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स्‍कूली किताबें: दुराग्रह और आक्रोश पढ़ाती किताबें

सीबीएसई की पाठ्य-पुस्तकों में विभाजन को संतुलित तरीके से दर्शाया गया है, लेकिन राज्‍य बोर्डों का नजरिया इतिहास के प्रति अब भी दुराग्रहपूर्ण.

अपडेटेड 12 अगस्त , 2012

राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचे (एनसीएफ 2005) के क्रियान्वयन में एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद) ने जो तरीका अपनाया था, उसने इतिहास समेत तमाम स्कूली टेक्स्ट बुक की तस्वीर ही बदल डाली है. क्लास 6 से 8 तक की हमारा अतीत  नाम की पाठ्य पुस्तकों में एक नया दृष्टिकोण है. इसका इतिहास बताता है कि किस तरह अलग-अलग क्षेत्र, समूहों और महिलाओं समेत आम लोगों ने अतीत का अनुभव किया. बड़ी कक्षाओं की पाठ्य पुस्तकों में भी दृष्टिकोण और संरचना का फर्क इतना ही स्पष्ट है.

नई पाठ्य पुस्तकें बताती हैं कि इतिहासकार कैसे काम करते हैं, कैसे वे अपने स्त्रोतों और साक्ष्यों का इस्तेमाल करते हैं और कैसे एक ही घटना की दो भिन्न व्याख्याएं भी हो सकती हैं. पुरानी किताबों में कुछ रूढ़िवादी बातें थीं, जिनका आधार जाहिर नहीं था. नई किताबें बच्चों में विश्लेषण क्षमता और इतिहासबोध पैदा करने का काम कर रही हैं. पुराने पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तकों में कुछ विषयों को बड़ी हिचक के साथ बरता गया था. माना जाता था कि विस्तार से चर्चा के लिए वे विषय बेहद संवेदनशील हैं. देश विभाजन ऐसा ही एक विषय था, जिसे बिल्कुल सरकारी शैली में रेखांकित कर छोड़ दिया गया था.

मैंने 1998 में जब भारतीय और पाकिस्तानी पाठ्य पुस्तकों का तुलनात्मक अध्ययन शुरू किया (बाद में जो 2001 में पेंगुइन से प्रिज्‍युडिस एंड प्राइड  के नाम से छपा) तो मैंने पाया कि दोनों देशों में साझे अतीत का ज्ञान देने वाले दो इतिहासों के फर्क को समझने में विभाजन की धारणा केंद्रीय है.

मेरा अध्ययन कहता था कि पाकिस्तानी बच्चों को विभाजन फतह के रूप में दिखाया जाता है, जबकि भारतीय बच्चों को इसे त्रासदी बताया जाता है. दोनों ही मामलों में पाठ्य पुस्तकें यह बता पाने में नाकाम रहीं कि विभाजन आखिर कैसे इतना अपरिहार्य बन गया और कैसे यह अपने साथ इतनी तबाही और खून-खराबा लेकर आया.

एनसीईआरटी की नई किताबों के मामले में ऐसा नहीं है. कक्षा 12 की पुस्तक भारतीय इतिहास के कुछ अंश भाग-3 में विस्तार से विभाजन पर बात की गई है. इसमें विभाजन के राजनीतिक आयामों के साथ सरहद के दोनों ओर करोड़ों लोगों पर बरपे दर्द और सदमे के बीच संतुलन बरता गया है.

अभिलेखागार के चित्रों, मौखिक आख्यानों और विडंबनाओं के सहारे बात की गई है. हाशिए पर और बॉक्स में पृष्ठभूमि से जुड़ी सूचनाएं दी गई हैं, जबकि मुख्यपाठ में विद्यार्थी को सिलसिलेवार घटनाक्रम के सहारे उस प्रक्रिया से जोड़ने की कोशिश की गई है, जिसने चौथे दशक की राजनीति को संचालित किया था. अंत में दिए गए अभ्यास प्रश्न ऐसे हैं, जो बच्चों में नए सवालों और विपरीत तथ्यों के प्रति जिज्ञासा पैदा करते हैं.

भारत के लिए यह अद्भुत उपलब्धि वास्तव में संतोष की बात है, क्योंकि दोनों देशों के प्रतिनिधियों की ओर से सार्क के कई घोषणापत्रों पर दस्तखत किए जाने के बावजूद पाठ्य पुस्तक सुधार पर पाकिस्तान के पास कहने के लिए कुछ भी नहीं है. भारत निश्चित तौर पर एनसीईआरटी के इस गौरवशाली काम पर संतोष जता सकता है. बावजूद इसके राज्‍यों के बोर्ड द्वारा चलाई जाने वाली पाठ्य पुस्तकों की गुणवत्ता अब भी बदतर है.

कुछ राज्‍यों ने तो एनसीईआरटी की ही किताबें दोबारा मुद्रित करवा ली हैं, लेकिन अधिकतर राज्‍य बोर्ड अपना इंतजाम खुद ही करते हैं. अधिकतर राज्‍य बोर्डों में सेकेंडरी और सीनियर सेकेंडरी स्कूली किताबों की हालत खस्ता है. पंजाब और पश्चिम बंगाल इस मामले में सबसे बुरी स्थिति में हैं. यही वे राज्‍य हैं, जिन्होंने विभाजन का दर्द सीधे तौर पर सबसे ज्‍यादा झेला है. सोचा जा सकता है कि इन दोनों राज्‍यों में विभाजन पर अध्यायों को तरजीह दी जानी चाहिए, लेकिन सच यहां उलटा है.

विभाजन अब भी पाठ्यक्रम में कहीं कोने पर पड़ा हुआ है. इसे इस तरह से पेश किया गया है गोया पाकिस्तान आजादी की लड़ाई की नाजायज पैदाइश हो. चूंकि पाकिस्तान के गठन और आजादी के बाद इतिहास का अंत हो जाता है, लिहाजा शिक्षक को भी जरूरत नहीं पड़ती कि वह इसका जिक्र बच्चों से आगे कभी करे. नतीजतन पाकिस्तान, एक नौजवान और शिक्षित मस्तिष्क के भीतर हमेशा के लिए नकारात्मक छवि लिए हाशिये पर चुपचाप पड़ा रह जाता है.

पंजाब में 11वीं के पाठ्यक्रम में विभाजन का विषय है. यहां एम.एस. सोढ़ी की किताब हिस्ट्री ऑफ  इंडिया चलती  है, जिसमें विभाजन के प्रभाव को 15 लाइनों के एक नाटकीय पैरा में निबटा दिया गया है. विवरण, चित्रों या छात्रों को जोड़ने वाले अभ्यास के लिए कहीं कोई जगह नहीं है. इसका समूचा उद्देश्य बच्चों को इम्तिहान पास करवाना है. बच्चों के पास भी इसे याद करने के अलावा कोई और काम नहीं बचता.

12वीं कक्षा की इतिहास की किताब भी इसी लेखक की लिखी हुई है, जिसमें 1469 से 1869 के बीच पंजाब का क्षेत्रीय इतिहास शामिल है. किताब मध्यकालीन इतिहास के ब्यौरों से पटी पड़ी है. आक्रमण, विजय, हत्याएं छोटे-छोटे विवरण के साथ मौजूद हैं. विश्लेषण की कोई गुंजाइश नहीं.

दूसरे अंग्रेज-सिख युद्ध के पार जाने की जगह पाठ्यक्रम में छोड़ी ही नहीं गई है, लिहाजा बच्चों को उन चुनौतियों से परिचित करवाने का सवाल ही नहीं उठता, जो आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक दायरे में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के संदर्भ में पंजाब को दरपेश आईं. न ही ऐसी कोई गुंजाइश है कि भारतीय पंजाब के बच्चे सरहद पार पंजाब के बारे में कुछ सीख पाएंगे या कम-से-कम उत्सुक ही हो पाएंगे. निश्चित तौर पर राज्‍य की शैक्षणिक नीति का यह उद्देश्य तो नहीं है, न ही यह उद्देश्य बंगाल की शैक्षणिक नीति का है, जहां की पाठ्य-पुस्तकें पंजाब जितनी ही घटिया और संकीर्ण हैं.

जाहिर है, ये दोनों कोई अपवाद नहीं. देश के अधिकतर राज्‍य बोर्डों में पिछले 50 साल के दौरान पाठ्यक्रम तैयार करने, पाठ्य पुस्तकें तैयार करने या उनकी सिफारिश करने और परीक्षाएं आयोजित करने की क्षमता के संदर्भ में बमुश्किल मामूली बदलाव हुए हैं. अमरीक सिंह कमेटी की सिफारिशें सरकारी दफ्तरों में धूल खा रही हैं. एनसीईआरटी राज्‍य के बोर्डों के साथ जो सालाना कॉन्फ्रेंस करता है, उससे भी पाठ्यक्रम या पाठ्य-पुस्तक तैयार करने में किसी नए विचार का सूत्रपात या इस विषय में संवाद नहीं हुआ है.

अधिकतर राज्‍यों में पाठ्यक्रम तैयार करने और पाठ्य पुस्तक लिखने का काम प्राथमिक स्तर पर राज्‍य बोर्ड एससीईआरटी के पास होता है, लेकिन यह संस्था कमजोर है. इनके पास न तो स्थायी स्टाफ  है, न ही इसका कोई असर है. इन स्थितियों के मद्देनजर पाठ्य पुस्तकों की गुणवत्ता की हमारी कुल क्षमता बहुत खराब है. सीबीएसई से मान्यता प्राप्त स्कूल कम-से-कम कक्षा 8 के बाद तो एनसीईआरटी की किताबें ही चलाने को बाध्य हैं, लेकिन वे समाज के संपन्न तबके को शिक्षा देते हैं. दूसरी ओर राज्‍य बोर्डों से मान्यताप्राप्त स्कूल ग्रामीणों और मजदूरों के बच्चों के काम आते हैं.

पाकिस्तान की कहानी भी इससे कोई अलग नहीं. वहां भी संपन्न तबके के बच्चों को पढ़ाने वाले निजी स्कूलों में बेहतरीन ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से छपी हुई किताबें चलती हैं, जबकि आम आदमी के बच्चे मजहबी विचारधारा की खाद पर पलते हैं. दोनों ही देशों में प्रभावशाली अमीर तबके ने अपने बच्चों के लिए साफ-सुथरी व्यवस्था की हुई है और आम बच्चों को पिछड़ी सरकारी व्यवस्था से जूझ्ने के लिए छोड़ दिया है.

यदि भारत और पाकिस्तान के बीच अमन को शैक्षणिक नीतियों का लक्ष्य बनाया जाना है, तो पहले से कहीं अधिक सुधारात्मक ऊर्जा दोनों ही देशों में खपानी होगी. भारत में हम पाकिस्तान से इस मामले में आगे हैं कि हमने राष्ट्रीय स्तर पर कम-से-कम पाठ्यक्रम में सुधार किया है. राज्‍यों के स्तर पर इसे बनाए रखना कोई आसान काम नहीं है.

सवाल सिर्फ पाठ्य पुस्तकों को पुराने ढर्रे पर चलते रहने से रोकने भर का नहीं है. बच्चों को विचार करने के लिए प्रेरित करने वाली किताबों के साथ-साथ ऐसे शिक्षक भी होने जरूरी हैं, जिन्हें बच्चों में वैचारिक स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करने के हिसाब से प्रशिक्षित किया गया हो. भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में ऐसे शिक्षकों का जबरदस्त अभाव है.

पिछले कुछ दशकों के दौरान दोनों ही देशों में बच्चों को पढ़ाने का काम चुनना अब ओछा काम बन चुका है. शैक्षणिक सुधार की दिशा में पाठ्यक्रम और पाठ्य पुस्तकों में नयापन लाना सिर्फ पहला कदम है.

अगला मोर्चा शिक्षक प्रशिक्षण और परीक्षा है. यदि हमें जंग में अपने संसाधन बरबाद करने से बचना है, तो शिक्षकों के भीतर अतीत के प्रति एक परिपक्व दृष्टिकोण को पोषित करना प्राथमिकता का काम होना चाहिए. लेकिन इसके लिए जरूरी है कि राज्‍यों की पाठ्य पुस्तकों में आजादी की लड़ाई और उसके बाद के प्रसंगों पर जो हादसे गढ़े गए हैं, पहले उनसे निजात पा ली जाए. ये किताबें अनजाने में ही हमारे पड़ोसी के प्रति स्थायी दुराग्रह और आक्रोश का पोषण कर रही हैं. शायद इससे एक नए बदलाव की शुरुआत हो.

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