भारतीयों और पाकिस्तानियों में क्या फर्क है? जवाब आसान हैः कोई फर्क नहीं है. हम एक जैसे ही लोग हैं, हमारे व्यक्तित्व की ताकत एक जैसी और सामूहिक कमजोरी भी एक सी. फिर आखिर अपने अस्तित्व के छह दशकों के बाद भी दोनों देश नाटकीय ढंग से दो जुदा राहों पर कैसे निकल पड़े?
भारत और पाकिस्तान केवल सीमाओं से ही अलग-अलग नहीं, बल्कि मूलरूप से ही परस्पर विपरीत विचारधारा से बने हैं. भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में यकीन करता है जहां सभी धर्म समान हैं; पाकिस्तान का ख्याल है कि धर्म के आधार पर ही किसी राष्ट्र की बुनियाद रखी जा सकती है.
दो राष्ट्र का सिद्धांत, जिसके आधार पर पाकिस्तान का जन्म हुआ, इस उपमहाद्वीप के सभी मुसलमानों को हिंदुओं से अलग नहीं करता. जितने मुसलमान पाकिस्तान में हैं, उतने तो भारत में रह रहे हैं और उन्हें अपने मजहब को मानने पर कोई रोक नहीं. पाकिस्तान इस पूर्वाग्रह के साथ बना कि हिंदूबहुल भारत में मुसलमान बराबरी की जिंदगी बसर नहीं कर सकते, जिसका भारतीय मुसलमानों के राजनैतिक या सामाजिक इतिहास में कोई आधार नहीं मिलता. यह ऐसी अवधारणा थी जो हीन भावना की बंजर जमीन पर उग आई थी.
मौलाना आजाद और देवबंद के अधिकतर उलमा जैसे भारतीय मुसलमान इस सोच से कतई सहमत नहीं थे. उनका तर्क था कि इस्लाम का ताल्लुक भाईचारे से है, राष्ट्रीयता से नहीं क्योंकि मजहब का रिश्ता अल्लाह से है जबकि राष्ट्र का इनसान से. इस विचार के पक्ष में उन्होंने अनुभव आधारित सबूत भी पेश कियाः अगर आस्था ही आपस में जोड़ने की बुनियाद होती तो भला इतने सारे अरब देश क्यों होते? अलग राष्ट्र के पैरोकारों को लगता था कि धरती पर जन्नत उतारने का रास्ता यही है और उनकी हठवादिता भारत की एकता की आवाज बुलंद करने वाले लोगों को खारिज कर देती है. खैर, वक्त को अपना पहला फैसला सुनाने में तीन दशक का समय लग गया. वर्ष 1971 में दो राष्ट्र का सिद्धांत तब ढह गया जब पाकिस्तान की एक बड़ी आबादी अलग होकर बांग्लादेश के रूप में सामने आई.
1950 के दशक में कई लोग यह मानकर चल रहे थे कि आजाद हुए मुल्क के बाशिंदे लोकतंत्र जैसी उच्चस्तरीय व्यवस्था को अपनाने के काबिल नहीं हैं और भारत का आदर्शवादी एक-राष्ट्र सिद्धांत पानी के बुलबुले की तरह फट जाएगा जबकि पाकिस्तान स्थिरता प्राप्त करते हुए विकास की दिशा में बढ़ता चला जाएगा. हालांकि आजादी के 10 साल के भीतर पाकिस्तान के राज्यतंत्र ने दम तोड़ दिया था, लेकिन शुरू के वर्षों में यह दिख रहा था कि पाकिस्तान कहीं अधिक बेहतर सामाजिक और आर्थिक माहौल कायम कर सकता है.
1960 के दशक के मध्य में जब पाकिस्तान के वजूद के मकसद की परतें उतरने लगीं तो पाकिस्तान के नेताओं ने अपने अनुभव से उलटा ही सबक सीखा. अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए धर्म-तंत्र से अलग राह अख्तियार करने की बजाए उन्होंने इसी पर चलने का फैसला कर लिया.
संभ्रांत और जहीन बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना ने 1930 के दशक की अफवाह कि अंग्रेजों के भारत छोड़ते ही हिंदुओं के कारण इस्लाम खतरे में पड़ जाएगा, को 1940 के दशक में एक तूफान में तब्दील कर दिया और इसी नारे की बुनियाद पर उन्होंने अलग पाकिस्तान का नारा बुलंद किया.
विडंबना यह है कि जिन्ना ही वह पहले पाकिस्तानी थे जिन्हें इस बात का एहसास हुआ कि जिस सिद्धांत को उन्होंने हवा दी, उसके साथ कैसे खतरे जुड़े थे. जिन्ना के मन में पाकिस्तान को मुस्लिमबहुल धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में संवारने का सपना पल रहा था. वैसे सार्वजनिक तौर पर उन्होंने एक बार यह बात मानी थी जब वे मार्च, 1947 के दूसरे सप्ताह में पाकिस्तान संविधान सभा को पहली बार संबोधित कर रहे थे.
हालांकि उन्होंने गांधी के विचारों को स्वीकार करने योग्य कभी नहीं समझ लेकिन अगर उन्होंने उनकी बात मानी होती तो यह भारत का प्रतिबिंब होता. गांधी एक अखंड और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र चाहते थे जो हिंदूबहुल हो. इसमें एक बड़ा फर्क था. जिन्ना का राष्ट्र खास लोगों के लिए था, जबकि गांधी का भारत समावेशी था.
दोनों की राहें 1930 के दशक के मध्य में अलग हो गईं. गांधी और कांग्रेस ने आजादी हासिल करने के लिए अंग्रेजों के साथ संघर्ष किया तो जिन्ना और मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के वजूद के लिए कांग्रेस के साथ लड़ाई की. अंग्रेजों ने दलालों की तरह काम किया और वे यहां से अपना नफा वसूले बगैर गए भी नहीं.
बहुलतावादी जनतंत्र के तौर पर भारत के स्वरूप को बड़ी जल्दी एक दस्तावेज भारतीय संविधान में संरक्षित कर लिया गया था जो भारतीय राष्ट्रवाद की रीढ़ है. जहां तक पाकिस्तान के 'मुस्लिम राष्ट्र' होने से जुड़ी बहस का सवाल था तो इसकी सुगबुगाहट का असर दिखते ही पलटी मारकर सबसे मुश्किल सवाल पर पहुंच गयाः इस्लामी मुल्क का मतलब क्या है?
अहमदिया संप्रदाय के विरुद्ध हुए लाहौर दंगे के बाद 1950 के दशक में गठित जस्टिस मुनीर आयोग ने कुछ सुझाव दिए थेः जो भी हो मुस्लिम राष्ट्र दिवास्वप्न मात्र था; किसी भी स्थिति में 'कूमत को बताने की जरूरत नहीं कि कौन मुसलमान है. पर हदों को पार करने के लिए आतुर कट्टरवादियों को विवेक की सलाह शायद ही सचेत कर पाती है. पाकिस्तान के गॉडफादर और जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक मौलाना मौदूदी ने पाकिस्तान के पिता जिन्ना को जल्दी ही हाशिए पर डाल दिया. वैसे, चुनावी रण में जमात फिसड्डी रहती है क्योंकि मतदाता शासन की बागडोर थामे मुल्ला पर विश्वास नहीं करते लेकिन देश की विचारधारा पर उसका जबरदस्त प्रभाव है जो लगातार बढ़ रहा है.
मौदूदी के चरमपंथ और हाफिज मोहम्मद सईद जैसे उसके वारिसों पर लगाम कसने में इस्लामाबाद की विफलता ने न सिर्फ भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर असर डाला, बल्कि इसने पाकिस्तान के सामाजिक ताने-बाने को भी झ्कझेर दिया. परिवार और अल्पसंख्यक कानून ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है. कई कबाइली इलाके बर्बर हो चले हैं. यही वजह है कि मैंने अपनी किताब चिनगारीः पाकिस्तान का अतीत और भविष्य में पाकिस्तान को 'जेली स्टेट' कहा है.
पाकिस्तान का भूत और भविष्य जेली के जैसा है जो स्थिर नहीं रह सकता, लेकिन यह मक्खन-सा कोमल भी नहीं कि पिघल कर अपना वजूद खो बैठे. चूंकि वहां एक तरफ आतंकवाद का ढांचा है और दूसरी ओर परमाणु हथियारों का जखीरा है. लिहाजा वह विषाक्त जेली स्टेट बन गया है. भारत जिसका मुख्य शिकार है.
दूसरी तरफ, भारत के निर्माण का बुनियादी दर्शन खुद ही भारत का सुरक्षा कवच बन कई आफतों से इसकी रक्षा कर रहा है. लोकतंत्र की औषधि ने पश्चिमोत्तर और पूर्वोत्तर क्षेत्रों की यंत्रणा पर मरहम का काम किया है; सिक्खों की असुरक्षा की भावना कि धर्मनिरपेक्ष भारत में उनका मजहब खतरे में है, से पनपी विघटनवादी विचारधारा ने बेशक हिंसक रूप अख्तियार कर लिया था, पर जल्दी ही वह शांत भी हो गया. 1980 के दशक के उस अग्निकुंड से भारत ने फिर नई जीवन ऊर्जा की डोर कसकर बांध ली है और उज्ज्वल आधुनिक विकास की ओर बढ़ रहा है. भारत के सिद्धांत ने साबित कर दिया है कि वह भारतीय से ज्यादा मजबूत है; उधर पाकिस्तान का सिद्धांत पाकिस्तानी से कमजोर सिद्ध हुआ है.
जो विभाजन हुआ वह स्थायी है. भारत से पाकिस्तान और पाकिस्तान से बांग्लादेश का अलग होना, दोनों ही घटनाएं ऐसी हैं जो पलटी नहीं जा सकतीं. पाकिस्तान का जवाब सिर्फ उस व्यक्ति के चेहरे से झंकता है जिसे तस्वीरों में ही याद किया जाता है-जिन्ना. उनकी विचारधारा और व्यक्तिगत मूल्यों से इस देश का कोई लेना-देना नहीं.
कुछ ऐसी बातें हैं जो दर्शाती हैं कि जिन्ना ने खुद भी शायद यह अनुमान नहीं लगाया होगा कि विभाजन स्थायी होगा, जैसे उन्होंने मुंबई का अपना मकान नहीं बेचा था, जबकि हैदराबाद के निजाम ने उन्हें 10 लाख रु. की पेशकश की थी. जिन्ना ने सोचा होगा कि पाकिस्तान अंग्रेजी राज के जैसा एक स्वतंत्र साम्राज्य होगा जिसकी सीमाएं दोनों तरफ से खुली होंगी. जो भी हो अगर आज वह होते तो पाकिस्तान की फिजा में जहर घोलने वाले रूढ़िवादियों पर लानत भेजते.
इतिहास की कसक से हकीकत को खास ढाढस नहीं मिलता. 1947 में अमेरिका सात समंदर पार था, पर आज एक भारतीय पाकिस्तान की तुलना में उससे ज्यादा नजदीकी महसूस करता है; भारत और पाकिस्तान के बीच एक हिमखंड-सी चुप्पी तारी है, जिसे उदारवादी धराशायी करने की कोशिश में लगे हैं, तो कट्टरवादी उसे और मजबूत करने के लिए तत्पर हैं और लोग? वे इसे झेलने के लिए अभिशप्त हैं.

