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अर्थशास्‍त्र: भरपूर मिलेगा, पर हर किसी को नहीं

भारत 2032 में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगा जिसकी कुल आय 7 ट्रिलियन डॉलर होगी (आज यह 2 ट्रिलियन डॉलर है). नंबर एक पर चीन और नंबर दो पर अमेरिका  बहुत आगे बढ़ चुके होंगे, हालांकि रुपया अगर मजबूत हो जाता है तो भारत की कमाई बढ़ सकती है.

अपडेटेड 11 अगस्त , 2012

पहले मैं तुमको अपना परिचय दे दूं. मैं 10 साल की हूं. मेरा नाम अनिता है और दिल्ली में रहती हूं. मेरे टीचर ने मुझे एक ऐसे प्रोजेक्ट में फंसा दिया है जिससे मुझे काफी जूझना पड़ा. उन्होंने मुझे 20 साल बाद यानी 2032 में भारतीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर पर एक निबंध लिखने को कहा. यह तो अर्थशास्त्री भी नहीं जानते और उन्होंने 10 साल की बच्ची से इसकी उम्मीद लगा ली. मैंने होशियारी दिखाई और अपनी अर्थशास्त्री मम्मी से पूछा.

उन्होंने कहा, ''नेट पर देखो. सर्च करो मिल जाएगा. अधिकतर अर्थशास्त्री भी यही करते हैं.'' मैंने जो कुछ पाया, बता रही हूं. मेरी मम्मी ने बस कुछ चीजें समझने में मदद की, बाकी सब कुछ नेट पर मौजूद ही था.

पहली चीज, हर देश की आय अलग करेंसी में होती है. इनकी तुलना करने के लिए उन्हें अमेरिकी डॉलर में बदल दिया जाता है. ऐसा करने के दो तरीके हैं, एक आधिकारिक विनिमय दर या पीपीपी (पर्चेजिंग पावर पैरिटी) विनिमय दर के हिसाब से. जैसे-जैसे भारत विकास करेगा, डॉलर के मुकाबले रुपया मजबूत होता जाएगा. लेकिन उसके आगे अर्थशास्त्रियों को नहीं पता कि विनिमय दरें कैसी रहेंगी. न ही उन्हें उस वक्त की महंगाई का ही कोई अंदाजा है. इसीलिए वे हर बात डॉलर के वर्तमान मूल्य के हिसाब से करते हैं.

भारत 2032 में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो जाएगा, जिसकी कुल आय 7 ट्रिलियन डॉलर होगी (आज यह 2 ट्रिलियन डॉलर है). नंबर एक पर चीन और नंबर दो पर अमेरिका इससे बहुत आगे होंगे, हालांकि रुपया अगर मजबूत हो जाता है तो भारत की कमाई बढ़ सकती है. दूसरे, भारत की आबादी डेढ़ अरब को पार कर जाएगी और यह चीन को पछाड़ देगा. यानी 7 ट्रिलियन की आय और ज्‍यादा लोगों में बंट जाएगी.

तीसरे, भारत की प्रति व्यक्ति आय 4,500 डॉलर होगी (अभी यह 1,400 डॉलर है). मैंने अपनी मां से पूछा कि क्या इससे भारत एक विकसित अर्थव्यवस्था बन जाएगा? उन्होंने कहा कि ''विकसित'' इसके लिए गलत शब्द रहेगा, भारत 2032 तक ''विकसित'' नहीं हो पाएगा. वह तब भी गरीब ही रहेगा, हालांकि आज से कम. बस निम्न मध्य आय वर्ग से उच्च मध्य आय वर्ग में चला जाएगा. इसका मतलब मुझे तब तक समझ में नहीं आया जब तक मैंने यह नहीं पता कर लिया कि जॉर्डन और तुर्कमेनिस्तान की प्रति व्यक्ति आय आज उतनी ही है जितनी उस समय भारत की होगी. मुझे तो अंदाजा ही नहीं था कि ये देश भारत से भी अमीर होंगे. मुझे इस बात का भी अंदाजा कतई नहीं था कि 2032 में औसतन भारत आज के चीन से भी गरीब ही होगा.

चौथी बात, भारत के भीतर बहुत से अंतर होंगे और आज जो खाइयां हैं, वे पट नहीं जाएंगी. चंडीगढ़, गोवा, पुड्डुचेरी या दिल्ली में जीवनस्तर (प्रति व्यक्ति आय) आज के विकसित देशों जैसा हो सकता है, लेकिन झारखंड में आज के बांग्लादेश जैसी गरीबी होगी. छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिसा में फिर भी बहुत गरीबी होगी.

पांचवीं बात, गरीबी रेखा नाम की एक चीज होती है यानी जीवित रहने के लिए न्यूनतम आय. आज करीब 30 फीसदी भारतीय गरीबी रेखा से नीचे हैं (हर कोई अपने-अपने आंकड़े पेश करता है). यह 2032 में 10 फीसदी से कम होगा. यानी भारतीय कम गरीब, बेहतर शिक्षित और ज्‍यादा स्वस्थ होंगे.

छठवीं चीज, अधिक से अधिक लोग भारतीय शहरों में रह रहे होंगे और राष्ट्रीय आय में कृषि का हिस्सा करीब आठ फीसदी होगा. कुछ लोग तब भी खेती कर रहे होंगे लेकिन ज्‍यादा लोग उद्योगों और सेवा क्षेत्र में योगदान करते नजर आएंगे. करीब 40 फीसदी भारतीय शहरों में रह रहे होंगे और 10 लाख से ज्‍यादा की आबादी वाले करीब 70 शहर होंगे. दिल्ली की आबादी चार करोड़ होगी, जहां मैं रहती हूं. मैं तो सोच भी नहीं सकती कि दिल्ली तब कैसी दिखेगी. मुझे लगता है कि दिल्ली पड़ोस के राज्‍यों-उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा-तक फैल जाएगी. उस वक्त तक सड़कें  और यातायात इतना बेहतर हो जाएगा कि आगरा, चंडीगढ़ या जयपुर पहुंचने में सिर्फ  दो घंटे लगेंगे. मुझे तो लगता है कि हाइ स्पीड ट्रेन से चार घंटे में मुंबई भी पहुंचा जा सकेगा.

सातवां, तब झेपड़पट्टियों का क्या होगा? गरीबों और महंगाई का क्या? मैं तो आज भी पानी के लिए लोगों को लड़ते देखती हूं. कई के पास बिजली नहीं. हो सकता है तब बेहतर स्कूल (वर्चुअल भी हो सकते हैं) और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं हों. शिशु मृत्यु दर 15 (1,000 बच्चों पर) रह जाएगी. हर बच्चे का टीकाकरण होगा और कोई भी बच्चा तब घर में नहीं जन्मेगा. लेकिन मुझे लगता है कि पानी के लिए लोग तब भी झ्गड़ेंगे और मौसम तो पल-पल में बदलेगा. क्या तब हम दिल्ली में गर्मी में अधितम तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक झेलेंगे? खैर, हम सब के पास यूआइडी होगा और सरकार को पता होगा कि कौन गरीब है ताकि उन्हें ही सब्सिडी दी जा सके. बाकी सब लोग पैसे चुका कर खाएंगे, और मुझे तो ऐसा लग रहा है कि हर चीज 350 रु. किलो हो जाएगी. बिजली भी 15 रु. यूनिट हो जाएगी. हमारी कमाई तो ज्‍यादा होगी ही, लेकिन हर चीज और महंगी हो जाएगी.

चूंकि मैं अच्छे स्कूल में पढ़ती हूं और शायद आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका जाऊं, इसलिए इतना तो पक्का है कि लौटकर मुझे अच्छी नौकरी मिल जाएगी. अब दूसरों के बारे में मैं कुछ नहीं कह सकती. उस समय हममें से कई लोग जॉब मार्केट में नौकरी खोज रहे होंगे और नौकरियां उतनी होंगी नहीं (मेरी मम्मी ने मुझे यह कह कर भ्रम में डाल दिया कि सबको नौकरी मिल जाएगी, बस होगा इतना कि सबके वेतन में औसतन कम इजाफा होगा).

लेकिन मैं दूसरा सवाल पूछ रही हूं. मान लेते हैं कि गरीब ठीक से रहेंगे क्योंकि सरकार उसे सब्सिडी देगी. मान लो कि अमीर भी ठीक से रहेगा क्योंकि उसे अच्छे वेतन वाली अच्छी नौकरी मिल जाएगी. लेकिन जो बीच में होंगे, क्या वे 350 रु. किलो खाना खरीद पाएंगे और 15 रु. यूनिट बिजली के लिए चुका पाएंगे? मम्मी ने कहा कि चिंता न करो. उनके मुताबिक, वास्तविक आय वृद्धि हमेशा सकारात्मक होती है और यह महंगाई से ज्‍यादा ही रहती है.

आठवीं बात, मेरे दोस्त अदित ने इसे पढ़ा और पारिवारिक जीवन और करियर के बारे में पूछने लगा. मैंने उसके बारे में तो लिखा नहीं क्योंकि वह तो मैं जानती ही नहीं. इतना जानती हूं कि मैं शायद दिल्ली के अलावा किसी अन्य शहर में काम करूंगी और बाकी लोग भी अपने-अपने जन्मस्थान से दूर ही काम कर रहे होंगे. मैं जानती हूं कि नौकरी अनिश्चित रहेगी और मैं नौकरी बदलती रंगी. मैं जानती हूं कि मैं देर से शादी करूंगी, या फिर न भी करूं. मैं यह भी जानती हूं कि अदित को भी शादी करने में दिक्कत आएगी. लेकिन उसका मामला अलग है. वह तो देश के उस हिस्से से आया है जहां उन्होंने सारी बेटियों को मार डाला है.

मैं जानती हूं कि मैं साल में एक बार से ज्‍यादा अपने माता-पिता से नहीं मिल पाऊंगी. अगर मैं किसी भी महानगर में हुई, तो इतना पता है कि घरेलू नौकर खोजने में मुझे बहुत दिक्कत आएगी. उस समय, मैं खुद अपने माता-पिता को सरकारी महकमे में फंसे हुए देखूंगी.

मसलन, अब भी कई ऐसे काम हैं जिन्हें निबटाने के लिए उन्हें दौड़ना होता है. मुझे नहीं लगता कि इस तरह का सारा काम डिजिटल हो सकेगा. अगर मुझे विकल्प दिया गया कि मैं अपने माता-पिता जैसा जीवन जीना चाहती हूं या अपनी कल्पना का, तो मैं अपना ही जीवन चुनूंगी. मुझे लगता है कि मेरे पास भारतीय होने पर गर्व करने के अपने माता-पिता से भी कहीं ज्‍यादा कारण होंगे. और अगर मैंने शादी की, तो मुझे उम्मीद है कि मेरी बिटिया भी ऐसा कोई निबंध लिखने को कहे जाने पर यही सब बातें कहेगी.

तुम्हारी अनीता
(यह पत्र ''काल्पनिक'' है)

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