कई वजहों से विभाजन का इतिहास उपमहाद्वीप के हिंदू और मुसलमानों के संदर्भ में लिखा गया. इस प्रकरण में ईसाइयों की भूमिका बहुत सीमित थी. ऐंग्लो-इंडियन (जिस समुदाय का मैं हूं और जो भारतीय ईसाइयों का बहुत छोटा हिस्सा है) की भूमिका तो बस मूकदर्शक की ही थी.
लेकिन विभाजन का मेरे बड़े परिवार पर भारी असर पड़ा. मेरे दादा तीन भाई थे. उनमें सबसे बड़े एक सिविल सर्वेंट थे जो लाहौर और पेशावर में काम कर चुके थे. वे अगस्त 1947 की तरफ बढ़ रहे उथल-पुथल भरे दिनों में उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के गवर्नर सर ओलाफ कैरो के निजी सचिव के रूप में कार्यरत थे. मेरे परिवार के बाकी लोग, मेरे पिता, दादा आदि कोलकाता (जो कि तब कलकत्ता कहलाता था) में थे.
एक दिन, बिना इसका निहितार्थ समझे, ओ' ब्रायन परिवार के ये घटक अलग-अलग देश के नागरिक हो गए. कुछ महीनों के भीतर भारत और पाकिस्तान में युद्ध छिड़ गया. यह एक ऐसा युद्ध था जिसने मेरे पिता की चचेरी बहन को तोड़कर रख दिया जो कि पाकिस्तान में रह गईं थीं. उनके पति भारतीय वायु सेना में और ब्रदर इन-लॉ पाकिस्तानी सेना में लड़ाकू पायलट थे.
वह रात-रात भर बैठी रहतीं इस चिंता में कि उनके पति घर वापस आएंगे कि नहीं या उनके ब्रदर इन-ला सुरक्षित होंगे या नहीं. या वे दोनों लोग जो कुछ हफ्तों पहले तक एक ही वायुसेना के कॉमरेड्स और दोस्तों के इतने प्रिय थे, आकाश के डरावने गुमनाम क्षेत्रों में एक-दूसरे को निशाना बनाएंगे.
सौभाग्य से उस युद्ध में किसी की मौत नहीं हुई, लेकिन एक दूरी जरूर आ गई. पिता और पुत्री, भाई एवं बहन, चेचेर भाई-बहन, मेरे दादा और उनके पाकिस्तानी भाई, इन सबके बीच एक-दूसरे से संपर्क खत्म हो गया.
आज यह सब काफी पीछे छूट चुका है. मेरे भाई और मैं 1970 और 1980 के दशक के अलग तरह के वातावरण में पले-बढ़े. हम सिर्फ अल्पसंख्यक नहीं थे (इसका हम अकसर मजाक भी उड़ाते थे) बल्कि अल्पसंख्यक में अल्पसंख्यक वाले अल्पसंख्यकः भारतीय ईसाइयों में ऐंग्लो इंडियन और उनमें रोमन कैथोलिक. हमारे दोस्त और तृणमूल कांग्रेस में सहयोगी जावेद खान ने एक बार मुझसे हंसी-मजाक में कहा था कि मुसलमान 'बहुसंख्यक अल्पसंख्यक' हैं और हम ईसाई 'अल्पसंख्यक अल्पसंख्यक'.
इन हंसी-मजाक को छोड़ दें तो भारत में अल्पसंख्यक होने का मतलब क्या है? साफगोई से कहूं तो मुझे नहीं लगता कि मैं इसका संपूर्ण उत्तर दे सकता हूं और मुझे शक है कि कोई भी दे सकता है. लेकिन मैं इसकी व्याख्या तीन कोणों से करना चाहूंगा-मेरा परिवार और मैं, मेरा समुदाय और वह वृहद सामाजिक करार जो हमने धार्मिक अल्पसंख्यकों और देश के बीच बना रखा है.
ये प्रतिबिंब मेरे अनुभवों पर आधारित हैं. हो सकता है कि ये सबकी बात कह पाएं या न कह पाएं, लेकिन मुझे उम्मीद है कि यह कुछ हद तक भारत के उस चमत्कार की व्याख्या कर पाएंगे जिसकी वजह से मेरे जैसे बहुत सीमित हिस्से वाले अल्पसंख्यक को भी एक व्यापक बंगाली पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में संसद में प्रवेश करने का अवसर मिला है.
मैं कोलकाता में मध्यमवर्गीय बंगाली-हिंदू पड़ोसियों के बीच रहने वाले एकमात्र ईसाई परिवार में पला-बढ़ा. एक ऐसी विडंबना के साथ रहते हुए जो भारत को इतना मोहक बनाता है, हम एक ऐसे रोड पर रहते थे जिसका नाम एक मुस्लिम के नाम पर रखा गया था. वहां हम तीन लोग रहते थे, तीन लड़के. शुरू से ही हमें इसमें ढलना था-पड़ोसियों के कहने से नहीं बल्कि अपने मां-बाप की तरफ से. हमें स्थानीय भाषा सीखने को प्रोत्साहित किया गया. हम कोलकाता में रहते थे, इसलिए हमने बांग्ला सीखी.
अगर हम जालंधर में रहते तो हम पंजाबी सीख जाते. लेकिन क्या यह आत्मरक्षा का भाव था? मैं ऐसा नहीं मानता. भारत एक समावेशी समाज है, लेकिन इस समावेश की अल्पसंख्यक जितना मांग करते हैं उतना उन्हें प्रदर्शित भी करना चाहिए. स्थानीय भाषा सीखना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है और यह कोलकाता में रहने वाले केरल के ईसाई के लिए उतना ही सच है जितना कि कोच्चि में रहने वाले पंजाबी हिंदू के लिए. कभी-कभी हम सिर्फ इसलिए अलग हो जाते हैं क्योंकि हम अलग खड़े होना चाहते हैं.
मेरे समुदाय में किसी और ने चीजों को उस तरह से नहीं देखा जैसा कि मेरे मां-बाप ने. ज्यादातर लोग तो अंग्रेजी या मिश्रित हिंदी बोलने पर जोर देते थे. कई ने तय कर लिया कि भारत उनके लिए नहीं है और वे यहां से चले गए. हमारे चर्चों और सामुदायिक जमावड़े में लोगों की संख्या घटती गई. रेलवे, डाक और तार विभाग-सभी महान संस्थाएं जो कभी ऐंग्लो-इंडियन लोगों का गढ़ हुआ करती थीं, अलग रंग हासिल करने लगीं. माहौल निराशाजनक था.
मैंने 1990 के दशक से खुद को बदलना शुरू किया जब भारतीय अर्थव्यवस्था ने पंख फैलाने शुरू किए और खासकर सेवा क्षेत्र में नए-नए अवसरों के दरवाजे खुल रहे थे. अचानक ऐंग्लो-इंडियन लोगों की अंग्रेजी बोलने जैसी कई विशेषताओं ने ही उन्हें रोजगार के लिए पसंदीदा बना दिया. आज मेरे समुदाय के युवा बहुत ज्यादा कॉन्फिडेंट हैं जिन्हें लगता है कि भारत में उनकी ज्यादा भूमिका है.
कौशल का पैमाना तो वही रहा लेकिन लोगों की सोच में बदलाव आ गया, आंतरिक और बाह्य, दोनों तरीकों से. मेरे लिए संदेश बहुत साफ हैः अगर आप अल्पसंख्यकों को खुश देखना चाहते हैं, तो ऐसा खुशहाल समाज बनाएं जिसमें सबके लिए अवसर, उम्मीद और आकांक्षाएं हों. यदि आप व्यामोह, निराशा और अभावों का समाज बनाएंगे तो आपको खुश लोग नहीं मिलेंगे और खुश अल्पसंख्यक समाज तो कभी नहीं.
अल्पसंख्यकों की चर्चा करते समय ज्यादातर संवाद में अपरिहार्य रूप से हिंसा और धार्मिक दंगों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है. ऐसा तर्क दिया जाता है कि यदि अल्पसंख्यक अनुकूल व्यवस्था हो तो वह अल्पसंख्यकों जैसे मुसलमानों, ईसाइयों की हिंसा से रक्षा करती है. इससे असहमति न प्रकट करते हुए मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि इस तर्क की सीमा है और यह थोड़ा उबाऊ भी है.
जीवन, अंगों और धार्मिक विश्वास की सुरक्षा अल्पसंख्यकों का विशेषाधिकार नहीं है, यह हर नागरिक का हक है. अल्पसंख्यकों को यह प्रदान कर सरकार किसी तरह का पक्षपात नहीं कर रही होती. वह सिर्फ अपने बुनियादी कर्त्तव्यों का पालन करती है. अल्पसंख्यक अधिकारों को सिर्फ इस तरह के संकुचित दायरे में देखना मेरे ख्याल से खुद को हराने जैसा है.
पुनश्चः वर्ष 1984 में मेरा भाई ऐंडी, जो तब खेल पत्रकार था, हॉकी की चैंपियंस ट्रॉफी को कवर करने कराची गया. वह पाकिस्तान में बिछड़े ओ ब्रायन परिवार के सदस्यों को खोजने के लिए दृढ़ था. आखिरकार उसने उन्हें तलाश लिया और हमारे बीच फिर से संपर्क कायम हो गया. मेरे पिता के चाचा की मौत हो चुकी थी, लेकिन बाकी परिवार अब भी वहां था और उन्होंने अपने भारतीय कजिन का गर्मजोशी से स्वागत किया.
मेरे पिता की पीढ़ी के ज्यादातर लोग और अगली पीढ़ी के सभी लोग-मेरे सेकेंड कजिन-इस्लाम में धर्मांतरित हो चुके थे. उन पर दबाव काफी ज्यादा था. पाकिस्तान में एक अल्पसंख्यक की तरह रहना बहुत कठिन है. ऐंडी घर आया और उसने लाहौर एवं कराची में रहने वाले मुस्लिम ऐंग्लो-इंडियन कुल की अजब और उदासी भरी कहानी सुनाई. हम यह सुनकर स्तब्ध रह गए और इसे अभी तक नहीं पचा पाए हैं. मैंने भारत में अपने जीवन के बारे में सोचा, चर्च जाने की आजादी, अपने धर्म के पालन की आजादी, खुद के होने की आजादी, वह आजादी जो मेरे देश ने यहां के अल्पसंख्यकों को दी है. मुझे भारतीय होने पर पहले कभी इतना गर्व नहीं हुआ था.

