
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने जनवरी की शुरुआत में एक आयोजन में कहा था कि अपने पड़ोस में भारत का प्रभाव जोर-जबरदस्ती पर नहीं बल्कि भरोसे, सहयोग और साझा खुशहाली पर टिका है. उन्होंने यह भी कहा कि भारत पड़ोसी देशों के अच्छे कामों का समर्थन करता है और बुरे कामों के लिए 'रेड लाइन’ तय करता है. भारत की पास-पड़ोस की नीति को देखने-समझने के लिए यह अच्छा चश्मा है.
नई दिल्ली ने बांग्लादेश में शेख हसीना की रुखसती के बाद आए नाजुक बदलावों को संयम और बातचीत के जरिए संभाला और श्रीलंका, नेपाल और मालदीव के साथ रिश्तों को आर्थिक उपायों से मजबूत किया. अलबत्ता पाकिस्तान के साथ रिश्ते बर्फीले बने रहे. दरअसल सुरक्षा का मसला सबसे ऊपर था जबकि इस्लामाबाद के 'सदाबहार दोस्त’ चीन के साथ रिश्ते सुधारने का काम अभी भी चल रहा है.
इस तरह भारत की 'पड़ोसी प्रथम’ नीति ने परिणामपरक सहयोग को प्राथमिकता दी, जिसे जनवरी के इंडिया टुडे देश का मिज़ाज सर्वे की भी मंजूरी मिल गई है—51 फीसद लोग मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में पड़ोसियों के साथ भारत के रिश्तों में सुधार आया है जबकि 34 फीसद ने कहा कि रिश्ते बिगड़े हैं.

ऐसे मोड़ पर जब विश्व व्यवस्था में उथलपुथल मची है, एनडीए सरकार ने अपनी रणनीतिक मजबूती बढ़ाई है—जापान और यूरोपीय संघ के साथ रिश्ते गहरे हुए और जी20 तथा ब्रिक्स के साथ जुड़ावों को सार्थकता मिली. हालांकि देश का मिज़ाज सर्वे के कम ही उत्तरदाताओं ने एनडीए के मातहत भारत की विदेश नीति का समग्रता में समर्थन किया: अच्छे-खासे 60 फीसद अब भी मानते हैं कि उसने भारत की वैश्विक हैसियत को मजबूत किया है, जो अगस्त 2025 के 66.7 फीसद और फरवरी 2025 के 72.6 फीसद से कम है.
नकारात्मक राय रखने वाले उत्तरदाता थोड़े बढ़कर 30 फीसद से ज्यादा हो गए हैं. क्या भारत के वैश्विक प्रभाव और प्रतिष्ठा में बढ़ोतरी हुई है? 57.7 फीसद का कहना है, हां, जो अगस्त के 60 फीसद से कम है.
बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों का नई दिल्ली ने नपा-तुला कूटनीतिक जवाब दिया, जिसमें अपनी चिंता तो जताई लेकिन टकरावपूर्ण रवैए से परहेज किया. देश का मिजाज सर्वे के ज्यादातर उत्तरदाता कहीं ज्यादा निर्णायक कार्रवाई के पक्ष में हैं, महज 25.1 फीसद का कहना है कि सरकार की कार्रवाई काफी है जबकि 46.6 फीसद मानते हैं कि ज्यादा मजबूत कदम उठाने की जरूरत है.
चीन के मामले में एहतियात
भारत और चीन सीधी उड़ानें फिर शुरू करके और व्यापार पर लगी पाबंदियों में ढील देकर दोतरफा रिश्तों को फिर पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं. सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि चीन से सटी भारत की सरहदें स्थिर हैं लेकिन लगातार सतर्क रहने की जरूरत है. जब चीन से रिश्तों के संदर्भ में भारत की प्राथमिकताओं को आंकने के लिए कहा गया तो उत्तरदाताओं ने भी ऐसी सतर्कता जाहिर की. 53.2 फीसद लोग सरहद पर सुरक्षा मजबूत करने के पक्ष में हैं जो अगस्त 2025 के 56.5 फीसद से कम है. केवल 20.9 फीसद ने व्यापार बढ़ाने में भरोसा जताया, जो पिछली बार के 22.3 फीसद के मुकाबले कम है.
ट्रंप का दूसरा कार्यकाल भारत-अमेरिका संबंधों के लिहाज से मुश्किल रहा क्योंकि उन्होंने भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया. भारत ने निर्यात के ठिकानों में इजाफा करके और ब्रिटेन, ओमान तथा अभी 27 जनवरी को यूरोपीय संघ के साथ हुए समझौतों समेत व्यापार समझौतों को पूरा करके अमेरिका को किए जाने वाले भारतीय निर्यातों पर 50 फीसद टैरिफ के असर को कुछ कम किया है. अभी भारत-अमेरिका व्यापार समझौता होना बाकी है.

फिर आश्चर्य क्या कि 53.6 फीसद उत्तरदाताओं ने ट्रंप 2.0 के दौरान रिश्ते बदतर होने की बात कही. 45 फीसद से ज्यादा लोगों का कहना है कि अगर अमेरिका के ऊंचे टैरिफ बने रहते हैं तो भारत को भी ऐसे ही जवाबी टैरिफ लगाने चाहिए जबकि 33.6 फीसद ने जीएसटी कटौती या ऐसे ही दूसरे उपायों का सुझाव दिया जिनसे बढ़े टैरिफ की भरपाई हो सके.
ट्रंप इसलिए भी नाराज हैं क्योंकि भारत ने मई में ऑपरेशन सिंदूर में 87 घंटे चले संघर्ष में भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम में उनकी कथित भूमिका मानने से इनकार कर दिया. ट्रंप ने जहां 60 से ज्यादा बार अपनी मध्यस्थता का दावा किया, भारत अपने इनकार पर मजबूती से कायम रहा. क्या सरकार ने असरदार ढंग से ट्रंप के दावों का प्रतिकार किया? देश का मिज़ाज सर्वे के प्रतिभागी बंटे हुए हैं. 38.6 फीसद मानते हैं कि भारत ने अच्छे से जवाब दिया, पर 37.6 फीसद इससे सहमत नहीं.
उधर, अमेरिका के हाथों वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को नार्को-टेररिज्म के आरोपों में पकड़ कर अपने देश ले जाने पर 33 फीसद का कहना है कि इस कार्रवाई से अंतरराष्ट्रीय कानून और राष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन हुआ, वहीं 22.4 फीसद ने अमेरिकी कार्रवाई का समर्थन किया.


