
- अश्विनी वैष्णव
उन्नीस सौ पचास में गणितज्ञ और कंप्यूटर वैज्ञानिक ऐलन ट्यूरिंग ने अपने वक्त से बहुत आगे का एक सवाल पूछा था: क्या मशीनें सोच सकती हैं? तब का दौर ऐसा था, जब कंप्यूटर महज मेकैनिकल कैलकुलेटर की तरह काम करते थे. नंबर गिन सकते थे, विचार नहीं. ट्यूरिंग का तर्क था कि बुद्धि चेतना या भावनाओं से नहीं, बल्कि सीखने, तर्क करने और समझदारी से काम करने की क्षमता से तय होती है.
यह सोच उससे दशकों पहले आई, जब कंप्यूटिंग पावर, डेटा और एल्गोरिद्म इतने मजबूत नहीं थे कि उसे हकीकत बनाया जा सके. फिर भी इसी विचार ने दुनिया को बुद्धिमान मशीनों की अवधारणा से परिचित कराया. 2026 में देखें तो यह सफर इंसानी तरक्की के नए चरण—पांचवीं औद्योगिक क्रांति— में पहुंच चुका है, जो है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोजमर्रा की जिंदगी में उसका दखल.
पांचवीं औद्योगिक क्रांति
इंसानी तरक्की हमेशा तकनीक से आकार लेती रही है. बिजली ने हमारे रहने और काम करने का तरीका बदला. कंप्यूटर ने जानकारी को समझने और संभालने का तरीका बदला. इंटरनेट ने दुनिया को जोड़ दिया. फिर मोबाइल फोन आए और तकनीक हर किसी की जेब में पहुंच गई.
हर दौर ने समाज को नए सिरे से गढ़ा. अब हम पांचवीं औद्योगिक क्रांति में दाखिल हो रहे हैं. यहां एआइ इंसानों के साथ मिलकर अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र को बदल रहा है. यह पिछले एक दशक की डिजिटल तरक्की पर खड़ा है. इसका फोकस है इंसान और मशीन की साझेदारी. एआइ का इस्तेमाल खेती, स्वास्थ्य, जलवायु संकट और ऐसे कई क्षेत्रों में किया जा रहा है, जहां चुनौती लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाना है.
एआइ एक मल्टीप्लायर
एआइ को अक्सर ऐसी तकनीक कहा जाता है, जो अपने साथ मल्टीप्लायर असर लाती है. वजह यह है कि यह अकेले काम नहीं करती, बल्कि पहले से मौजूद सिस्टम को और मजबूत बनाती है. खेती, स्वास्थ्य, मैन्युफैक्चरिंग या राजकाज जैसे क्षेत्रों में जब एआइ का इस्तेमाल होता है तो प्रक्रियाएं तेज होती हैं, ज्यादा सटीक बनती हैं और कामकाज ज्यादा असरदार हो जाता है. किसी एक सेक्टर में सुधार का असर पूरी अर्थव्यवस्था में दिखता है.
उत्पादकता बढ़ती है, लागत घटती है और फैसले बेहतर होते हैं. जो देश एआइ को सही तरीके से विकसित और इस्तेमाल करते हैं, उन्हें प्रतिस्पर्धा और मजबूती दोनों में बढ़त मिलती है. इस मायने में एआइ अब ऐसी क्षमता बनता जा रहा है जो देश को मजबूत करता है और लोगों की जिंदगी बेहतर बनाता है.
हमारे प्रधानमंत्री लगातार जोर देते रहे हैं कि भारत में इस्तेमाल में और विकास में भी तकनीक का लोकतंत्रीकरण होना चाहिए. यह कुछ गिनी-चुनी कंपनियों, लोगों या देशों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. समाज के हर हिस्से को इसका फायदा मिलना चाहिए.
भारत की डिजिटल क्रांति भी इसी सोच की झलक देती है. यूपीआइ ने डिजिटल पेमेंट को खुला और सुलभ बनाकर बदल दिया. आधार ने बड़े पैमाने पर डिजिटल पहचान दी. भारत ने अपना 4जी और 5जी स्टैक खुद तैयार किया. एआइ को भी इसी रास्ते पर आगे बढ़ना होगा.
एआइ स्टैक: सबसे पहले ऐप्लिकेशन
हमारी समझ में एआइ स्टैक की पांच परतें होती हैं. इस स्टैक के सबसे ऊपर ऐप्लिकेशन लेयर है. 1960 और 70 के दशक में सेमीकंडक्टर ने आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की नींव रखी थी. लेकिन असली असर तब दिखा, जब उसका इस्तेमाल अलग-अलग इंडस्ट्री में बड़े पैमाने पर होने लगा.
इसी तरह इंटरनेट तब फायदा देने लगा, जब लोग और सिस्टम उसे बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने लगे. मोबाइल फोन ने समाज को तब बदला, जब वह रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया. सेंसर ने भी तब असली असर दिखाया, जब उसे भौतिक दुनिया को देखने और मापने के लिए बड़े पैमाने पर लगाया गया. उससे निकला डेटा असल समस्याएं सुलझाने में काम आया.

एआइ भी इसी रास्ते पर चलेगा. जो इसे सबसे ज्यादा और सबसे व्यापक तरीके से अपनाएंगे, वही इससे सबसे ज्यादा फायदा उठाएंगे. आज एआइ और एल्गोरिद्म समाज की प्रकृति तक को बदल रहे हैं. खेती, स्वास्थ्य, शिक्षा, मैन्युफैक्चरिंग, परिवहन, गवर्नेंस और जलवायु से जुड़े कामों तक, हर सेक्टर में उसका इस्तेमाल हो रहा है.
खेती में ही देखें तो एआइ आधारित बुआई की सलाह से आंध्र प्रदेश में किसानों की पैदावार 30 फीसद तक बढ़ी है. महाराष्ट्र में एआइ से जुड़े फैसलों ने गन्ने की पैदावार 50 फीसद तक बढ़ाने में मदद की है. एआइ दूध उत्पादन और पशुओं की सेहत सुधारने में भी मदद कर रहा है. अब पट्टे की शक्ल वाले आइओटी डिवाइस पशुओं के पोषण, प्रजनन और बीमारी के शुरुआती संकेतों पर नजर रखते हैं. कई राज्यों में इन समाधानों से मीथेन उत्सर्जन 30 फीसद तक घटा है.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में एआइ जिला अस्पतालों तक बड़े अस्पतालों जैसी क्षमताएं पहुंचा रहा है. भारतीय स्टार्टअप ऐसे एआइ स्क्रीनिंग टूल बना रहे हैं, जो मेडिकल इमेज और दूसरे क्लिनिकल डेटा का विश्लेषण कर डॉक्टरों की मदद करते हैं. एआइ दिमाग से जुड़े जटिल संकेतों को समझकर न्यूरोलॉजिकल बीमारियों की पहचान पहले और ज्यादा सटीक तरीके से करने में भी सहायक हो रहा है. यह साफ है कि जो देश तेजी से आगे बढ़ना चाहते हैं, उन्हें हर सेक्टर में एआइ का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल सीखना होगा. हम इसी रणनीति पर काम कर रहे हैं, जिसे एआइ डिफ्यूजन या बड़े स्तर पर एआइ अपनाना कहा जा सकता है.
भारत आज दुनिया के टॉप तीन स्टार्टअप इकोसिस्टम में शामिल है. अनुमान है कि करीब 90 फीसद स्टार्टअप किसी न किसी रूप में एआइ का इस्तेमाल कर रहे हैं. यह दिखाता है कि एआइ अब नवाचार के ताने-बाने में कितनी गहराई से जुड़ चुका है.
एआइ मॉडल: ऐप्लिकेशन का दिमाग
एआइ स्टैक की दूसरी परत है एआइ मॉडल. ऐप्लिकेशन जहां समाज पर दिखने वाला असर पैदा करते हैं, वहीं एआइ मॉडल वह दिमाग होता है, जो उन्हें ताकत देता है. शुरुआत में ओपनएआइ, गूगल और मेटा जैसे बड़े वैश्विक खिलाड़ियों ने इन फ्रंटियर मॉडलों को विकसित करने में बढ़त बनाई. इन मॉडलों ने दिखाया कि बड़े पैमाने पर एआइ क्या-क्या कर सकता है और तकनीक की सीमाओं को और आगे बढ़ाया.
लेकिन इन मॉडलों को ट्रेन करने और चलाने के लिए भारी कंप्यूटिंग संसाधनों की जरूरत पड़ी. इससे उन्हें बनाना और इस्तेमाल करना दोनों ही बेहद महंगा हो गया. नतीजतन, उन्नत एआइ क्षमताओं तक पहुंच कुछ गिनी-चुनी कंपनियों तक ही सीमित रह गई. इसके बाद इंजीनियरिंग के मोर्चे पर ऐसे नवाचार सामने आए, जिनसे चीन से बड़ी संख्या में नए मॉडल आए. इंजीनियरिंग और तकनीकी शोध में दशकों के निवेश ने इन नवाचारों को आगे बढ़ाया.
अब जैसे-जैसे मॉडल लेयर विकसित हो रहे हैं, दुनिया के कई देशों में बड़ी संख्या में ओपन-सोर्स मॉडल तैयार हो रहे हैं. ये मॉडल ट्रेनिंग और डिप्लॉयमेंट की लागत घटाकर एंट्री की बाधाओं को कम करते हैं. इससे एआइ का दायरा ज्यादा लोगों और संस्थाओं तक फैलने लगा है.
इन मॉडलों की मदद से स्टार्टअप, शोधकर्ता और डेवलपरों को हर बार शुरुआत से काम नहीं करना पड़ता. वे पहले से मौजूद काम पर आगे बढ़ सकते हैं. इससे इनोवेशन तेज होता है, पारदर्शिता बढ़ती है और भरोसा भी बनता है. साथ ही एआइ को स्थानीय भाषाओं, खास सेक्टरों और राष्ट्रीय नियमों के हिसाब से ढालना आसान हो जाता है.
लेकिन एआइ के दौर में हर देश के लिए अपने संप्रभु मॉडल होना भी जरूरी है. यही मॉडल डेटा सुरक्षा, सांस्कृतिक संदर्भ और रणनीतिक स्वतंत्रता तय करते हैं. इसी लक्ष्य को पाने के लिए इंडियाएआइ मिशन के तहत 12 स्वदेशी एआइ मॉडल विकसित किए जा रहे हैं. उनका इस्तेमाल भारतीय संदर्भ में बड़े पैमाने पर समस्याएं सुलझाने के लिए किया जाएगा.
इसी का एक उदाहरण है सर्वम एआइ, जो भारत को ध्यान में रखकर फुल-स्टैक एआइ मॉडल बना रहा है. ये मॉडल कई भारतीय भाषाओं में काम करेंगे और वॉयस कॉल, दस्तावेजों और नागरिक सेवाओं में लोगों की मदद करेंगे. ये सिस्टम भारतीय भाषाओं में बात समझेंगे और जवाब देंगे. इन मॉडलों को 22 भारतीय और छह संयुक्त राष्ट्र की भाषाओं में शुरू से ट्रेन किया गया है.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्योर.एआइ का मॉडल मेडिकल इमेज के जरिए टीबी, फेफड़ों के कैंसर और दूसरी बीमारियों की पहचान में डॉक्टरों की मदद कर रहा है और दुनिया भर में लाखों लोगों तक पहुंच चुका है. न्यूरोडीएक्स एआइ की मदद से दिमागी संकेतों यानी ईईजी का विश्लेषण कर मिर्गी और डिमेंशिया जैसे रोगों की प्रारंभिक पहचान पर काम कर रहा है. इससे दूर-दराज के अस्पतालों में भी विशेषज्ञ सेवाएं पहुंच सकेंगी.
वहीं भारतजेन भारतीय भाषाओं पर केंद्रित, खुले और भारत केंद्रित फाउंडेशन मॉडल तैयार कर रहा है, जिनमें 2 अरब से लेकर 10 खरब तक पैरामीटर होंगे. ये मॉडल रिसर्च, स्टार्टअप और पब्लिक सेक्टर के इस्तेमाल के लिए आधार बनेंगे. यह दिखाता है कि भारतीय स्टार्टअप किस तरह एआइ के जरिए किफायती, समावेशी और बड़े पैमाने पर असर डालने वाले समाधान तैयार कर रहे हैं.
कंप्यूट लेयर: दिमाग के पीछे की चिप्स
एआइ स्टैक की तीसरी परत है कंप्यूट लेयर, यानी वह ताकत जो मॉडल को ट्रेन करने और चलाने के लिए चाहिए. यह कंप्यूट उन्नत चिप्स से आता है. आज का एआइ बेहद ताकतवर प्रोसेसर पर टिका है. जैसे एनविडिया के ब्लैकवेल जीपीयू, गूगल के टीपीयू, एनपीयू और दूसरे सर्वर-ग्रेड चिप्स, जो ट्रेनिंग और इनफेरेंस को संभव बनाते हैं.
इंडियाएआइ मिशन के तहत भारतीय शोधकर्ताओं, स्टार्टअप और अकादमिक संस्थानों को अपने एआइ मॉडल ट्रेन करने में मदद दी जा रही है. करीब 40,000 जीपीयू सब्सिडी पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जिनकी औसत दर 65 रुपए प्रति घंटा रखी गई है. यह वैश्विक औसत लागत का करीब एक-तिहाई है. इसके साथ-साथ खास जरूरतों के हिसाब से कस्टम चिप्स भी विकसित किए जा रहे हैं, ताकि ट्रेनिंग और इनफेरेंस दोनों को बेहतर बनाया जा सके. भारत में भी कई स्टार्टअप खास एआइ चिप्स डिजाइन कर रहे हैं, जिससे देश की कंप्यूट क्षमता मजबूत हो रही है.
इस पूरी कोशिश को भारत के बढ़ते सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का सहारा मिल रहा है. अब तक 10 सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट को मंजूरी दी जा चुकी है. इनमें दो फैब यानी फैब्रिकेशन यूनिट और आठ एटीएमपी यूनिट शामिल हैं, जहां असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग होती है. इन प्रोजेक्ट से भारत में चिप डेवलपमेंट की क्षमता बनेगी और आने वाले समय में एआइ और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की कंप्यूट जरूरतों को देश के भीतर से ही पूरा किया जा सकेगा.
डेटा सेंटर: एआइ की इन्फ्रास्ट्रक्चर लेयर
डेटा सेंटर और नेटवर्क इन्फ्रास्ट्रक्चर एआइ स्टैक की चौथी परत है. प्रधानमंत्री के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत ने देश के 85 फीसद से ज्यादा हिस्से को 5जी सेवाओं से कवर कर लिया है. ऑप्टिकल फाइबर केबल पूरे देश में बिछ चुके हैं, जिससे नेटवर्क ज्यादा तेज और सक्षम हुआ है. अब डेटा सेंटर में करीब 6 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया जा रहा है, ताकि वह कंप्यूट ताकत खड़ी की जा सके, जो भारत को पांचवीं औद्योगिक क्रांति में आगे बढ़ाएगी.
डेटा सेंटर कैसे बनाए और चलाए जाएं, इसमें भी इनोवेशन हो रहा है. नए तरीके कूलिंग सिस्टम को बेहतर बना रहे हैं, पानी की खपत कम कर रहे हैं और कुल ऊर्जा इस्तेमाल को घटा रहे हैं. भारत के भीतर डेटा सेंटर क्षमता बढ़ाने से विदेशी डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर निर्भरता भी कम होती है. इससे यह तय होता है कि भारत के एआइ मॉडल, डेटा सेट और इनोवेशन की पूरी कड़ी देश की डिजिटल सीमा के भीतर रहे.
गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेजन जैसी वैश्विक टेक कंपनियों ने भारत में एआइ और डेटा सेंटर इन्फ्रास्ट्रक्चर में बड़े और लंबे समय के निवेश का ऐलान पहले ही कर दिया है. भारतीय कंपनियां भी इस क्षेत्र में भारी निवेश कर रही हैं.
यह सब भारत के डिजिटल भविष्य पर भरोसे को दिखाता है. डेटा सेंटर का विस्तार न सिर्फ तकनीकी मजबूती लाता है, हाइ-वैल्यू रोजगार पैदा करता है और इनोवेशन इकोसिस्टम को भी मजबूती देता है.
ऊर्जा: एआइ स्टैक की पांचवीं परत
ऊर्जा एआइ स्टैक की आखिरी और सबसे अहम परत है. एआइ डेटा सेंटर बहुत ज्यादा बिजली खपत करते हैं. जैसे-जैसे एआइ का इस्तेमाल बढ़ेगा, ज्यादा डेटा सेंटर और हाइ-कैपेसिटी बिजली की जरूरत भी बढ़ेगी. आगे डेटा सेंटर की बिजली मांग में तेज उछाल तय माना जा रहा है.
इसी वजह से टिकाऊ और भरोसेमंद ऊर्जा समाधान बेहद जरूरी हो जाते हैं. सौर और वायु ऊर्जा भारत में स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने का अहम हिस्सा हैं. लेकिन उनकी सीमा है. ये लगातार नहीं मिलतीं और बड़े एआइ सिस्टम और डेटा सेंटर को चौबीसों घंटे बिजली देने में सक्षम नहीं हैं.
यहीं परमाणु ऊर्जा की भूमिका अहम हो जाती है. यह साफ, स्थिर और लगातार बिजली देती है, जो एआइ इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए जरूरी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस चुनौती को पहले ही भांप लिया था. संसद से हाल ही में पास हुआ शांति ऐक्ट (सस्टेनेबल हारनेसिंग ऐंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) परमाणु ऊर्जा को एआइ और डेटा सेंटर के लिए साफ और चौबीसों घंटे मिलने वाले भरोसेमंद स्रोत के तौर पर स्थापित करता है.
जैसे-जैसे परमाणु तकनीक पर रिसर्च आगे बढ़ेगी, छोटे मॉड्यूलर और माइक्रो रिएक्टर सामने आएंगे. ये 15 से 50 मेगावॉट तक बिजली पैदा कर सकेंगे और कंटेनर के आकार की यूनिट में लगाए जा सकेंगे. इससे ऊंचे सुरक्षा मानकों के साथ साफ और भरोसेमंद ऊर्जा देना संभव होगा. ऊर्जा की भारी खपत वाले डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए यह ऑन-साइट समाधान के तौर पर काफी व्यावहारिक माना जा रहा है.
शांति ऐक्ट सरकारी-निजी साझेदारी और विदेशी निवेश का रास्ता भी खोलता है. इससे परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में पूंजी, तकनीक और विशेषज्ञता आएगी. फायदा एआइ और डेटा सेंटर के विकास को मिलेगा, देश की डिजिटल ताकत मजबूत होगी.
इंसानियत के लिए एआइ
हम एक-एक कदम करके पूरा एआइ स्टैक तैयार कर रहे हैं. मकसद है एआइ को बड़े पैमाने पर कामयाब बनाना, लेकिन भारत की हकीकत से जोड़कर. इसे इनोवेटरों के लिए किफायती बनाना और लोगों की जिंदगी में असली बदलाव लाना. ऐप्लिकेशन और मॉडल से लेकर कंप्यूट, इन्फ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा तक, स्टैक की हर परत इस सोच के साथ बनाई जा रही है कि रुकावटें कम हों और ज्यादा लोग एआइ को अपना सकें.
पिछले साल पेरिस एआइ ऐक्शन समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, ''इस सदी में एआइ मानवता के लिए कोड लिख रहा है.’’ हम इस स्टैक की हर परत को अपने लोगों के प्रति जिम्मेदारी के भाव के साथ खड़ा कर रहे हैं. यह पक्का किया जा रहा है कि जो कोड लिखा जा रहा है, वह हमारे संदर्भ में फिट बैठे, हमारे मूल्यों को दर्शाए और लोगों की असली समस्याओं का समाधान करे.

