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भूख से यूं दिलाते निजात

न जाने कितने भारतीय बच्चे भूख के कारण स्कूल नहीं जा रहे. अक्षय पात्र ऐसे बच्चों को भोजन उपलब्ध कराते हुए उन्हें बड़ी संख्या में स्कूल तक लाने के लिए प्रतिबद्ध.

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भूख के खिलाफ जंग बेंगलूरू में अक्षय पात्र किचन के स्टाफ के साथ चंचलपति दास (बाएं) और श्रीधर वेंकट
अपडेटेड 6 फ़रवरी , 2026

बंगलूरू में सुबह की पहली किरण फूटने से काफी पहले ही एक एसेंबली लाइन उत्पादन की अपनी प्रक्रिया शुरू कर देती है. इसकी पूरी प्रक्रिया गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की तर्ज पर काम करती है और तीन स्तरों पर ऊपर से नीचे की ओर चलती है. सबसे ऊपरी मंजिल पर रखे कई टन चावल, सब्जियों और खाना पकाने की दूसरी सामग्री को उसके ठीक नीचे वाली मंजिल पर भेजा जाता है, जहां विशेष मशीनें उन्हें पकाने से पहले की प्रक्रिया के लिए तैयार करती हैं.

फिर इन्हें एक पाइप के जरिए भाप से चलने वाले खाना पकाने के 10 बड़े बर्तनों में डाला जाता है, जहां 2,100 किलोग्राम गरमागरम चावल और 3,600 लीटर स्वादिष्ट सांभर तैयार होता है. हर बैच को तैयार होते ही इन्सुलेटेड स्टील कंटेनरों में डाला जाता है और एक कन्वेयर बेल्ट के सहारे बाहर इंतजार कर रही वैन तक पहुंचा दिया जाता है.

बेंगलूरू के बाहरी इलाके में स्थित यह रसोईघर सुबह 8 बजे तक बंद हो जाता है. यह अक्षय पात्र फाउंडेशन की तरफ से पूरे देश में संचालित 78 रसोईघरों में एक है, जो रोजाना 23,000 से ज्यादा सरकारी स्कूलों में 23.5 लाख बच्चों को भरपेट भोजन मुहैया हो, इसका पक्का इंतजाम कराना है. इसका उद्देश्य है: ''भारत में कोई भी बच्चा भूख के कारण शिक्षा से वंचित न रहे.’’ यह है भलाई की ताकत (अ फोर्स फॉर गुड).

बेंगलूरू के चिक्कजला स्थित अक्षय पात्र के सेंट्रलाइज्ड किचन के भीतर का दृश्य

अक्षय पात्र फाउंडेशन (एपीएफ) के सीईओ श्रीधर वेंकट कहते हैं, ''हमारे अक्षय पात्र में 9,000 'हंगर वॉरियर’ हैं, जिन्हें यह नाम इसलिए दिया गया क्योंकि वे स्कूली बच्चों के भूखे पेट होने की समस्या को दूर करते हैं.’’ एपीएफ एक गैर-लाभकारी संस्था की तरफ से संचालित है और दुनिया में सबसे बड़ा स्कूल मील कार्यक्रम चलाता है. एपीएफ सरकार के मिड डे मील कार्यक्रम (अब पीएम पोषण) के साथ साझेदारी करने वाला पहला गैर-सरकारी संगठन है.

एपीएफ ने वर्ष 2000 में बेंगलूरू के पांच स्कूलों के 1,500 बच्चों को भोजन कराने के साथ इसकी शुरुआत की थी. समय के साथ इसने कर्नाटक के हुबली में दुनिया के सबसे बड़े मेगा-किचन का निर्माण किया, जहां रोजाना 1,50,000 बच्चों को परोसने वाला भोजन तैयार होता है. करीब एक चौथाई सदी में इसने 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में केंद्रीय रसोईघर तैयार किए हैं.

इसका लक्ष्य 2030 तक प्रति दिन 30 लाख बच्चों को मिड डे मील और इसके अतिरिक्त 30 लाख बच्चों को सुबह का पौष्टिक नाश्ता (रेडी-टू-ईट नाश्ता) उपलब्ध कराना है. अभी यह 8,00,000 बच्चों को सुबह का पौष्टिक भोजन प्रदान करता है. वेंकट बताते हैं कि इसकी शुरुआत इसलिए की गई क्योंकि ''आज भी बहुत-से बच्चे खाली पेट स्कूल आते हैं.’’ उन्होंने साथ ही यह भी जोड़ा कि इससे स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ी है.

स्थानीय स्वाद को ध्यान में रखकर मेन्यू प्रति दिन और विभिन्न क्षेत्रों के हिसाब से बदलते रहते हैं, जैसे गुजरात में दाल-ढोकली से लेकर असम में पीठा तक मुहैया कराया जाता है. दक्षिण में चावल मुख्य भोजन रहता है तो उत्तर भारत के लोगों की पसंद को देखते हुए ऐसी स्वदेशी मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है जो एक घंटे में 40,000 रोटियां तैयार कर सकती हैं.

अक्षय पात्र एक ऋणमुक्त संस्था है, जिसके कार्यक्रम संचालन की करीब 55 फीसद लागत सरकार नकद और अनाज सब्सिडी के रूप में उपलब्ध कराती है. वहीं, बाकी राशि यह संस्था कॉर्पोरेट और व्यक्तिगत दानदाताओं के जरिए जुटाती है. रोजाना 60 लाख खुराक भोजन परोसने के अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए इस गैर-लाभकारी संस्था को प्रति वर्ष 2,500 करोड़ रुपए की जरूरत होगी, जो वित्त वर्ष 2025 के कुल व्यय 867 करोड़ रुपए से लगभग तीन गुना ज्यादा है. इसलिए, जैसा कि वेंकट कहते हैं कि इसके लिए पैसा जुटाना 'लगातार ट्रेडमिल पर दौड़ने’ जैसा है.

 आखिर क्यों है यह एक रत्न
●अक्षय पात्र का मूल उद्देश्य यही है कि 'भारत में कोई भी बच्चा भूख के कारण शिक्षा से वंचित न रहे’.
●अभी इसकी तरफ से 23,000 स्कूलों में 23 लाख से ज्यादा बच्चों को भोजन उपलब्ध कराया जाता है.
●इसने 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में 78 अत्याधुनिक रसोईघर स्थापित कर रखे हैं.
●अगला लक्ष्य: 30 लाख बच्चों को मिड डे मील और इसके अलावा 30 लाख बच्चों को सुबह का पौष्टिक आहार उपलब्ध कराना.

- अजय सुकुमारन

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