
जनवरी 2026 का इंडिया टुडे देश का मिज़ाज सर्वेक्षण विपक्ष को ऐसे मोड़ पर खड़ा बताता है, जो दिखने में जितना कमजोर लगता है, असल में उससे कहीं ज्यादा अस्थिर है. विपक्ष, खासकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस नाम की पार्टी अब कहीं भी निर्णायक ताकत के रूप में नहीं दिखती. विपक्ष बोलता लगातार है, जोरदार विरोध प्रदर्शन करता है और नैतिक रूप से श्रेष्ठ होने का दावा करता है, लेकिन इन सबके बावजूद इस सारे किए-धरे को सियासी असर में तब्दील कर पाने में नाकाम रहता है. वोटर विपक्ष से मुंह नहीं मोड़ रहे, वे उससे ज्यादा की उम्मीद करना छोड़ चुके हैं.
इस असहज संतुलन के केंद्र में अब भी राहुल गांधी हैं. वे विपक्ष का सबसे पहचाना जाने वाला चेहरा बने हुए हैं. सर्वे में 28.6 फीसद लोगों ने उन्हें विपक्षी गठबंधन का सबसे उपयुक्त नेता माना. यह आंकड़ा अगस्त 2025 के मुकाबले खास नहीं बदला है. लेकिन तस्वीर तब और साफ होती है, जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर उनके प्रदर्शन का आकलन किया जाता है. कुल 44 फीसद लोग उनके काम को 'शानदार' या 'अच्छा' मानते हैं जबकि करीब 31 फीसद उत्तरदाता इसे 'खराब' या 'बहुत खराब' बताते हैं. यह बंटवारा ऐसे नेतृत्व की तरफ इशारा करता है, जो एक तबके में तो जोश भरता है, लेकिन दूसरे को भरोसे में नहीं ले पाता.
कांग्रेस को लेकर धारणा में भी यही अनिश्चितता झलकती है. अगस्त 2025 में जहां 47.2 फीसद कांग्रेस को बतौर विपक्ष 'शानदार' या 'अच्छा' मानते थे, अब यह गिरकर 41 फीसद रह गया है. गिरावट तब और तेज दिखी जब पूछा गया कि क्या कांग्रेस ही असली विपक्ष है?
इस गिरावट की बड़ी वजह यह है कि कांग्रेस मुद्दे उठाने में माहिर है, लेकिन उसे वोट में तब्दील करने में कमजोर साबित हो रही है. 'वोट चोरी' का नैरेटिव इसकी सबसे उम्दा मिसाल है. संस्थागत पक्षपात, चुनावी मशीनरी पर सवाल और लोकतंत्र को कमजोर करने के आरोप विपक्षी राजनीति के केंद्र में हैं. बौद्धिक तौर पर यह तर्क असरदार लगते हैं, लेकिन चुनावी नतीजों में इसका फायदा नहीं दिखा. बिहार विधानसभा चुनाव इसका ठोस उदाहरण बने. कांग्रेस के भीतर नेतृत्व के प्रश्न पर खींचतान साफ दिखती है. मामूली गिरावट के बावजूद राहुल गांधी 35.6 प्रतिशत समर्थन के सात सबसे आगे बने हुए हैं जबकि मामूली सुधार के साथ प्रियंका गांधी को हासिल समर्थन 8.6 प्रतिशत है.
कांग्रेस की नाकामी ने इंडिया ब्लॉक के भीतर गणित बदल दिया है. अब 62 फीसद से ज्यादा उत्तरदाता कांग्रेस को गठबंधन की सबसे कमजोर कड़ी मानते हैं. यह साल चार बड़े चुनावी राज्यों-असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल- में उसकी जमीन पर लड़ने और टिकने की क्षमता परखेगा. जहां संगठन, गणबंधन का प्रबंधन और नेतृत्व की स्पष्टता नारेबाजी से ज्यादा मायने रखेगी.
समस्याएं हर तरफ
तमिलनाडु में कांग्रेस और द्रविड़ मुनेत्र कलगम (द्रमुक) का गठबंधन अब तक सबसे स्थिर रिश्तों में गिना जाता रहा है. लेकिन अब पार्टी के युवा नेता इस रिश्ते को नए सिरे से तय करने की बात कर रहे हैं. उनका मानना है कि मौजूदा ढांचे में कांग्रेस चुनावी तौर पर अप्रासंगिक होती जा रही है. केरल में कांग्रेस का मुकाबला वाम दलों से है, जो राष्ट्रीय स्तर पर उसके सहयोगी हैं. पिनाराई विजयन के नेतृत्व में वाम दल लगातार तीसरे कार्यकाल की तैयारी में है. लेकिन कांग्रेस गुटबाजी के बोझ तले दबी हुई है और सत्ता विरोधी माहौल को ठोस चुनावी विकल्प में बदल नहीं पा रही. असम में कांग्रेस ने गौरव गोगोई को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. वे पीढ़ीगत बदलाव, संसद में विश्वसनीयता और अपेक्षाकृत साफ छवि का प्रतिनिधित्व करते हैं. लेकिन इसके बावजूद पार्टी संगठनात्मक रूप से कमजोर और रणनीति के स्तर पर उलझी हुई है.

पश्चिम बंगाल इंडिया ब्लॉक के लिए शायद सबसे विरोधाभासी परीक्षा है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मुकाबला एक ऐसी भाजपा से है, जिसने संगठन को मजबूत किया है और ध्रुवीकरण की धार तेज की है. लेकिन यहीं विपक्ष की राष्ट्रीय एकता का दावा सबसे ज्यादा बिखरता दिखता है.
ये सारे पहलू मिलकर जनवरी 2026 के देश का मिज़ाज सर्वे में दिखी उस व्यापक भावना को समझाते हैं. वोटर एक साफ संदेश दे रहे हैं. सिर्फ आलोचना काफी नहीं है. सिर्फ एकता की घोषणाएं भी भरोसा नहीं जगातीं. जब तक विपक्ष इन खाइयों को नहीं पाटता, तब तक उसके लिए राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लौटना मुश्किल ही रहेगा.

