बहुत कम लोग जानते हैं कि उत्तर भारत की शादियों की तस्वीरों में आम तौर पर दिखने वाला एकदम झक सफेद नुकरा घोड़ा गहरा राज छिपाए हुए है. इसकी सफेद त्वचा कम मेलेनिन (पिगमेंट जो त्वचा को सूरज की किरणों से होने वाले नुक्सान से बचाता है) के कारण है.
कई नुकरा घोड़ों को जिंदगी भर त्वचा, आंखों और जेनेटिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है मगर देखने वालों को पता नहीं कि वे किस दर्द से गुजरते हैं और वे उन्हें लाखों रुपए में खरीद लेते हैं.
मगर राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र ऐसा खरीदार नहीं है. बीकानेर के अपने सेंटर में उसके विशेषज्ञ चार नुकरा घोड़ों के साथ इसे एक शुद्ध नस्ल के रूप में प्रमाणित करने और इसके इलाज तथा खरीद-बिक्री के मानक तय करने में जुटे हैं. यह नस्ल पड़ोसी पंजाब में लोकप्रिय है और डीएनए के लिहाज से मारवाड़ी नस्ल के करीब मानी जाती है.
यह भारतीय घोड़ों की बेहतरी के लिए इस केंद्र में चल रही कई पहलकदमियों में से एक है. उन्होंने आबादी बढ़ाने के लिए कृत्रिम गर्भाधान पर शोध किया, खासकर लुप्तप्राय नस्लों के लिए. उन्होंने वंश और बीमारियों के जोखिम को बेहतर ढंग से ट्रैक करने के लिए तकनीक विकसित की है. उन्होंने अपने कुछ काम को कमर्शियल भी बनाया है. वैज्ञानिकों ने सरोगेसी के जरिए दो मारवाड़ी और दो जंसकरी घोड़ों के बच्चे पैदा किए हैं. वरिष्ठ वैज्ञानिक तल्लूरी तिरुमलै राव कहते हैं, ''यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो हमें लुप्तप्राय प्रजातियों को बचाने में मदद कर सकती है.'' भ्रूण ट्रांसफर टेक्नोलॉजी से कमाई भी शुरू हुई है. इसे 4,00,000 रुपए प्रति पैक बेचा जा रहा है.
इस केंद्र की उपलब्धियों में एक डीएनए चिप बनाना शामिल है जो जीनोम में लाखों जगहों को स्कैन कर सकती है और जेनेटिक बदलावों का पता लगा सकती है. यह केंद्र देशभर में घोड़े के सीमेन के सैंपल उपलब्ध कराने और नेटवर्क मजबूत करने के लिए पशु चिकित्सकों को प्रशिक्षित कर रहा. यह केंद्र खुद हर साल लगभग ऐसी 400 डोज बेचता है, जिनका डीएनए पितृत्व साबित हो चुका है. एक डोज की बाजार दर 11,000 रु. से लेकर 7,00,000 रु. तक होती है.
दूसरे कदमों में इकोटूरिज्म से जागरूकता बढ़ाना और घोड़ों का म्यूजियम तथा घोड़ा गाड़ी की सवारी शुरू करना शामिल है.
लाभार्थी की राय
नेशनल कंफेडरेशन ऑफ इंडीजनस हॉर्स सोसाइटीज के उपाध्यक्ष रघुवेंद्र सिंह डूंडलोद ने कहा, ''घोड़ों की स्वदेशी नस्लों के लिए केंद्र की पहलकदमियों को देखते हुए अगला कदम इन्हें खेलों में अलग श्रेणी के रूप में वर्गीकृत करने का होना चाहिए क्योंकि उनकी विशेषताएं आयातित पोलो पोनी, वार्म-ब्लड और थॉरोब्रेड घोड़ों से भिन्न हैं.''
आखिर क्यों है यह एक रत्न
> सेहत को उन्नत बनाने के लिए इस केंद्र ने सरोगेसी के जरिए दो मारवाड़ी और दो जंसकरी अश्व पैदा किए हैं.
> एक एंब्रियो ट्रांसफर टेक्नोलॉजी का अब बाजार में उपयोग हो रहा और हर बिक्री पर 4,00,000 रुपए मिल रहे.
> इस केंद्र ने जीनोम को स्कैन करने और वंश/बीमारियों के जोखिम को ट्रैक करने के लिए एक डीएनए चिप तैयार किया.
> यह केंद्र देशभर में घोड़े के सीमेन की उपलब्धता बढ़ाने पर काम कर रहा है और हर साल 400 डोज बेचता है.

