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नजर का नजराना

अत्याधुनिक मशीनों से लैस प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ और उम्दा डॉक्टर लाखों लोगों की आंखों की रोशनी लौटा रहे, वह भी ज्यादातर निशुल्क. अपनी स्थापना के मकसद को पूरा करने के लिए अरविंद आइ हॉस्पिटल दिन-रात इसमें जुटा.

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मदुरै के अरविंद आइ हॉस्पिटल में अपनी आंखों की जांच कराता एक मरीज
अपडेटेड 9 फ़रवरी , 2026

मदुरै में अरविंद आइ हॉस्पिटल के गलियारे तड़के ही मरीजों की हलचल से भर उठते हैं. कई बुजुर्ग धुर ग्रामीण इलाकों से आते हैं. वे बड़े सब्र से डॉक्टर से मिलने, आंख दिखाने और सर्जरी के वास्ते कतार में इंतजार करते रहते हैं. इस हॉस्पिटल की शुरुआत 11 बिस्तरों वाली आइ क्लिनिक के तौर पर हुई थी पर अब अरविंद आइ केयर सिस्टम का मुख्य केंद्र बन गया है. यह विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त संस्थान है और उसका साधारण-सा लक्ष्य है: बेवजह के अंधेपन को खत्म करना.

इसकी स्थापना 1976 में डॉ. वी के नाम से चर्चित रिटायर्ड सरकारी नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. गोविंदप्पा वेंकटस्वामी ने जरूरत के मद्देनजर पक्के इरादों से की थी. अरविंद आइ हॉस्पिटल के चेयरमैन डॉ. आर.डी. रवींद्रन कहते हैं, ''अंधापन दूर करने का विजन ही हमारे हर काम को गाइड करता है.’’ यह हॉस्पिटल डॉ. वी और उनके चार साथियों के पांच प्राइवेट नेत्र रोग क्लिनिकों के जोड़ से बना था. सभी ने मिलकर आंख के इलाज के लिए धर्मार्थ ट्रस्ट बनाया था.

साल भर के अंदर अरविंद हॉस्पिटल का फोकस दूरदराज के इलाकों तक लोगों को सेवा उपलब्ध कराने पर हो गया. 1977 तक जगह-जगह आइ कैंप लगाना उसके काम का मुख्य हिस्सा बन गया. डॉ. रवींद्रन बताते हैं, ''शुरुआत तो छोटी-सी पहल के तौर पर हुई थी लेकिन दायरा तेजी से बढ़ता गया. पिछले साल ही आइ कैंप में लगभग 1,10,000 सर्जरी की गई.’’

फिर, प्रबंधकों को एहसास हुआ कि सिर्फ कैंप लगाने से ग्रामीण लोगों की आंखों की समस्याएं दूर नहीं हो सकतीं. इसी वजह से 2004 में विजन सेंटर बनाए गए. ये गांवों में मौजूद सुविधाएं थीं. एक सेंटर से साल में लगभग 3,000 लोगों का इलाज होता है. अब अरविंद हॉस्पिटल के तमिलनाडु और पुदुच्चेरी में 120 विजन सेंटर हैं, जहां रोजाना लगभग 3,500 मरीजों का इलाज होता है.

डॉ. रवींद्रन बताते हैं, ''पिछले साल इन सेंटरों में 11 लाख से ज्यादा मरीजों का इलाज किया गया.’’ इन सेंटरों में प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ अरविंद के अस्पतालों के डॉक्टरों से डिजिटल रूप से जुड़े होते हैं. इनका मुख्य मकसद यह है कि करीब 10 फीसद मरीजों को ही सर्जरी या उन्नत जांच के लिए अस्पतालों में भेजने की जरूरत पड़े. वे कहते हैं, ''यहां लगभग 80 फीसद मरीजों का इलाज मुफ्त होता है, जिसका अर्थ है करीब एक करोड़ ग्रामीण आबादी.’’

इस पूरे सिस्टम को अरविंद की मैन्युफैक्चरिंग इकाई ऑरोलैब की मदद हासिल है, जो सालाना 35-40 लाख इंट्राओकुलर लेंस बनाती है. डॉ. रवींद्रन कहते हैं, ''हर दस सेकंड में दुनिया में कहीं न कहीं मदुरै में बने आइओएल का इस्तेमाल ऑपरेशन में होता है.’’

अरविंद के अस्पतालों और सेंटरों में हर दिन तकरीबन 20,000 मरीज आंख दिखाने पहुंचते हैं और 3,000 तक की सर्जरी होती है. फिर भी यह दुनिया में सबसे कम इन्फेक्शन रेट वाले उपक्रमों में है. लगभग पांच दशक के सफर के साथ अरविंद आइ हॉस्पिटल इसका सबूत है कि लोगों से हमदर्दी, बड़े पैमाने पर काम और क्लिनिकल उत्कृष्टता एक साथ बनाए रखी जा सकती है. और यह समन्वय जिंदगी बदल सकता है.

लाभार्थी की राय
तिरुचिरापल्ली के एक प्याज व्यापारी एस. वेल्लैअप्पन ने कहा कि आंख के अल्सर की वजह से मेरी आंखें लगभग चली ही गई थीं. उन्होंने अरविंद में सर्जरी की और मैं पूरी तरह ठीक हो गया. वहां जिस तरह से मेरा इलाज किया गया, वह बिल्कुल असाधारण किस्म का था.

आखिर क्यों है यह एक रत्न
●शुरुआती दिनों से ही अरविंद हॉस्पिटल ने आंखों के निशुल्क इलाज की व्यवस्था ग्रामीण इलाकों तक पहुंचाई.
●आइ कैंप लगाना उसके काम का एक अहम हिस्सा है, 2025 में 3,000 से ज्यादा कैंप में 1,10,000 सर्जरी हुई.
●यह संस्थान अपने 120 विजन सेंटर के जरिए 7,00,000 सर्जरी अंजाम देता है और 50-60 लाख मरीजों का इलाज करता है.
●अरविंद की मैन्युफैक्चरिंग इकाई ऑरोलैब सालाना 35-40 लाख इंट्राओकुलर लेंस दुनियाभर के मुकाबले बहुत कम लागत पर बनाती है.

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