भारत में मानसिक सेहत का संकट सबसे तीव्रता से दुविधा की स्थितियों में ही महसूस होता है: मदद कहां से लें, क्वालिटी को कैसे परखें और टूटी-बिखरी व्यवस्था में भरोसा किस पर करें. ये सवाल द श्री राम स्कूल्स की वाइस-चेयरपर्सन वासवी भरत राम के लिए उस वक्त निजी बन गए जब उनकी बेटी को मानसिक सेहत से जुड़ी परेशानियां होने लगीं. वे याद करती हैं, ''मैं उस सचाई का सामना करने को मजबूर हो गई जिसे मैंने कभी पूरी तरह समझा नहीं था.’’
हालांकि उनके परिवार को इलाज और देखभाल आखिरकार मिल गए, लेकिन इस तजुर्बे ने व्यवस्था के भीतर गैरबराबरी के बारे में उनकी जागरूकता को और गहरा कर दिया. भारत में मानसिक सेहत से जुड़े इलाज में लगातार चिंताजनक फासला बना हुआ है यानी उन लोगों का हिस्सा जिन्हें इलाज की जरूरत है लेकिन मिल नहीं पाता. यह 95 फीसद से ज्यादा आंका जाता है, और यह कमी कोविड के बाद के सालों में खासकर बच्चों और युवाओंं में बढ़कर और गहरी हो गई. वासवी कहती हैं, ''मानसिक सेहत खास लोगों की चिंता नहीं है; यह शिक्षा, आजीविका, जेंडर, गरीबी, उत्पादकता और भले-चंगे में भी दिखती है. देश का हर चौथा व्यक्ति इससे प्रभावित है. ऐसे में यह विकास का मूल मुद्दा है.’’
इसी समझ ने 2023 में इंडिया मेंटल हेल्थ एलायंस (आइएमएचए) की नींव रखी. अलग-थलग कार्यक्रम चलाने के बजाए इस एलायंस की परिकल्पना व्यवस्था के स्तर पर हस्तक्षेप के रूप में की गई. विभिन्न क्षेत्रों में फैला यह मंच सेवा प्रदाताओं, शोधकर्ताओं, परोपकारियों, नीति निर्माताओं और सबसे जरूरी, मानसिक बीमारी अनुभव कर चुके लोगों को साथ लाया. पहले ही साल इसका दायरा इस कदर बढ़ा कि 30 से ज्यादा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फैले 250 सदस्य संगठन इसमें शामिल हो गए, जिससे यह भारत का सबसे बड़ा मानसिक स्वास्थ्य अलायंस बन गया.
चिल्ड्रेन फर्स्ट की सह संस्थापक और आइएमएचए के संस्थापक समूह से जुड़ी बच्चों और किशोरों की मनोचिकित्सक डॉ. कविता अरोड़ा कहती हैं, ''भारत में मानसिक स्वास्थ्य का काम बहुत बड़ा और समुदाय से जुड़ा है और फिर भी अक्सर दिखाई नहीं देता जबकि परोपकारी लोगों के सामने असर डालने वाले निवेश के साफ रास्ते नहीं हैं. ज्यों-ज्यों जागरूकता और फैलाव बढ़ रहा है, चुनौती इसे रोकथाम, हस्तक्षेप और बाद की देखभाल जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर बढ़ाने की है.’’
इसीलिए यह एलायंस साझा ज्ञान को संजोने, संगठनों और डॉक्टरों की क्षमता को मजबूत बनाने और दोहराव के बजाए मिलकर काम करने को बढ़ावा देने पर काम कर रहा है. इसकी एक बड़ी पहल ओपन-सोर्स ऑनलाइन नॉलेज सेंटर है, जिसका मकसद परिवारों, डॉक्टरों, अगली कतार के वर्कर्स के लिए मानसिक सेहत की राह आसान बनाना है.
आइएमएचए के तौर-तरीकों को परिभाषित करने वाला सिद्धांत 'जिए गए अनुभव की विशेषज्ञता’ को सबसे आगे रखना है. वासवी बताती हैं, ''मानसिक सेहत को विशुद्ध बायोमेडिकल और विशेषज्ञ-संचालित चश्मों से नहीं देखा जा सकता. देखभाल मानवीय, भरोसेमंद और समुदायों के प्रति उत्साह भरी होनी चाहिए.’’ यह एलायंस पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़े भागीदार के तौर पर सरकारों के साथ काम करके मानसिक देखभाल अधिनियम 2017 के बेहतर अमल में मदद कर रहा है.
अपनी शुरुआत से ही आइएमएचए ने क्षमता निर्माण कार्यक्रम चलाकर, राष्ट्रीय सम्मेलनों की मेजबानी करके, सीखने-सिखाने की सुविधा देकर और परोपकारी पूंजी जुटाकर 130 से ज्यादा शहरों में फैले 1,600 से ज्यादा मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों तक पहुंच स्थापित की है. चुपचाप और मिल-जुलकर बना यह एलायंस अपने काम से यह पक्का कर रहा है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य को ढांचागत प्राथमिकता के रूप में लिया जाए जिससे वह लंबे समय से वंचित रहा है.ठ्ठ
संस्थापक की राय
हड़बड़ी दिखाने से मानसिक स्वास्थ्य नहीं सुधरता. इसके लिए धैर्य, भरोसा और सतत निवेश की जरूरत होती है. हमारी सफलता का पैमाना यह नहीं है कि हम कितनी बार ट्रेंड करते हैं बल्कि यह है कि देखरेख के रास्ते कितने स्पष्ट हैं, पेशेवरों को कितनी मदद हो रही है और मदद चाहने वालों को कम अड़चनों का सामना करना पड़े.
—वासवी भरत राम, संस्थापक ट्रस्टी, आइएमएचए
आखिर क्यों है यह एक रत्न
● 30 से ज्यादा राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में फैले 250 संगठनों को एकजुट किया, जिससे ज्ञान में साझेदारी हो पाई.
● क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के जरिए 130 से ज्यादा शहरों में 1,600 से ज्यादा मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों तक पहुंचा.
● मानसिक हेल्थकेयर अधिनियम के बेहतर अमल के लिए मानसिक बीमारी के जिए गए अनुभव से संपन्न लोगों की आवाज को केंद्र में रखा.

