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फिल्‍म: लॉलीवुड ने गंवा दी जमीन

भारत की उस्तादी के साथ पाकिस्तान का टैलेंट मिले, तब रचनात्मकता फूलेगी-फलेगी

अपडेटेड 11 अगस्त , 2012

अपनी फिल्म ताजमहलः ऐन इटर्नल लव स्टोरी (2005) के साथ पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों पर पिछले 35 साल से चली आ रही पाबंदी को खत्म करवाने में अपनी भूमिका को लेकर मुझे फक्र है. मैंने उस वक्त के पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को लिखा था कि न तो पाकिस्तानी और न ही भारतीय हुकूमत इस बात से इनकार कर सकती है कि ताजमहल के बनने के वक्त यह मुल्क साझ हिंदुस्तान था.

जहांगीर लाहौर में दफन हैं, उनके पुत्र शाहजहां आगरा में, नूरजहां लाहौर में तो उनकी भतीजी मुमताज महल आगरा में. सिनेमा संपर्क और प्यार का सबसे अच्छा साधन है और इसे किसी भी तरीके से रोका नहीं जाना चाहिए.

उस वक्त यह फिल्म प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया को भी दिखाई गई थी. प्रधानमंत्री ने कहा कि मुहब्बत के अपने संदेश के कारण यह फिल्म पाकिस्तान को भी दिखाई जानी चाहिए. मैंने उन्हें बताया कि मैं पहले ही पाकिस्तानी राष्ट्रपति को श्त लिख चुका हूं. हमें अपनी फिल्म वहां रिलीज करने की इजाजत मिल गई और भारतीय फिल्मों पर से पाबंदी हटा ली गई.

पाकिस्तान के न्यौते पर पर्यटन और संस्कृति मंत्री अंबिका सोनी की अगुआई में एक बड़े प्रतिनिधिमंडल ने पाकिस्तान के लिए उड़ान भरी और राष्ट्राध्यक्षों की तरह से हमारा स्वागत किया गया. उसके बाद महेश भट्ट की फिल्म नजर (2005) दिखाई गई और उसने भारतीय फिल्मों के लिए रास्ता खोल दिया.

लेखकों, शायरों, गायकों और अभिनेताओं के रूप में पाकिस्तान के पास उम्दा टैलेंट है. मगर टेक्नोलॉजी और विशेषज्ञता के क्षेत्र में वे पीछे हैं. उन्होंने कुछ बेहतरीन फिल्में बनाई हैं. मैं निर्देशक शोएब मंसूर को अंतरराष्ट्रीय स्तर का मानता हूं. उनकी फिल्म खुदा के लिए (2007) शानदार थी.

मुझे लगता है कि शान शाहिद शानदार ऐक्टर हैं. मैं हमेशा से उनके साथ एक फिल्म बनाना चाहता हूं और मुझे लगता है कि उनमें भारत का सुपरस्टार होने का माद्दा है. अली जफर एक अन्य प्रतिभाशाली अभिनेता और गायक हैं. कभी पाकिस्तानी टीवी बड़े पैमाने पर भारतीय दर्शकों के दिलो-दिमाग पर छा गया था. मौसम, तलाश, उड़ान जैसे सीरियलों की भारी मांग थी. उनका लेखन, अभिनय, संगीत और गीत सभी उम्दा किस्म के थे और यहां के लोग उनके आदी हो गए थे.

एक पाकिस्तानी फिल्म जो मुझे याद है, वह है उमराव जान अदा (1972). बदकिस्मती से बोल (2011) देखने से पहले तक हमें कोई बहुत ज्‍यादा अच्छी पाकिस्तानी फिल्में देखने को नहीं मिलीं. अली हैदर अच्छे कलाकार हैं, अब्दुल राशिद कादरी उम्दा अभिनेता थे और नूरजहां तो अद्भुत थीं. आज तक मैंने जितनी आवा.जें सुनी हैं, उनमें उनकी आवाज सबसे सुंदर थी. वे तब फिल्मों में अभिनय कर रही थीं जब दोनों मुल्क एक ही थे, इसलिए सुरैया की तरह वे भी हम दोनों की हैं.

जब पाकिस्तान में ताजमहल रिलीज हुई तो बंद हो चुके सिनेमाघरों को फिर से खोला गया और उनकी मरम्मत हुई. मेरे ख्याल से वक्त आ गया है कि डिस्ट्रिब्यूशन नेटवर्क में दोनों मुल्कों के उद्योगों का विलय कर दिया जाए जो सरहद के आर-पार फिल्मों को एक साथ रिलीज किए जाने का इंतजाम करे.

अगर पाकिस्तान में हमारी फिल्में ठीक से रिलीज हो पाएं तो उनके वितरकों की कमाई होगी, जिसका पैसा  वे अपने फिल्म उद्योग में लगा सकते हैं. सरहद के दोनों तरफ काम करने में कलाकारों को कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए. पाकिस्तान के पास अच्छे लेखक हैं, जिनका हम इस्तेमाल कर सकते हैं और वे अपनी फिल्मों की गुणवत्ता सुधारने के लिए हमारे निर्देशकों और तकनीशियनों की मदद ले सकते हैं. हम पाकिस्तानी प्रतिभा को काम में लें और वे हमारी प्रतिभा का इस्तेमाल कर सकते हैं.

लाउड कॉमेडी वाली पंजाबी फिल्मों की पाकिस्तान में लंबी परंपरा रही है. उनमें कोई ताजा टेक्नोलॉजी की भी जरूरत नहीं होती, जिसने पैसों की कमी के साथ मिलकर पाकिस्तान में फिल्मों के विकास को रोक दिया. निर्देशन, सिनेमैटोग्राफी और साउंड डिजाइन वगैरह सिखाने के लिए पाकिस्तान को तकनीक के स्कूल खोलने की जरूरत है.

उपमहाद्वीप की बड़ी मानी जाने वाली फिल्में साझ हिंदुस्तान की उपज थीं. बंटवारे के बाद पाकिस्तानी सिनेमा का शानदार दौर असल में कभी रहा नहीं जबकि भारतीय फिल्म उद्योग विकास करता गया. जब वे अच्छी फिल्में बनाते भी हैं तो वे कभी-कभार ही हमें देखने को मिलती हैं. वहां के फिल्म निर्माता सीमित दर्शकों के साथ खुश हैं. अपनी फिल्में भारत लेकर आना उनके लिए प्रतिष्ठा कमाने का मौका होगा और दुनिया के सामने उन्हें पेश करने की तरफ एक बड़ा कदम.

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