scorecardresearch

स्‍वास्‍थ्‍य: सेहत की दौड़ में अव्‍वल

2012 के शुरू में विभाग ने राज्य की रिमोट सेंसिग एजेंसी को डब्ल्यूएचओ के सॉफ्टवेयर की मदद से उसके हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर की पड़ताल को कहा. राष्ट्रीय आरोग्य निधि के तहत राज्य गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को सरकारी अस्पतालों में एक लाख रु. तक की स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराता है.

अपडेटेड 10 नवंबर , 2012

जम्मू और कश्मीर
सर्वाधिक सुधार वाला बड़ा राज्य
अपने को देश का सबसे कम उम्र का स्वास्थ्य सचिव बताने वाले 40 वर्षीय मनोज कुमार द्विवेदी कहते हैं, ‘‘आतंकवाद के साये में रह रहे राज्य में सुदूर कोने के लोगों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने का काम चुनौतियों भरा है.’’

उत्तर प्रदेश में जन्मे और दिल्ली में पले-बढ़े आइएएस ऑफिसर द्विवेदी ने जम्मू और कश्मीर के लोगों की सेहत को अपने जीवन का मिशन बना लिया है. उन्हें तकरीबन अपनी ही उम्र के मुख्यमंत्री का सहयोग प्राप्त है जिसके चलते द्विवेदी के पास सेहत से ऐसे जुड़े कई आंकड़े और संकेतक हैं जिनसे वे साबित कर सकते हैं कि कश्मीर की सेहत राष्ट्रीय औसत से कहीं बेहतर है.SOS Health

इसे विडंबना ही कहेंगे कि जिस राज्य में आतंकवाद ने जिंदगी को सस्ता बना दिया हो, वहां जन्म के समय नवजात शिशु के बच जाने की दर देश के तमाम हिस्सों से अच्छी है. यहां शिशु मृत्यु दर 1,000 पर 43 है जबकि राष्ट्रीय औसत 47 का है. इसी तरह बच्चों की जान बचने का संकेत देने वाली कुल प्रजनन दर यहां 2.1 है जबकि राष्ट्रीय औसत 2.6 इससे खराब है. छह साल तक के बच्चों में लिंगानुपात भी यहां 933 के राष्ट्रीय आंकड़े के मुकाबले 941 का है.

द्विवेदी कहते हैं, ‘‘यहां तक पहुंचने के लिए हमें बहुत मशक्कत करनी पड़ी है. ऐसा काफी हद तक मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के सहयोग के कारण संभव हो सका है.’’ कभी यहां स्वास्थ्य सेवाएं सिर्फ सत्तारूढ़ दल के विधायकों की मुट्ठी में होती थीं. 2012 के शुरू में विभाग ने राज्य की रिमोट सेंसिंग एजेंसी को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सॉफ्टवेयर की मदद से उसके स्वास्थ्य हालात की पड़ताल करने को कहा. वे कहते हैं, ‘‘इससे हमें बजटीय संसाधनों को ज्यादा नियोजित तरीके से आवंटित करने में मदद मिलती है.’’

हालांकि अब तक राज्य के 22 में से सिर्फ 13 जिलों का ही खाका खींचा जा सका है, लेकिन जो भी सूचना उपलब्ध है उसकी मदद से विभाग ‘अगम्य’ ‘बहुत मुश्किल्य और ‘मुश्किल’ श्रेणी में आने वाले इलाकों तक डॉक्टरों, चिकित्साकर्मियों और चिकित्सा उपकरणों तथा दवाओं की आपूर्ति करवा पाने में सक्षम हुआ है. द्विवेदी बताते हैं, ‘‘हमारे यहां 250 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र थे जहां पिछले एक दशक से कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था. लेकिन अब 230 में केंद्रों में नियमित डॉक्टर मौजूद हैं, इनमें लेह, करगिल, कुपवाड़ा, किश्तवाड़, रंबान, पुंछ, रियासी और डोडा जैसे इलाकों का नाम प्रमुखता से लिए जा सकता है.’’

असंभव नजर आने वाले लक्ष्यों को पूरा करने में नकद प्रोत्साहन ने भी अपना रंग दिखाया है. गांव और सुदूर कस्बों में काम करने के इच्छुक डॉक्टरों को नियमित वेतन के अलावा 10,000 से 20,000 रु. के बीच अलग से कठिनाई भत्ता (हार्डशिप एलाउंसेस) दिया जाता है. जम्मू और कश्मीर में जच्चा-बच्चा ट्रैकिंग सिस्टम (एमसीटी) जबरदस्त है, जहां हर एक मामले पर राज्य मुख्यालय से यहां तक कि सेलफोन के माध्यम से भी निगरानी की जा सकती है.

वे कहते हैं, ‘‘हमने स्वास्थ्यकर्मियों के लिए कागजी रिपोर्ट लिखने की प्रणाली को खत्म कर दिया है. आजकल स्वास्थ्यकर्मी गांवों में अपने दौरे की तस्वीर बड़ी ही आसानी के साथ हमारे फेसबुक पेज पर मोबाइल फोन से अपलोड कर देते हैं.’’

यह बात ध्यान देने लायक है कि पिछले एक साल के दौरान श्रीनगर के जीबी पंत अस्पताल में करीब 900 शिशुओं की मौत ने राज्य को सुर्खियों में ला दिया था. लेकिन इसमें कोई शुबहा नहीं कि आज यह राज्य द्विवेदी जैसे लोगों की कोशिशों के कारण सुर्खियों में है.

मणिपुर
सर्वाधिक सुधार वाला छोटा राज्य
भारत के रजिस्ट्रार जनरल के 19 अक्तूबर को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को भेजे गए हालिया सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे (एसआरएस) के आंकड़े बताते हैं कि देश में बच्चे के जन्म लेने के लिए सबसे अच्छी जगहों में गोवा के अलावा मणिपुर है. जन्म लेने वाले हर 1,000 बच्चों पर यहां सिर्फ 11 की मौत होती है यानी राज्य शिशु मृत्यु दर कम होने के मामले में देश में अव्वल है. साल 2011 में यह दर 14 थी. मणिपुर में संस्थागत प्रसव की संख्या 2010 के 7,025 से बढ़कर 2012 में 9,983 हो गई है. राज्य में मातृ मृत्यु दर में भी कमी आई है और यहां प्रसव के दौरान आने वाली जटिलताओं के चलते एक लाख जच्चा में से सिर्फ 160 की मौत होती है जबकि राष्ट्रीय औसत 220 का है.

मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह कहते हैं, ‘‘हम भले ही संसाधनों के अभाव में जीते हों, लेकिन हमने तीव्र विकास के लिए कुछ क्षेत्रों की पहचान कर रखी है. स्वास्थ्य इनमें एक है.’’

स्वास्थ्य मंत्री फुंगजथांग तोनसिंग कहते हैं, ‘‘इस साल हमने राज्य स्वास्थ्य नीति गठित की है जिसका केंद्रीय विचार है ‘उपचार से बचाव बेहतर.’ हम आम रोगों को रोकने के लिए जागरूकता शिविर लगाने की योजना बना रहे हैं. इसके पीछे उद्देश्य यह है कि लोगों को अस्पताल में कम-से-कम आना पड़े.’’

सुदूर इलाकों और गांवों तक स्वास्थ्य सेवा को पहुंचाने के लिए राज्य सरकार डॉक्टरों को प्रोत्साहन भी देती है. कुल 821 सरकारी डॉक्टरों में से 556 गांवों में काम कर रहे हैं. यहां 1,660 मरीजों पर एक डॉक्टर की व्यवस्था है. तोनसिंग डॉक्टरों की कमी के बारे में कहते हैं, ‘‘राज्य में सिर्फ एक केंद्रीय मेडिकल संस्थान रिजनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज था. इस साल हमने जवाहरलाल नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज की शुरुआत की है. अब कुल एमबीबीएस सीटों की संख्या 137 पहुंच गई है.’’ इस तरह राज्य अपने लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने की राह पर सरपट दौड़ लगा रहा है.

केंद्र सरकार की स्वास्थ्य योजनाओं को लागू करने में भी राज्य सरकार ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है. मसलन, 1997 में केंद्र सरकार की शुरू की गई योजना राष्ट्रीय आरोग्य निधि के तहत सरकारी अस्पतालों में गरीबी रेखा से नीचे के मरीजों का 1,00,000 रु. तक का इलाज किया जाता है. साफ है कि ऐसे प्रयासों से ही राज्य का स्वास्थ्य ग्राफ बढ़ रहा है.

Advertisement
Advertisement