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उन अपनों को कैसे भूल जाएं?

एयर इंडिया की फ्लाइट 171 हादसे की रिपोर्ट आने से पहले ही दुर्घटनास्थल की यादें मिटाई जा रहीं और पीड़ित परिवारों से सबकुछ भूलकर आगे बढ़ने की उम्मीद की जा रही

अहमदाबाद में एअरइंडिया बोइंग 787 ड्रीमलाइनर का मलबा
अपडेटेड 21 जून , 2026

बारह जून 2025 की दोपहर दुनिया ने उस भयावह हादसे को कई कोणों से देखा था. अहमदाबाद एअरपोर्ट से उड़ान भरने के सिर्फ 32 सेकंड बाद फ्लाइट 171 हवा में लड़खड़ाई और फिर लगभग फिसलती हुई सी नीचे आ गिरी. यह भारत के विमानन इतिहास की सबसे भीषण दुर्घटना थी.

मृतकों की सूची में 260 नाम दर्ज हुए. उस दिन की बरसी आने वाली है और मृतकों के परिजनों को अब दो मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ रही—एक उस जमीन को बचाने की, जहां उनके अपने आखिरी बार गिरे थे, और दूसरी न्याय की जंग.

हादसे की वजह अब तक साफ नहीं हो पाई है लेकिन परिवारों का आरोप है कि उन पर ऐसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने का दबाव डाला जा रहा, जो उनके कानूनी हक सीमित कर सकते हैं.

लंदन जा रहे एअर इंडिया के उस बोइंग 787-8 ड्रीमलाइनर में 242 लोग सवार थे और वह अहमदाबाद के मेघाणीनगर स्थित बीजे मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल परिसर में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. जांच अभी पूरी नहीं हुई है, फिर भी गुजरात सरकार ने दुर्घटनास्थल के पुनर्विकास के लिए 105 करोड़ रुपए की योजना का ऐलान कर दिया. यही जगह जांच से जुड़े अहम सबूतों का हिस्सा है.

एक संरचनात्मक ऑडिट में पुराने भवनों को असुरक्षित बताया गया और उन्हें गिराना जरूरी माना गया. उनकी जगह जी+8 मॉडल का नया हॉस्टल परिसर बनाया जाएगा, जिसमें 236 छात्रों के लिए स्टुडियो अपार्टमेंट, हरित क्षेत्र और बेसमेंट पार्किंग जैसी सुविधाएं होंगी. एअर इंडिया के स्वामित्व वाला टाटा समूह परियोजना में 53 करोड़ रुपए देगा, तो राज्य सरकार ने 34.65 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं.

स्मारक की मांग
पीड़ित परिवारों ने राज्य सरकार से उस स्थल को एक स्मारक के रूप में संरक्षित करने की मांग की है. ऐसी कई मिसालें हैं. मसलन, गुजरात के कच्छ में 2001 के भूकंप में मारे गए 185 स्कूली बच्चों की याद में स्मारक बना है. फ्लाइट 171 के पीड़ितों का कहना है कि क्या यह निर्माण कम से कम जांच पूरी होने तक भी नहीं रुक सकता?

इस बीच एअरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (एएआइबी) की अंतिम जांच रिपोर्ट 12 जून को आने वाली है. सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है—दोनों इंजनों के फ्यूल कंट्रोल स्विच एक सेकंड के भीतर 'रन' से 'कटऑफ' पर कैसे चले गए? कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर में एक पायलट दूसरे से पूछता सुनाई देता है कि स्विच क्यों बदले गए, जबकि दूसरा जवाब देता है कि उसने उन्हें छुआ तक नहीं. जांच में फिलहाल तीन संभावनाओं पर विचार हो रहा है—पायलट की अनजाने में हुई गलती, इलेक्ट्रिकल खराबी या कोई यांत्रिक दोष. तीसरी संभावना, जो संभावित जिम्मेदारियों के सवाल खड़े कर सकती है, अभी खारिज नहीं हुई है.

2018 में फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन ने एक बुलेटिन जारी कर इसी तरह की डिजाइन संबंधी दिक्कत का संकेत किया था. फरवरी में एअर इंडिया के एक बोइंग 787-8 विमान में हीथ्रो एअरपोर्ट पर बाएं इंजन का फ्यूल स्विच दो बार अपने आप रन से कटऑफ पर चला गया था.

एअर इंडिया ने पीड़ित परिवारों को अंतिम मुआवजे का प्रस्ताव देना शुरू किया है. एक इंडेम्निटी दस्तावेज भी दिया जा रहा जिसमें परिवारों से कहा गया है कि वे एअर इंडिया, बोइंग, पुर्जे बनाने वाली कंपनियों, विमानन ऑपरेटरों और सरकारी संस्थाओं के खिलाफ दुनिया के किसी भी न्यायिक क्षेत्र में मुकदमा या दावा करने का हक 'हमेशा के लिए और अपरिवर्तनीय रूप से' छोड़ दें. इसके बदले 3 करोड़ रुपए तक की अतिरिक्त राशि की पेशकश की गई है. मृतक मरियम पडारिया के बेटे अब्बास अली पडारिया, जिन्हें 10 लाख रुपए की पेशकश हुई है, कहते हैं, ''अंतिम जांच रिपोर्ट आने से पहले यह रकम स्वीकार करना सही नहीं लगता. हम जानना चाहते हैं कि आखिर हुआ क्या था.'' सवाल यह भी है कि अगर जांच में किसी निर्माता कंपनी या किसी अन्य संस्था की जिम्मेदारी सामने आती है, तो फिर क्या होगा?

अब तक चार परिवारों ने बोइंग और फ्यूल स्विच बनाने वाली हनीवेल के खिलाफ डेलावेयर में मुकदमा किया है. इंडेम्निटी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने वाले परिवार ऐसे मुकदमों में शामिल होने का हक खो देंगे. अब तक दुर्घटना में घायल 74 में से 60 लोग ऐसे कानूनी प्रयासों से जुड़े हैं. हादसे में बुरी तरह झुलसे हॉस्टल के माली अशोक परमार के पास अपनी वजह है, ''मेरी पत्नी मुझे छोड़ गई. मैं बमुश्किल काम कर पाता हूं. मेरी जिंदगी बर्बाद हो गई.'' मगर अपने प्रियजनों को हमेशा के लिए खो चुके लोगों के लिए यह खालीपन और गहरा है. 

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