हाल ही में नई दिल्ली के एक कार्यक्रम में एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने कहा कि मजबूत सेना के बिना राष्ट्रीय शक्ति के अन्य साधन मसलन आर्थिक ताकत, प्रासंगिकता गंवा बैठते हैं. भारतीय वायु सेना (आइएएफ) प्रमुख साफ ढंग से मौजूद होते हुए भी अनदेखा की जा रही समस्या की तरफ इशारा कर रहे थे, और वह है वायु सेना के लड़ाकू विमानों का खतरनाक ढंग से घटता बेड़ा, जो 42 स्वीकृत स्क्वाड्रन के मुकाबले 29 रह गया है.
इलाके में भारत के मुख्य दुश्मन चीन और पाकिस्तान अपने लड़ाकू बेड़ों को आधुनिक बना रहे हैं, वहीं भारत की भयप्रतिरोधक क्षमता घट रही है. इस स्थिति को सुधारने के लिए अब रक्षा मंत्रालय मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (एमआरएफए) खरीद कार्यक्रम के तहत 114 (ज्यादातर) 'मेड इन इंडिया' राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के वायु सेना के प्रस्ताव पर काम कर रहा है, जो फ्रांसीसी फर्म दसॉ एविएशन के हाथों भारतीय एयरोस्पेस फर्मों के साथ मिलकर बनाए जाने हैं और जिसमें कुछ हद तक टेक्नोलॉजी ट्रांसफर या प्रौद्योगिकी हस्तांतरण भी होगा.
भारत की योजना इन 114 विमानों में से 18 उड़ान भरने के लिए तैयार स्थिति में हासिल करने की है. पूरा सौदा करीब 3.25 लाख करोड़ रुपए (36 अरब डॉलर) का होने का अनुमान है. इसकी घोषणा 19-20 फरवरी को फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां की भारत यात्रा के दौरान की जा सकती है. आइएएफ के पास 36 राफेल विमान हैं, जबकि भारतीय नौसेना ने अपने विमानवाहकों के अनुरूप 26 राफेल मरीन का ऑर्डर दिया है.
वॉशिंगटन डीसी स्थित स्टिमसन सेंटर में नॉन-रेजिडेंट फेलो क्रिस्टोफर क्लैरी का कहना है कि भारत के पास गुणात्मक रूप से प्रभावशाली वायु सेना है, लेकिन ''तादाद के लिहाज से वह चीनी हवाई ताकत के मुकाबले कमजोर स्थिति में है और यह कमजोरी बढ़ती जा रही है. राफेल लड़ाकू विमान इस रुझान को रोकने में मदद करेगा.''
अलबत्ता इस तरह के बड़े सौदे को फलदायी होने में वक्त लगता है. रक्षा सचिव की अध्यक्षता में रक्षा खरीद बोर्ड ने 16 जनवरी को परियोजना को मंजूरी दी. अब प्रस्ताव आवश्यकता की स्वीकृति के लिए रक्षा अधिग्रहण परिषद को भेजा जाएगा, जिसके अध्यक्ष रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह हैं. यह स्वीकृति मिल जाने के बाद टेक्नोलॉजी के ट्रांसफर, स्वदेशी सामग्री, डिलिवरी की समय सारणी और घरेलू भागीदार के चयन के बारे में बातचीत होगी. फिर इस समझौते के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीएस) की राजनैतिक मंजूरी लेनी होगी.
जानकारों का कहना है कि घोषणा के बाद भी दस्तखत होने में और साल भर या उससे ज्यादा वक्त लग सकता है. विमान की वास्तविक डिलिवरी की तो बात ही अलग है. दूसरी विदेशी वायु सेनाओं को भी राफेल की डिलिवरी की दसॉ की प्रतिबद्धताओं को देखते हुए 18 तैयार विमानों में से पहला 2032 के आसपास कहीं जाकर आएगा. देश में ही एसेंबल किए जाने वाले बाकी 96 राफेल में से पहला भी उसी वक्त के आसपास मिलेगा, और वह भी तब जब यह एसेंबली शृंखलाओं की स्थापना और स्वदेशी पुर्जों के उत्पादन पर निर्भर करेगा.
एमआरएफए कार्यक्रम के जरिए राफेल हासिल करने का यह नया कदम वैसा ही है जैसे 2007 में मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) टेंडर निकाला गया था. बरसों की जांच-परख के बाद बेहतर प्रदर्शन और जीवनचक्र सततता यानी पूरे जीवनकाल पर्यावरणीय प्रभाव के आधार पर 2012 में पसंदीदा विमान के रूप में राफेल का चयन किया गया था. उड़ने के लिए तैयार स्थिति में 18 विमानों की सीधी खरीद और उसके साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए सरकार की मिल्कियत वाली हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) में बाकी 108 विमानों की लाइसेंसशुदा मैन्युफैक्चरिंग के बारे में बातचीत शुरू हुई.
2015 में एनडीए की नई सरकार ने एमएमआरसीए सौदे को रद्द कर दिया और इसके बजाए अंतरसरकारी समझौते के जरिए सीधे 36 राफेल विमान खरीदने का विकल्प चुना. इस समझौते पर सितंबर 2016 में दस्तखत हुए और डिलिवरी 2022 के अंत तक पूरी होनी थी. मौजूदा सौदे में उत्पादन भागीदार के तौर पर एचएएल नहीं है, क्योंकि उसका सारा ध्यान फिलहाल जारी कई परियोजनाओं पर ही लगा हुआ है.
एमएमआरसीए सौदे की तकनीकी मूल्यांकन समिति के सदस्य एयर मार्शल अनिल चोपड़ा (सेवानिवृत्त) का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राफेल के प्रदर्शन से आइएएफ संतुष्ट है, खासकर जिस तरह इसने पाकिस्तान वायु सेना की तमाम फ्रीक्वेंसी को जाम कर दिया. वे यह भी बताते हैं कि फ्रांस अब राफेल के नवीनतम संस्करण एफ4 और उसके बाद के एफ5 की पेशकश कर रहा है, जिसमें गैलियम नाइट्रेट आधारित इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियां और उसके साथ नवीनतम एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐरे (एईएसए) राडार लगी हैं. आइएएफ राफेल का एफ3आर संस्करण संचालित करती है.
भारतीय एसेंबली शृंखला
उम्मीद है कि 96 राफेल के भारतीय उत्पादन के लिए एसेंबली शृंखला दसॉ रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड (डीआरएएल) के नागपुर स्थित कारखाने में लगाई जाएगी. डीआरएएल दसॉ एविएशन की सहयोगी कंपनी है. पिछले साल सितंबर में उसने इसके बहुमत शेयर हासिल किए. इस कार्यक्रम में टाटा ग्रुप, महिंद्रा और डायनैमैटिक टेक्नोलॉजीज लि. के साथ 30 से ज्यादा दूसरे सप्लायर सहित कई भारतीय कंपनियों की शिरकत होगी.
टाटा पहले ही दसॉ के विदेशी ऑर्डर के लिए राफेल फ्यूजलेज यानी विमान ढांचे के कुछ हिस्से बना रहे हैं. स्वदेशी सामग्री चरणों में करीब 60 फीसद तक बढ़ाने की योजना है. राफेल फ्यूजलेज और सफरान के एम-88 इंजन सहित प्रमुख कलपुर्जों के लिए अलग-अलग समझौतों पर काम चल रहा है. दसॉ ने भारत में एमआरओ (मेंटेनेंस, रिपेयर, ओवरहॉल) सुविधा भी स्थापित की है, जहां हैदराबाद में एम-88 इंजन के ओवरहॉल की योजना है.
आइएएफ ने 36 राफेल का जो पिछला सौदा किया था, उसमें भारतीय वायु सेना के खास सुधार और संवर्धन शामिल थे, जिनमें इज्राएली हेलमेट-माउंटेड डिस्प्ले (एचएमडी), राडार वार्निंग रिसीवर और लो-बैंड जैमर थे. इसमें हथियारों का पैकेज और प्रदर्शन-आधारित लॉजिस्टिक्स समझौता भी शामिल था.
हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों में एमबीडीए, एमआइसीए आइआर और एमबीडीए मेटियोर के अलावा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान में आतंकी अड्डों को नष्ट करने के लिए इस्तेमाल किए गए हैमर बम भी शामिल हैं. उम्मीद है कि मौजूदा सौदे में भी एचएमडी ईडब्ल्यू सुइट और राडार जोड़ने की ऐसी ही व्यवस्था शामिल होगी.
एक मसला तब भी उठा था और अब भी उठ रहा है. वह है सुरक्षा और रणनीतिक कारणों का हवाला देकर राफेल का सोर्स कोड साझा करने से फ्रांस का इनकार करना. सोर्स कोड वह कंप्यूटर प्रोग्रामिंग है जो थेल्स एईएसए राडार और मॉड्यूलर मिशन कंप्यूटर (एमएमसी) सरीखी बेहद अहम प्रणालियों को नियंत्रित करती है. हालांकि, दसॉ ने हवा से हवा में मार करने वाली अस्त्र एमके-1 सरीखी मिसाइलों और एसएएडब्लू (स्मार्ट ऐंटी-एयरफील्ड वेपन) सरीखे भारतीय हथियारों को समाहित करने में मदद की, लेकिन सोर्स कोड नहीं मिलने से नए हथियार और सेंसर जोड़ने के लिए मैन्युफैक्चरर के आसरे रहना होगा.
इससे बचने के लिए भारत को एपीआइ (ऐप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस) स्तर की पहुंच हासिल करने का लक्ष्य रखना चाहिए, जिसकी बदौलत वह मूल सोर्स कोड की पूरी पहुंच मिले बिना ही सॉफ्टवेयर इंटरफेस का इस्तेमाल करके खास सॉफ्टवेयर मॉड्यूल, हथियार और सेंसर जोड़ पाएगा.
सैन्य विश्लेषक स्क्वाड्रन लीडर विजयेंद्र के. ठाकुर (सेवानिवृत्त) कहते हैं, ''प्लेटफॉर्म के सोर्स कोड तक पहुंच एपीआइ-स्तर के इंटीग्रेशन तक सीमित होनी चाहिए, जो भारतीय हथियारों की तैनाती के लिए काफी है. टेक्नोलॉजी के ट्रांसफर को हथियार की खरीद से अलग रखना चाहिए.'' वे बताते हैं कि हथियार खरीद को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर से जोड़ने के कारण लागत बढ़ जाती है और युद्ध सामग्री खरीदने की वायु सेना की क्षमता बाधित होती है, जिससे युद्ध के लिए तैयार होने पर असर पड़ता है.
यही नहीं, राफेल की डिलिवरी की समय सीमा वही (2030 के दशक के शुरुआती साल) होने की उम्मीद है जो तेजस एमके की है, जो 4.5 पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं.
कुछ अन्य लोगों को 'मेड इन इंडिया' वाले हिस्से से दिक्कत है. करीब 850 मिग-21 की देश में ही मैन्युफैक्चरिंग के बावजूद (जिसका जोर मोटे तौर पर नो-हाउ ट्रांसफर के तहत एसेंबली और मैन्युफैक्चरिंग पर था) भारत ने ऐसा स्वतंत्र एयरोस्पेस पारिस्थितिकी तंत्र विकसित नहीं किया जो बाहरी निर्भरता के बिना टेक्नोलॉजी पर पूरी महारत दिला पाता. एक सैन्य विमानन विशेषज्ञ कहते हैं, ''भारत के पास राफेल प्लेटफॉर्म के बौद्धिक संपदा अधिकार (आइपीआर) नहीं हैं. बड़े सुधार या क्षमता संवर्धन के लिए मूल उपकरण निर्माता (ओईएम) के सहारे की जरूरत होती है. ओईएम पर यह लगातार जारी इस तरह की निर्भरता आधुनिक लड़ाकू विमानों के विकास में आत्मनिर्भरता हासिल कर पाने में बाधा डालती है.''
क्रिस्टोफर क्लैरी का मानना है कि राफेल की इतनी संख्या भी भारतीय सेना के लिए नाकाफी होगी. वे कहते हैं, ''तेजस से कुछ क्षमता जरूर हासिल होगी, लेकिन अगर भारत मीडियम रेंज में लड़ाकू विमानों की एक और बड़ी खरीद पर अपनी गाढ़ी कमाई के रुपए खर्च करने से बचना चाहता है तो उसे उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान (पांचवीं पीढ़ी के एएमसीए) कार्यक्रम को आगे बढ़ाना होगा.''
आइएएफ की 29 लड़ाकू स्क्वाड्रन (प्रत्येक में 18-20 विमान हैं) में से 13 एसयू-20एमकेआइ विमानों, तीन मिग-29यूपीजी, तीन मिराज-2000, छह सेपेकैट जगुआर, दो एलसीए तेजस एमके1, और दो राफेल विमानों से मिलकर बनी हैं. मिग-29, जगुआर और मिराज से बनी इकाइयां 2030 से डिकमिशन होने लगेंगी, और चरणों में 2035 तक पूरी बाहर हो जाएंगी. ऐसे में एसयू-30एमकेआइ के बेड़े को अपग्रेड करने की जरूरत है और वायु सेना मुख्यालय अंतरिम उपाय के तौर पर, एएमसीए के 2035 से बेड़े में शामिल होने तक, पांचवीं पीढ़ी के रूसी एसयू-57 'फेलन' विमान की कुछ स्क्वाड्रन हासिल करने पर विचार कर रहा है.
प्रतिद्वंद्वियों की स्थिति
इस बीच पाकिस्तान और चीन अपनी वायु सेनाओं को आधुनिक बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं. अमेरिका ने हाल ही में पाकिस्तानी एफ-16 विमानों को अपग्रेड करने के लिए 68.6 करोड़ डॉलर के पैकेज को मंजूरी दे दी, जिससे उनका जीवनकाल 2040 तक बढ़ जाएगा. पाकिस्तान लंबी दूरी और दृश्य सीमा से आगे यानी एलआर-बीवीआर पीएल-15 मिसाइलों से लैस जे-10सी लड़ाकू विमान उड़ाता है. उसने पांचवीं पीढ़ी का चीनी जे-35ए स्टेल्थ विमान भी हासिल करने की कोशिश की है.
पड़ोसी मुल्क चीन के पास पांचवीं पीढ़ी के करीब 400 जे-20 विमान हैं और उम्मीद है कि वह 2030 तक करीब 1,000 जे-20 भी मैदान में उतार देगा. जे-35ए को शामिल करने और जे-10 तथा जे-16 को आधुनिक बनाने के साथ चीन की कुल लड़ाकू ताकत 2,200 आधुनिक प्लेटफॉर्म से भी ज्यादा हो सकती है.
भारतीय वायु सेना रूसी निर्भरता को भी कम करना चाह रही है. आइएएफ के एक बड़े अधिकारी का कहना है कि रूसी प्लेटफॉर्म (सुखोई एसयू 30 एमकेआइ लड़ाकू बेड़े की रीढ़ की हड्डी हैं) सस्ते हैं, लेकिन समय के साथ उनकी लागत पश्चिमी विमान से ज्यादा हो जाती है. भारत रूस, अमेरिका और यूरोप से अपनी रक्षा खरीदों में संतुलन साध रहा है, जबकि खुद अपने प्लेटफॉर्म विकसित करने की रफ्तार बढ़ा रहा है.
राफेल सौदा आखिरकार स्वदेशी विमानों पर भारत के जोर की विसंगति नहीं बल्कि उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सोच समझकर तैयार किया गया पुल है. फिलहाल तो तत्काल कमियों को पूरा करने के लिए आजमाए हुए और तैयार विमान खरीदकर भारत ने अपने लिए कुछ वक्त हासिल कर लिया है ताकि इस बीच अपने लड़ाकू विमानों के डिजाइन, टेस्ट और उत्पादन पर काम कर सके.
स्टिमसन सेंटर के नॉन-रेजिडेंट फेलो क्रिस्टोफर क्लैरी ने कहा, "भारत के पास गुणात्मक रूप से प्रभावशाली वायु सेना है, लेकिन तादाद के लिहाज से वह चीनी हवाई ताकत के मुकाबले कमजोर स्थिति में है और यह कमजोरी बढ़ती जा रही है. राफेल इस रुझान को रोकने में मदद करेगा.''

