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संगीत: हमें खींचते हैं कुछ तार

पाकिस्तानी संगीत उद्योग थोड़ा अराजक जरूर है पर इसके सितारे अपने टैलेंट से चौंकाते हैं. हिंदुस्तानी श्रोता उनके बेहद शुक्रगुजार हैं.

अपडेटेड 12 अगस्त , 2012

दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योग में जड़ें होने की वजह से हमारे संगीत उद्योग में करोड़ों रु. का कारोबार है. लेकिन पाकिस्तानी फिल्म उद्योग में उस तरह का पैसा नहीं है. उसी का नतीजा है कि संगीत का वहां अपना अलग ही ढर्रा चलता है.

बड़ा खुशनुमा संयोग है कि इस आलेख के लिए बैठने से पहले मैं गजल सम्राट गुलाम अली से फोन पर बातें कर रहा था. संगीत के बारे में बातें चल रही थीं. मैने पूछा कि उनके साथ गाने का सौभाग्य मुझे कब मिलेगा? वे हंसे और बोले कि इसी वक्त क्यों न शुरू कर दें फोन पर? पाकिस्तान के इस वक्त के सबसे बड़े फनकारों में से एक के साथ मेरा इस तरह का याराना है.

पाकिस्तानी संगीत के साथ मेरा पहला परिचय उस समय हुआ जब मैं दसवीं में था. मेरे गुरु टी. बालमणि की बेटी रजनी ने मुझे अली साहब की गजलें सुनने को कहा था. संगीत की उस विधा के बारे में शुरू में मेरी कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. सो मैं असमंजस में था. पर उस दिन घर आकर जब मैंने उनकी सबसे मशहूर रोमांटिक गजल-चुपके चुपके रात दिन सुनी, जिसे कि मौलाना हसरत मोहानी साब ने लिखा है, तो मैं तो हैरत में पड़ गया.

गजल के बोल और उनकी खूबसूरत आवाज ने मेरे ऊपर नशा-सा कर दिया. मैं बार-बार उसे सुनता रहा. वह दिन और आज का दिन. हमारे देश में पाकिस्तान के कई गायकों ने अपने जलवे बिखेरे हैं. एक कंसर्ट में जब मैंने शास्त्रीय गायक शफकत अमानत अली के साथ गाया तो मेरा परिचय संगीत की एक और उम्दा शख्सियत से हुआ. अमानत अली और राहत अली के साथ मंच पर हुई जुगलबंदी मुझे हमेशा याद रहेगी.

पिछले कुछेक साल में मैंने सरहद के उस पार कई दोस्त बनाए हैं. मेरा मानना है कि संगीत इतना ताकतवर और क्रिएटिव मीडियम है, जो भारत और पाकिस्तान के बीच सौहार्द और स्थिरता का माहौल रच सकता है. संगीत एक ऐसी कोमल ऊर्जा है जो सीमाओं से परे उन्मुक्त उड़ान भरती है. यह संगीत ही है जिसने दोनों मुल्कों के रिश्तों में कड़वाहटों के बीच मिश्री घोली है. तभी तो भारत के लोगों ने भी सरहद पार से आई संगीत प्रतिभाओं को जमकर प्यार दिया है. 

हालांकि, मुझे ऐसा लगा है कि हमारे देश के मुकाबले पाकिस्तान का संगीत उद्योग काफी बिखरा-सा है. दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योग में जड़ें होने की वजह से हमारे संगीत उद्योग में करोड़ों का कारोबार है. भारत में जब कोई गायक अपने जमाने के किसी बड़े सितारे को अपनी आवाज देता है तो उसकी लोकप्रियता पक्कीहो जाती है. जैसे राजकपूर-मुकेश की नामी जोड़ी, राजेश खन्ना और किशोर कुमार, अमिताभ और सुदेश भोंसले और शाहरुख खान और उदित नारायण.

चूंकि पाकिस्तान का संगीत उद्योग उतना व्यवस्थित नहीं या दूसरे शब्दों  में कहा जाए कि हमारे जैसी फिल्में बनाने के लिए उनके पास पैसा नहीं, लिहाजा वहां संगीत का अपना अलग ही ढर्रा है. वहां संगीतकारों की अपनी एक खास पहचान है और संगीत की विभिन्न विधाओं के बेहिसाब नगीने मौजूद हैं: आबिदा परवीन और मेहदी हसन जैसे सूफी गजल-गायकों से लेकर स्ट्रिंग्स और जुनून जैसे पॉप बैंड तक. देखा जाए तो यह एक अच्छी बात है पर पैसे की कमी के कारण इन्हें फलने-फूलने की राह नहीं मिलती.

मेरा खुशकिस्मती है कि मुझे पाकिस्तान के कुछ युवा गायकों और संगीतकारों के साथ काम करने का मौका मिला. अली जफर उनमें से एक हैं, जिनकी पहली फिल्म तेरे बिन लादेन है. उनके व्यक्तित्व में जितना आकर्षण है, उनकी गायकी में उतनी ही कशिश. सच में, वे विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं. मैंने एक और उभरते हुए गायक जावेद बशीर के साथ एक गाना रेकार्ड कराया है, जिनसे मेरी मुलाकात एमटीवी के कोक स्टुडियो सीजन-टू के दौरान हुई थी. फिल्म कहानी  में उनकी कशिश भरी आवाज वाला गाना पिया तू काहे रूठा  पहले ही भारतीय श्रोताओं के दिलोदिमाग पर अपनी छाप छोड़ चुका है.

देखिए, मेरा तो मानना है कि मौसिकी के मामले में दोनों मुल्क हाथ में हाथ डाले सही राह पर चलते दिख रहे हैं. हमारे पास मजबूती से खड़ा संगीत उद्योग है, जिसके दरवाजे सच्ची प्रतिभा के लिए हमेशा खुले हैं. जब सरहद पार के गायक अपनी स्वरलहरी की मंजूषा लिए यहां आते हैं तो उसमें संगीत के अथाह सागर का सार मिलाकर एक अद्भुत मेल तैयार होता है. पाकिस्तान के पास काबिलियत की कमी नहीं, लेकिन अपनी एक सशक्त पहचान बनाने के लिए संगीतकारों को एकजुट होना पड़ेगा. समाज के स्तर पर ज्‍यादा उदार नजरिए के विकास की जरूरत है क्योंकि उसी की शाखाओं को थामकर वे हमारे जैसे संगीत उद्योग को खड़ा कर सकते हैं.

(प्राची रेगे से बातचीत के आधार पर)

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