कोलकाता स्थित सेना की पूर्वी कमान के प्रमुख के तौर पर 88 वर्षीय ले. जनरल (अवकाशप्राप्त) जैकब-फर्ज-रफेल (जेएफआर) जैकब 1971 की भारत-पाकिस्तान जंग में फतह दिलाने वालों में से एक थे. इसी जंग के कारण बांग्लादेश बना. 72 वर्षीय जनरल (अवकाश प्राप्त) वेद प्रकाश मलिक 1999 में करगिल की जंग के दौरान सेना प्रमुख थे. इस जंग में पाकिस्तानी घुसपैठियों को जम्मू और कश्मीर के ऊंचाई वाले इलाकों से खदेड़ा गया था. भारत के दो आखिरी और बिल्कुल अलहदा किस्म की जंग लडऩे वाले इन दो जनरलों ने नई दिल्ली में डिप्टी एडिटर संदीप उन्नीथन के साथ बैठकर सेना के मौजूदा हालात का जायजा लिया. राजनैतिक साफगोई और सेना को राजनीति से मुक्त रखने की जरूरत तथा चीन की सैन्य ताकत से मिल रही बुनियादी ढांचे और आधुनिकीकरण की चुनौती के संदर्भ में बात की. क्या आज जो भारतीय सेना है, वह भविष्य में होने वाली जंग लड़ पाएगी?
क्या भारतीय सेना डायनासॉर है?
जेएफआर जैकब: (जेएफआर) बुनियादी रूप से भारतीय सेना द्वितीय विश्व युद्ध के समय की सेना है. इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है. सेना में गतिशीलता की कमी है और यह रक्षा केंद्रित है.
वेद प्रकाश मलिक: रणनीतिक माहौल हमेशा गतिशील रहता है. जो जंग हमने 1962 में लड़ी, वह इनके समय में लड़ी गई 1971 की जंग या मेरे समय में हुई 1999 की जंग से अलहदा थी क्योंकि एक क्षेत्र की राजनीति और भू-रणनीति में बदलाव होते रहते हैं. टेक्नोलॉजी से जुड़ा नया विकास भी हुआ है. ऐसे हालात में सियासी नेतृत्व का दिमाग भी अलग तरीके से काम करता है.
भारतीय सेना की रक्षात्मक सोच रखने की वजह?
मलिक: राजनैतिक नेतृत्व एक इंच जमीन भी नहीं खोना चाहता. यही वजह है कि हमें 1999 में करगिल में सीमा को पार नहीं करने दिया गया.
तो क्या सेना के कोल्ड स्टार्ट सिद्धांत को, जिसमें दुश्मन के खिलाफ बिजली की गति से हमले शामिल हैं, इस रक्षात्मक राजनैतिक मानसिकता की प्रतिक्रिया माना जाए?
मलिक: नहीं. ऐसा इसलिए होता था क्योंकि हमें हरकत में आने में समय लगता था. इन दिनों पलक झपकते ही संघर्ष की स्थितियां पैदा हो जाती हैं, इसलिए तेज प्रतिक्रिया देने की जरूरत पैदा हो गई है. तथाकथित ‘कोल्ड स्टार्ट’ दरअसल एक रणनीतिक जरूरत है.
जब आप सेना में भर्ती हुए थे, तब क्या आपको पता था कि इतने सारे फौजी आंतरिक उग्रवाद से लडऩे में तैनात थे?
जैकब: इंदिरा गांधी दमदार थीं. उन्हें पता था कि क्या करना है. पश्चिम बंगाल में जब हालात काबू से बाहर हो गए, तो उन्होंने नक्सलियों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल किया. नक्सल विद्रोह आर्थिक और सामाजिक वजहों से पैदा हुआ था, जिसकी हमने कभी सुध नहीं ली.
मलिक: हाल के वर्षों में सरकार आंतरिक सुरक्षा में फौज का लगातार इस्तेमाल करती रही है. यह स्थिति न तो देश के लिए अच्छी है और न ही सेना के लिए. कुछ समय बाद लोग फौजी बंदिशों के आदी हो जाते हैं और उसके बाद एक हद तक अलगाव पैदा हो जाता है. चाहे जो हो, लेकिन इससे फौजियों की सोच और प्रशिक्षण पर असर पड़ता है.
राजनैतिक नेतृत्व की ओर से दिशा-निर्देशों की स्पष्टता किस तरह सैन्य अभियानों को प्रभावित करती है?
मलिक: अगर आपका राजनैतिक लक्ष्य और अन्य कोई भी लक्ष्य आपके सामने स्पष्ट कर दिया जाए, तो फिर आपकी रणनीति, कदम सब कुछ उसी हिसाब से चलते हैं. लेकिन शुरुआत में ही यदि दिशा सही नहीं रही, तो बड़ी समस्या हो जाती है. 1962 की जंग को देख लीजिए. हम पर्वतीय युद्ध के लिए तैयार नहीं थे. आज उस मुकाबले चीजें बेहतर हैं, और जैसा 1999 में था, राजनैतिक दिशा-निर्देश काफी साफ हैं.
जैकब: मैं खुशकिस्मत था कि इंदिरा गांधी जैसे नेताओं के साथ काम किया, जो मजबूत इरादों की धनी थीं और कतई घबराती नहीं थीं, और जगजीवन राम भी थे जिन्होंने हमें जंग लडऩे के लिए जरूरी हर सामान मुहैया कराया. ये व्यावहारिक नेता थे. आज के नेताओं के बारे में मैं नहीं जानता.
क्या हम अपने सबसे बड़े पड़ोसी चीन से निपटने के लिए तैयार हैं?
मलिक: बेशक हम पहले से कहीं ज्यादा तैयार हैं. आज दोनों देशों के पास परमाणु हथियार हैं जिन्होंने एक सीमा रेखा खींच दी है. सिर्फ एक समस्या है कि हमने सीमा पर पर्याप्त बुनियादी ढांचा विकसित नहीं किया है जिसके चलते सेनाएं हमला और रक्षा दोनों करने में सक्षम हो पाती हैं. अगर आपको जंग से बचना है, तो उपकरण ज्यादा से ज्यादा होने ही चाहिए. फिलहाल हम जंग लडऩे की स्थिति में तो हैं लेकिन उसे रोक पाने की स्थिति में नहीं हैं.
सेना अच्छी तरह हथियारों से लैस है?
मलिक: हमें 155 एमएम होवित्जर और चाहिए. पहाड़ों में मारक क्षमता बढ़ाने के लिए आपको पर्याप्त मात्रा में इनकी जरूरत होती है. हम खुशकिस्मत थे कि बड़े पैमाने पर जंग नहीं हुई इसलिए अपनी तोपों को हम करगिल में लगा सके. फिलहाल बोफोर्स के बाद हम कुछ भी नहीं खरीद सके हैं. हमें बेहतर सर्विलांस और तस्वीर उतारने वाले सैटेलाइट भी चाहिए. आज रणनीतिक माहौल काफी गतिशील है, इसलिए आपको साइबर जंग के लिए भी तैयार रहना होगा. सेना की नई डिवीजनों को हेलिकॉप्टर मिलने चाहिए ताकि उनकी एक जगह से दूसरी जगह आवाजाही में तेजी आ सके.
जैकब: हमें आवाजाही पर फिर सोचना होगा. हमें तीन और डिवीजनों तथा पूर्वोत्तर में एक सशस्त्र डिवीजन की जरूरत है. हम चीनी फौज को रोके रख सकते हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर हमारे पास हमला करने की पर्याप्त क्षमता नहीं है.
सेना में अफसरों की इतनी कमी क्यों है?
मलिक: जंग जीतने का काम युवा अफसर, जूनियर लीडर करते हैं. हमारे पास वे पर्याप्त संख्या में नहीं हैं क्योंकि प्रमोशन की रफ्तार धीमी है. एक अफसर जितने समय में ब्रिगेडियर या मेजर जनरल बनता है, वह अपनी सर्विस का तीन-चौथाई समय गुजार चुका होता है या कई बार ज्यादा भी. मैं 14 साल की सर्विस के बाद कमांडिंग अफसर (सीओ) बना. लेफ्टिनेंट जनरल जैकब उससे कम उम्र में ही सीओ बन गए. इस तरह आपको सीखने का और वक्त मिलता है. हमें फौज की नौकरी को और अधिक आकर्षक बनाना होगा. दूसरे, हौसला बढ़ाने वाले ऐसे कदम उठाने होंगे ताकि युवा अफसर फौज को छोड़कर न जाएं.
सेना में करियर को अरुचिकर बनाने की वजह कहीं घोटाले तो नहीं?
मलिक: कुछ अफसर खराब मिसाल के तौर पर सामने आए हैं. उन्हें दंडित किया जाना चाहिए, ऐसा हो भी रहा है. अगर आप समूची सेना की ताकत को देखें, तो घोटालों का असर भर्तियों पर पड़ रहा है.
क्या आपको लगता है कि सेना में राजनीतिकरण बढ़ा है?
मलिक: सेना की बुनियाद गैर राजनैतिक रही है. ले. जनरल जैकब और फील्ड मार्शल करियप्पा जैसे लोगों ने सेना के गैर राजनैतिक चरित्र को स्थापित करने का काम किया है. मैं उस वक्त के राजनैतिक नेतृत्व को भी इसका श्रेय देता हूं. आज भी वही परिपाटी चली आ रही है.
इसकी वजह से क्या राजनैतिक और सैन्य नेतृत्व के बीच की दूरी बढ़ी है?
मलिक: हमने अपने शीर्ष रक्षा संगठनों को दरअसल ऐसे ही गढ़ा है, और आपने सेना और नेताओं के बीच अफसरशाहों को ला दिया. जंग के दौरान हमारा ज्यादा संवाद राजनैतिक नेतृत्व से होता है. सामान्य स्थितियों में दूरी बढ़ जाती है, लेकिन ऐसा होना नहीं चाहिए. राजनैतिक और सैन्य नेतृत्व के बीच ज्यादा प्रोफेशनल रिश्ता होना चाहिए.
क्या सेना को सियाचिन ग्लेशियर से हटा लिया जाना चाहिए?
मलिक: आप कराकोरम दर्रे पर तभी कब्जा बनाए रख सकते हैं जब तक आप साल्टोरो रिज पर तैनाती रखें. एक समय था जब मैं कह सकता था कि यदि वास्तविक ग्राउंड पोजीशन लाइन तय हो जाती तो हम उसके पीछे अपनी तैनाती हटा लेते. आज मैं सियाचिन को खाली करने की बात नहीं कह सकता. अब यह अकेले भारत और पाकिस्तान का मामला नहीं रह गया है क्योंकि चीन अब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में घुस चुका है. इन रणनीतिक बदलावों के कारण हम वहां से नहीं हट सकते. आप एक ऐसे इलाके को खाली कतई नहीं कर सकते जहां चीनी और पाकिस्तानी फौजें मिलकर काम कर रही हों.
सेना में ऐसा क्या खास है कि वहां से ढेर सारी ब्यूटी क्वींस और हीरोइनें आ रही हैं, जैसे प्रियंका चोपड़ा, गुल पनाग, अनुष्का शर्मा...?
मलिक: इसका श्रेय सेना में होने वाली परवरिश को मिलना चाहिए. हम ऐसा माहौल रचते हैं जहां बच्चे अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल कर सकें.

