छह माह तक खींचतान, कड़वाहट, और आपसी टकराव के बाद 2 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच फोन पर आत्मीय बातचीत हुई और आखिरकार भारत-अमेरिका ने विवाद से किनारा कर लिया.
ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर इस सुलह के संकेत दिए और सबसे पहले इंडिया टुडे के 'सुर्खियों के सरताज 2025' अंक का कवर पोस्ट किया, जिसका शीर्षक था 'द मूवर एंड द शेकर.' उसमें मोदी और ट्रंप की फोटो थी.
इसके फौरन बाद, उन्होंने पोस्ट किया कि मोदी 'मेरे सबसे अच्छे दोस्तों में एक' हैं और ''उनके अनुरोध पर हमने तत्काल प्रभाव से व्यापार करार पर सहमति जताई है.'' इसके तहत अमेरिका बराबरी का टैरिफ 25 फीसद से घटाकर 18 फीसद कर देगा.
यह भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान के कानों में रस घोलने जैसा था. लेकिन तभी ट्रंप ने इससे जुड़ी शर्तें गिना डालीं, जिससे उसे अपनी स्थिति के बचाव के लिए हाथ-पैर मारने पड़े. अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि भारत अमेरिकी सामान पर अपने टैरिफ और गैर-शुल्क बाधाओं को घटाकर शून्य करने और रूसी तेल खरीदना बंद करने पर सहमत हो गया है. इसके अलावा, उन्होंने कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री ने 500 अरब डॉलर से ज्यादा के अमेरिकी ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, कृषि उत्पादों और कोयले के अलावा 'अमेरिकी उत्पादों' को बड़े पैमाने पर खरीदने का वादा किया है.
भारतीय प्रतिक्रिया
इसके तुरंत बाद आया मोदी का ट्वीट खासा सतर्कता भरा था, जिसमें उन्होंने ट्रंप को ''अपना प्रिय मित्र'' कहा और टैरिफ घटाने के लिए उनका आभार जताया. प्रधानमंत्री ने ट्रंप की शर्तों का जिक्र करने से परहेज किया लेकिन कहा कि वे साझेदारी ''अभूतपूर्व ऊंचाइयों'' पर पहुंचाने को उत्सुक हैं. उन्होंने वैश्विक शांति और स्थिरता बहाल करने में ट्रंप के नेतृत्व की भी सराहना की, जिसे कई लोगों ने पिछले मई में भारत-पाकिस्तान टकराव में शांति स्थापित करने के उनके बार-बार के दावों का खंडन करने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति को खुश करने की कोशिश के तौर पर देखा.
हालांकि, ट्रंप की पोस्ट में रूसी तेल खरीदने के कारण भारत पर लगाए गए अतिरिक्त 25 फीसद टैरिफ जुर्माने को हटाने का कोई जिक्र नहीं था, लेकिन भारत में नए अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने इंडिया टुडे को बताया कि उसे भी हटा लिया जाएगा और कुल टैरिफ 18 फीसद ही होगा. माना जा रहा है कि करार पक्का कराने में गोर की बड़ी भूमिका रही है. इस बीच, हमारे वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि ट्रंप ने जिस 500 अरब डॉलर के वार्षिक व्यापार का आंकड़ा दिया है, वह दरअसल पांच वर्षों में हासिल किया जाने वाला लक्ष्य है. यह वही प्रतिबद्धता है जो दोनों देशों ने फरवरी 2025 में मोदी की द्विपक्षीय यात्रा के दौरान जताई थी, जो ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में व्हाइट हाउस में हुई थी.
विपक्ष ने आरोप लगाया कि मोदी ने ''देश को अमेरिका के हाथों बेच दिया है.'' जवाब में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने साफ किया कि ''खाद्य और कृषि क्षेत्र में भारतीय हितों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है. यह ऐतिहासिक करार एमएसएमई, उद्यमियों, कुशल श्रमिकों और उद्योगों के लिए नए अवसर खोलेगा, अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी तक पहुंच संभव बनाएगा, दुनिया के लिए मेक इन इंडिया के भारत के विजन को आगे बढ़ाएगा.'' उन्होंने ने यह भी कहा कि करार की विस्तृत रूपरेखा और ब्यौरे जल्द ही सामने आएंगे और इसके लिए दोनों पक्ष ''आवश्यक तकनीकी प्रक्रियाओं को पूरा करने और व्यापार सौदे से संबंधित कागजी कार्रवाई को अंतिम रूप देने'' के लिए तेजी से काम करेंगे.
राहत की बात
अलबत्ता, ब्यौरे सामने न आने के बावजूद विशेषज्ञों ने इसे ''सभी समझौतों में पितृ-समझौता (फादर ऑफ ऑल डील्स)'' करार दिया, क्योंकि एक हफ्ते पहले यूरोपीय संघ के साथ भारत ने व्यापारिक ''समझौतों की जननी'' (मदर ऑफ ऑल डील्स) के ठीक बाद हुआ है. इसमें शक नहीं कि भारत-अमेरिका समझौते के कई मायने में खासा अहम फायदे हैं. भारतीय व्यापार के लिए फिर से प्रतिस्पर्धा में आने के मौके मुहैया करने के साथ यह भारत-अमेरिका संबंधों को भी एक बार फिर पटरी पर लाता है. करार यकीनन उस पुराने दौर को वापस नहीं लाता, जहां भारत के निर्यात पर अमेरिकी शुल्क औसतन सिर्फ 2.5 फीसद था. लेकिन, भारत को ब्राजील की तरह उन देशों की सूची में शामिल होने से बचाता है, जिन पर 50 फीसद शुल्क की मार पड़ने वाली है.
अमेरिका में भारतीय राजदूत रह चुके अरुण सिंह कहते हैं, ''करार सबसे बड़े नुक्सान को दूर करता है. सिर्फ इसी वजह से इसका स्वागत किया जाना चाहिए.'' 18 फीसद शुल्क के साथ भारत कई प्रतिस्पर्धी आसियान देशों—जिन पर करीब 20 फीसद शुल्क है—और पाकिस्तान तथा बांग्लादेश (19 फीसद) की तुलना में थोड़ी बेहतर स्थिति में होगा. कपड़े, जूते-चप्पल, लाइट मैन्युफैक्चरिंग और इंजीनियरिंग उत्पादों जैसे श्रमिक-सघन क्षेत्रों में भारत की स्थिति फिर से मजबूत करेगा. हालांकि, अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, फिर भी व्यापार को मौजूदा 210 अरब डॉलर से बढ़ाकर 500 अरब डॉलर तक पहुंचाना बहुत आसान नहीं होगा.
करार का दूसरा फायदा यह है कि भारत-अमेरिका रिश्तों को ज्यादा स्थिर करने वाला है. अमेरिका के पूर्व उप-सहायक विदेश मंत्री इवान ए. फीगनबॉम कहते हैं, ये दोनों नेताओं के लिए जीत का जश्न मनाने का पर्याप्त कारण है. वे आगाह भी करते हैं कि ''हमें ऐसी बात नहीं करनी चाहिए कि पिछले छह महीनों की कड़वाहट जादू की छड़ी घुमाते ही 'हवा' हो गई. अंतरराष्ट्रीय और घरेलू राजनीति परीकथाओं जैसी नहीं होती; यहां फैसलों का प्रतिकूल असर भी होता है.'', जैसा कई देशों ने अनुभव किया है, ट्रंप शैली के करार दिखावे में बड़े लेकिन बारीकियां छोटे और कभी भी पलट सकते हैं. भारतीय वार्ताकारों को तय करना चाहिए कि बारीकियों में कुछ ऐसा न हो जो आगे चलकर रिश्तों को फिर बिगाड़ दे.
करार के मायने
> अमेरिकी पारस्परिक टैरिफ 25 फीसद के बजाए 18 फीसद होने से भारत आसियान देशों, पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुकाबले बेहतर स्थिति में होगा
> लेकिन इसके साथ रूस से तेल खरीदना बंद करने और वेनेजुएला और अमेरिका से तेल खरीदने की शर्तें भी हैं
> अमेरिकी सामान पर भारत में शून्य टैरिफ लगेगा, जबकि भारत को 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामान खरीदने का वादा करना होगा
> वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, यह ऐतिहासिक समझौता एमएसएमई के लिए नए अवसर खोलेगा...अत्याधुनिक तकनीक तक पहुंच बनाएगा, और दुनिया के लिए मेक इन इंडिया के भारत को विजन को आगे बढ़ाएगा.

