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तकनीकी-उपनिवेशवाद से खबरदार

भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी में भारी निवेश करना होगा, अपना खुद का डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करना बनाना बेहद अहम, वरना हमें दूनिया की बड़ी ताकतों पर निर्भर रहने का भारी जोखिम उठाना पड़ेगा.

future trends AI: tech infrastructure
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 29 जनवरी , 2026

- जयंत सिन्हा

विकसित भारत के निर्माण के लिए हरित भारत  भी बेहद जरूरी है. देश में लोगों की टिकाऊ समृद्धि आश्वस्त करने के लिए हमें न सिर्फ अपनी अर्थव्यवस्था को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अग्रणी स्थान दिलाना होगा, बल्कि अपने पर्यावरण को भी दुरुस्त करना होगा. हम यह हरित विकास मॉडल बड़े पैमाने पर वित्तीय निवेश के दम पर तीव्र तकनीकी प्रगति के जरिए ही हासिल कर सकते हैं.

हरित विकास मॉडल श्रम लागत में कटौती या चमचमाते इन्फ्रास्ट्रक्चर से तैयार नहीं होता, बल्कि अत्याधुनिक तकनीकों को अपनाने की रक्रतार और उनके बड़े पैमाने पर अमल से बनता है. अर्थव्यवस्था में संसाधनों के कुशल आवंटन की क्षमता से तैयार होता है. अमेरिका और चीन काफी तेजी से प्रौद्योगिकी मानकों, वैश्विक मूल्य शृंखलाओं, ऊर्जा ग्रिड और पूंजी प्रवाह को आकार दे रहे हैं.

जो वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अगले दौर को परिभाषित करेंगे. हम उनके साथ कदम मिलाकर नहीं चले तो विदेशी प्रौद्योगिकी, उपकरणों और पूंजी के मामले में पूरी तरह उन पर निर्भर होने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा. 

इस दौड़ में बने रहने के लिए बहुत ज्यादा पूंजी की जरूरत है. सिर्फ आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस की बात करें तो अमेरिका सरकारी और निजी क्षेत्र से एआइ, उन्नत कंप्यूटिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर, डेटा सेंटर, स्वच्छ ऊर्जा और संबंधित आपूर्ति शृंखलाओं में सालाना 500 अरब डॉलर (करीब 45 लाख करोड़ रुपए) का निवेश कर रहा है.

वहां अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, सेमीकंडक्टर, बायोसाइंस और अन्य उन्नत तकनीकों में भी सैकड़ों अरबों डॉलर निवेश हो रहा है. चीन भी स्वच्छ ऊर्जा, बैटरी और उन्नत उत्पादन में निरंतर निवेश के साथ एआइ और उससे जुड़ी अग्रणी प्रौद्योगिकियों में सालाना 100 अरब डॉलर (9 लाख करोड़ रुपए) या उससे अधिक का निवेश कर रहा है. दोनों देश दीर्घकालिक आर्थिक और रणनीतिक अगुआई के लिए प्रौद्योगिकी निवेश की इस होड़ में जीतना आवश्यक मानते हैं.

भारत तकनीकी आधारित विकास मॉडल में बड़े पैमाने पर निवेश के बिना वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धा में ज्यादा आगे नहीं पहुंच सकता. एआइ तो तस्वीर का केवल एक पहलू है. भारत को क्वांटम कंप्यूटिंग, बायोसाइंस, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, उन्नत तत्वों और विखंडन तथा संलयन दोनों तरह की ऊर्जा में भी निवेश करना चाहिए. उनमें हर क्षेत्र में दीर्घकालिक पूंजी निवेश और तकनीकी जोखिम को ध्यान में रखना और उससे पार पाने की ताकत बेहद जरूरी है.

इसके साथ, भारत के नेट जीरो लक्ष्य को हासिल करने के लिए बिजली, परिवहन, उद्योग और शहरी प्रणालियों में भी निरंतर निवेश करना होगा. अक्षय ऊर्जा क्षमता का विस्तार जारी रहना चाहिए. पारेषण, वितरण और भंडारण इन्फ्रास्ट्रक्चर को तेजी से बढ़ाना होगा. इस्पात, सीमेंट और रसायन जैसे क्षेत्रों में उत्सर्जन घटाना अब भी काफी खर्चीला और तकनीकी लिहाज से कमजोर है. उसमें स्वच्छ उत्पादन तरीकों की दरकार है. ये निवेश लंबी अवधि में बेहतर नतीजे देते हैं और उनमें निवेश अल्पकालिक साधनों के जरिए नहीं किया जा सकता. 

स्पष्ट है कि चुनौती कितनी बड़ी है. भारत का कॉर्पोरेट पूंजीगत व्यय हालिया वर्षों में लगभग 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष पर अपेक्षाकृत स्थिर रहा है, जबकि बैलेंस शीट मजबूत हुई है और व्यापक आर्थिक स्थिरता में सुधार हुआ है. हरित विकास के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अकेले कॉर्पोरेट निवेश में प्रति वर्ष कम से कम 100-200 अरब डॉलर (करीब 9-18 लाख करोड़ रुपए) की वृद्धि करनी होगी.

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि हमारे लिए एआइ इन्फ्रास्ट्रक्चर, डेटा केंद्रों, कंप्यूटिंग क्षमता और स्वच्छ ऊर्जा में प्रति वर्ष अरबों डॉलर का निवेश करना जरूरी है. हमें परमाणु विखंडन और संलयन जैसी अन्य अत्याधुनिक तकनीकों में भी निवेश करना होगा. उसके साथ-साथ, जैसा कि अध्ययनों से पता चलता है, भारत को जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा बदलाव में वार्षिक वृद्धिशील निवेश को जीडीपी के लगभग 2 फीसद या 2025 के डॉलर के संदर्भ में लगभग 80-85 अरब डॉलर (7.2 से 7.7 लाख करोड़ रुपए) तक बढ़ाने की आवश्यकता है.

कॉर्पोरेट के पूंजीगत व्यय में भारी बढ़ोतरी के लिए देश की वित्तीय प्रणाली को बिल्कुल नया स्वरूप देना होगा. देश में मौजूदा वित्तीय व्यवस्था में ज्यादातर छोटी से मध्यम अवधि के कर्ज, जायदाद गिरवी रखकर कर्ज और कम से कम जोखिम वाले कर्ज दिए जाते हैं. यह व्यवस्था विकास के पिछले चरणों के अनुरूप थी, जिसमें खासकर आर्थिक स्थिरता और इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण पर ज्यादा जोर दिया गया.

अब हमें ऐसी वित्तीय प्रणाली अपनाने की जरूरत है जो उच्च स्तरीय तकनीकी जोखिम, दीर्घकालिक और लगातार पूंजी प्रवाह के लिए कर्ज मुहैया कराए. सरल शब्दों में कहें तो हमारे निवेश प्रबंधकों को इतना कुशल होना चाहिए कि वे व्यक्तिगत तकनीकी दांवों पर अरबों डॉलर गंवाने का साहस रखें, और साथ ही एक बेहतर पोर्टफोलियो बनाकर शानदार रिटर्न प्राप्त कर सकें.

हालांकि, वैश्विक पूंजी महत्वपूर्ण है लेकिन सिर्फ उसके सहारे काम नहीं चल सकता. आज, वैश्विक निवेशक उन उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में पूंजी लगा रहे हैं जहां रिटर्न आकर्षक है और उन्हें जोखिमों का अंदाजा भी है. अमेरिका में एआइ इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश में उछाल इसका स्पष्ट उदाहरण है. वैश्विक पूंजी सघन बाजार और पूर्वानुमानित नियमन वाले स्थिर क्षेत्रों में उच्च रिटर्न दे सकती है. हमें इन वास्तविकताओं को समझना होगा.

प्रतिस्पर्धा के लिए, हमें अपने दीर्घकालिक घरेलू पूंजी भंडार को बढ़ाना होगा. यह पूंजी वैश्विक अस्थिरता के दौर में अधिक स्थिर रहती है और स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं के अनुरूप होती है. घरेलू वित्तीय बचत बढ़ रही है, जबकि पेंशन और बीमा के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं. हमारे पूंजी बाजार काफी परिपक्व हो चुके हैं. फिर भी, इस पूंजी का एक बड़ा हिस्सा अल्पावधि या कम जोखिम वाले साधनों में फंसा है. हमें वैकल्पिक निवेश निधि (एआइएफ) व्यवस्था में बदलाव लाना होगा ताकि टेक्नोलॉजी आधारित विकास और टिकाऊ इन्फ्रास्ट्रक्चर में दीर्घकालिक निवेश संभव हो सके.

एआइ के विस्तार से उसकी अहमियत का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है. आधार, यूपीआइ और एकाउंट एग्रीगेटर फ्रेमवर्क जैसी डिजिटल सार्वजनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में देश की सफलता दर्शाती है कि आम प्रचलन वाली प्रौद्योगिकी प्रणालियों को विकेंद्रित शासन व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाना चाहिए.

एआइ डिजिटल अर्थव्यवस्था की अगली कड़ी है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, वित्त, रसद और सार्वजनिक प्रशासन को आकार दे रही है. अगर गोपनीयता पर किसी और की निगाह रहती है या उसका नियंत्रण कहीं और से होता है तो उस पर पूरी तरह नजर रखना संभव नहीं होगा और जवाबदेही भी घट जाएगी. इसलिए अपना मजबूत तंत्र विकसित करना बेहद जरूरी है. 

एआइ में हमारा मौजूदा निवेश दुनिया में अगुआ बनने के लिहाज से जरूरी राशि की तुलना में बहुत कम है. सरकार के इंडियाएआइ मिशन को पांच वर्षों में करीब एक अरब डॉलर की मंजूरी मिली है; हम संभवत: प्रति वर्ष केवल 20 करोड़ डॉलर (1,803 करोड़ रुपए) ही खर्च कर पाएंगे. भारत की सबसे बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियां और इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियां इससे कहीं अधिक निवेश कर रही हैं.

टीसीएस, पीई फर्म टीपीजी (टेक्सास पैसिफिक ग्रुप) के साथ मिलकर अरबों डॉलर की एआइ डेटा सेंटर क्षमता का निर्माण कर रही है. माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और अमेजन ने भारत में क्लाउड और एआइ इन्फ्रास्ट्रक्चर के विस्तार के लिए अरबों डॉलर के दीर्घकालिक निवेश की घोषणा की है. रिलायंस ने गीगावाट स्तर की एआइ कंप्यूटिंग क्षमता विकसित करने की एक महत्वाकांक्षी योजना का अनावरण किया है, जबकि अदाणी की तरफ से हाइपरस्केल डेटा केंद्रों में भारी निवेश किया जा रहा है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि कुल मिलाकर यह निवेश सालाना लगभग 10 अरब डॉलर (90,000 करोड़ रुपए) तक है.

यकीनन 21वीं सदी में तकनीकी-उपनिवेशवाद इसी रूप में उभर सकता है. अधिकांश देश अपने डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में पर्याप्त निवेश नहीं कर पाएंगे. वैश्विक शन्न्तियां को बाहरी कंप्यूटिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर, मालिकाना मॉडल, छिपे मानक और घरेलू नियामक से परे पूंजी संरचना पर निर्भरता बढ़ाने का मौका मिलेगा. जो देश अपनी अत्याधुनिक तकनीकों में निवेश के लिए रकम नहीं लगा पाएंगे, वे कहीं और बनी प्रणालियों को उनकी कीमतों पर स्वीकारने को बाध्य होंगे. यह भारत का भविष्य नहीं हो सकता.

सही मायने में समृद्ध भारत तभी बनेगा जब हम विकसित और हरित भारत को एक साथ जोड़ेंगे. लेकिन हरित लक्ष्य तक पहुंचने के लिए भारत को अपनी वित्तीय प्रणाली में इस तरह बदलाव करना होगा कि जानते-समझते जोखिम उठाया जाए, सार्वजनिक और निजी बैलेंस शीट के बीच जोखिम का बंटवारा करे और दीर्घकालिक घरेलू पूंजी के बड़े भंडार जुटाए. हमारी महत्वाकांक्षाएं तभी पूरी हो सकती हैं जब हम अपनी वित्तीय प्रणाली में इस तरह के नए बदलाव लाएंगे. 

(पूर्व केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा एवरस्टोन ग्रुप के अध्यक्ष तथा लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में विजिटिंग प्रोफेसर हैं.)

खास बातें
- दुनिया में होड़ लेने के लिए भारत को अत्याधुनिक टेक्नोलॅजी में भारी निवेश करना होगा, और टेक्नोलॉजी के जोखिम भी उठाने होंगे.अमेरिका में एआइ पर निवेश सालाना 500 अरब डॉलर, चीन में 100 अरब डॉलर है, भारत में पांच साल में एक अरब या साल में 20 करोड़ डॉलर है.

- पूंजी बाजार अब परिपक्व हैं, अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी और टिकाऊ इन्फ्रास्ट्रक्चर में दीर्घावधिक निवेश की ओर जरूर बढ़ना चाहिए.

- जो देश अत्याधुनिक तकनीकों में निवेश के लिए रकम नहीं लगा पाएंगे, वे कहीं और बनी प्रणालियों को उनकी कीमतों पर अपनाने को मजबूर होंगे. यह तो भारत का भविष्य नहीं हो सकता.

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