अगस्त माह में वेब पोर्टल एमबीएयूनिवर्स डॉट कॉम और एसेसमेंट कंपनी मेरिट ट्रैक के भारत के टॉप 100 बिजनेस स्कूलों के सर्वेक्षण में खुलासा हुआ कि भारत में निकलने वाले ज्यादातर एमबीए पास आउट नौकरी के लायक ही नहीं हैं. हालांकि, इस बात की जानकारी कई एम्प्लॉयर्स को पहले से ही थी.
इस सर्वेक्षण में 29 शहरों के 2,264 एमबीए छात्रों को शामिल किया गया था जिससे पता चला कि टॉप 25 बिजेनस स्कूलों के अलावा अन्य सभी स्कूल अपने सिर्फ 21 फीसदी ग्रेजुएटों को ही नौकरी दिला पा रहे हैं. सर्वे में एमबीए ग्रेजुएट की एम्लॉयबिलिटी (नौकरी के लायक होने की योग्यता) को 26 से 100 के बीच रैंकिंग दी गई थी. इससे यह पता चला कि 2007 के पिछले सर्वेक्षण के 25 फीसदी की तुलना में 2012 में एम्लॉयबिलिटी और घटते हुए सिर्फ 21 फीसदी ही रह गई.
इसी दौरान देश में एमबीए सीटों की संख्या 95,000 से बढ़कर 3,50,000 तक पहुंच गई. इस तरह सीटों की संख्या में हर साल 30 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हुई. लेकिन एमबीए एजुकेशन की क्वालिटी इस तेजी से नहीं बढ़ पाई. यह उसी तरह की बीमारी है जिससे भारत का पूरा हायर एजुकेशन सेक्टर ग्रसित है. तेजी से बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए सप्लाई तो बढ़ती गई है, लेकिन क्वालिटी कंट्रोल की व्यवस्था न होने से हालत यह है कि भारत के लाखों नौजवानों के पास डिग्री जरूर है, लेकिन वे किसी लायक नहीं हैं.
हालांकि भारत के बेहतरीन क्वालिटी वाले बेस्ट इंस्टीट्यूट्स में मैनेजमेंट की पढ़ाई व्यापक उच्च शिक्षा क्षेत्र से वास्तव में काफी अलग है. बिजनेस टुडे की 2012 की रैंकिंग में टॉप पर रहने वाले आइआइएम-अहमदाबाद को प्रतिष्ठित फाइनेंशियल टाइम्स (एफटी) की दुनिया के बेस्ट बिजनेस स्कूलों की रैंकिंग टॉप 10 में जगह मिली है.
इसी तरह 2012 में ग्लोबल बिजनेस स्कूलों की क्यूएस 200 रैंकिंग में आइआइएम-अहमदाबाद को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में दूसरे स्थान पर रखा गया है. क्यूएस की रैंकिंग में एशिया-प्रशांत के टॉप 36 में छह भारतीय बिजनेस स्कूल शामिल किए गए हैं, जिन्होंने दुनिया के टॉप 200 बिजनेस स्कूलों में भी जगह बनाई है. 2012 की एफटी की रैंकिंग में हैदराबाद के इंडियन बिजनेस स्कूल को 20वें पायदान पर रखा गया है.
इसकी तुलना में अगर हायर एजुकेशन के अन्य क्षेत्रों की बात करें तो एक आइआइटी को छोड़कर, शायद ही कभी कोई भारतीय यूनिवर्सिटी, ग्लोबल यूनिवर्सिटीज की किसी भी विश्वसनीय रैंकिंग में टॉप 200 में जगह बना पाई है. बेशक यह संख्या बहुत ज्यादा नहीं है, फिर भी यह हौसले बुलंद करने वाली बात है कि भारत में कुछ ही सही, ऐसे मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट हैं, जो दुनिया के टॉप इंस्टीट्यूट्स से मुकाबला कर सकते हैं.
तो इस मामले में पिछड़ जाने वाले इंस्टीट्यूट्स को अपना आदर्श घर के ही इन संस्थानों को बनाना होगा जो भारत में मौजूद तमाम बाधाओं के बावजूद फल-फूल रहे हैं. बिजनेस टुडे बी-स्कूल्स रैंकिंग जैसे सर्वेक्षण का मकसद इन इंस्टीट्यूट्स में कंपिटिशन को और बढ़ाना होता है. देशभर के इंस्टीट्यूट्स में उच्च स्तरीय मानक कंपिटिशन से ही सुनिश्चित किए जा सकते हैं, कठोर सरकारी रेगुलेशन से नहीं.
इस मामले में भारत का काफी कुछ दांव पर लगा हुआ है. भारत तुलनात्मक रूप से अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी चीन से किसी क्षेत्र में आगे निकल सकता है तो वह नॉलेज इकोनॉमी है. फिलहाल तो टॉप मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट्स की क्वालिटी के मामले में भारत से चीन थोड़ा ही ऊपर है. 2012 के लिए एफटी की रैंकिंग में टॉप 100 में चीन के पांच मैनेजमेंट स्कूलों को जगह मिली है जबकि भारत के सिर्फ दो स्कूल ही इस मामले में खुशकिस्मत रहे हैं.
हालांकि क्यूएस की 2012 की रैंकिंग में टॉप 200 इंस्टीट्यूट्स में भारत और चीन, दोनों ही के छह-छह संस्थानों को जगह मिली है. भारत को और बेहतर करने की जरूरत है. यही नहीं, इसे अपनी स्किल्ड मैनपॉवर की क्वालिटी के मामले में भी चीन से आगे निकलने की सख्त दरकार है. कुछ इंस्टीट्यूट नए तरीके अपना रहे हैं.
मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर मुकुल पी. गुप्ता कहते हैं, ‘‘हमने इंडस्ट्री की मांग और जरूरतों को ध्यान में रखकर अपना करिक्यूलम तैयार किया है.’’ इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी (आइएमटी) में बदलाव पर बात करते हुए ज्वाइंट एडमिशंस कमेटी के डायरेक्टर अरुण मोहन शेरी ने बताया, ‘‘हमारे लिए सबसे यूनिक बात दो साल का ग्लोबल एमबीए है. अन्य बिजनेस स्कूलों में स्टुडेंट एक्सचेंज प्रोग्राम जहां कम अवधि के रहते हैं, उसके विपरीत आइएमटी के कोर्स के तहत स्टुडेंट को एक साल के लिए ट्रेड और इंडस्ट्री के बड़े ठिकाने-दुबई पढ़ाई के लिए भेजा जाता है.’’
अनुमान के मुताबिक 2020 तक दुनिया की जीडीपी में उभरती अर्थव्यवस्थाओं का योगदान 50 फीसदी तक होगा. इसी प्रकार ग्लोबल वृद्धि दर में इनका योगदान 66 फीसदी से ज्यादा का रहेगा. उभरती अर्थव्यवस्थाओं के योगदान में सबसे बड़ा हिस्सा चीन और भारत का ही होगा. अमेरिका, यूरोप और जापान के बाजारों के ठहर जाने की वजह से अब विश्व व्यापार के लिए यह अपरिहार्य हो गया है कि तेजी से बढ़ती-उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर ध्यान केंद्रित किया जाए. लांग टर्म में देखें तो यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 2050 तक भारत और चीन दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं होंगी और शायद तब तक भारत, चीन से भी बड़ा हो जाएगा.
अगर यह बात सच हुई, जो तभी संभव है जब भारत सरकार कोई रोड़ा न अटकाए, तो भारत और चीन, ग्लोबल आर्थिक गतिविधियों के केंद्र बन जाएंगे. ग्लोबल बिजनेस का बड़ा हिस्सा भारतीयों और चीनियों के पास होगा. इनके पास अभी ही दुनिया भर के कई प्रतिष्ठित ब्रांड आ चुके हैं जिनमें जगुआर और लेनोवो जैसे नाम लिए जा सकते हैं. अब सवाल यह है कि इन कारोबार का प्रबंधन कौन करेगा, भारतीय, चीनी, अमेरिकी या यूरोपीय लोग. भारत के पास वह संख्या बल है जिससे वह 2050 तक दुनिया के मैनेजरों का बड़ा हिस्सा तैयार कर सके. लेकिन उसके पास संस्थागत क्षमता नहीं है. यह अलग बात है कि अगले दशक में इसमें भारी बदलाव हो सकते हैं.
निश्चित तौर पर कुछ सबसे प्रतिभावान भारतीय कई प्रमुख ग्लोबल बिजनेस का मैनेजमेंट संभालेंगे. वे अब भी ऐसा ही कर रहे हैं: डोयचे बैंक के अंशु जैन और पेप्सी की इंद्रा नूयी कुछ ही ऐसे ही उदाहरण हैं.
चुनौती तो ऐसे और ज्यादा बेहतरीन पर्सनेलिटीज तैयार करने की है. हमें अगले 10 साल में ऐसा माहौल तैयार होने का लक्ष्य रखना चाहिए कि किसी ग्लोबल दिग्गज कंपनी के सीईओ के रूप में किसी भारतीय की नियुक्ति कोई खबर ही न बने. क्यों? क्योंकि पहले से ऐसे बहुत से लोग मौजूद होंगे. तब जाकर ही भारत वास्तव में एक नॉलेज इकोनॉमी बन पाएगा. अब यह जिम्मेदारी देश के सैकड़ों बिजनेस स्कूलों की है कि वे इसका बीड़ा उठाएं.

