पाकिस्तान राजनैतिक दलों पर परिवारों के प्रभुत्व के दक्षिण एशिया के रुख को पुष्ट करता है. अकसर व्यापक जनसमर्थन वाला करिश्माई मुखिया खानदान का प्रतीक बन जाता है और यदि उसकी शहादत भी हो जाए तो यह उसके वंशज को इस बात के लिए सक्षम बना देता है कि 'वंश के ही आदमी को सत्ता में लाकर बदला लेने' की लोकप्रिय प्रवृत्ति को संतुष्ट कर सके. इसकी शुरुआत संस्थापक जिन्ना से हुई और आज यह मूल शासक की विरासत को आगे बढ़ा रहे कुल के बच्चों, पोते-पोतियों के रूप में राष्ट्रीय राजनीति में जिंदा है.
भारत और पाकिस्तान के दो गुजराती 'संस्थापक' गांधी और जिन्ना साफ तौर से बिना किसी उत्तराधिकारी के दिवंगत हो गए. दोनों शहीद थे. कुछ लोगों का कहना है कि जिन्ना को जब बलूचिस्तान के एक हेल्थ रिजॉर्ट से सेना के एक जर्जर रेड क्रॉस वाहन में वापस कराची लाया जा रहा था तभी यह रास्ते में खराब हो गया और उन्हें 'सड़क पर मरने के लिए छोड़ दिया गया.' उनके भरोसेमंद प्रधानमंत्री लियाकत अली खान पर उंगली उठाई जाती है.
गांधी के विपरीत, जिनके परिवार ने करिश्मे की परंपरा को आगे बढ़ाने में रुचि नहीं ली, जिन्ना की बहन फातिमा राजनीति में उतरीं, लेकिन सैन्य तानाशाह जनरल अयूब खान ने उन्हें दबा दिया. इस बात के मजबूत साक्ष्य हैं कि उनकी हत्या की गई थी. पाकिस्तान के पूर्व अटॉर्नी जनरल और 1941 से 1944 तक जिन्ना के मानद सचिव रहे शरीफुद्दीन पीरजादा ने खुलासा किया था कि फातिमा जिन्ना की 1967 में स्वाभाविक मौत नहीं हुई थी, बल्कि उनके एक नौकर ने उनकी हत्या कर दी.
पाकिस्तान के विदेश सचिव शहरयार खान की मां ने अपने संस्मरण आबिदा सुल्तानः मेमॉयर्स ऑफ अ रेबल प्रिंसेज (ओयूपी 2003) में लिखा हैः ''मैंने मिस जिन्ना को बर्फ की सिल्लियों के बीच लेटे हुए पाया. उनके चेहरे पर नीले रंग के दाग दिख रहे थे, खासकर बाईं आंख के नीचे. उनको ढकने वाली चादर में भी कुछ खून लगा हुआ था लेकिन मैं यह नहीं पकड़ पाई कि यह कान से निकल रहा था या नाक या मुंह से.''
तो क्या शहादत वंश परंपरा की पूर्व शर्त होती है? जिन्ना की वंश परंपरा खत्म हो गई क्योंकि उनकी बेटी डायना ने भारत में शादी करने का फैसला किया और उन्हें पारसी धर्म पसंद आ गया. पाकिस्तान की वंश परंपरा व्यवस्था में गैर-मुसलमानों को जगह नहीं मिलती. लेकिन अगले करिश्माई नेता जुल्फिकार अली भुट्टो 1979 में अपनी शहादत से एक 'हस्तांतरणीय' खानदानी गौरव छोड़ गए. उनकी मौत को आज देश 'न्यायिक हत्या' के रूप में देखता है. सैन्य तानाशाही के तहत पाकिस्तान का सुप्रीम कोर्ट उनके खिलाफ 'एक पक्ष' बन गया था.
मैकियावली से बेहतर इस करिश्मे को और कौन बयान कर सकता है. उन्होंने अपनी किताब ह्ढिंस में सलाह दी थी कि ताज हासिल करने के लिए सबसे अच्छा नुस्खा तीन नियमों पर आधारित हैः पहलाः 'सौभाग्य' के लिए व्याकुल रहें, जिसका मतलब यह है कि हर अवसर वाले क्षण में मौजूद रहें, दूसराः आपके पास 'गुण' का उपहार हो, जिसका मतलब यह है कि अवसरवादिता का सहारा लें, तीसराः आम आदमी के हितों से जुड़ें. यूरोपीय पुनर्जागरण काल के सबसे ताकतवर खानदान मेडिसी और बोर्गियाज ने मैकियावली के सुझाव को अपनाया.
भारत के नेहरू खानदान की तरह ही भुट्टो वंश में दो शहादत हुईं जिन्होंने पाकिस्तान को हिलाकर रख दिया था. बेनजीर भुट्टो के बेटे बिलावल भुट्टो के मुताबिक अल .कायदा ने कई पाकिस्तानी आइएसआइ अधिकारियों के साथ मिलकर 2007 में उनकी मां का कत्ल किया. सही बात तो यह है कि 'बड़े होने के हिसाब से भुट्टो का ताज उनके बड़े बेटे मीर मुर्तजा भुट्टो को मिलता, जिनकी 1996 में कराची में गोली मारकर हत्या कर दी गई.
पंजाब के भुट्टो विरोधी लोगों का कहना है कि प्रधानमंत्री बेनजीर ने ही उनकी 'हत्या कराई'. अब उनकी बेवा न्निगन्वा ने शहीद भुट्टो पार्टी खड़ी की है, हालांकि वह टिकाऊ खानदानी आभा से लिपटे बेनजीर के बेटे बिलावल को कोई नुकसान नहीं पहुंचा पा रहीं. बिलावल के पिता आसिफ अली जरदारी ने उन्हें पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का सह-अध्यक्ष बनाकर उनके प्रभाव को कायम रखा है. उनका नाम उपयुक्त रूप से बिलावल भुट्टो-जरदारी रखा गया है. हो सकता है कि न्निगन्वा एक दिन इटली में जन्मी और भारत में रहने वाली सोनिया गांधी की तरह परदे के पीछे रहकर शासन करें. वह सीरियाई-लेबनानी मूल की हैं और मुर्तजा भुट्टो की दूसरी बीवी तथा फातिमा भुट्टो की सौतेली मां हैं. उनमें पाकिस्तान की भविष्य की नेता बनने के लिए पर्याप्त प्रतिभा है.
विकसित लोकतंत्रों में वंशवाद 'अप्रत्याशित' होता है. विकासशील लोकतंत्रों में वह कई कारकों पर निर्भर होता हैः वोट देने वाली जनता में जागरूकता की कमी, गरीबी से पीड़ित जनता का 'आम आदमी का पक्ष लेने' के मैकियावली के छिपे संदेश से आकर्षित हो जाना, वंशवादी परिवारों में नेता 'तैयार करने' कर सकने का दम, शहीद की तरह कष्ट भोग सकने, राजनैतिक अभियानों में पैसा लगा सकने और विपक्ष में रहने पर व्यक्तिगत त्याग कर सकने की उनकी क्षमता. यदि विद्वेष की जमीन उर्वर हो तो वंशवाद एक तरह के काउंटर-वंशवाद को जन्म दे सकता है.
नवाज शरीफ पाकिस्तान मुस्लिम लीग के प्रमुख हैं जो अपने वंशजों को एक खानदानी विरासत सौंप रहे हैं ताकि उन्हें शरीफ वंश को बनाए रखने के लिए 'तैयार' किया जा सके. दुर्भाग्य से नवाज शरीफ के बेटे ने पाकिस्तान की राजनीति से दूर रहना ही पसंद किया है और फिलहाल लंदन में रह रहे हैं. उनकी बीवी कुलसुम ने उनके जेल में रहने के दौरान वंश की राजनैतिक लौ को आगे बढ़ाने की कोशिश की थी लेकिन जल्दी ही वह पस्त हो गईं. शरीफ के करिश्मे के हस्तांतरण का फायदा उनके भाई के बेटे हमजा शहबाज शरीफ को मिल रहा है जो अपने चाचा की शैली को ही आगे बढ़ा रहे हैं.
मूल पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग का तो टूटने का इतिहास रहा है और हर टुकड़ा हताशा में वंशवाद को अपनाने की कोशिश करता है. जनरल जिया की तानाशाही के दौरान नेतृत्व के लिए प्रतिद्वंद्विता करने वाले दो परिवार थे शरीफ और चौधरी. जिया ने शरीफ खानदान को पसंद किया. जब 1999 में जनरल मुशर्रफ सत्ता में आए तो उन्होंने चौधरियों को शह दी. उन्होंने इस परिवार से जुड़े दो नेताओं सुजात हुसैन और परवेज इलाही को आगे बढ़ाया जो एक खानदान की तरह ही एक-दूसरे से चिपके रहे.
पंजाब में शरीफ ही सर्वोच्च हैं और चौधरी बचे-खुचे खानदानी ताज के साथ उनके पक्ष में ही खड़े हैं. सीमांत प्रांत में अब्दुल गफ्फार खान की वंश परंपरा काफी पुरानी है पर आज के खैबर पख्तूनख्वा ने एक अलग राह चुन ली है. अवामी नेशनल पार्टी (एएनपी) की बंटवारे से पहले शुरुआत एक कांग्रेस समर्थक पार्टी के रूप में हुई थी. लेकिन 1947 के बाद इसके राजनीतिक विरोध ने पख्तून राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया. इससे उनके अफगानिस्तान के पख्तूनों के साथ जुड़ने का खतरा पैदा हुआ और इस तरह से पाकिस्तान के एक आतंकवादी देश बनने का जोखिम बढ़ा.
एएनपी ने पहले खुद को प्रांत के भीतर ही सीमित रखा, लेकिन जब दक्षिण में कराची का दुनिया के सबसे बड़े पख्तून शहर के रूप में उभार हुआ तो वह 'राष्ट्रीय' बनने को मजबूर हुई. यहां वंशवाद आक्रामक रूप नहीं ले पाया क्योंकि पख्तून पारिवारिक निरंकुशता के आधार पर पार्टी संचालित करने के इच्छुक नहीं थे. एएनपी नेता इसफानदयार वली सौम्य और उदासीन हैं. उन्हें अपने दादा गफ्फार खान और पिता वली खान की बची-खुची 'गरिमा' के टिके रहने का भरोसा है.
धार्मिक पार्टियों की छल-प्रपंच की दुनिया के अलावा पाकिस्तान में वंशवाद शासन करता दिखता है. धार्मिक पार्टियों में तो नेता का चुनाव इस गहरे इरादे के आधार पर होता है कि उनका जिहाद में इस्तेमाल किया जाएगा. लेकिन जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (जेयूआइ) का नेतृत्व मौलाना फजलुर रहमान कर रहे हैं जिन्होंने अपने उच्च सम्मानित पख्तून मौलाना पिता की जगह ली है. रहमान के भाई आम नागरिक हैं और उनके वंशज भी सार्वजनिक जीवन में नहीं दिखते. उनके बाद जनजातीय देवबंदियों को बिना वंश परंपरा के रहना पड़ सकता है.
सिंध में बीमार लेकिन करिश्माई रसूल बख्श पालिजो की नेशनलिस्ट पार्टी के 'राष्ट्रवादी' आंदोलन को उनके ज्यादा मुखर वक्ता बेटे अयाज लतीफ पालिजो आगे बढ़ा रहे हैं. इसी तरह पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के सरदार अब्दुल कयूम के बेटे सरदार अतीक अहमद खान ने निश्चित रूप से अपने पिता के 'यथार्थवाद' में और सुधार किया है.
लोकतंत्र अंततः द्विदलीय पद्धति को नष्ट करके वंशवाद को खत्म कर देता है. तीसरी दुनिया में द्विदलीय पद्धति में बारी-बारी से दो पार्टियां ही सत्ता में रहती हैं. गांधी खानदान अब शायद कभी भी लोकसभा में कांग्रेस के पूर्ण बहुमत के साथ भारत पर शासन न कर पाए. पाकिस्तान में भी इमरान खान को ऐसा लग सकता है कि वह ऐसा चुनावी बहुमत हासिल नहीं कर पाएंगे जो उनके हिसाब से पाकिस्तान को बदलने के लिए जरूरी है. जेमिमा खान शायद यह समझदारी भरा निर्णय ले लें कि इमरान के बेटे सुलेमान और कासिम वंशवाद की वेदी पर अपनी आहूति नहीं देंगे.

