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आइआइएम-अहमदाबाद: कॉर्पोरेट जगत का चहेता

आइआइएम-अहमदाबाद की मुहर लगते ही कॉर्पोरेट दुनिया के दरवाजे खुल जाते हैं. मार्केट को ध्यान में रखकर बनाए गए कोर्सेस की बदौलत बिजनेस स्कूलों की रैंकिंग में फिर इसने बाजी मार ली है.

अपडेटेड 13 नवंबर , 2012

कॉर्पोरेट जगत का चहेता

 

ढ देविका चतुर्वेदी

अगर आप आइआइएम-अहमदाबाद से ग्रेजुएट हैं तो समझिए कि आप जिंदगी भर के लिए ‘ब्रांडेड’ माने जाएंगे और दुनियाभर के कॉर्पोरेट जगत के दरवाजे आपके लिए खुल जाएंगे. इसमें कोई शक नहीं कि भारत में मैनेजमेंट एजुकेशन का सबसे दिग्गज इंस्टीट्यूट आइआइएम-अहमदाबाद ही है. इस साल की बीटी-नीलसन रैंकिंग में इस बिजनेस स्कूल ने पिछले साल के मुकाबले दो रैंक की छलांग लगाते हुए एक बार फिर पहला स्थान हासिल कर लिया है. इसकी सफलता के कारण क्या हैं? इसका जवाब यह है कि आइआइएम-अहमदाबाद बहुत अच्छी तरह समझता है कि कॉर्पोरेट जगत की जरूरत क्या है. मसलन, 2012-13 के पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा प्रोग्राम में नए विषयों पर गौर करते हैं-रियल एस्टेट मैनेजमेंट, स्पोर्ट्स मार्केटिंग, कोचिंग ऐंड काउंसलिंग स्किल्स फॉर टीम ऐंड लीडरशिप इफेक्टिवनेस (कैसल), मीडिया इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट और हाइ टेक्नोलॉजी ऐंड इनोवेशन में मार्केटिंग मैनेजमेंट.
इंस्टीट्यूट ने 2009 में ‘इंट्रोडक्शन टू कंटेंपररी फिल्म इंडस्ट्री: अ बिजनेस पर्सपेक्टिव्य नाम से एक इलेक्टिव कोर्स शुरू किया है. इस साल इस विषय के केंद्र में 100 करोड़ रु. का कारोबार करने वाली मेगाहिट फिल्में उन्हें प्रचारित करने में फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया की भूमिका है.
बाजार की जरूरत के हिसाब से तैयार किए गए दो साल के इस फुलटाइम एमबीए कोर्स की फीस है 15.5 लाख रुपए. यह महंगा तो है पर इससे मिलने वाले फायदों के आगे यह कीमत कुछ भी नहीं है. इंस्टीट्यूट में ग्लोबल पार्टनरशिप ऐंड कॉर्पोरेट अफेयर्स मैनेजर इशिता सोलंकी कहती हैं, ‘‘आइआइएम-अहमदाबाद की विदेशी यूनिवर्सिटीज के साथ साझेदारी में जबरदस्त बढोतरी हुई है, जो ‘90 के दशक में चार थीं लेकिन आज 60 हैं.’’ स्टुडेंट एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत हर साल यहां के 100 से ज्यादा स्टुडेंट्स का सलेक्शन कर बाहर भेजा जाता है. जहां तक प्लेसमेंट की बात है तो यह कारोबारी जगत का सबसे प्रिय ठिकाना है. 2012 के कैंपस प्लेसमेंट में इसके एक छात्र को सालाना 39.81 लाख रु. का ऑफर मिला जबकि बैच की औसत सैलरी 16.44 लाख रु. रही. प्लेसमेंट के लिए 120 कंपनियां आई थीं. इनमें सबसे बड़ी एम्प्लॉयर साबित हुई आइबीएम, जिसने यहां के 21 स्टुडेंट्स को चुना.
महीने भर बाद पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा करने जा रहे आइआइएम-अहमदाबाद के डायरेक्टर 61 वर्षीय समीर बरुआ कहते हैं, ‘‘ओबीसी कोटा बढ़ा दिया गया है (314 से 381) इस वजह से हर बैच में स्टुडेंट्स की संख्या काफी बढ़ गई है लेकिन बावजूद इसके हमने एकेडमिक प्रोसेस की क्वालिटी को जरा भी प्रभावित नहीं होने दिया है. यहां चयन की कसौटी कभी भी सिर्फ कैट का स्कोर नहीं रहा, बल्कि इसके लिए और भी कई फैक्टर का आकलन किया जाता है.’’
आइआइएम-अहमदाबाद की गुणवत्ता को प्रमाणित करते हैं वे नाम जिन्होंने बड़ा मुकाम पाया है. सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रघुराम राजन, स्पोर्ट्स कमेंटेटर हर्षा भोगले, लेखक चेतन भगत और आइसीआइसीआइ के नॉन-एक्जीक्यूटिव अध्यक्ष और इन्फोसिस के अध्यक्ष के.वी. कामथ यहां के स्टुडेंट रह चुके हैं. इंस्टीट्यूट की स्थापना 1961 में हुई थी, जिसमें विक्रम साराभाई का अहम योगदान था. उनकी बेटी और विख्यात नृत्यांगना मल्लिका साराभाई यहां की 1974 बैच की छात्रा हैं. उनका मानना है कि शैक्षणिक नैतिकता और सामाजिक प्रतिबद्धता के बीच बहुत भारी अंतर है. वे कहती हैं, ‘‘मेरे पिता का ख्वाब तकनीकी रूप से दक्ष अरबपति नहीं बल्कि सामाजिक उद्यमी पैदा करना था.’’ आइआइएम-अहमदाबाद को भी इस बात की चिंता है. इसीलिए 2013 में यहां ‘इन्वेस्टिगेटिंग कॉर्पोरेट सोशल इर्रिस्पॉन्सिबिलिटी, नाम से नया कोर्स शुरू होने जा रहा है जो एक्जीक्यूटिव एजुकेशन प्रोग्राम का हिस्सा होगा. इसमें अत्याधिक उपभोग और पर्यावरणीय क्षरण के बीच संबंध, औद्योगिक खेती के नुकसान, भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास जैसे मसलों के बारे में पढ़ाया जाएगा.
165 एकड़ में फैला कैंपस दिलचस्प चीजों से भरा है. मसलन यहां की कैंटीन का नाम है ‘‘तांस्ताफल’’ (‘मुफ्त खाने से अच्छा कुछ नहीं’ का संक्षिप्त रूप), तो नए छात्रों के डॉर्म का नाम है खुजली, टिनटिन, कालिया, डिस्को, बर्गर. जब जीवन बहुत मुश्किल लगने लगे तो मेन गेट के करीब मौजूद रामभाई की ‘‘कितली’’ (चाय की दुकान) पर अपना मन हलका कर सकते हैं. ढ

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