कोई भी दो व्यक्ति एक-दूसरे से इतने अलग नहीं हो सकते जितना कि मोहम्मद अली जिन्ना और सादगीपसंद महात्मा गांधी थे. इसी तरह से नियति ने पुतलीबाई और मीठीबाई के बेटे में समानताएं भी इतनी दी थीं जितनी कि उस पीढ़ी के किसी भी दो लोगों में शायद ही मिलें. दोनों गुजराती-भाषी परिवार में पैदा हुए, दोनों ने बंबई विवि से मैट्रिक किया, दोनों कानून की पढ़ाई के लिए लंदन के इंस ऑफ कोर्ट गए, दादाभाई नौरोजी का दोनों बहुत सम्मान करते थे और दोनों ने भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने के मकसद के साथ ही हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए काम किया. यह तब तक चला जब तक दो-मुल्क के सिद्धांत ने उनकी राहें जुदा नहीं कर दीं. कुछ समानताएं फिर भी बची रहीं. एक आजाद भारत में राष्ट्रपिता कहलाए तो दूसरे नवनिर्मित पाकिस्तान के बाबा-ए-कौम. दोनों अपने-अपने मुल्कों के गणतंत्र बनने से पहले ही चल बसे. ऐसे दौर में जब उनके देश आजाद देश के तौर पर 66वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, इस काल्पनिक बातचीत में दोनों अपनी विरासत में खुद को देख रहे हैं और अपने जीवन की कहानियों में अपनी विरासत को.
जिन्नाः (नाक पर टिके चश्मे से घड़ी देखते हुए) मिस्टर गांधी, आपसे बात करना हमेशा वक्त बर्बाद करने जैसा होता है.
गांधीः लेकिन मेरे लिए ऐसा नहीं होता.
जिन्नाः इस तरह हम कहीं नहीं पहुंच पाए.
गांधीः (चरखे से ध्यान हटाकर ऊपर देखते हुए) मुझे पता है.
जिन्नाः यह अशिष्टता है कि जब हम बात कर रहे हों तब भी आप कताई करते रहें.
गांधीः बंद किए देता हूं.
जिन्नाः आपका यह तो पूरा आभामंडल है ना...यह संतों जैसा काम...यह सब मुझे कभी भी आकर्षित नहीं करता. सच कं तो यह पूरी तरह से राजनीति पर केंद्रित रहने वाली हमारी बातचीत में एक तरह का अड़ंगा था.
गांधीः मैंने तो कभी नहीं कहा कि मैं संत हूं.
जिन्नाः आपके चेले तो आपको इसी रूप में देखते हैं.
गांधीः मुझे शिष्यों की आवश्यकता नहीं.
जिन्नाः आपको लगता है, मैं यकीन कर लूंगा?
गांधीः मैं सहयोगियों की जरूरत महसूस करता रहा हूं और मुझे मिले भी हैं. कुछ तो बड़े ही काबिल थे. आपका क्या ख्याल है?
जिन्नाः मेरे साथियों का और मेरा एक ही कॉमन गोल, कॉमन पैशन था-पाकिस्तान.
गांधीः मेरा लक्ष्य सभी भारतवासियों के लिए स्वराज प्राप्त करना था. इससे भी बड़ा लक्ष्य था हिंदू-मुस्लिम एकता कायम करना.
जिन्नाः आप सारे हिंदुस्तानियों के लिए थोड़े ही बोलते थे.
गांधीः यह तो मैं आप पर छोड़ता हूं. परंतु भारत को अखंड रखने का मेरा लक्ष्य यदि विफल रहा तो क्या भारत को बांटने की सफलता से आपको जीत जैसा एहसास होता है?
जिन्नाः आपको इस तरह से तंज नहीं कसना चाहिए, मिस्टर गांधी.
गांधीः संभवतः हम दोनों ही असफल व्यक्ति हैं.
जिन्नाः आप अपने बारे में ही ऐसा कह सकते हैं मि. गांधी.
गांधीः हम दोनों को भुला दिया गया है...
जिन्नाः आपका चेहरा तो है हिंदुस्तानी नोटों पर.
गांधीः जब हमारे करोड़ों हिंदुस्तानी गरीब, कुपोषित और शोषण के शिकार हों तो ऐसे में मुझे कागज की नोटों पर अपना खिलखिलाता चेहरा देखकर घृणा होती है...परंतु आपकी तस्वीर भी तो पाकिस्तान में हर दफ्तर की दीवार पर दिखती है...
(थोड़ी देर के लिए दोनों चुप हो जाते हैं)
गांधीः क्या मैं आपको कायदे-आजम कह सकता हूं?
जिन्नाः आपको इस जुमले का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. मैंने नहीं गढ़ा है इसे.
गांधीः 'महात्मा' की ही तरह. मैंने कभी अपने को इस रूप में नहीं देखा!
जिन्नाः आप आखिर पूछना क्या चाहते थे?
गांधीः कहा ना, आप जो चाहते थे, यानी पाकिस्तान, वह मिल गया आपको. मेरी जो इच्छा थी, वह पूरी न हुई. एक आजाद, न्यायसंगत और अखंड भारत. हमने तो भारत को बंटते देखा...
जिन्नाः हमने पाकिस्तान की पैदाइश देखी.
गांधीः लेकिन अब वह खुशहाल देश नहीं लगता...
जिन्नाः तो क्या हिंदुस्तान खुशहाल है?
गांधीः मुझे लगा, अब मुझे सवाल पूछ ही लेना चाहिए...
जिन्नाः पूछिए पूछिए... (घड़ी की तरफ देखते हुए) मैं इसी का इंतजार कर रहा था.
गांधीः मेरी मृत्यु तीन गोलियां लगने से नहीं बल्कि एक अदद दिल जलने से हुई.
जिन्नाः सवाल क्या है?
गांधीः उन्होंने मुझे राष्ट्रपिता कहा, लेकिन यह वह देश नहीं जिसका मैंने सपना देखा था.
जिन्नाः जनाब, आप सवाल पूछिए.
गांधीः मेरे साथी मुझे सुनने को ही तैयार न थे. हिटलर की तरफ से चुनौती आई तब तक वे संघर्ष करके और आपके साथ लगातार जबानी युद्ध करके थक चुके थे.
जिन्नाः मिस्टर गांधी, सवाल.
गांधीः मैं अकेला था, जबकि आप...आप पाकिस्तान के संस्थापक थे, राष्ट्र के मुखिया, उसकी संविधान सभा के अगुआ, मुस्लिम लीग के मुखिया.
जिन्नाः जी हां.
गांधीः अब मेरा सवाल ये है कि...आप जो कुछ चाहते थे आपको सब मिला...एक-एक चीज मिली आपको...तो क्या आप खुशी-खुशी मरे?
जिन्नाः (जेब से पाइप निकालते हुए) बहुत दर्द हुआ मरते वक्त.
गांधीः ओफ्फ...
जिन्नाः (पाइप जेब में वापस रखते हुए) बउ दरद थायो...हां-जी...बउ दरद.
गांधीः यानी हमारे बीच कम से कम दो समानताएं तो थीं-हम गुजराती बोल रहे थे और आखिरी दिनों में दर्द से तड़प रहे थे.
जिन्नाः मेरा मतलब शारीरिक तकलीफ से था.
गांधीः मेरा दर्द तो शारीरिक नहीं था. हां, एकदम अंतिम क्षणों को छोड़ दें तो. बिजली की तरह आई पहली गोली ने तो एक तरह से मुझे चौंका दिया था...हां दूसरी से जरूर चोट महसूस हुई, लेकिन तीसरी का तो मुझे कुछ अनुभव ही नहीं हुआ...परंतु जिस दर्द की मैं बात कर रहा हूं वह मेरे हृदय में था...कुछ-कुछ ऐसा ही, जैसे कि मुझे किसी अंगीठी में डाल दिया गया हो, हिंदुस्तान का बंटवारा और नरसंहार...मैं उस पीड़ा की वजह से मरा.
(एक बार फिर चुप्पी का दौर)
जिन्नाः मुझे लग रहा था कि यह सब बड़े सलीके से होगा...इसके बाद पाकिस्तान में कोई हिंदू या मुसलमान नहीं रह जाएगा, सिर्फ पाकिस्तानी होंगे...वे जैसी पूजा पद्धति चाहेंगे, अपना सकेंगे...मैं नहीं जानता कि कैसे और क्यों...अकेले पंजाब में ही पांच लाख लोग मार डाले गए. हिंदू और मुसलमान दोनों बराबर की तादाद में मारे गए...सब कुछ इतना डरावना था...पर अब इन सबके बारे में सोचने का क्या मतलब...
गांधीः मैंने नोआखली में हिंदुओं का...और बिहार में मुसलमानों का कत्लेआम देखा...बिहार में मैंने लोगों से पूछा, ''यह देखकर आप जिंदा कैसे रह सकते हैं कि आपकी आंखों के सामने ही एक बूढ़ी महिला को काट डाला जाए. आप उसे सिर्फ एक मुसलमान के रूप में कैसे देख सकते हैं? वह एक मां थी. एक दादी थी.''
जिन्नाः शेखूपुरा में एक बच्चा गिड़गिड़ाया, ''मेरा गला मत काटो...मेरा गला मत काटो...'' फिर भी वे नहीं माने और उन्होंने उसका गला रेत दिया...मैं इसे...इसे...
गांधीः आपने दोषियों को सजा दिलाई या नहीं? और आपके साथी कहां थे?
जिन्नाः ...हम अपनी अलग-अलग दुनिया में रहते थे. वे अलग, मैं अलग (गला साफ करते हुए) रुत्ती भी नहीं थीं मौके पर.
गांधीः वह बड़ी परेशान आत्मा थीं.
(चुप्पी)
जिन्नाः और इसके बाद...मैं बीमार पड़ गया...
गांधीः पिछली बार हमारी भेंट के समय आपको अपने कैंसर की जानकारी थी? आपने बताया तो नहीं था.
जिन्नाः आप कोई डॉक्टर तो थे नहीं.
गांधीः ठीक कहा आपने...
(चुप्पी)
जिन्नाः इस सबमें हमारा इतना वक्त, इतनी एनर्जी, और जिंदगी ही खप गई, सब कुछ अब कितना फालतू लगता है. हम एक-दूसरे से किस चीज के लिए लड़े? प्रधानमंत्रियों...पूर्व प्रधानमंत्रियों...भावी प्रधानमंत्रियों...को कत्ल होते देखने के लिए...आतंकवादियों...घोर भ्रष्टाचार...कुशासन...और एटमी हथियारों को देखने के लिए...
गांधीः पता है मुझे. दोनों मुल्कों में धार्मिक कट्टरता बढ़ रही है...संस्कृति के नाम पर महिलाओं के साथ बर्बरता हो रही है...कभी-कभी तो मुझे लगता है कि हम कहीं मध्य युग की ओर तो नहीं लौट रहे...हमारे इलाकों में हिंसा हद दर्जे तक बढ़ गई है...सीधी और छद्म हिंसा, दोनों...शोषण...पैसा सबको चला रहा है...यह समूची मानवीय करुणा को खत्म कर रहा है...हमें इस बारे में कुछ करना होगा.
जिन्नाः मिस्टर गांधी, ध्यान रहे, हम दोनों उस दुनिया के लिए मर चुके हैं. हम सिर्फ भूत हैं...
गांधीः परंतु हम मूकदर्शक होकर नहीं देख सकते!
जिन्नाः सिविल नाफरमानी का आपका तरीका तो अब हिंदुस्तान में काफी आम हो चुका है...एक मजाक बन गया है...
गांधीः क्या आपका 'इस्लाम खतरे में है' वाला नारा अप्रत्याशित रूप से वापस नहीं लौट आया है? परंतु आरोप-प्रत्यारोप से क्या लाभ...हमारे सामने एक नया लक्ष्य है कायदे-आजम. हमें यह तय करना होगा कि हमारी जमीन पर अब कोई निर्दोष न मरने पाए, दंगों में या आतंकवाद से या युद्ध में. हमें भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को अपराध के खिलाफ जंग में लगाना होगा.
जिन्नाः कश्मीर का क्या होगा?
गांधीः चलो श्रीनगर में बैठते हैं. एक नया अध्याय शुरू करने के लिए वहां दाराशुकोह के परी महल में एक सम्मेलन रखा जाए...प्राकृतिक संरक्षण के लिए कश्मीर को दुनिया की राजधानी बनाया जाए...मैं वह शब्द तो नहीं जानता था, जिसे आज पूरी दुनिया इस्तेमाल करती है...'इकोलॉजी'...लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि हमारे पर्यावरण को मनुष्य के लालच से बचाना होगा. कश्मीर पूरी दुनिया को एक रास्ता दिखा सकता है...न सिर्फ हमें...और हम वहां जहांगीर के साथ फिर कहें...पृथ्वी पर कहीं जन्नत है...तो यहीं है...यहीं है...
जिन्नाः बहुत जज्बाती मत होइए.
गांधीः और वहां एक सूफी संगीत का समारोह आयोजित हो...कबीर की साखियां...और रामधुन...ईश्वर अल्ला तेरे नाम...भारत और पाकिस्तान पारिस्थितिकीय समझ की उपमहाद्वीपीय योजना बनाने के लिए एक श्रीनगर सम्मेलन की घोषणा करें...जो श्रीनगर कोड कहलाए...परमाणु हथियारों को खत्म करने के एक कार्यक्रम के साथ...कैदियों की परस्पर रिहाई हो...सीमा का उल्लंघन न करने का एक समझैता हो...पाकिस्तान की ओर से हिंदुस्तान को यह जोरदार ऐलान सुनने को मिले कि उसका आतंकियों से कोई लेना-देना न होगा...भारत को मुंबई हमले की सचाई सुनने को मिले...मुंबई तो आपके लिए भी खास था...कायदे-आजम...मैं दिल्ली के कान में यह बात डालूंगा कि मुंबई में जो आपका सुंदर मकान है, उस पर आपका ही हक है...भारत को आपके बारे में संकुचित सोच नहीं रखनी चाहिए...आपकी आंखें नम हो रही हैं...
जिन्नाः और आपकी सूखी हैं क्या?

