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बुलंद और बेलगाम

डोनाल्ड ट्रंप के भारी उथल-पुथल भरे कदमों के बावजूद देश में चुनावी जीत से उत्साहित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुधारों की एक्सप्रेस की रफ्तार तेज की

नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो)
नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो)
अपडेटेड 20 जनवरी , 2026

वर्ष 2025 की शुरुआत में नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप, दोनों की मजबूरियां काफी हद तक एक जैसी थीं. दोनों को ऐसे मजबूत नेताओं के तौर पर देखा जा रहा था, जिन्होंने अपने-अपने देशों में अब तक की राजनीति से अलग रास्ता चुना था. उम्र के सात दशक पार कर चुके इन दोनों नेताओं के लिए सवाल अब सिर्फ राजनैतिक वजूद कायम रखने का नहीं था, बल्कि ऐसी विरासत छोड़ने का था जो टिकाऊ भी हो और असरदार भी.

पचहत्तर साल के मोदी ने 2024 के आम चुनाव में तीसरी बार लगातार जीत हासिल कर इतिहास रच दिया. इस तरह वे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड के बराबर आ गए. लेकिन एक अहम फर्क था. नेहरू के दौर की कांग्रेस के उलट, मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को तीसरे कार्यकाल में लोकसभा में अपने दम पर बहुमत नहीं मिला. पार्टी को 543 में से 240 सीटें मिलीं, यानी जरूरी 272 के आंकड़े से 32 कम.

प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के दस साल के कार्यकाल में यह पहला मौका था जब उनको सरकार बनाने के लिए अपने प्रमुख सहयोगियों पर निर्भर होना पड़ा. आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) और बिहार में नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) या जद (यू) के सहारे ही एनडीए सरकार बनी.

माना जा रहा था कि इससे मोदी की बड़े और निर्णायक सुधार करने की क्षमता सीमित हो सकती है लेकिन 2025 में मोदी ने इस सियासी झटके को अपने रास्ते में नहीं आने दिया. उन्होंने ऐसे सुधारों की शुरुआत की, जिनका मकसद देश को विकसित भारत के रास्ते पर मजबूती से आगे बढ़ाना था. लक्ष्य साफ था: आजादी के 100वें साल में 2047 तक भारत को विकसित देशों की चुनिंदा कतार में खड़ा करना.

अमेरिका में 79 वर्षीय डोनाल्ड ट्रंप ने नवंबर 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में जोरदार वापसी की. वे 132 साल में पहले ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति बने, जिन्होंने एक अंतराल के बाद चुनाव जीतकर व्हाइट हाउस में वापसी की. उनकी जीत भी बेहद निर्णायक थी. कुल 538 में से 312 इलेक्टोरल वोट उनके खाते में गए, जो राष्ट्रपति बनने के लिए जरूरी 270 के आंकड़े से कहीं ज्यादा थे. ट्रंप की इस जीत को अमेरिकी समाज के गहरे जनसंख्यागत, सांस्कृतिक और सभ्यतागत पलटवार के रूप में देखा गया.

13 फरवरी, 2025 को ओवल ऑफिस में मोदी और ट्रंप

यह पलटवार उन श्वेत ईसाई राष्ट्रवादी समूहों का था, जो बराक ओबामा और जो बाइडन जैसे डेमोक्रेटिक राष्ट्रपतियों के कार्यकाल में तेजी से उभरती बहु-नस्ली और बहु-धार्मिक अमेरिका की पहचान से असहज महसूस कर रहे थे. ट्रंप ने 50 में से 31 राज्यों में जीत दर्ज की. इतना ही नहीं, उनके नेतृत्व में रिपब्लिकन पार्टी ने सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्ज, दोनों में बहुमत हासिल कर लिया. इससे ट्रंप को इतनी सियासी ताकत मिल गई कि वे अपने दूसरे कार्यकाल में 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (एमएजीए या मागा) के अपने विवादास्पद एजेंडे को पूरे जोरशोर से आगे बढ़ा सकें.

जैसे ही दुनिया इस सदी की पहली चौथाई के अंतिम वर्ष में दाखिल हुई, मोदी और ट्रंप के लक्ष्य हासिल करने के रास्ते न सिर्फ एक-दूसरे से टकराए, बल्कि कई मायनों में एक-दूसरे के उलट भी साबित हुए. साल के अंत तक यह टकराव भारत-अमेरिका संबंधों में खिंचाव पैदा करने लगा.

वे संबंध, जिन्होंने पिछले दो दशकों में इतिहास की हिचकिचाहट को पीछे छोड़कर मजबूती हासिल की थी. इसके बावजूद, दोनों देशों के रिश्तों में दिख रहे तनाव के बीच ट्रंप और मोदी ने यह दिखावा बनाए रखा कि वे अब भी, अमेरिकी राष्ट्रपति के शब्दों में, 'अच्छे दोस्त’ हैं. यही 'दोस्ती’ 2025 के दौरान भारत की घरेलू और विदेश नीति की बहसों पर छाई रही, भले ही इससे किसी भी देश को कोई ठोस लाभ मिलता नहीं दिखा.

मोदी की रिफॉर्म एक्सप्रेस
वर्ष 2025 की शुरुआत में यह अंदेशा नहीं था कि दोनों नेताओं के बीच हालात इतनी तेजी से बिगड़ेंगे. उस वक्त मोदी और ट्रंप, दोनों ही घरेलू आर्थिक सुधारों पर पूरी तरह फोकस किए हुए दिख रहे थे. नवंबर 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत ने मोदी को फिर से आत्मविश्वास दिया और उन्होंने जिसे अपनी 'रिफॉर्म एक्सप्रेस’ कहा, उसकी रफ्तार बढ़ा दी. इसका पहला संकेत 1 फरवरी को मिला, जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में मध्य वर्ग को बड़ी राहत दी.

उन्होंने आयकर की शून्य कर देनदारी की सीमा 7 लाख रुपए से बढ़ाकर 12.75 लाख रुपए सालाना कर दी. इस फैसले से करीब एक करोड़ करदाताओं, यानी देश के कुल करदाताओं के एक-तिहाई से ज्यादा को सीधा फायदा मिला. उनके हाथ में खर्च करने के लिए ज्यादा पैसा आया, जिससे वस्तुओं और सेवाओं की मांग बढ़ने की उम्मीद जगी.

यह बजट मोदी सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं में एक बड़े बदलाव का संकेत भी था. बीते वर्षों में सरकार का जोर मुख्य रूप से ऊर्जा और परिवहन जैसे क्षेत्रों में भारी सार्वजनिक निवेश कर बुनियादी ढांचा खड़ा कर आपू‌र्ति पक्ष की अर्थव्यवस्था पर रहा था. लेकिन 2025 में सरकार ने मांग और खपत बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाए. उम्मीद यह थी कि इससे मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र में निजी निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे.

नाम जाहिर न करने की शर्त पर बात करते हुए एक विशेषज्ञ इसे साफ शब्दों में स्पष्ट करते हैं, ''भाजपा को अपने दम पर लोकसभा में बहुमत न मिलने की सबसे बड़ी वजह रोजगार थी. सुधारों को इलाज माना गया और 2025 में उन्हें लागू करने की तात्कालिकता एक मजबूरी बन गई. रिफॉर्म एक्सप्रेस के लिए यह 'अभी नहीं तो कभी नहीं’ जैसा मौका था.’’

मोदी सरकार ने सितंबर में उस समय एक और बड़ा कदम उठाया जब काफी अरसे से लंबित और बेहद जरूरी माल और सेवा कर (जीएसटी) को तर्कसंगत बनाने का काम आगे बढ़ाया गया. प्रक्रिया को सरल बनाकर टैक्स स्लैब को पांच से घटाकर तीन कर दिया गया. इससे सरकार ने साफ संकेत दिया कि वह खपत बढ़ाने के लिए राजस्व में कुछ कमी स्वीकार करने को तैयार है. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) ने भी सरकार की इस मंशा का समर्थन किया.

2 अप्रैल, 2025 को ट्रंप ने अपनी बराबरी के टैरिफ का ऐलान किया

उसने 2025 के दौरान अल्पकालिक ऋण के लिए रेपो दर में कुल 1.25 फीसद अऌंक की बड़ी कटौती की, जिससे यह 6.50 फीसद से घटकर 5.25 फीसद पर आ गई. इसका सीधा असर यह हुआ कि बैंकों को कारोबार और आवास दोनों के लिए कर्ज सस्ता करने की गुंजाइश मिली. वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में इसके नतीजे भी दिखने लगे. जीडीपी वृद्धि में तेज उछाल आया और देश ने 8.2 फीसद की दमदार वृद्धि दर्ज की, जिससे वह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बन गया. ‌रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इसे भारत का 'गोल्डीलॉक्स मोमेंट’ बताया, यानी एक ऐसा दुर्लभ मौका, जब विकास दर ऊंची हो और महंगाई नियंत्रित रहे.

रफ्तार पर जोर
नवंबर में बिहार में भाजपा और जद (यू) की बड़ी जीत के बाद मोदी ने सुधारों के पैडल पर और जोर डाला. उसके फौरन बाद सरकार ने काफी वन्न्त से लंबित श्रम संहिताओं (लेबर कोड) को लागू करने का ऐलान किया. 29 पुराने और बिखरे श्रम कानूनों को समेटकर चार नई, एकरूप संहिताएं बनाई गईं, जिनमें मजदूरी, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और कार्य स्थितियों को सरल और स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया. इसका मकसद साफ था: रोजगार सृजन को रफ्तार देना, साथ ही श्रमिकों की सुरक्षा पक्की करना.

साल के अंत में संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान आर्थिक सुधारों की एक और तेज लहर देखने को मिली. सरकार ने यह संकेत देते हुए कि देश अपनी दीर्घकालिक वित्तीय संरचना में वैश्विक पूंजी पर भरोसा करने को तैयार है, बीमा क्षेत्र को 100 फीसद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) के लिए खोल दिया. इसके साथ ही सरकार ने सस्टेनेबल हार्नेसिंग ऐंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (एसएचएनएनटीआइ या शांति) विधेयक पारित किया, जिसने दशकों पुराने एटमी कानूनों में व्यापक बदलाव किए. इस कानून ने एटमी ऊर्जा क्षेत्र में राज्य के एकाधिकार को खत्म करके निजी क्षेत्र की पूर्ण भागीदारी का रास्ता खोला और नागरिक दायित्व से जुड़े उन मुद्दों को भी सुलझाया, जो अब तक विदेशी निवेशकों को भारत से दूर रखते थे.

कल्याणकारी कार्यक्रमों के मोर्चे पर भी मोदी सरकार ने एक साहसिक कदम उठाया. मनमोहन सिंह के दौर की महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को नया नाम दिया गया—वीबी-जी-राम-जी (विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार ऐंड आजीविका मिशन-ग्रामीण). इसे एनडीए की एकदम नई रोजगार योजना के तौर पर पेश करके काम की गारंटी को 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया लेकिन साथ ही राज्यों की हिस्सेदारी 10 फीसद से बढ़ाकर 40 फीसद कर दी गई.

विपक्ष ने इस बदले हुए संक्षिप्त नाम को मोदी सरकार की उस कोशिश के रूप में देखा, जिसके तहत वह कल्याणकारी योजनाओं को अपनी व्यापक हिंदुत्व राजनीति के फ्रेम में ढालना चाहती है, और राज्यों पर बढ़ते वित्तीय बोझ को लेकर आलोचना की. इस मुद्दे पर सरकार का बचाव यही था कि यह योजना दो दशक पुरानी हो चुकी थी और उसमें जवाबदेही बढ़ाने, लीकेज रोकने और टिकाऊ ढांचे बनाने के लिए सुधार जरूरी था.

साल के अंत तक यह पूरी तरह से साफ हो गया कि मोदी राजनैतिक मजबूरियों को अपनी आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के आड़े नहीं आने देंगे. प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव डॉ. प्रमोद मिश्र के शब्दों में, ''ये ऐतिहासिक सुधार हैं, जिनके लिए पक्की राजनैतिक इच्छाशक्ति जरूरी होती है और जिनमें पर्याप्त जोखिम भी हैं, लेकिन प्रधानमंत्री उन्हें जमीन पर लाने को तैयार हैं क्योंकि देश के विकास और तेज गति से आर्थिक बढ़ोतरी के लिए ये बेहद जरूरी हैं. इस तरह प्रधानमंत्री जिस रिफॉर्म एक्सप्रेस की बात करते हैं, वह पूरी रफ्तार से आगे बढ़ रही है और रफ्तार पकड़ती जाएगी.’’

13 मई को ऑपरेशन सिंदूर के बाद आदमपुर वायु सेना ठिकाने पर मोदी

मांग बढ़ाने पर नए सिरे से दिए जा रहे जोर की वजह क्या है? इस पर मिश्र का जवाब भी बेहिचक और साफ-साफ है: ''दरअसल यह आपूर्ति या मांग में से किसी एक क्षेत्र को चुनने का सवाल ही नहीं है. हम इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बढ़ा रहे हैं और परफॉर्मेंस-लिंक्ड इंसेंटिव जैसे कदमों के जरिए आपूर्ति पक्ष को लगातार मजबूत कर रहे हैं, लेकिन उसी के साथ-साथ मांग बढ़ाने के उपाय भी कर रहे हैं, जिनके नतीजे दिखने लगे हैं. हमें भरोसा है कि मांग और आपूर्ति, दोनों पर एक साथ फोकस के साथ अर्थव्यवस्था और तेजी से आगे बढ़ेगी. उसके नतीजे आगे बाकायदा दिख सकते हैं.’’

नियम-कायदों की बाधाओं की सफाई
प्रधानमंत्री के पूर्व प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्र की माने तो मोदी भली-भांति जानते हैं कि उनका तीसरा कार्यकाल विरासत गढ़ने का है और ''इतिहास किसी प्रधानमंत्री का मूल्यांकन सिर्फ इस आधार पर नहीं करता कि उसने क्या बनाया, बल्कि इस पर भी करता है कि उसने क्या हटाया.’’

2025 में आर्थिक विकास को जकड़ने या उसकी रफ्तार धीमी करने वाले 'रेगुलेटरी कोलेस्ट्रॉल’ को हटाना प्रधानमंत्री के सुधार एजेंडे का एक अहम हिस्सा बन गया. इसके लिए उन्होंने कई उच्च अधिकार समितियां गठित कीं. उन्हें साफ निर्देश था कि भारी-भरकम रिपोर्ट नहीं चाहिए, बल्कि प्रक्रियाओं में बदलाव और तेज अमल पर फोकस हो. अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, मोदी का लक्ष्य सीधा था: सरकार को लोगों की रोजमर्रा की राह से हटाना.

इन समितियों में अगस्त में गठित गैर-वित्तीय नियामक सुधार समिति भी शामिल थी. उसकी अध्यक्षता पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गाबा ने की और उसमें उद्योग जगत के प्रतिनिधि भी थे. समिति का बड़ा फोकस लघु, छोटे और मझोले उपक्रमों (एमएसएमई) के लिए कारोबार की सहूलत को पक्का करना था.

एमएसएमई वालों का कहना था कि उन्हें सालाना करीब 1,400 नियम-कायदों का पालन करना पड़ता है और रोजाना लगभग 40 नियामक शर्तों पर नजर रखनी होती है. उसके बाद से समिति नियमन की बारीकियों पर चौबीसों घंटे काम कर रही है, खास तौर पर लाइसेंस, नवीनीकरण, निरीक्षण और नगर निकायों से जुड़ी वे बुनियादी अड़चनें, जो सरकार के साथ कारोबारी संपर्क में असली परेशानी बनती हैं.

इसका मतलब था कारोबार को लाइसेंस-आधारित व्यवस्था से रजिस्ट्रेशन की ओर ले जाना और इंस्पेक्टर-केंद्रित जांच की जगह जोखिम-आधारित, आइटी-सक्षम प्रवर्तन लागू करना. जैसा कि गाबा बताते हैं, ''हम अक्सर नियम-कायदों और अमल को एक ही समझ लेते हैं. हमें ज्यादा नियमों की नहीं, बेहतर अमल की जरूरत है, जहां सरकारी निगरानी औचक और जरूरत के आधार पर हो.’’ ठीक उसी तरह, जैसे नए आयकर सिस्टम में सॉफ्टवेयर के जरिए रैंडम जांच अब सामान्य हो चुकी है.

समिति के सामने दूसरा बड़ा मुद्दा छोटे कारोबारों से बार-बार मांगे जाने वाले प्रमाणपत्र थे. यह एक नए किस्म का इंस्पेक्टर राज था, जो नए प्रमाण-पत्र जारी करने वाले अधिकारियों के विवेक पर निर्भर रहता था और इसलिए भ्रष्टाचार की गुंजाइश बढ़ जाती थी. इससे निबटने के लिए समिति ने लाइसेंस की वैधता अवधि को काफी बढ़ाने का सुझाव दिया है, जिसमें 'एक बार दिया गया, तो दिया गया’ का सिद्धांत शामिल है. साथ ही, खाने-पीने के ठेलों जैसे छोटे कारोबारों के लिए लाइसेंस की जगह केवल रजिस्ट्रेशन पर जोर दिया गया है. सुरक्षा जैसी जांचों को मान्यता प्राप्त निजी थर्ड-पार्टी संस्थाओं को सौंपने का प्रस्ताव भी इसी दिशा में है.

रोजमर्रा के झंझटों में कटौती
समिति ने जो अंतरिम 38-सूत्री एजेंडा तैयार किया है और जिस पर काम शुरू भी हो चुका है, उसकी बुनियाद  भरोसे पर टिकी नियामक व्यवस्था है. गाबा के शब्दों में, ''प्रधानमंत्री का सुशासन का दर्शन औपनिवेशिक दौर के शक पर आधारित नियमों से बाहर निकल कर भरोसे पर आधारित नियमन की ओर बढ़ने का है, जहां लोगों को ईमानदार माना जाए. हमारा लक्ष्य 'सरकार हर वक्त सामने खड़ी हो’ वाले रवैए को कम करना है और ऐसी व्यवस्था बनाना है, जहां राज्य जरूरत पड़ने पर सुरक्षा जाल की तरह मौजूद रहे लेकिन रोजमर्रा के कारोबार में बेवजह दखल बिल्कुल न दे.’’

26 सितंबर, 2025 को ट्रंप व्हाइट हाउस में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ

इस एजेंडे में जीएसटी रिटर्न दाखिल करने की प्रक्रिया को सरल बनाना और छूट की सीमा बढ़ाना, 'छोटी कंपनी’ की परिभाषा को सालाना 40 करोड़ रुपए के टर्नओवर से बढ़ाकर 100 करोड़ रुपए करना, और छोटे उद्यमों के लिए अनिवार्य बोर्ड मीटिंग्स और ऑडिट का बोझ घटाने जैसे कई ठोस कदम शामिल हैं. खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआइ) और भारतीय मानक ब्यूरो (बीएसआइ) जैसी एजेंसियों के लिए जटिल लाइसेंस और निरीक्षण व्यवस्था की जगह सरल दो-स्तरीय मानक प्रणाली अपनाने की सिफारिश भी की गई है.

इन सुधारों का सबसे बड़ा असर उन क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर्स (क्यूसीओ) को हटाने में दिख रहा है, जिसने आयात और निर्यात दोनों की रफ्तार धीमी कर दी है. बीते आठ साल में सरकार ने बजाहिर गुणवत्ता तय करने और आयात को नियंत्रित करने के लिए लगभग 1,300 उत्पादों पर अनिवार्य मानक लागू किए थे. लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक, उनमें पंखे या हीटर जैसे तैयार उत्पाद की बजाए हर नट, बोल्ट और कॉइल तक के मानक शामिल कर दिए गए थे, जो परेशान करने और भ्रष्टाचार का नया स्रोत बन गए. उसका असर वैसे तो हर सेक्टर पर पड़ा, लेकिन सबसे ज्यादा चोट एमएसएमई को लगी. नवंबर में सरकार ने इन क्यूसीओ की संख्या घटाकर लगभग 750 कर दी.

इसी दौरान मोदी सरकार ने उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआइआइटी) की निगरानी में जन विश्वास कार्यक्रम के दूसरे चरण को आगे बढ़ाया. इसके तहत 17 और कानूनों में संशोधन किया गया, जिनमें नगर निकाय प्रशासन, मोटर वाहन नियमों और निर्यात से जुड़ी गतिविधियों के कई मामलों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया. यह 2023 से शुरू हुए पहले चरण की कड़ी है, जिसमें डीपीआइआइटी ने 42 कानूनों की 183 धाराओं को अपराधमुक्त किया था.

प्रमोद मिश्र कहते हैं, ''कुल मिलाकर ये सुधार उत्पादकता बढ़ाने, उद्यमिता के प्रोत्साहन और आर्थिक भागीदारी में रोजमर्रा की अड़चनों को कम करके देश की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत करने के लिए हैं.’’ लेकिन ठीक इसी समय, डोनाल्ड ट्रंप के वैश्विक व्यवस्था को झकझोर दिए जाने, खासकर भारत-अमेरिका रिश्तों में बढ़ते तनाव के चलते मोदी को अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल की सबसे बड़ी विदेश नीति चुनौती का सामना करना है.

ट्रंप फैक्टर
अलबत्ता, विडंबना देखिए कि मई 2025 तक भारत-अमेरिका संबंध बीते कई वर्षों में सबसे मजबूत दौर में थे. ट्रंप के पहले कार्यकाल में मोदी के साथ उनके रिश्ते अच्छे रहे थे. इकलौता बड़ा विवाद भारत के पक्ष में लगभग 41 अरब डॉलर के व्यापार घाटे को लेकर था. ट्रंप 2.0 की शुरुआत में भी वॉशिंगटन से सकारात्मक संकेत ही मिल रहे थे.

20 जनवरी को शपथ ग्रहण समारोह में विदेश मंत्री एस. जयशंकर को पहली पंक्ति में जगह दी गई. अगले ही दिन जयशंकर ने क्वाड के अन्य सदस्य देशों—ऑस्ट्रेलिया और जापान—के विदेश मंत्रियों के साथ नए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो से भेंट की. इससे यह स्पष्ट हुआ कि भारत और क्वाड समूह नई अमेरिकी प्रशासन की रणनीतिक सोच में अहम स्थान रखते हैं.

मोदी 13 फरवरी को उन शुरुआती नेताओं में शामिल थे, जिन्हें ट्रंप ने व्हाइट हाउस में आधिकारिक वर्किंग विजिट पर आमंत्रित किया. इस दौरे में दोनों नेताओं ने कई दूरगामी और भविष्योन्मुखी पहलकदमियों पर हस्ताक्षर किए. उससे दो हफ्ते पहले भारत ने अपने बजट के जरिए इस सकारात्मक नतीजे की जमीन तैयार कर दी थी. बजट में अमेरिका से आने वाले कई उत्पादों—जैसे बॉर्बन (व्हिस्की), मोटरसाइकिल, आइसीटी उत्पाद और चिकित्सा उपकरण—पर आयात शुल्क में बड़ी कटौती की गई.

साथ ही, बत्तख के मांस और अल्फाल्फा घास जैसे कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोलने का ऐलान किया गया. इतना ही नहीं, भारत ने एटमी ऊर्जा क्षेत्र को निजी क्षेत्र, जिसमें विदेशी निवेशक भी शामिल हों, के लिए खोलने की प्रतिबद्धता जताई. उसके साथ ही नागरिक एटमी दायित्व से जुड़े उन विवादित प्रावधानों में बदलाव का संकेत दिया गया, जिनकी वजह से 2008 के भारत-अमेरिका एटमी समझौते के बाद भी अमेरिकी कंपनियां भारत में निवेश से दूर रही थीं.

1 सितंबर को एससीओ शिखर बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मोदी रूसी राष्ट्रपति पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ

महत्वपूर्ण बात यह रही कि मोदी-ट्रंप शिखर बैठक में नतीजों पर केंद्रित एजेंडे के साथ यूएस-इंडिया कॉम्पैक्ट (कैटलाइजिंग ऑपर्चुनिटीज फॉर मिलिट्री पार्टनरशिप, एक्सीलेरेटेड कॉमर्स ऐंड टेक्नोलॉजी) पर हस्ताक्षर हुए. उसके तहत 2025 की शरद ऋतु तक एक नए द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) पर बातचीत का फैसला किया गया और मिशन 500 के तहत 'साहसिक नया लक्ष्य’ 2030 तक कुल द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना कर 500 अरब डॉलर तक ले जाना तय किया गया.

रक्षा सहयोग के मोर्चे पर भी ठोस ढांचा बना. अमेरिका ने अत्याधुनिक 'जैवलिन’ ऐंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल और 'स्ट्राइकर’ इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल भारत को बेचने के लिए नई को-प्रोडक्शन व्यवस्था पर सहमति दी. साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप ने अमेरिकी वायु सेना के शीर्ष स्तर के एफ-35 फाइटर जेट की पेशकश तक कर डाली. रणनीतिक तकनीक के क्षेत्र में भी दोनों देशों ने सभी मोर्चे कवर किए. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी महत्वपूर्ण और उभरती तकनीकों पर सहयोग के लिए एक स्ट्रेटेजिक टेक्नोलॉजी एग्रीमेंट पर दस्तखत हुए. उसके साथ ही हाइ-टेक उद्योगों के लिए जरूरी रेयर अर्थ मिनरल्स की वैश्विक आपूर्ति शृंखला में साझेदारी पर भी सहमति बनी.

मेक अमेरिका ग्रेट अगेन यानी मागा का असर पर इस तरह की अच्छी शुरुआत के बावजूद शिखर वार्ता के फौरन बाद भारत-अमेरिका संबंध खराब होने लगे. इसकी, दरअसल, कई वजहें थीं. इसमें कुछ ट्रंप 1.0 के दौरान उनसे निबटने की भारत में बनी धारणाएं थीं, और कुछ खुद ट्रंप की फितरत से जुड़ी थीं. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में हूवर फाउंडेशन के वरिष्ठ फेलो प्रोफेसर सुमित गांगुली कहते हैं, ''ट्रंप से निबटने के मामले में आप अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सभी महान सिद्धांतों को ताक पर रख सकते हैं जो हम यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं. अमेरिकी नीति को आप सिर्फ और सिर्फ ट्रंप की शख्सियत से आंकिए. सब कुछ लेन-देन का मामला है—तुम मेरी पीठ खुजाओ और मैं तुम्हारी पीठ खुजाऊंगा.’’

पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन जैसे जानकार कुछ हलकों में प्रचलित इस धारणा को खारिज करते हैं कि भारत का साबका दो वॉशिंगटन से है—एक, जिस पर मनमौजी ट्रंप काबिज हैं जो अक्सर पैंतरा बदलते रहते हैं, और दूसरा राज्य-तंत्र वह है, जो भारत का मजबूत पैरोकार है. उनका मानना ​​है, ''पेंटागन और व्हाइट हाउस के बीच कोई खास फर्क नहीं है.

मोटे तौर पर दुनिया में यह मान लिया गया है कि अब ट्रंप की दुनिया में जीना है, चाहे आपको पसंद हो या नहीं. हमारा साबका बुनियादी तौर पर एक बिल्कुल अलग अमेरिका से है, जहां संरक्षणवाद और अलगाव अब अपवाद नहीं, बल्कि नियम-कायदा है.’’ बकौल मेनन, दिलचस्प है कि यह बदलाव उदार वैश्वीकरण से दूर जाने का दीर्घावधिक रुझान दिखाता है, जिसकी शुरुआत ट्रंप के पदार्पण से काफी पहले ही हो गई थी.

कई जानकार मेनन से सहमत हैं लेकिन उनका कहना है कि ट्रंप ने सिर्फ अपने मागा जनाधार की राजनैतिक और सांस्कृतिक बेचैनी को हथियार बनाया है, जिसमें ज्यादातर गोरे ईसाई राष्ट्रवादी शामिल हैं और जिनमें अपना दबदबा और पहचान खोने का डर घर कर गया है. स्तंभकार और लेखक टॉम फ्रीडमैन का मानना ​​है कि अमेरिका तीसरे गृह युद्ध की ओर बढ़ सकता है.

बकौल उनके, यह पहले गृह युद्ध से अलग होगा, जिसमें उत्तर और दक्षिण आमने-सामने थे, और दूसरे गृह युद्ध से भी अलग होगा, जिसके मूल में नस्लीय अधिकार थे. उनका कहना है कि इस बार पहचान, अपनेपन, राष्ट्रवाद और बुनियादी सांस्कृतिक मूल्यों को लेकर विवादों के बीच संघर्ष होगा.

ट्रंप अपने पहले कार्यकाल के मुकाबले बाधाओं से लगभग पूरी तरह मुक्त हैं. उन पर सत्तर-तंत्र या सांसदों की कोई बंदिश नहीं है, दूसरे कार्यकाल में उन्हें मुकदमों की अड़चन नहीं है और वे अगले कांग्रेस चुनावों से पहले जल्द से जल्द सारा काम पूरा कर लेना चाहते हैं. एक अमेरिकी विशेषज्ञ मोदी के साथ ट्रंप की कथित निजी दोस्ती में ज्यादा कुछ पढ़ने से आगाह करते हैं, ''दोनों नेताओं के बीच अच्छे संबंध हैं.

लेकिन भारत-अमेरिका संबंध सख्त चुनावी वादों से तय होते हैं, खासकर इमिग्रेशन, व्यापार और महंगाई जैसे मुद्दों पर.’’ पहला झटका 2 अप्रैल को लगा. ट्रंप ने भारत समेत कई देशों के खिलाफ ऊंचे टैरिफ का ऐलान किया, जबकि भारतीय व्यापार वार्ताकारों की अमेरिकी अधिकारियों के साथ बातचीत शुरू हो चुकी थी. उन्होंने भारतीय निर्यात पर 1 अगस्त से 25 फीसद ऊंचे टैरिफ का ऐलान किया, जिससे नई दिल्ली में निराशा छा गई.

अमेरिका से रिश्तों की ढलान
अलबत्ता, व्यापार ही एकमात्र टकराव का मुद्दा नहीं. अवैध और वैध, दोनों तरह का इमिग्रेशन या आव्रजन ट्रंप के चुनाव अभियान का मुख्य मुद्दा था, और भारत को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा. ट्रंप ने अवैध आप्रवासियों को देश से निकालने की प्रक्रिया शुरू की, और अमेरिका में अवैध रूप से रह रहे अनुमानित 4,00,000 भारतीय अमेरिका की इमिग्रेशन ऐंड कस्टम्स एन्फोर्समेंट (आइसीई) एजेंसी की पकड़ से बच नहीं पाए.

जब ​​चार्टर्ड विमानों से देश से निकाले जा रहे अवैध भारतीयों के पहले जत्थे की तस्वीरें पैरों में जंजीरें और हाथों में हथकडिय़ों के साथ सामने आईं, तो भारत के राजनैतिक हलकों में हंगामा मच गया. उसके बाद आइसीई अधिकारियों ने नई दिल्ली को आश्वस्त किया कि महिलाओं और बच्चों को पैरों में जंजीरें नहीं पहनाई जाएंगी, लेकिन देश से निकालने की प्रक्रिया चुपचाप और लगातार जारी रही.

ट्रंप के सत्ता में आने के बाद से अनुमानित 3,000 लोगों को वापस भेजा जा चुका है, जो हाल के वर्षों में सबसे ज्यादा है. लेकिन और भी बहुत कुछ हुआ क्योंकि ट्रंप ने एच1बी वीजा के नियमों को और सख्त कर दिया. इससे अमेरिका में काम कर रहे लगभग 7,50,000 भारतीय प्रभावित हुए और वापस लौटने वालों का एक और सिलसिला शुरू हो गया.

फिर भी, ट्रंप और मोदी के बीच दरार चौड़ी अप्रत्याशित परिस्थितियों की वजह से हुई. 22 अप्रैल को पहलगाम में आतंकी हमले के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय सशस्त्र बलों को 7 मई को नौ जगहों पर हवाई हमले करने का आदेश दिया, जिनमें ज्यादातर पाकिस्तान के अंदर थे. ऑपरेशन सिंदूर कहे गए इस मिशन से छठी भारत-पाकिस्तान जंग शुरू हुई, जो चार दिनों तक चली. आखिर 10 मई को दोनों पक्ष युद्धविराम पर सहमत हो गए. भारत ने कहा कि पाकिस्तान ने युद्धविराम की गुहार लगाई थी लेकिन दोनों देशों के ऐलान से पहले ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर एक पोस्ट में दावा किया कि उन्होंने शांति समझौता करवाया. यह मोदी के लिए शर्मिंदगी जैसी थी.

तब से ट्रंप यह दावा अब तक तकरीबन 60 बार कर चुके हैं, जिससे भारत का करीने से बनाया नैरेटिव कमजोर पड़ गया और दुनिया में धारणाएं आकार देने में नई दिल्ली की सीमाओं का पता चला. बदतर तो यह कि ट्रंप ने 18 जून को पाकिस्तान के खुद ही फील्ड मार्शल का खिताब ओढ़ लेने वाले आसिम मुनीर को व्हाइट हाउस में बैठक के लिए बुलाया, जो भारत की नाखुशी के बावजूद उनके संबंधों के गहरे होने का संकेत था. लगभग उसी समय ट्रंप ने मोदी से टेलीफोन पर बातचीत में जी-7 शिखर सम्मेलन के लिए कनाडा से लौटते समय व्हाइट हाउस आने का न्योता दिया.

प्रधानमंत्री ने यह कहकर मना कर दिया कि उनकी व्यस्तताएं कुछ और हैं. लेकिन उससे पहले उन्होंने यह बात साफ कर दी कि भारत ने अतीत में पाकिस्तान के साथ विवाद में किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की है और न ही भविष्य में ऐसा करेगा. खबरों के मुताबिक, उससे ट्रंप नाराज हो गए.

विशेषज्ञों के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर दोनों देशों के बीच नीतियों में मतभेदों के कारण नहीं, बल्कि इसलिए महत्वपूर्ण मोड़ बन गया क्योंकि भारत ने ट्रंप के निजी नैरेटिव को सही मानने से इनकार कर दिया और कई युद्धों को रोकने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार जीतने की उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया, जिन्हें रुकवाने का उन्होंने दावा किया था. पीछे मुड़कर देखें तो, नीतिगत विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत युद्धविराम कराने में अमेरिका की भूमिका को स्वीकार करने के लिए बीच का ऐसा रास्ता निकाल सकता था, जिससे उसकी घरेलू जनता भी संतुष्ट हो जाती और ट्रंप भी खुश हो जाते.

अगस्त में भारत-अमेरिका रिश्ते और भी बिगड़ गए, जब ट्रंप ने रूस से तेल आयात करने के लिए भारत पर 25 फीसद का अतिरिक्त टैरिफ ठोक दिया. उन्होंने भारत पर तेल खरीद कर मॉस्को के यूक्रेन पर युद्ध को फंड देने और दूसरे देशों को बेचकर मुनाफा कमाने का आरोप लगाया. उसके बाद 50 फीसद टैरिफ लगने से भारत उन देशों में शामिल हो गया जो सबसे ज्यादा टैरिफ दे रहे हैं, जैसे कि ब्राजील.

अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत अरुण सिंह के अनुसार, ''रिश्तों में असली नुक्सान मनोवैज्ञानिक है. यह धारणा बन गई है कि अमेरिका धौंस जमाने वाला और भरोसेमंद नहीं है. इससे भारत को अपनी साझेदारी गहरा करने से तो नहीं रुकना चाहिए, लेकिन सावधानी जरूर बरतनी चाहिए.

हम अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग कर सकते हैं, लेकिन कभी भी सुरक्षा के लिए उस पर निर्भर नहीं होना चाहिए. पहला कदम यह होना चाहिए कि अमेरिका रूस से जुड़े टैरिफ हटाए. उसके बाद ही हम असल में संबंधों को फिर से बनाने के बारे में बात कर सकते हैं.’’ उम्मीद है कि रिश्तों में तनाव दूर करने की प्रक्रिया जनवरी के मध्य में शुरू होगी, जब नए अमेरिकी राजदूत सर्गेई गोर पदभार संभालेंगे, जो ट्रंप के करीबी हैं.

2025 के सबक
जानकारों का मानना ​​है कि ट्रंप के हर बयान पर प्रतिक्रिया न देने और तीसरे पक्ष की मध्यस्थता तथा व्यापार वार्ता में किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए भी लक्ष्मण रेखा खींचने का मोदी का फैसला समझदारी भरा और परिपक्व है. दिसंबर में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और सितंबर में चीन में एससीओ बैठक में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकातों को ट्रंप के लिए साफ संदेश के तौर पर देखा जा रहा है कि भारत के पास इस खेल में दूसरे खिलाड़ी भी हैं. मोदी सरकार का ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और ओमान के साथ समझौते और यूरोपीय संघ के साथ वार्ता के जरिए व्यापार संबंधों का विस्तार करने का कदम भारतीय निर्यात पर अमेरिका के दंडात्मक टैरिफ के असर को कम कर सकता है.

वर्ष 2025 के सबक दो-टूक हैं और 2026 में मोदी और उनकी सरकार के लिए ये प्राथमिकता होंगे. साल के आखिर में मुख्य सचिवों के साथ मोदी की बैठक में यह साफ दिखा, जिसमें मानव संसाधन को मजबूत करना और कौशल विकास पर फोकस मुख्य क्षेत्र बनकर उभरे हैं. प्रधानमंत्री के सहयोगियों के मुताबिक, उन्हें पता है कि बढ़ती बुजुर्ग आबादी वाले पश्चिमी देशों में भारत को अपने जनसंख्यागत लाभ का फायदा उठाना होगा. जैसा कि किसी ने कहा था, भारत को अमीर बनने से पहले बूढ़ा नहीं होना चाहिए.

ट्रंप की वापसी ने मोदी को इस बात के लिए मजबूर कर दिया है कि वे भारत की विदेश नीति के नजरिए को फिर से तय करें. वजह? अब अमेरिका भारत को चीन के मुकाबले रणनीतिक ताकत के तौर पर नहीं देखता. पहले का आत्मविश्वास अब उसके उलट गंभीर हकीकत में बदल गया है कि अमेरिका भारत को आर्थिक रूप से छोटा, टेक्नोलॉजी में पीछे और रणनीतिक रूप से कमजोर मानता है.

बहुध्रुवीय दुनिया की भारत की चाहत को इस कठिन भू-राजनैतिक सचाई का सामना करना होगा. ट्रंप ने भारत को नहीं बदला. उन्होंने जो किया, वह दिल्ली को खुद के बारे में सोचने को मजबूर करना था. जैसे एक सीप को आत्मरक्षा में मोती की परतें बनाने के लिए बाहरी जीव की जरूरत होती है, जो आखिरकार सुंदर मोती बनता है, उसी तरह ट्रंप का दखल देने वाला रवैया भारत को बेहतर संभावनाओं को खोजने के लिए प्रेरित कर सकता है.

वर्ष 2026 में मोदी और भारत को देश की विदेश नीति में जरूरी बदलाव करने होंगे और तय करना होगा कि वह किस तरह की महाशक्ति बनना चाहता है? हम चीन से मुकाबला करना चाहते हैं या पाकिस्तान से? क्या हमारे प्रदेश कारोबारी सहूलत के मामले में खुद को एक-दूसरे से होड़ लेते हैं या वियतनाम और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े व्यापार वाले देशों से? क्या हम राष्ट्रीय राजधानी समेत अपने शहरों को प्रदूषण और भ्रष्टाचार का नरक बनने देंगे, या ऐसी क्रांति लाएंगे जो ग्रोथ को बढ़ावा दे और रिहाइश और कारोबार दोनों को आसान बनाए?

मोदी उन बहुत थोड़े नेताओं में हैं जिनके पास दीर्घावधिक नजरिया है, जैसा उन्होंने बतौर प्रधानमंत्री दिखाया है, और जिनके पास इस मुश्किल समय में भारत को आगे बढ़ाने का माद्दा है. यह 2025 में उनके शुरू किए गए आर्थिक सुधारों की झड़ी और खराब माहौल के बीच दिखाई गई हिक्वमत, साथ ही साल भर भारत पर असर डालने वाले वैश्विक बदलाव में ट्रंप की भूमिका है, जिसकी वजह से इंडिया टुडे ने उन्हें वर्ष 2025 का सुर्खियों के सरताज का खिताब दिया है.


मोदी: अगुआ
रिफॉर्म एक्सप्रेस

केंद्रीय बजट 2025 में आय कर व्यवस्था में कर-मुक्त आय बढ़ाकर 12.75 लाख रुपए किया गया, जिससे वेतनभोगी मध्यवर्ग को लाभ हुआ
जीएसटी के स्लैब का नया ढांचा बनाया; प्रक्रिया आसान की गई
बीमा क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की सीमा 100 फीसद की गई, जिससे पूरी विदेशी मिल्कियत की छूट मिली
शांति विधेयक 2025 से परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी और विदेशी हिस्सेदारी के लिए खोल दिया गया

योद्धा
पहलगाम हमले के विरुद्ध भारत की जवाबी कार्रवाई ऑपरेशन सिंदूर ने नई लाल लकीर खींच दी, और प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ''अगर भारत के ऊपर आतंकी हमला होता है, तो मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा.’’

शांत-चित्त कप्तान
अमेरिकी टैरिफ के दबाव में भारत के निर्यात मार्गों में विविधता लाई गई और ब्रिटेन तथा ओमान के साथ व्यापार समझौतों पर दस्तखत हुए, न्यूजीलैंड के साथ मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया गया
अमेरिका के साथ रिश्ते कटु हुए तो प्रधानमंत्री मोदी अगस्त में एससीओ शिखर बैठक में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मिले और संदेश दिया कि भारत के पास दूसरे कूटनीतिक विकल्प मौजूद हैं

राजनैतिक ताकत
हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद सहयोगियों की बैसाखी पर टिकना पड़ा, लेकिन मोदी ने ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून मनरेगा को वीबी-जी-राम-जी में बदलकर राजनैतिक जोखिम उठाया
2025 में बिहार के विधानसभा चुनाव में भारी जीत के बाद केंद्र ने 29 पुराने श्रम कानूनों के बदले चार श्रम संहिताएं लेकर आया

ट्रंप: विध्वंसक 
टैरिफ आतंक

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मातहत अमेरिका ने व्यापार घाटे के बहुत ज्यादा भारत के पक्ष में झुके होने और व्यापारिक रुकावटों का हवाला देकर पहले भारतीय निर्यात की 55 श्रेणियों पर 25 फीसद टैरिफ लगाए
फिर उसने भारतीय सामान पर और 25 फीसद टैरिफ लगा दिए, जो रूस से सस्ते कच्चे तेल की भारत की खरीद का जुर्माना था

वीजा और आप्रवासन अवरोध
ज्यादातर एच1बी वीजा भारतीयों को दिए जाते हैं,  जो हुनरमंद पेशेवरों के अमेरिका में रहने और काम करने का सबसे प्राथमिक रास्ता है
2025 में एच1बी वीजा के हरेक नए आवेदन पर 1,00,000 डॉलर की भारी-भरकम फीस थोप दी गई. वजह: वे ''अमेरिकी नौकरियां छीन लेते हैं’’
 अमेरिका में तकरीबन 4,00,000 अवैध आप्रवासी भारतीयों में तकरीबन 3,000 को जनवरी 2025 से जंजीरों और बेड़ियों में जकड़ कर चार्टर्ड विमान से वापस भेजा जा चुका है

कूटनीतिक झटके
भारत ने ट्रंप के दावे से इनकार किया है कि उन्होंने 10 मई को भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम कराया. उसके बाद से वे इस दावे को करीब 60 बार दोहरा चुके हैं
ट्रंप ऑरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर से व्हाइट हाउस में दो बार मिले. पाकिस्तान के साथ रिश्तों के इस अचानक 'बदलाव’ का नतीजा भारत के साथ रिश्तों में गिरावट के दौर की शक्ल में सामने आया
रूस से सबसे ज्यादा तेल चीन खरीदता है, उसके बावजूद सिर्फ भारत पर 25 फीसद अतिरिक्त टैरिफ जड़ दिया गया. ट्रंप ने भारतीय अर्थव्यवस्था को 'मृत’ कहकर भी निशाना साधा

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रो. सुमित गांगुली के मुताबिक,‘‘ट्रंप के साथ सौदेबाजी में, आप अंतरराष्ट्रीय रिश्तों के उन महान सिद्धांतों को कूड़ेदान के हवाले कर सकते हैं, जिन्हें हम विश्वविद्यालयों में पढ़ाते हैं. अमेरिकी नीति का बस एक ही सबब है: ट्रंप की शक्चिसयत. सब कुछ लेनदेन का मामला है: यानी तुम मेरी पीठ खुजलाओ और मैं तुम्हारी.’’

प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव प्रमोद मिश्रा के मुताबिक, ‘‘इसके लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति चाहिए और इसमें जोखिम भी काफी हैं. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ऐसे बेहद जरूरी सुधारों के लिए तैयार थे, जो तेज रफ्तार की आर्थिक प्रगति के लिए अनिवार्य जैसे हैं.’’ 

विशषज्ञों का मानना ​​है कि ट्रंप के हर बयान पर प्रतिक्रिया न देने और तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार न करने तथा व्यापार वार्ता में किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए भी लक्ष्मण रेखा खींचने का मोदी का फैसला समझदारी भरा और परिपक्व है.

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