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प्रधान संपादक की कलम से

इस पूरे बजट का विचार साफ है: कम में ज्यादा हासिल करना. हर रुपए से ज्यादा उत्पादकता निकालना. लेकिन यह मितव्ययिता सिर्फ बचत के लिए नहीं है. हर कदम नपा-तुला है ताकि आगे नए रास्ते खुल सकें

18 फरवरी 2026 अंक
18 फरवरी 2026 अंक
अपडेटेड 18 फ़रवरी , 2026

- अरुण पुरी

बजट बनाना कोई आसान काम नहीं होता. इसमें बहुत सारे गतिशील ‌‌हिस्से और बदलता हुआ डेटा होता है. भारत जैसे देश में इसका मतलब है करीब डेढ़ अरब अलग-अलग अपेक्षाएं रखने वाले लोग! और यह कोई आसान दौर नहीं है. हम ऐसे दशक में जी रहे हैं, जहां एक-दो नहीं बल्कि कई अप्रत्याशित घटनाएं हो चुकी हैं. महामारी, जंग, टैरिफ के झटके, ग्लोबल करेंसी को लेकर बेचैनी, और संसाधनों पर सरकार का बढ़ता नियंत्रण.

इसी बीच ऐसी टेक्नोलॉजी सामने आ गई है, जो पूरी दुनिया बदल रही है. ऐसे अनिश्चित माहौल में प्लानिंग कैसे की जाए? ऐसे वक्त में यह राहत की बात है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने तालियां बटोरने वाले रास्ते को नहीं चुना. जिस ऐतिहासिक मोड़ पर देश खड़ा है, वहां दिखावे से ज्यादा जरूरत ढांचे और दिशा की थी. 1 फरवरी को पेश किया गया यूनियन बजट इसी जरूरत को समझता है. 

इस हफ्ते की आवरण कथा में हम इसी बड़े रणनीतिक डिजाइन को खोलकर देख रहे हैं और समझने की को‌‌शिश कर रहे हैं कि इसके हिस्से कैसे आपस में जुड़ते हैं. पहले स्तर पर पूरी सोच को तीन बड़े हेड में समेटा जा सकता है. नई अर्थव्यवस्था, कनेक्टिविटी और मानव संसाधन. इसी के तहत वित्त मंत्री ने 10 सेक्टर चिह्नित किए हैं: बायोफार्मा, सेमीकंडक्टर, रेयर अर्थ, केमिकल पार्क, एमएसएमई, मेट्रो कॉरिडोर, लॉजिस्टिक्स, लैब टू वर्कस्टेशन, कृषि विविधता और ऑरेंज इकोनॉमी. इनमें से कुछ सेक्टर साफ तौर पर 21वीं सदी की जरूरत हैं.

अंदर दी गई हमारी राय आपको बताएगी कि सारे सेक्टर कैसे नए जमाने की मांगों को साधते हैं. यहां उभरती टेक्नोलॉजी है, रणनीतिक संसाधन हैं, भरोसेमंद परंपरागत सेक्टर हैं, बड़े रोजगार देने वाले क्षेत्र हैं और इंसानी पूंजी पर जोर है. पुरानी अर्थव्यवस्था के हिस्सों को बदलते समय के हिसाब से री-डिजाइन किया जा रहा है. यह ग्रिड एक सेक्टर को दूसरे से ऊपर नहीं रखती. इसका मकसद सबको एक बड़े विजन के नीचे लाना है: कुल मिलाकर यह भविष्य पर दांव है. यह सिर्फ पैसे बांटने वाला बजट नहीं है. यह दिशा तय करने वाला है. 

बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स से शुरुआत करें. यह वे दवाएं हैं जो जीवित कोशिकाओं से तैयार की जाती हैं. करीब 12 अरब डॉलर (एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा) की इस उभरती इंडस्ट्री को बजट में 10,000 करोड़ रुपए दिए गए हैं, ताकि भारत को ग्लोबल बायोफार्मा हब बनाया जा सके. इतनी ही रणनीतिक अहमियत इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 को भी दी गई है. इसके लिए रखे गए 1,000 करोड़ रुपए का मकसद सिर्फ चिप बनाना नहीं, बल्कि इन बेहद छोटे और जटिल डिजिटल पुर्जों की पूरी देसी सप्लाइ चेन खड़ी करना है. आत्मनिर्भरता का यही विचार रेयर अर्थ कॉरिडोर में भी दिखता है. जिन राज्यों में यह संसाधन मौजूद हैं, वहां खास कॉरिडोर बनाकर भारत को बाहरी सप्लायर के झटकों से बचाने की कोशिश है. खासकर चीन के एक्सपोर्ट बैन के बाद यह जरूरत और साफ हो गई थी. क्लाइमेट के मोर्चे पर कार्बन कैप्चर पहल को अगले पांच साल में 20,000 करोड़ रुपए मिलेंगे.

इससे इंडस्ट्री को बेहतर क्लाइमेट सॉल्यूशन और जीरो पॉल्यूशन टेक्नोलॉजी अपनाने में मदद मिलेगी. केमिकल पार्क इसी सोच का हिस्सा हैं, जिसमें पूरी सहायक सप्लाइ चेन को एक तय इलाके में क्लस्टर किया जाएगा. टियर-2 और टियर-3 शहरों के लिए भी एक बड़ा अर्बन रिन्यूअल प्लान है. वहीं यातायात को ग्रोथ का अहम इंजन माना गया है. इसका ठोस रूप है हाइ-स्पीड इंटर-सिटी एक्सप्रेसवे, फ्रेट कॉरिडोर और इनलैंड वॉटरवेज. देश के 7.6 करोड़ एमएसएमई को भी बजट में बहुत महत्व दिया गया है. 24,566 करोड़ रुपए के साथ एमएसएमई 2.0 का लक्ष्य है, इन्हें नए दौर के रोजगार इंजन में बदलना. इसका सीधा तालमेल शिक्षा से बैठता है. भावी हुनर और इनोवेशन पर जोर देकर यूनिवर्सिटी को इंडस्ट्री से जोड़ा जा रहा है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इस पूरी तस्वीर में कई जगह बहता दिखता है: खेती से लेकर टूरिज्म और डिजिटल क्रिएटिविटी तक.

इंडिया टुडे के अर्थशास्त्रियों के बोर्ड 'बाइट' की राय एक जैसी है, इससे दो बातें साफ तौर पर उभरकर आती हैं: पहली, यह बजट शोर और तुरंत खुश करने वाले ऐलानों से दूर रहकर लंबी अवधि की साफ-सुथरी सोच पर टिका है. दूसरी, इस सोच को वित्तीय जिम्मेदारी के दायरे में रहकर लागू किया गया है. सरकार की पूर्व प्रमुख आर्थिक सलाहकार इला पटनायक कहती हैं कि यह बजट ''उभरती टेक्नोलॉजी को लेकर गहरी समझ दिखाता है, जो भारत की पोस्ट-फॉसिल फ्यूल ग्रोथ रणनीति के स्तंभ हैं.'' उनका यह भी कहना है कि ऐसे समय में जब ''ग्लोबल सप्लाइ चेन में हो रहे बदलाव भारत के लिए पीढ़ियों में एक बार मिलने वाला मौका है,'' तब ''सीमित वित्तीय गुंजाइश का समझदारी से इस्तेमाल, बेलगाम खर्च से ज्यादा असरदार साबित हो सकता है.''

एक्सिस बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट नीलकंठ मिश्र इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि कैपेक्स की ग्रोथ को कुल खर्च से तेज रखा गया है. उनके मुताबिक, यह खर्च की मात्रा नहीं बल्कि खर्च की गुणवत्ता पर फोकस का संकेत है. हालांकि वे यह चेतावनी भी देते हैं कि कड़ी फिस्कल डिसिप्लिन के बावजूद बॉन्ड यील्ड बढ़ रही हैं. ऐसे में बेहतर कैश मैनेजमेंट की जरूरत है. रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की पूर्व सदस्य आशिमा गोयल भी बजट के इस रुख का स्वागत करती हैं. उनके मुताबिक, सरकार ने 'लोकलुभावन हथकंडों' से बचते हुए एक साफ ''गोल्डन रूल अपनाया है: कर्ज सिर्फ निवेश के लिए लिया जाए.''

इस पूरे बजट का विचार साफ है: कम में ज्यादा हासिल करना. हर रुपए से ज्यादा उत्पादकता निकालना. लेकिन यह मितव्ययिता सिर्फ बचत के लिए नहीं है. हर कदम नपा-तुला है ताकि आगे नए रास्ते खुल सकें. भारत के पास न समय ज्यादा है, न संसाधनों की फिजूलखर्ची की गुंजाइश. एक गलत अनुमान, एक चूका हुआ अवसर, या तात्कालिक वाहवाही के लिए खेला गया कोई गैर-जरूरी बड़ा दांव महंगा पड़ सकता है. इसके उलट, इस बजट में जो दिखता है, वह दूर की सोच है. असल मायने में, यह दस्तावेज अगले बीस वर्षों की भूमिका जैसा लगता है. सवाल सीधा है: 2047 में आजादी के सौ साल पूरे होने पर भारत क्या बनना चाहता है? यह बजट उस सवाल का ईमानदार जवाब देने की कोशिश करता है. अब इस पर अनुशासन के साथ अमल का इंतजार है.

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