करीब 20 सीनियर सिटिजन योग क्लास के लिए बैठे हैं. देखभाल करने वाले कई सारे नौजवान उनकी मदद कर रहे हैं. हफ्ते के कुछ दिन हालांकि वे फिजियोथेरेपी समेत फिटनेस से जुड़ी गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं लेकिन फुरसत के पल भी होते हैं, जैसे हर हफ्ते मूवी नाइट, बगीचों और रेस्तरां की सैर और भजन प्रस्तुतियां. आजी केयर में आपका स्वागत है.
यह उन बुजुर्गों के लिए असिस्टेड लिविंग सेंटर है जिन्हें डिमेंशिया या मनोभ्रंश है या ऑपरेशन के बाद की और पैलिएटिव केयर (दर्द निवारक देखभाल) की जरूरत है. नर्सों, जेरियाट्रिक काउंसलर और थेरेपिस्ट समेत भरे-पूरे स्टाफ के साथ यह सेंटर उन लोगों के लिए अच्छा विकल्प है जो अपने बीमार माता-पिता को समय नहीं दे पाते.
आजी केयर के संस्थापक सीईओ प्रसाद भिडे कहते हैं, ''मुझे हमेशा से पता था कि मैं लोगों की मदद करना और फर्क लाना चाहता हूं.’’ 2011 में उनकी मां तीन महीने तक बिस्तर पर थीं और उन्हें घर पर खास देखभाल की जरूरत थी. तभी भिडे ने पाया कि सीनियर हेल्थकेयर सेक्टर में भारी खालीपन है. वे कहते हैं, ''मैं यह देखकर चौंक गया कि घर पर बुजुर्गों के साथ काम कर रहे लोगों के लिए कोई प्रशिक्षण नहीं था.
ज्यादातर मामलों में घरेलू सहायकों से ही मदद ली जाती थी.’’ भिडे ने अमेरिका के सबसे बड़े सेवा प्रदाता बयाडा से घरेलू स्वास्थ्य सेवा में दो महीने का डिप्लोमा किया, बाजार को समझने के लिए भारत आए, और फिर अपनी अच्छी-खासी तनख्वाह की नौकरी छोड़कर आजी केयर की शुरुआत की. उन्होंने सबसे पहले केयरगिवर्स यानी देखभाल करने वालों के लिए प्रशिक्षण केंद्र खोला, जो न केवल उन्हें बुजुर्गों के सामने आने वाली चुनौतियों से जोड़ता था बल्कि घरेलू केयरगिवर के प्रति परिवारों का रवैया बदलता था ताकि उन्हें और ज्यादा पेशेवर गरिमा मिल सके.
भिडे यह भी कहते हैं, ''सब अपने घर के आराम में रहना चाहते हैं. यही पहली पसंद होती है. माता-पिता को असिस्टेड लिविंग सेंटर में रखने से अभी भी बहुत ज्यादा सामाजिक कलंक जुड़ा है. परिजन सोचते हैं, 'लोग क्या कहेंगे?’ हम उन्हें इसके फायदे समझाने के लिए सलाह-मशविरा देते हैं. बुजुर्ग की देखभाल के लिए ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो दयालु और धैर्यवान हों. भर्ती करने से पहले हमारे परिचारकों का पूरा मनोवैज्ञानिक आकलन किया जाता है.’’
भारत भर में और ज्यादा सेंटर खोलने की मांग ज्यों-ज्यों बढ़ रही है, भिडे ने फ्रेंचाइजी मॉडल अपनाने से अपने को रोक रखा है. वे कहते हैं, ''अच्छे काम की जरूरत है. हमें इसे 100 फीसद फूलप्रूफ बनाने की दरकार है.’’ अभी उनका ध्यान सीनियर सिटिजन के लिए विभिन्न उत्पादों की रिटेल शॉप खोलने पर है. शहरों में 55-80 साल के बुजुर्गों के लिए रिटायरमेंट होम्स डेवलप करने के लिए बिल्डरों से बातचीत चल रही है. वे कहते हैं, ''मैं उनके सोशल सर्कल को डिस्टर्ब नहीं करना चाहता.’’
एक दशक पहले भिडे इस क्षेत्र में अकेले सेनानी थे. तब से उन्होंने इस क्षेत्र को बढ़ते देखा है, लेकिन वे मानते हैं कि अभी बहुत काम करने की जरूरत है. भारत में बुजुर्गों की देखभाल करने वालों को पंजीकृत करने के लिए कोई परिषद नहीं है और बुजुर्ग देखभाल केंद्रों के कोई मानक भी नहीं हैं. भिडे नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स के साथ मिलकर दिशानिर्देश जारी करवाने और आजी केयर को उसका प्रमाणपत्र दिलवाने के लिए काम कर रहे हैं. वे कहते हैं, ''केयरगिवर उसी तरह अर्थव्यवस्था को बदल देंगे जैसे इंजीनियरों और नर्सों ने बदल दी. हम अगले 10 साल में बुढ़ाती आबादी वाले दूसरे देशों को केयरगिवर का निर्यात करना शुरू कर देंगे.’’
लाभार्थी की राय
मेरे पिता को बुढ़ापे से जुड़ी दिमागी दिक्कतें हैं. आजी केयर के अटेंडेंट ने धीरे-धीरे उनसे रिश्ता कायम किया. बुजुर्ग जिद्दी हो सकते हैं लेकिन जहां पहले वे कभी घर से नहीं निकलते थे, अब टहलने जाते हैं और क्रॉसवर्ड हल करते हैं. आप पैरेंट्स को खुश देखना चाहते हैं. 90 बरस की उम्र में मेरे पिता खुश हैं.
—संजय मधुकर किंबहुने,सीनियर आइटी प्रोफेशनल
आखिर क्यों है यह एक रत्न
●अपनी शुरुआत से अभी तक आजी केयर करीब 20,000 बुजुगों की सेवा कर चुका और 3,000 लोगों को देखभाल में प्रशिक्षित किया.
●यह पांच मदद वाले लिविंग सेंटर चलाता है. अगले पांच साल में 10 शहरों में 1,000 बेड तैयार करना उसका लक्ष्य.
●करीब 3,000 परिवारों को घर पर ही केयरगिवर मुहैया कराना भी मकसद.

