—अरुण पुरी
अगर आपको सामयिक विषयों की थोड़ी भी जानकारी है तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) से परिचित होंगे. हर दौर में कोई न कोई ऐसी तकनीक आती है, जो दुनिया बदल देती है. लेकिन एआइ बाकी सब से अलग है. पहिया हो या कंप्यूटर, पहले की तकनीकों ने इंसानी क्षमता को आगे बढ़ाया. एआइ ने उसकी नकल शुरू कर दी है. यह सिर्फ रफ्तार बढ़ाने वाली नहीं, बल्कि चीजों को बदलने वाली ताकत भी है.
ठीक दो साल पहले जनवरी 2024 में, हमने नए साल के विशेष अंक में एआइ को जगह दी थी. तब एआइ बड़े पैमाने पर प्रयोग के दौर में था. चैटजीपीटी का चर्चित वर्जन मुश्किल से एक साल पुराना था. लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) ही एआइ की दुनिया का केंद्र माने जाते थे. लेकिन 2026 तक आते-आते एआइ की हदें चैटबॉट और स्मार्ट प्रॉम्प्ट से आगे निकल चुकी हैं. अब एआइ ऐसे सिस्टम की तरफ बढ़ रहा है, जो योजना बनाते हैं, तालमेल बैठाते हैं और खुद कार्रवाई करते हैं.
ऐसे मॉडल सामने आ रहे हैं, जो लगातार सीखते रहते हैं. ऐसी मशीनें बन रही हैं, जो भाषा, तस्वीरों और डेटा के बीच देख, सुन और समझकर फैसले ले सकती हैं. यह वही दौर है, जिसमें एआइ कामकाज संभालने लगा है, कोड लिख रहा है, फैक्ट्रियों को ऑप्टिमाइज कर रहा है, चुनावों को प्रभावित कर रहा है, कर्ज तय कर रहा है, बीमारियों को पहचान रहा है और हकीकत को निजी पसंद के हिसाब से गढ़ने के साथ उसकी नकल भी कर रहा है.
यह तेज बदलाव ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया खुद अनिश्चितता से घिरी है. भू-राजनीतिक बिखराव, जलवायु संकट, आबादी में बदलाव और युद्ध जैसे हालात पहले से मौजूद हैं. ऐसे में एआइ खतरे और संभावनाएं दोनों बढ़ाने वाला बन रहा है. अब सवाल यह नहीं है कि एआइ हमारी जिंदगी बदलेगा या नहीं, बल्कि वह कितनी गहराई तक बदलेगा, किस हद तक असमान असर डालेगा और आखिर किसके फायदे में होगा. भारत के लिए यह एक निर्णायक मोड़ है.
एआइ का इस्तेमाल देश भर में तेजी से फैल रहा है. टियर-2 शहरों से लेकर गांवों तक. करोड़ों यूजर, मोबाइल फर्स्ट संस्कृति और दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के साथ, भारत जो फैसले आज लेगा, वही तय करेंगे कि एआइ असमानता को और गहरा करेगा या सच में समावेशन और विकास का जरिया बनेगा. डेटा, गवर्नेंस, भाषा, श्रम और नैतिकता, हर मोर्चे पर लिए गए फैसले इसका भविष्य तय करेंगे.
यह विशेष अंक इन्हीं नई सीमाओं और दरारों को समझने की कोशिश करता है. इसमें देखा गया है कि एआइ कैसे दफ्तरों और फैक्ट्रियों, कला और चिकित्सा, बैंकिंग और सिनेमा, क्लासरूम और अदालतों को बदल रहा है. कैसे नागरिकों और प्लेटफॉर्म, सरकारों और कंपनियों के बीच शक्ति संतुलन को नए सिरे से गढ़ रहा है. सबसे अहम सवाल यही है कि मशीनों से बढ़ी हुई बुद्धि कहीं इंसानी समझ, गरिमा और लोकतांत्रिक पसंद की कीमत पर तो नहीं आ रही. यही इस विमर्श का केंद्र है.
इस निर्णायक मोड़ पर भारत कहां खड़ा है, इसे समझने के लिए हमने देश के बड़े नीति निर्माताओं, टेक्नोलॉजिस्ट, इंडस्ट्री लीडर्स और विद्वानों को साथ लिया है. इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव नीति का खाका सामने रखते हैं और बताते हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार किस तरह बड़े पैमाने पर स्वदेशी एआइ क्षमताएं खड़ी करने की तैयारी में है. उनके साथी आइआइटियन और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा दायरा और बड़ा करते हैं.
वे चेतावनी देते हैं कि अगर निजी निवेश गहराई से नहीं आया, तो भारत टेक्नो-कोलोनियलिज्म के नए दौर में फिसल सकता है. खासकर तब, जब एआइ मॉडल और उन्हें चलाने वाली बिजली, दोनों ही खरबों डॉलर निगल रहे हैं. मेटा के अरुण श्रीनिवास का तर्क है कि भारत का मोबाइल फर्स्ट इकोसिस्टम और मजबूत डिजिटल ढांचा उसे वैश्विक एआइ क्रांति में आगे बढऩे का असली मौका दे रहा है.
कई लेख यह भी बताते हैं कि इंडस्ट्री इस बदलाव को कैसे आगे बढ़ा रही है और खुद भी कैसे बदल रही है. वर्कफैब्रिक एआइ के संस्थापक रोहन मूर्ति 'मल्टीप्लेयर एआइ’ का विचार रखते हैं, जिसमें इंटेलिजेंट सिस्टम सिर्फ किसी व्यक्ति की मदद नहीं करते, बल्कि पूरी टीम से तालमेल बैठाते हैं. हुंडई इंडिया के डायरेक्टर गोपालकृष्णन सी.एस. बताते हैं कि डेटा आधारित तकनीक आधुनिक ऑटो मैन्युफैक्चरिंग की वैल्यू चेन में घुल चुकी है.
इससे नौकरियों पर खतरे की चर्चा अक्सर होती रहती है, लेकिन यह बात कई बार छूट जाती है कि एआइ सामाजिक जरूरतों को कैसे पूरा कर रहा है. क्वांटम साइंटिस्ट उत्पल चक्रवर्ती बताते हैं कि वित्त के क्षेत्र में कागजी दस्तावेजों पर टिके इंसानी फैसलों से हटकर अब व्यवहार और संदर्भ पर आधारित एल्गोरिद्मिक आकलन की तरफ एक खामोश लेकिन गहरा बदलाव हो रहा है. इससे उन लोगों तक भी कर्ज की पहुंच बढ़ रही है, जो अब तक सिस्टम से बाहर रखे गए थे.
माइक्रोसॉफ्ट की कालिका बाली भारतीय भाषाओं वाले एआइ पर ध्यान दिलाती हैं, जो शायद सबसे अहम मोर्चा है. यह तकनीक लाखों नए यूजर को पहली बार एआइ की दुनिया में ला सकती है और इसी प्रक्रिया में खुद एआइ को भी भारतीय संदर्भ के हिसाब से नया रूप दे सकती है.
कई लेख खतरों की तरफ भी आगाह करते हैं. हाल ही में ग्रोक पर अश्लील डीपफेक तस्वीरों को लेकर उठे विवाद के बाद यह चिंता और गहरी हुई है. इसी संदर्भ में डिजिटल फ्यूचर्स लैब की संस्थापक निदेशक उर्वशी अनेजा अंदेशा जताती हैं कि कहीं सारे फैसले बड़ी टेक कंपनियों के हवाले न कर दिए जाएं. स्टैनफोर्ड इंटरनेट ऑब्जर्वेटरी की पूर्व प्रमुख रेनी डिरेस्टा इस सवाल को लोकतंत्र तक ले जाती हैं और चुनाव में डीपफेक की भूमिका पर नजर डालती हैं.
यह अंक न तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के पक्ष में तर्क है और न उसके खिलाफ. यह इस पर स्पष्ट रूप से सोचने का न्योता है कि हम अपने भीतर से कितना हिस्सा ऑटोमेट करना चाहते हैं और कितना हिस्सा हमें जानबूझकर बचाकर रखना होगा.

