से लेकर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे प्रांतों में बीजेपी बेहतर राजकाज की पार्टी के रूप में अपने को टिकाए रखने की कोशिश में जुटी है. यहां तक कि शिवसेना का भी काम हिंदू और मुसलमान अंतर्विरोध से नहीं चल पाया और उसे उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के रूप में एक नया शत्रु पेश करना पड़ा.
दरअसल, प्रकृति के बदलाव के नियम से सियासत भी अछूती नहीं है. सामाजिक न्याय की खातिर मंडल आयोग की सिफारिशों को समर्थन की वजह से पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह भले ही शहरी मध्यवर्ग परिवारों के ड्राइंगरूम में निंदा के पात्र बन गए, लेकिन उन्होंने राजनीति की दशा-दिशा बदल दी.
1991 में पी.वी. नरसिंह राव की सरकार ने आर्थिक उदारीकरण के बाद अर्थव्यवस्था हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ के दुष्चक्र से बाहर आने लगी. सबको नए आर्थिक अवसर दिखने लगे और आरक्षण का विरोध करने वाली पार्टियों को एहसास हो गया कि ओबीसी और दूसरी पिछड़ी जातियों को नजरअंदाज करके राजनीति नहीं हो सकती.
यही नहीं, कांग्रेस के विरोध से राजनीति शुरू करने वाले बिहार के लालू प्रसाद यादव, सुशील कुमार मोदी, शरद यादव, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव सरीखे नेता चमक गए, हालांकि इन सबकी राजनीति मंडल से पहले राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण की कांग्रेस विरोध से प्रेरित थी. इन नेताओं ने बिहार और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का वस्तुत: सफाया कर दिया. उनकी राजनीति की सफलता ने ओबीसी और दूसरी जातियों की राजनैतिक महत्वकांक्षाओं को बढ़ा दिया.
लेकिन राजनीति में न तो कभी शून्य रहता है न ही राजनीति की डगर चुनौतियों से खाली रहती है. बिहार में मुस्लिम-यादव (माइ) के गठजोड़ से 15 वर्षों तक राज करने वाले लालू को उन्हीं के साथ राजनीति का ककहरा पढऩे वाले नीतीश ने चुनौती दी. अमीर-गरीब और जातियों में बंटे राज्य में नीतीश ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग का कमाल दिखाया और राष्ट्रीय पार्टी बीजेपी को सत्ता में दूसरे स्थान पर संतोष करने के लिए मजबूर कर दिया.
बिहार भले ही आर्थिक मामले में पिछड़ा रहा हो, लेकिन इन दोनों ने और खासकर रामविलास पासवान ने पिछड़ों में राजनैतिक जागरूकता पैदा कर दी थी. इसी का नतीजा है कि मार्च 1990 में कांग्रेस सरकार के बाद से राज्य में अभी तक कोई सवर्ण मुख्यमंत्री नहीं बना है. इन नेताओं ने धार्मिक मामले में ब्राह्मणों के वर्चस्व को भी चुनौती दी. कई जगहों पर गैर-ब्राह्मणों को जनेऊ बांटे गए और मंदिरों के पुजारी बनाए गए. लेकिन कुल मिलाकर उन्होंने हिंदू धर्म को चुनौती नहीं दी.
जातियों की इस लड़ाई में संभवत: सबसे ज्यादा उस वर्ग के नेता को फायदा मिला जो सबसे ज्यादा वंचित और दबा-कुचला था. 1980 के दशक के आखिर तक सबसे ज्यादा दमन झेलने वाला वर्ग विरोध प्रदर्शन से भी डरता था और मीडिया उसका नेतृत्व करने वाली बीएसपी की रैलियों को खास तरजीह नहीं देता था. पार्टी के कार्यकर्ता नीली सियाही से अपने समर्थकों के इलाकों में वॉल पेंटिंग करते. दिवंगत कांशीराम के संरक्षण में राजनीति का पाठ पढऩे वाली दलित की बेटी मायावती सबसे कमजोर तबके की एकता के दम पर अब देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी चला रही हैं.
दलित वोटों को ट्रांसफर करने का माद्दा रखने वाली बीएसपी की मात्र 57 वर्षीया सुप्रीमो उत्तर प्रदेश की 23वीं, 24वीं, 30वीं और 32वीं मुख्यमंत्री रह चुकी हैं. 'लोकतंत्र की चमत्कार’ मायावती के ठाठ ने उनके समर्थकों को उनकी ताकत का एहसास कराया. उन्होंने प्रदेश की राजधानी लखनऊ तथा देश की राजधानी दिल्ली के पास नोएडा में विशाल पार्कों में अपनी मूर्ति समेत दलित नेताओं की मूर्ति लगाकर दलित राज के प्रतीक खड़े कर दिए.
राजनीति का अंतिम लक्ष्य सत्ता हासिल करना होता है. बीजेपी ने इसके लिए सांप्रदायिकता का मार्ग चुना, जिसकी वजह से देश में बड़े पैमाने पर दंगे हुए. लालकृष्ण आडवाणी का रथ सोमनाथ से निकलने के बाद जहां-जहां से गुजरा, वहां दंगे हुए. लालू और मुलायम ने ओबीसी और मुस्लिम का कार्ड खेला और सत्ता की बाजी जीती. नीतीश ने सोशल इंजीनियरिंग के साथ ही विकास को अपनी राजनीति का संदर्भ बिंदु बनाया. लेकिन मायावती का तरीका इन सबसे जुदा है, क्योंकि वे जाति व्यवस्था के सताए लोगों को लामबंद करके सत्ता तक पहुंचीं. ''किसी भी कीमत पर दलित समाज का सिर नीचा न” होने देने के लिए प्रतिबद्ध मायावती ने दलितों का ऐसा आंदोलन खड़ा कर दिया, जिसे लोग बुनियादी तौर पर बौद्ध आंदोलन मानते हैं. और यह बेजा नहीं है. भारतीय इतिहास में गौतम बुद्ध जाति व्यवस्था के पहले विरोधी थे. ऐसे में बीएसपी की नजर सिर्फ राजनैतिक सत्ता पर ही नहीं है. बल्कि सांस्कृतिक सत्ता पर भी है.
बहरहाल, बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद की पीढ़ी जवान हो चुकी है, जिसे उच्च शिक्षा, बढिय़ा रोजगार और बेहतर जिंदगी चाहिए. बदली हुई अर्थव्यवस्था के साथ ही पत्र-पत्रिकाओं और टीवी ने ग्लोबलाइजेशन की बयार उनके घरों तक पहुंचा दी है और उनकी महत्वकांक्षाएं जग गई हैं जैसा कि राजनैतिक विश्लेषक और फैजाबाद स्थित साकेत महाविद्यालय के प्राचार्य बी.एन. अरोड़ा बताते हैं कि यहां की आबादी में एक बड़ा तबका ऐसे युवाओं का है जो मंदिर आंदोलन के बाद पैदा हुए हैं. उन्हें पढ़ाई के लिए कॉलेज और बिजली चाहिए.
अरोड़ा बताते हैं ''हिंदुओं की मानसिकता भव्य मंदिर की नहीं है. राम मंदिर तो अस्तित्व में है ही, अब वहां मस्जिद नहीं है. यही वजह है कि अयोध्या के लोगों के बीच मंदिर अब कोई मुद्दा नहीं रह गया है. अब लोगों की भावनाएं इस मुद्दे पर नहीं भड़कने वालीं. बीजेपी और विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के लोगों को भी यह बात समझ में आ गई है कि जनता अब इस मुद्दे पर आंदोलन नहीं करने वाली.”
पिछले 63 वर्षों से न्यायालय में बाबरी मस्जिद के मुद्दई 92 वर्षीय मोहम्मद हाशिम अंसारी भी स्वीकार करते हैं कि राम जन्मभूमि अब कोई मुद्दा नहीं रहा. वे कहते हैं, ''हिंदू महासभा अगर इस मसले को उच्चतम न्यायालय में लेकर नहीं जाती तो हम भी ऐसा नहीं करते. अयोध्या की जनता अब खुशहाली चाहती है.”
हाशिम अपने कुछ सहयोगियों के साथ मिलकर 2007 में बनाई गई संस्था 'मुस्लिम रिजर्वेशन मूवमेंट’ को सक्रिय करना चाहते हैं. हाशिम बताते हैं, ''अब मुसलमानों के हितों की लड़ाई लड़ी जाएगी. उनका हित विकास में है. योग्य मुसलमानों को आरक्षण देकर ऊपर उठाना चाहिए.” जनता की नब्ज को ध्यान में रखते हुए विहिप के संरक्षक अशोक सिंघल के तेवर भी इस मुद्दे पर ढीले हुए हैं. सिंघल कहते हैं, ''राम मंदिर का आंदोलन केवल मंदिर निर्माण के लिए नहीं है, यह राम राज्य के लिए है. ऐसा राज्य जिसका राजा चरित्रवान हो, राज्य अपराधमुक्त हो और राजा पर संतों का दबाव हो.”
लेकिन इन नेताओं के बोल दो दशक पुराने अतीत की परछाईं भर हैं. अयोध्या आंदोलन और बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमेटी जैसी संस्थाओं के अग्रणी पंक्ति के ज्यादातर नेता अब पृष्ठभूमि में चले गए हैं. लालकृष्ण आडवाणी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में बीजेपी नेताओं को सेकुलर होने की जरूरत और फायदे गिनाते हैं. अशोक सिंघल के संवाददाता सम्मेलनों से अब ब्रेकिंग न्यूज नहीं निकलती. उमा भारती की गंगा यात्रा अब कोई उत्तेजना पैदा नहीं करती. उत्तेजना फैलाना अब उनका मकसद भी नहीं है. विनय कटियार अब हिंदू से ज्यादा कुर्मी और ओबीसी नेता हैं.
हिंदू और मुसलमान दोनों के लिए मुद्दे बदल चुके हैं. गुजरात दंगों से आया उबाल भी लंबा नहीं चला. नरेंद्र मोदी अब गुजरातवाद और विकास के नाम पर वोट मांग रहे हैं, हालांकि उन्होंने खालिस सियासी वजहों से किसी भी मुसलमान को बीजेपी का उम्मीदवार नहीं बनाया है. जो लोग यह कामना कर रहे थे कि 1992 के दिसंबर पर घड़ी बंद हो जाए और वक्त ठहर जाए, वे निराश हैं.
श्रीराम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष और श्री मणिराम दास छावनी के महंत स्वामी नृत्यगोपाल दास कहते हैं, ''राममंदिर निर्माण संतों के साथ-साथ सभी की इच्छा है. इसके लिए मुस्लिम धर्माचार्यों से भी बात की जाएगी. इसके लिए विवाद की स्थिति से बचा जाएगा.”
पिछले 10 वर्षों के दौरान अयोध्या में पंडों का व्यवसाय काफी तेजी से बढ़ा है. वर्ष 2000 में जहां पूरे अयोध्या में केवल 30 से 50 पंडे ही थे वहीं अब इनकी संख्या 300 के पार पहुंच गई है. जाहिर है, अयोध्या के लोगों के लिए रोजी-रोटी का जुगाड़ पहली प्राथमिकता बन चुकी है. आनंद कुमार पांडेय 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद ध्वंस की घटना के दो वर्ष बाद पैदा हुए.
इन्होंने भले ही मंदिर आंदोलन को अपनी आंखों से नहीं देखा लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को आनंद केवल हिंदी में ही नहीं बल्कि कन्नड़, तेलुगू, तमिल और मराठी भाषाओं में सुना देंगे. आनंद बताते हैं, ''अयोध्या में पर्यटकों की संख्या काफी तेजी से बढ़ रही है इसीलिए मैंने पंडे का व्यवसाय चुना. पिता और अपने दोस्तों से दूसरे राज्यों की भाषाएं सीखीं. अब मैं अपनी पढ़ाई के साथ हर महीने 8,000 रु. से 10,000 रु. कमा लेता हूं.”
आनंद की तरह के करोड़ों युवा देश के विकास में अपना हिस्सा लेने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं. सीमित संसाधनों पर कब्जे के लिए संघर्ष बढ़ रहा है. औद्योगीकरण और शहरीकरण के साथ जमीन पर दबाव बढ़ रहा है. किसानों और आदिवासियों की जमीन का अधिग्रहण कर पाना अब पहले से बड़ी चुनौती है.
इक्कीसवीं सदी के भारत में गांधी की अङ्क्षहसा, नेहरू की धर्मनिरपेक्षता और आंबेडकर का समतावाद, सबके मायने बदल रहे हैं. भ्रष्टाचार अब अहम मुद्दा है और आने वाले दिनों में अण्णा हजारे और अरविंद केजरीवाल पर भी लोगों की नजरें होंगी. लेकिन चमत्कार उदार लोकतंत्र में ही हो सकते हैं, लिहाजा उम्मीद की जानी चाहिए कि देश में हर संस्था का लोकतांत्रीकरण होगा.

