
बेयरफुट कॉलेज की शुरुआत एक सरल मगर दूरदर्शी सोच के साथ हुई. 1970 के दशक के आरंभ में, दून स्कूल और सेंट स्टीफंस कॉलेज के पूर्व छात्र संजीत 'बंकर’ रॉय ने भारत के सबसे सूखे इलाकों में जल संकट से निबटने की पहल की. मेयो कॉलेज के उनके एक रिश्तेदार ने उन्हें राजस्थान से आगाज करने की सलाह दी. रॉय ने अजमेर जिले के तिलोनिया गांव को चुना और स्थानीय लोगों को जल-संग्रहण और उसके तरीकों के बारे में जागरूक करने से काम की शुरुआत की.
उसी काम के दौरान रॉय को ग्रामीण इलाकों में लगातार बनी रहने वाली एक समस्या का सामना करना पड़ा. वह यह कि जब हैंडपंप या ट्यूबवेल खराब हो जाते थे तो गांव वालों को अक्सर शहर से मैकेनिक के आने का हफ्तों इंतजार करना पड़ता था. रॉय ने यह दिखाने के लिए खुद पंपों की मरम्मत शुरू की कि इस तरह का हुनर स्थानीय स्तर पर भी सीखा जा सकता है. उनका तर्क था कि ग्रामीण अगर साइकिल ठीक कर सकते हैं या लोहार का काम कर सकते हैं तो सही प्रशिक्षण मिलने पर वे बुनियादी मैकेनिकल काम भी संभाल सकते हैं.
सरकार के सहयोग से रॉय को तिलोनिया में उजाड़ पड़ी एक क्षय रोग (टीबी) अस्पताल की इमारत आवंटित की गई. आगे चलकर वही बेयरफुट कॉलेज कैंपस बना. बेयरफुट के मैकेनिकों को प्रशिक्षित करने के लिए तीन महीने का आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया. अहम बात यह कि इनमें महिलाएं शामिल थीं. शुरू में सरकार तकनीशियनों को न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता में छूट देने को लेकर अनिच्छुक थी. मगर बेयरफुट कॉलेज की शुरुआती कामयाबी ने अधिकारियों को मानदंडों में ढील देने के लिए राजी किया और आखिरकार इस मॉडल को पूरे राजस्थान में लागू किया गया.

कॉलेज ने जल्द ही जल और मैकेनिक काम से आगे कदम बढ़ाया. शिक्षकों की कमी की समस्या से निबटने के लिए बेयरफुट कॉलेज ने आठवीं पास महिलाओं और दसवीं पास पुरुषों को पांचवीं क्लास तक के बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित किया. धीरे-धीरे कक्षाओं में वयस्कों की तुलना में बच्चों की संक्चया ज्यादा हो गई और यह कार्यक्रम समुदाय की अगुआई वाली प्राथमिक शिक्षा के मॉडल में तब्दील हो गया जिसे अन्य जगहों पर भी अपनाया जा सकता था.
स्वास्थ्य सेवा भी बेयरफुट कॉलेज का एक अहम आधार बना. डॉक्टरों की भारी कमी वाले गांवों में स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने बुनियादी सेवाएं प्रदान कीं. इसके साथ ही रॉय की पत्नी और सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय ने महिलाओं को संगठित करने और अब तिलोनिया की पहचान बन चुके हस्तशिल्प को विकसति करने में अहम भूमिका निभाई. इसमें तोते, घंटियां और अन्य कलाकृतियां बनाना शामिल हैं. आगे चलकर यह बढ़ते हुए बढ़ईगीरी, बुनाई और चमड़े से संबंधित कामों तक फैल गया.
इसी दौरान बेयरफुट कॉलेज लगातार विकसित होता रहा. बाद के वर्षों में इस कॉलेज ने सौर ऊर्जा पर काम शुरू किया. यह ग्रामीण भारत में सौर ऊर्जा के प्रचलित होने से काफी पहले की बात है. बहुत कम या बिना औपचारिक शिक्षा हासिल करने वाली महिलाओं को भी आवासीय कार्यक्रमों के जरिए सौर इंजीनियर के रूप में प्रशिक्षित किया गया.
59 वर्षीया मास्टर ट्रेनर लीला कहती हैं, ''मैंने तीसरी कक्षा के बाद स्कूल छोड़ दिया था और सोचा नहीं था कि कोई औपचारिक काम कर पाऊंगी. मैंने 23 साल पहले बेयरफुट कॉलेज से जुड़कर सोलर तकनीक सीखी और 96 देशों की महिलाओं को प्रशिक्षित किया तथा चार देशों की यात्रा कर चुकी हूं.’’ धीरे-धीरे सौर ऊर्जा का विस्तार हुआ और भारत के अन्य राज्यों के अलावा अफ्रीकी देशों की महिलाएं प्रशिक्षण के लिए तिलोनिया आने लगीं.
आज रॉय के मार्गदर्शन और सीईओ सौक्वया किदांबी की अगुआई में बेयरफुट कॉलेज विभिन्न सरकारों के साथ मिलकर काम कर रहा है. हाल में कॉलेज ने प्रधानमंत्री के सोलर सखी कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए राजस्थान सरकार के साथ एमओयू हस्ताक्षर किया है. वे कहती हैं, ''बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा के विस्तार के साथ हमारा और सरकार का लक्ष्य दूरदराज के इलाकों में ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्रशिक्षण देना है ताकि कोई परेशानी खड़ी होने पर स्थानीय स्तर पर ही उसका समाधान हो सके.’’ और जब इसके विभिन्न कार्यक्रमों के कार्यबल में आधी हिस्सेदारी महिलाओं की है तो जाहिर है कि बदलाव की यह बयार अब थमने वाली नहीं है.
संस्थापक की राय
छह हफ्ते से लेकर तीन महीनों के आवासीय प्रशिक्षण की खातिर घर से बाहर जाने के लिए महिलाओं को राजी करना आसान नहीं होता मगर ज्यादातर महिलाएं सशक्त होकर लौटती हैं और अपने परिवारों के लिए स्थायी खुशहाली लेकर आती हैं.
संजीत बंकर रॉय, संस्थापक
आखिर क्यों है यह एक रत्न
●96 देशों की 3,000 महिलाओं को सौर इंजीनियरिंग का प्रशिक्षण दिया गया.
●कई राज्यों में 250 रात्रि स्कूल और 100 प्री-स्कूल संचालित हैं.
●ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के जरिए 3,00,000 मरीजों का इलाज किया गया.

