- शकुन बत्रा
पहली बार जब मैंने एआइ से बनी कोई फिल्म देखी, तो मेरी प्रतिक्रिया कुछ ऐसी थी: ''वाह, यह तो कमाल है'' और साथ ही यह भी कि ''रुको, कहीं हम मुसीबत में तो नहीं हैं?'' फिल्म खूबसूरत थी, थोड़ी अजीब भी, लेकिन अजीब तरह से खोखली. जैसे कोई सपना, जहां कैमरा बेहतरीन ढंग से चलता है, शानदार फ्रेम पकड़ता है, लेकिन किरदारों में जान नहीं दिखती.
फिलहाल एआइ और फिल्ममेकिंग के बारे में यह राय है. ताज्जुब और बेचैनी के बीच. और सच कहूं तो मैं इससे सहमत हूं क्योंकि हमने ऐसा बदलाव पहले कभी नहीं देखा. यह सिर्फ फिल्मों के बनने के तरीके का बदलाव नहीं बल्कि इस बात का भी है कि फिल्म कौन बना सकता है, कितनी तेजी से बना सकता है और किन औजारों के साथ.
मैं हमेशा कहता आया हूं: फिल्ममेकिंग सिर्फ एक माध्यम है. पेशा कहानी कहना है. कोई कलम से कहता है, कोई मंच से. मैंने कैमरा चुना. और अब, धीरे-धीरे, मैं खुद को एआइ टूल्स में प्रॉम्प्ट टाइप करते हुए पा रहा हूं, और स्क्रीन पर तस्वीरों को उभरते देखता हूं, जैसे कोई जादूगर अच्छी तरह से ट्रेन किए गए एल्गोरिद्म से खरगोश निकाल रहा हो. यह अजीब है. मैं सेट पर सौ लोगों के साथ काम करने का आदी हूं, लाइट्स की गूंज, वॉकी-टॉकी की आवाज, चाय का दौर. अभी मैं एक शांत कमरे में लैपटॉप के सामने बैठा हूं, मशीन से कह रहा हूं कि बिना कैमरा छुए हिमालय में एक कार चेज की कल्पना करो. यह अटपटा है. लेकिन हर अजीब चीज बुरी नहीं होती.
मैं जो समझ रहा हूं वह यह कि एआइ रचनात्मकता की जगह नहीं लेता, वह जमी-जमाई परिभाषाओं को चुनौती देता है. वह आपको विकल्प देता है. काम की रफ्तार बढ़ाता है. आपको ऐसे आइडिया आजमाने देता है, जिनका बजट आप पहले सोच भी नहीं सकते थे. लेकिन वह अर्थ नहीं देता. उसे नहीं पता कि किसी किरदार को जवाब देने से पहले रुकना क्यों जरूरी है. एआइ यह नहीं बताएगा कि कब खामोशी में ठहरना है, या कब बस एक नजर संवाद से ज्यादा कह जाती है. वैसे, यह डर असली है कि एआइ कहानीकारों की जगह ले लेगा, लेकिन ज्यादातर मामलों में वह सिर्फ यह उजागर करेगा कि सच में कहने के लिए किसके पास कुछ है, और कौन सिर्फ स्टाइल के सहारे कंटेंट को ढो रहा था.
बिना क्रू के सिनेमा
खासकर भारतीय फिल्मकारों के लिए एआइ का सबसे रोमांचक पहलू है उसकी पहुंच. शुरुआत करने की आजादी. बिना किसी स्टूडियो से हरी झंडी मिले, मूड बोर्ड बनाना, किसी सीन को पहले देख पाना, एक आइडिया को आजमाना. यह सचमुच फिल्म निर्माण को लोकतांत्रिक बना सकता है. मैंने देखा है कि युवा कहानीकार इन टूल्स का इस्तेमाल अपनी आवाज गढ़ने के लिए कर रहे हैं. यह ऊर्जा से भरा है. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. ऐसे कंटेंट की बाढ़ आएगी जो देखने में अच्छा होगा, पर कहेगा कुछ नहीं. इसे ही लोग 'एआइ स्लॉप' कह रहे हैं. ठीक-ठाक विजुअल्स, नकली भावनाएं, और आत्मा गायब. असली चुनौती होगी शोर से संकेत को अलग करना, सिर्फ आउटपुट से शिल्प को पहचानना.
एक और पेचीदा बात यह है कि इनमें से ज्यादातर एआइ टूल्स ग्लोबल यानी पश्चिमी डेटा पर ट्रेन किए गए हैं. इसका मतलब यह हुआ कि शुरुआती आउटपुट में भारतीय चेहरे, शरीर, बनावट और लय अक्सर गायब रहती है. शुरुआती टेस्ट में जो मैंने देखा, वह थोड़ा अजीब लगा. जैसे किसी हिंदी सीन को स्कैंडिनेवियन आर्ट फिल्म के फिल्टर से देखा जा रहा हो. अगर हम इन टूल्स को आकार नहीं देंगे, तो ये हमें सही ढंग से दिखाएंगे भी नहीं. भारतीय फिल्मकार, कलाकार, डिजाइनर, हम सबको इस ट्रेनिंग प्रक्रिया का हिस्सा बनना होगा. इसका मतलब है अपनी फिल्मों, अपनी कहानियों, अपनी इमेजरी का डेटा देना.
नैतिक सवाल
हाल ही में रांझणा के एआइ से बनाए गए एक वैकल्पिक एंडिंग को लेकर जो विवाद हुआ, उसने कुछ बुनियादी सवाल खड़े कर दिए. क्या कोई भी किसी और की फिल्म को उठाकर उसे रीमिक्स कर सकता है? उस नए वर्जन का मालिक कौन है? और जब मशीन हमारे अतीत को दोबारा लिखने लगे, तो उसका मतलब क्या होगा? मुझे नहीं लगता कि यही वह भविष्य है जो हम चाहते हैं. मेरे स्टूडियो जौस्का में हम एआइ वर्कफ्लो को आजमा रहे हैं, पर सवाल भी पूछ रहे हैं. नैतिक सीमाएं कहां खिंचती हैं? श्रेय किसे मिलेगा? क्या उचित प्रयोग है और क्या चोरी?
तो हम कहां खड़े हैं? मेरे पास सारे जवाब नहीं हैं. मैं भी इसे करते-करते समझ रहा हूं. कुछ दिन संभावनाएं मुझे उत्साहित करती हैं, कुछ दिन मुझे असली शूट की अव्यवस्था याद आती है. लेकिन एक बात पर मेरा भरोसा कायम है. मैं कहानी कहने की संभावनाओं को लेकर जिज्ञासु बना रहूंगा. आखिर में कहानी मायने रखती है. भावना मायने रखती है. और अगर हम उसे केंद्र में रखें, तो मुझे लगता है कि हम इन टूल्स का इस्तेमाल सिनेमा के जादू को बदलने के लिए नहीं, बल्कि ऐसे नए मंत्र खोजने के लिए कर पाएंगे, जिनके बारे में हमने कभी सोचा भी नहीं था.
खास बातें
एआइ रचनात्मकता की जगह नहीं लेगा. यह उसके दायरे को फैलाएगा, प्रयोग की आजादी देगा और फिल्ममेकिंग को ज्यादा लोगों तक पहुंचाएगा.
चूंकि ज्यादातर एआइ टूल्स पश्चिमी डेटा पर ट्रेन हुए हैं. ऐसे में भारतीय फिल्ममेकर्स को खुद आगे आकर अपनी विजुअल भाषा को गढ़ना होगा.
कॉपीराइट से जुड़े सवाल बेहद अहम हैं. ऐसे सुरक्षा उपाय जरूरी हैं जो रचनात्मकता की हिफाजत करें लेकिन प्रयोग का गला न घोंटें.
एआइ यह नहीं बताएगा कि कब खामोशी में ठहरना है. यह नहीं समझा पाएगा कि कब एक नजर, शब्दों से ज्यादा कह जाती है. हमें अभी और आगे भी खुद तय करना होगा कि संकेत क्या है और शोर क्या. शिल्प क्या है और सिर्फ आउटपुट क्या.
(शकुन बत्रा जौस्का फिल्म्स के संस्थापक हैं. वे गहराइयां (2022) समेत कई अन्य फिल्मों के निर्देशक हैं.)

