राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने गठन के 100 साल 2025 में पूरा करने पर समाज में संपर्क बढ़ाने के लिए जो कुछ कर रहा है, उसकी खूब चर्चा हो रही है. संगठनात्मक ढांचे में किस तरह के बदलावों को लेकर आंतरिक मंचों पर बातचीत रही है, इस बारे में जानकारियां नहीं साझा की गईं. मगर, संघ के आधा दर्जन पदाधिकारियों से बातचीत में एक बात पुष्ट होती है कि आंतरिक ढांचे में बदलाव को लेकर संघ में गहन चर्चा चल रही है और प्रस्ताव तैयार किया गया है. वैसे, संघ पदाधिकारी आधिकारिक बातचीत में बदलावों की पुष्टि नहीं कर रहे हैं.
बदलावों को लेकर सुगबुगाहट संघ के शताब्दी वर्ष में ही नहीं हुई बल्कि इस पर पिछले कुछ वर्षों से चर्चा चल रही है. संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी कहते हैं, ''पिछले साल 21 मार्च से 23 मार्च तक बेंगलूरू में जो संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा हुई थी, उसमें भी इन बदलावों को लेकर बातचीत हुई थी. पहले की बैठकों में एक समिति को इस बारे में एक प्रारूप तैयार करने को कहा गया था. उस प्रारूप पर पिछली प्रतिनिधि सभा में चर्चा हुई और यह बात आई कि अभी इस पर और काम करने की जरूरत है. उस पर लगातार काम हुआ और अब उस प्रारूप को 2026 की प्रतिनिधि सभा में रखा जाएगा.''
यह जानना जरूरी है कि आखिर संघ के संगठन की संरचना में किन बदलावों का प्रस्ताव है? इनमें एक बड़ा बदलाव यह है कि संघ अपनी मौजूदा 'प्रांत आधारित' व्यवस्था को बदलकर 'संभाग आधारित' बनाने की योजना पर काम कर रहा है. अभी संघ की व्यवस्था की दृष्टि से पूरे भारत भर के कामों को 46 प्रांतों में बांटा गया है. प्रस्ताव यह है कि इन सारी स्थानीय इकाइयों को 90 संभागों में बांट दिया जाए. इसकी वजह के बारे में संघ के एक पदाधिकारी कहते हैं, ''ऐसा करने से नेतृत्व और जमीनी स्तर की इकाइयों के बीच प्रशासनिक दूरी कम हो सकेगी. स्थानीय स्तर पर निर्णय प्रक्रिया तेज होगी. बेहतर समन्वय होगा और स्थानीय स्तर पर संघ की गतिविधियों में तेजी लाने में मदद मिलेगी.''
बदलावों के क्रम में संभव है कि क्षेत्र प्रचारकों की संख्या घट जाए. अभी पूरे देश को संघ ने 11 क्षेत्रों में बांटा है और क्षेत्र प्रचारक भी 11 हैं. अगर व्यवस्था बदली तो इनकी संख्या घटकर नौ रह जाएगी. इससे बेहतर समन्वय हो सकेगा. संघ की क्षेत्र आधारित व्यवस्था में बदलाव की योजना यह है कि उत्तराखंड को उत्तर प्रदेश से और राजस्थान को उत्तर क्षेत्र के साथ जोड़ा जाए.
संघ की व्यवस्था में प्रांत प्रचारकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है. कई राज्य ऐसे हैं जहां के प्रांत प्रचारक संघ की सहयोगी भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के मुकाबले राजनैतिक तौर पर भी अधिक प्रभावशाली होते हैं. संघ की गतिविधियों में तो इनकी प्रमुख भूमिका होती ही है, भाजपा के टिकट बंटवारे से लेकर भाजपा सरकार में कौन मंत्री बनेगा, इन सभी राजनैतिक निर्णयों में भी इनकी भूमिका देखी जाती है.
प्रांत प्रचारक की जगह अब राज्य प्रचारक नियुक्त करने का प्रस्ताव दिया जा रहा है. इसकी जिम्मेदारी राज्य के सभी संभागों के संभाग प्रचारकों से समन्वय की होगी. उदाहरण के तौर पर अभी उत्तर प्रदेश में संघ की व्यवस्था की दृष्टि से छह प्रांत हैं. नई व्यवस्था में प्रदेश को नौ संभागों में बांटा गया है. हर संभाग में संभाग प्रचारक होगा. सभी नौ संभागों के लिए एक राज्य प्रचारक होंगे. इस तरह प्रांत प्रचारक की दशकों पुरानी व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी.
बदलावों के इस नए प्रस्ताव की खास बात यह है कि इसमें संभाग के नीचे की व्यवस्था को जस का तस रखने की बात कही गई है. संभाग के नीचे विभाग प्रचारक और जिला प्रचारक की व्यवस्था बनी रहेगी. इसके पीछे की सोच के बारे में संघ के एक प्रचारक बताते हैं, ''अभी प्रांत प्रचारक के तहत अधिक जिले हैं. संभाग प्रचारक के कार्यक्षेत्र में अपेक्षाकृत कम जिले होंगे. इससे उनके लिए हर जिले और विभाग से समन्वय अपेक्षाकृत आसान होगा. आज देश के लगभग हर जिले में संघ का संगठन है. नई व्यवस्था से हमारे लिए पहले के मुकाबले गांवों के स्तर पर और शहरी क्षेत्र में हर मोहल्ले तक अधिक सघन जनसंपर्क करने और अपनी गतिविधियों को चलाते हुए माइक्रो मैनेजमेंट में सुविधा होगी.''
संघ की गतिविधियां छह विभागों—प्रचार, बौद्धिक, शारीरिक, व्यवस्था, संपर्क और सेवा—से संचालित होती हैं. इसे नहीं बदला जाएगा. लेकिन इनके तहत ही संघ की गतिविधियों का दायरा बढ़ाने की बात प्रस्ताव में कही गई है. कहा गया है कि संघ के कार्य का विस्तार पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और परिवार की व्यवस्था मजबूत करने की दिशा में होना चाहिए. उल्लेखनीय है कि भारतीय परिवार की व्यवस्था को मजबूत करने के लिए संघ पिछले कुछ साल से 'कुटुंब प्रबोधन' के नाम से गतिविधियां संचालित कर रहा है. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी कई अवसरों पर 'कुटुंब प्रबोधन' का उल्लेख किया है और संघ का शीर्ष नेतृत्व इसमें और गति लाने की बात करता आया है.
उल्लेखनीय है कि कुटुंब प्रबोधन संघ की एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहल है. इसके तहत परिवारों में जागरूकता और मूल्यों के प्रसार का काम किया जा रहा है. यह कार्यक्रम परिवार को समाज की मूल इकाई मानकर उसे मजबूत बनाने समेत पारिवारिक जुड़ावों को गहरा करने और भारतीय संस्कृति के संस्कारों को घर-घर पहुंचाने पर केंद्रित है. संघ इसे 'पंच परिवर्तन' में से एक प्रमुख विषय मानता है. संघ के पंच परिवर्तनों में सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी जीवनशैली, नागरिक कर्तव्य और कुटुंब प्रबोधन शामिल हैं.
कुटुंब प्रबोधन के तहत स्वयंसेवक घर-घर जाकर लोगों को प्रेरित करते हैं कि परिवार के सदस्य नियमित रूप से साथ समय बिताएं. इसके तहत मुख्य सुझाव यह दिया जाता है कि सप्ताह में कम से कम परिवार का हर सदस्य एक बार साथ भोजन अवश्य करे. साथ ही स्मार्टफोन और टीवी से दूर रहकर चर्चा करें और परिवार के सदस्य पारिवारिक वृक्ष, देवी-देवता, संस्कृति, धर्म, देशभक्ति और नैतिक मूल्यों पर बात करें. इसके तहत बच्चों को संस्कार देने पर जोर देते हुए घर को 'संस्कार शाला' बनाने की बात कही जाती है. यह कार्यक्रम 2017 से चल रहा है लेकिन 2025 में संघ के शताब्दी वर्ष में इसे और व्यापक बनाने का काम किया गया है.
आखिर शताब्दी वर्ष में संघ की आंतरिक संरचना में बदलाव की पहल क्यों हो रही है? इस बारे में संघ के एक प्रचारक कहते हैं, ''कोई भी संस्था जब अपने गठन के 50 वर्ष या 100 वर्ष जैसा कोई माइलस्टोन हासिल करती है तो उसमें कामकाज और कार्य विस्तार की समीक्षा होती है. संघ में भी समीक्षा चल रही है. इसमें सामने आया कि अगर संगठन की संरचना के स्तर पर ये बदलाव कर लिए जाएं तो संघ न सिर्फ अपने कार्य विस्तार और प्रभाव में सकारात्मक बदलाव लाने में सक्षम बनेगा बल्कि भविष्य की चुनौतियों से निबटने में अधिक सक्षम बन सकेगा.''
क्या इन बदलावों से संघ के सहयोगी संगठनों की कार्यप्रणाली में भी बदलाव आएगा? इस बारे में ये प्रचारक बताते हैं, ''मुझे नहीं लगता कि मूल कार्यों में कोई बदलाव आएगा. व्यवस्था और समन्वय की दृष्टि से बदलाव आ सकते हैं लेकिन उससे हमारे अनुषांगिक संगठनों का कामकाज और बेहतर ही बनेगा.'' तो क्या इस बार मार्च में होने वाली प्रतिनिधि सभा में इन बदलावों के प्रस्ताव को अंतिम रूप दे दिया जाएगा? जवाब में वे कहते हैं, ''अभी पक्के तौर पर बदलावों के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन हमारी अपेक्षा तो ऐसी ही है. अब इन बदलावों की औपचारिक घोषणा में बहुत देर नहीं होनी चाहिए.''

