बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम
प्यारी अनीता,
तुम्हारा तोहफा पसंद आयाः चमकदार गहरे गले वाली घाघरा चोली. अफसोस, मैं इसे ज्यादा पहन नहीं पाऊंगी. दरअसल, मैं इसे हिजाब के नीचे पहनती हूं और जब आसपास मर्द नहीं होते तो हिजाब उतार देती हूं! मेरे नए अब्बू इस बारे में कुछ नहीं जानते. मैंने इसे अटारी में अम्मी के दूसरे कपड़ों के संग छिपाकर रखा है.
लैला ने जब मुझे तुम्हारा 20 साल बाद भारत वाला निबंध भेजा था, तभी से मैं तुम्हारे बारे में रोज सोचती हूं. मैं उसे पढ़कर सोचने को मजबूर हो गई कि 2032 में पाकिस्तान कैसा दिखेगा!
तुमने अपना पूर्वानुमान समझने के लिए इतने सारे आंकड़े दिए हैं, मैं भी यही करना चाहती थी. अम्मी ने मुझे इंटरनेट पर कई दिलचस्प चीजें खोजने में मदद की कि हमारे देश 20 साल बाद कैसे होंगे. आखिर वे कैंब्रिज में अर्थशास्त्री जो रही हैं. उन्हें तो मेरी फंतासी में जमकर मजा आया!
चूंकि कुछ बड़े और अहम लोग लगातार यह बात कहते रहते हैं कि हमें तुम्हारे देश के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहिए क्योंकि दो बराबर लोग ही एक-दूसरे का सम्मान कर सकते हैं. अम्मी कहती हैं कि ऐसा लगता है आज हम कमोबेश बराबर ही हैं. मानव विकास सूचकांक में तुम लोग 134 पर हो और हम 141 नंबर पर, अब इसका जो भी मतलब होता हो. लेकिन अम्मी यह भी कहती हैं कि अगर हम ऐसे ही रहे, तो 2032 में हम दोनों के बीच काफी फर्क आ जाएगा. अगले 20 साल में तुम लोगों का जीडीपी मेरे हिसाब से 4 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगा, यानी हमारे 0.43 ट्रिलियन डॉलर के मुकाबले करीब दस गुना! अम्मी बताती हैं कि जीडीपी ही असली ताकत है क्योंकि बम तो दोनों के पास है.
अम्मी बताती हैं कि हर हिंदुस्तानी की एवरेज जीडीपी 1,055 डॉलर है जबकि हर पाकिस्तानी की 975 डॉलर. यह फर्क तो बहुत बड़ा नहीं है, सिर्फ पांच डॉलर महीना! लेकिन अगले 20 साल में तुम्हारे वहां हर व्यक्ति हमारे वहां का दोगुना कमाएगा. जब मैंने उनसे पूछा कैसे तो उन्होंने बताया कि बड़ा फर्क इस बात से तय होता है कि हम महिलाओं, शिक्षा और फौज पर किस तरह निवेश करते हैं.
ऐसा लगता है कि हम लोग तुम्हारे मुकाबले अपनी फौज पर जीडीपी का ज्यादा हिस्सा खर्च करते हैं. अम्मी कहती हैं कि यदि हम ऐसे ही खर्च करते रहे, तो 20 साल बाद तुम अपने जीडीपी का 50वां हिस्सा फौज पर खर्च कर रही होगी जबकि तुम्हारे जितनी बड़ी फौज को बनाए रखने के लिए हमें अपने जीडीपी का 10वां हिस्सा लगाना पड़ेगा. इससे हमें काफी नुकसान होगा क्योंकि इसके लिए हमें ज्यादा उधार लेना पड़ेगा और बाकी चीजों में कटौती करनी पड़ेगी. पहले ही मुझे कितनी कम चीजें मुहैया हैं. क्या यह बात अजीब नहीं है कि 2032 तक दोनों देश 100 अरब डॉलर सिर्फ हथियार खरीदने पर जाया कर रहे होंगे?
लेकिन अम्मी की सबसे बड़ी चिंता हमारी औरतों को लेकर है. वे कहती हैं कि तुम्हारे वहां तब ज्यादा औरतें पढ़ने और नौकरी करने लग जाएंगी जबकि उन्हें डर है कि हममें से कम ही पढ़ और काम पर जा पाएंगी. उन्होंने बताया कि तुम्हारे वहां कामकाजी आदमियों और औरतों की तादाद बराबर होगी लेकिन हमारे यहां चार मर्दों पर एक औरत नौकरी कर रही होगी. वे नए किस्म के स्कूल बनने को लेकर भी खौफजदा हैं. वे पहनावे से जुड़े नए-नए कायदों और रोज सुनाए जाने वाले फरमानों से भी डरी हुई हैं.
सब लोग ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं. अम्मी को ही देखो, चौथा है-मेरे नए अब्बू से पहला. मुझे भी अब धीरे-धीरे अम्मी की तरह उनकी आदत पड़ रही है. वे बताती हैं कि मेरे असली अब्बू और उनके आदमियों को हमारे नए अब्बू ने मार दिया था. अम्मी तो हमें बचाने के लिए 'स्वारा' के नाम पर उनके घर चली आईं: अब हम उनकी जायदाद हैं और उनका काम है हमें बचाना. हमारी जिंदगियों को बचाने और दोनों ओर से लड़ रहे लोगों को शांत कराने का एक यही रास्ता था.
मैं अब घर पर रहने लगी हूं क्योंकि अम्मी को घरेलू काम के लिए और सबसे छोटी बहन को संभालने के लिए मदद की जरूरत थी. मेरी सबसे छोटी बहन कल ही दो साल की हो गई. मैं अपने पुराने स्कूल इंटरनेशनल कॉन्वेंट को, उसकी स्कर्ट को, अंग्रेजी की किताबों को और विदेशी टीचरों को मिस करती हूं. अब्बू नहीं चाहते कि अगले साल के बाद मैं पढ़ाई जारी रखूं. इत्तेफाक से वहां नेट ठीक चलता है इसलिए मैं लैला की मदद से लंदन के एक स्कूल के ऑनलाइन लेसन पढ़ पाती हूं.
यहां औरतों की दुनिया कितनी अलग है ना! हमारे यहां तुम्हारे देश का टीवी चैनल भी आने लगा है और अकसर वहां हिंदुस्तानी फिल्मों की शूटिंग की खबर आती रहती है. करीना खान पटौदी जब इस्लामाबाद आई थीं तो खुशकिस्मती से उसे मैंने भी देखा था. तुम सोच नहीं सकती मुझे कैसा लगा था. आज भी कितनी खूबसूरत है. उसने हिजाब नहीं पहना था और यहां वह सारे मर्दों के साथ नाची भी थी.
मेरे भाई दिलावर और फरीद के दिन अच्छे गुजर रहे हैं. आजकल यहां खूब काम चल रहा है, नई सड़कें बन रही हैं, बिजलीघर बन रहे हैं. कई लोग यहां बिजनेस के लिए और घूमने-फिरने आ रहे हैं. अधिकतर हिंदुस्तानी हैं पर दूसरे मुल्कों से भी हैं. लग रहा है सब ठीक ही होगा, कुछ नई दुकानें भी खुल गई हैं.
हां, इस साल हमारे यहां फिर से चुनाव होंगे. मुझे इसके मायने नहीं पता, लेकिन बड़े-बुजुर्ग काफी उत्साहित हैं, जैसे हम लोग क्रिकेट फेस्टिवल पर होते हैं. नेता अपने भाषणों में दुनिया जहान की बातें करते हुए कहते हैं कि पाकिस्तान के अब रफ्तार पकड़ लेने का वक्त आ चुका है. नए नेता ने विदेश के स्कूल-कॉलेज में पढ़ने के लिए वजीफे का ऐलान किया है जैसा कि सभी करते आए हैं. अम्मी बताती हैं कि अब ज्यादा से ज्यादा लोग काम करने के लिए पश्चिम का रुख कर रहे हैं.
अम्मी बहरहाल खुश हैं आजकल, दिनभर एक हिंदुस्तानी गीत गुनगुनाती रहती हैं जिसमें एक परिंदा अपने पिंजरे से बाहर निकलने के इंतजार में है ताकि वह खुले आकाश में आजाद उड़ सके. वे अपने पेट को हल्के से थपथपाते हुए कहती हैं, ''नसीब वाला हो तो लंदन में आंखें खोलेगा!'' मैं तुम्हें एक राज की बात बताती हूं. अम्मी के दोस्तों ने मेरे परिवार के इमिग्रेशन के लिए आवेदन कर दिया है. वे कहती हैं कि 'स्वारा' के चलते हमें शरणार्थी का दर्जा मिल जाएगा.
खैर, 20 साल बाद हम दोबारा अपनी-अपनी चिट्ठियां पढ़ेंगे ताकि जान सकें कि हम कितने बराबर हुए हैं और हमारी औरतें, फौजें अपनी ताकत के बारे में क्या सोचती हैं. मुझे उम्मीद है कि मैं अपने बच्चों को तुम्हारी भेंट की हुई घाघरा-चोली पहना सकूंगी.
तुम्हारी दोस्त
आलिया
(यह पत्र ''काल्पनिक'' है)

