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स्‍कूली किताबें: बच्चों को नफरत सिखातीं किताबें

पाकिस्तानी पाठ्य-पुस्तकें बांटने वाली विचारधारा को बढ़ावा देती हैं. जिसमें नायक हमेशा मुस्लिम होता है जबकि हिंदू अनिवार्य रूप से खलनायक.

अपडेटेड 12 अगस्त , 2012

पिछले छह दशकों के दौरान पाकिस्तान में लिखी गई इतिहास की सरकारी पाठ्य-पुस्तकों को खंगालने पर कई ऐसी लफ्फाजियां और बयान मिलते हैं, जिनका इस्तेमाल गुजरे जमाने की एक खास तस्वीर गढ़ने के लिए किया गया है. ज्‍यादातर किताबों को अलग-अलग 'कूमतों ने अपने-अपने नजरिए से बदलने का काम किया है. इसके बावजूद कुछ ऐसे लक्षण हैं, जो हर जमाने में रहे हैं और इस बात की ओर इशारा करते हैं कि राज्‍य के लिए वर्चस्वशाली परिवर्तन विरोधी विचारधारा को बार-बार दोहराए जाने की जरूरत होती है.

द्विराष्ट्र सिद्धांत
पाकिस्तान की सरकारी पाठ्य पुस्तकों का सबसे प्रमुख लक्षण हिंदुओं और मुसलमानों पर केंद्रित दो राष्ट्रों की वह दास्तान है, जिसके अनुसार ये दोनों कौम हमेशा से एक-दूसरे की विरोधी रही हैं, दुश्मन हैं और जिनका कभी मेल नहीं हो सकता. पाकिस्तान की स्थापना से जुड़े मिथकों पर आधारित यह कहानी यहां लिखी गई हर किताब के पन्नों में सजाई गई है.

आम तौर पर इसकी शुरुआत मुसलमानों के साथ हिंदुओं के दुर्व्यवहार से शुरू होती है और मुस्लिम शासकों की उदारता और माफी तक जाती है. इसके बाद विश्वासघात, साजिश और छल करने की कथित स्थायी हिंदू प्रवृत्ति पर रोशनी डालते हुए आखिर में साहस, ईमानदारी और नैतिकता के रास्ते मुसलमानों की फतह पर खत्म होती है. दोनों धार्मिक समुदायों के भीतर के आपसी अंतर्विरोधों का कहीं कोई जिक्र नहीं मिलता.

दोनों को दो विरोधी इकाइयों के रूप में पेश किया जाता है, जिसके पीछे वजह के तौर पर चरित्र को बताया जाता है (कि हिंदू अनैतिक हैं और मुस्लिम नैतिक). इसके लिए सैद्धांतिक षड्यंत्र और सनातन व आदिम प्रवृत्तियों का सहारा लिया जाता है. चूंकि इस इतिहास में आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक या ऐतिहासिक प्रक्रिया और कारण मौजूद नहीं हैं, लिहाजा इसमें इतिहास जैसा कुछ होता ही नहीं. यह अच्छे/बुरे, नैतिक/अनैतिक के खांचों में बंटी किसी पौराणिक कथा की शक्ल ले लेता है, जिसमें जीत हमेशा अच्छे की होती है.

धार्मिक राष्ट्रवाद के मिथकीय कालखंड
नैतिक/अनैतिक का विभाजन करने के लिए एक काल्पनिक कालखंड का सहारा लिया जाता है क्योंकि वास्तविक कालखंडों का अकसर जिक्र ही नहीं होता. इसके लिए तकनीक के तौर पर 'उससे पहले' या 'उसके बाद' की शैली अपनाई जाती है. ज्‍यादातर पाठ्य-पुस्तकों में 'इस्लाम से पहले' के भारतीय और अरब समाज को बताया गया है, जहां समाज हर किस्म की बुराई में लिप्त होता था.

शायद ही कहीं इन दो समाजों का तुलनात्मक अध्ययन है. दोनों का इस तरह घालमेल किया गया है कि पाठक इन्हें अलग समाजों के तौर पर नहीं बरत पाता. इस्लाम के आने से पहले बुराई का राज था, लेकिन एक बार इस्लाम के आने पर इन समाजों का शुद्धिकरण हो जाता है.

इसके बाद बुतों को तोड़ दिया जाता है और इस्लाम जाति प्रथा, मूर्तिपूजा, सती-प्रथा, शिशु हत्या जैसी हर किस्म की सामाजिक बुराई को खत्म कर देता है और उनकी जगह एक सच्चे ईश्वर की पूजा को स्थापित कर देता है. चूंकि वास्तविक ऐतिहासिक कालखंड नदारद हैं, इसलिए ये समाज एक मिथकीय समय में मौजूद होते हैं.

धार्मिक आधार पर भौगोलिक विभाजन
जिस तरह काल को पहले और बाद के आधार पर बांटा गया है, ठीक वैसे ही भौगोलिकता को भी नैतिक मुस्लिम भौगोलिकता और अनैतिक हिंदू भौगोलिकता में बांटा गया है. नैतिक आयाम के भीतर पवित्र और सेकूलर दोनों ही संदर्भ समाहित हैं. इस विभाजन को स्थापित करने के लिए मंदिरों और मस्जिदों को एक-दूसरे के बरक्स खड़ा किया गया है. मंदिरों को संकरा, तंग और अंधकारमय बताया गया है.

गोया उनके भीतर कुछ नाजायज काम हो रहा हो, जबकि मस्जिदों को खुला और अच्छी तरह से रोशन बताया गया है, जहां सारे रिश्ते वैध हैं और जिस खुदा की इबादत की जाती है, वही असल है. इसी तरह के विवरण हिंदू और मुस्लिम घरों के बारे में भी मिलते हैं. हिंदू घर जहां पेचीदा और संकरे होते हैं, वहीं मुस्लिम घरों में सीधे रास्ते होते हैं और खुलापन होता है.

इससे यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि हिंदू स्थापत्य के तत्व बड़े जटिल और रहस्यमय किस्म के होते हैं, जबकि मुस्लिम स्थापत्य सीधा-सुंदर होता है. इसी मुस्लिम स्पेस को विस्तारित करके 'मुस्लिम जगत' की मिथकीय संरचना में बदल दिया जाता है और बाद में जो अध्याय खुलते हैं, उनमें 'मुस्लिम जगत के सागर', 'मुस्लिम जगत के पर्वत' और 'मुस्लिम जगत का मौसम' जैसी कोटियों का विवरण मिलता है. यहां भूगोल प्रकृति के नियमों की बजाए विचारधारा का चारण है.

नायक और खलनायक
पाकिस्तान में इतिहास की पाठ्य-पुस्तकें उन मुस्लिम नायकों की वीरगाथाओं से सराबोर हैं, जो इस्लाम और मादरे-वतन के लिए लड़े थे. अतिशयोक्तियों से भरे हुए ये नायक हमेशा कुछ ऐसे षड्यंत्रकारियों से मुकाबिल होते हैं, जिन्हें कई अध्यायों में पाया जा सकता है. इन पसंदीदा नायकों में मोहम्मद बिन कासिम और मोहम्मद गजनी सबसे पहले आते हैं जिनकी आक्रामकता, विनाश और खूंरेजी का खूब बखान किया गया है.

दूसरे छोर पर बंगाल का मीर जाफर है, जिसने सिराजुद्दौला के साथ गद्दारी की, जबकि मीर कासिम ने मैसूर के टीपू सुल्तान के साथ गद्दारी की थी. ये गद्दार भीतर के दुश्मन हैं, जो राष्ट्र को नष्ट कर देना चाहते हैं. लिहाजा राष्ट्र को कुछ लोगों का बलिदान चाहिए. राष्ट्र को खून चाहिए-खुद को दोबारा जिंदा करने के लिए शहीदों का खून और अपने घर में छिपे दुश्मनों को उकसाने के लिए उन गद्दारों का खून जो पीठ में छुरा घोंप सकते हैं. दोनों का खून राष्ट्र के विचार को मजबूती देने के काम आएगा. मुस्लिम आक्रामकता और हिंदू मंदिरों का विध्वंस गौरव का विषय है, जिसकी खूब सराहना की जाती है.

दूसरी ओर बाबरी मस्जिद विध्वंस की निंदा करते हुए इसके लिए हिंदुओं की क्रूरता को जिम्मेदार माना जाता है. जाहिर किस्म के अंतर्विरोधों पर भी कभी बात नहीं होती, न ही उन्हें देखने की कोई कोशिश जान पड़ती है. पाठ्य-पुस्तक लिखने वाले इतिहासकार तथ्यों और विचारों को बिलकुल बंद घरों में कैद रखते हैं ताकि अंतर्विरोध, जटिलताएं और मिश्रित प्रवृत्तियां अच्छे बनाम बुरे की करीने से गढ़ी गई इस पवित्र कहानी को कहीं बदजायका न कर डालें.

भड़काऊ भाषा
खासकर उर्दू की पाठ्य-पुस्तकों में इस्तेमाल की गई भाषा कड़ी है और जज्‍बात को भड़काती है. मक्कार, अय्यार (षड्यंत्रकारी), गुंडा जैसे शब्द आम तौर पर उन हिंदुओं के लिए आते हैं, जिन्होंने भारत में मुसलमानों के वर्चस्व के खिलाफ  लड़ाई छेड़ी. महात्मा गांधी को धोखेबाज, चालू, षड्यंत्रकारी और विश्वास के अयोग्य बताते हुए 'मैकियावेली' जैसी संज्ञा दी गई है. पाकिस्तान के टूटने के लिए राष्ट्र का मानवीकरण करने वाले मुहावरे और शब्द इस्तेमाल किए गए हैं, जैसे-''इस अंग-भंग से जो जख्म पैदा हुए, उनके दर्द से पूरा मुल्क कराह रहा था'' और यह सब ''दुश्मन की शैतानी साजिशों'' का नतीजा था.

अलगाव और समावेश
किताबें लिखने वाले इतिहासकारों ने राष्ट्रवादी उद्देश्य को पूरा करने के लिए घटनाक्रम को उपयुक्त शक्ल देने के लिहाज से अलगाव (उपेक्षा भाव) और समावेश (उदारता भाव) दोनों ही उपकरणों का इस्तेमाल एक साथ किया है. उपेक्षा भाव और अलगाव के औजार से जिस घटना को बड़ी कलाकारी से दबा दिया गया, वह है 1971 में पूर्वी पाकिस्तान का विभाजन. अगर इस घटना का सही इतिहास लिखा जाता, तो नैतिक/अनैतिक के ढांचे में दरार पड़ जाती.

दो राष्ट्रों के विभाजन को सही ठहराने के लिए हर कीमत पर खुद को नैतिक ठहराना जरूरी था क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान के विभाजन ने दिखा दिया था कि धार्मिक समानता पर एथनिक राष्ट्रवाद और मतभेद हावी था, लिहाजा दो राष्ट्रों का सिद्धांत ही गलत साबित हो रहा था. इसलिए पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश के गठन की कहानी पर अर्धसत्य और सफव्द झूठ की चादर डाल दी गई है.

अध्यायों के अंत में या तो एक सूत्रवाक्य समूचे मामले को साजिश की अंधियारी सुरंग में ले जाकर छोड़ देता है या फिर किसी गढ़ी हुई कहानी पर इतना ज्‍यादा जोर दिया जाता है, जिसमें फौज का महिमामंडन कर के बांग्लादेश की आजादी के लिए लड़ने वालों को गद्दार घोषित कर दिया जाता है. राष्ट्रवाद की इस कहानी का एजेंडा पूरा करने के लिए कुछ तथ्यों को चुनिंदा तरीके से उछाला जाता है जबकि उतने ही महत्वपूर्ण तथ्यों पर हमेशा के िलए परदा डाल दिया जाता है. इस उपकरण का इस्तेमाल आम तौर पर आजादी की कहानी को सुनाने के लिए किया जाता है जो कि भारत के विभाजन की कहानी का पाकिस्तानी संस्करण मात्र है.

ऐसा जान पड़ता है कि पाकिस्तानी स्कूली किताबें बौद्धिक विकास और आलोचनात्मक चिंतन के शैक्षणिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए नहीं लिखी गई थीं, बल्कि इन्हें इसलिए लिखा गया था ताकि विभाजनकारी विचारधारा को हमेशा के लिए सही ठहराया जा सके. राष्ट्रीय स्मृति में इस बात को लगातार दोहराया भी जाना था. लिहाजा स्कूली किताबों से बेहतर और क्या चीज हो सकती थी.

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