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आसमां के पार लगाई छलांग

राकेश शर्मा की राह पर चलते हुए शुभांशु शुक्ला दूसरे ऐसे भारतीय बन गए हैं, जिन्होंने धरती की सीमाओं को लांघकर अंतरिक्ष में कदम रखा

शुभांशु शुक्ला, अंतरिक्ष यात्री
अपडेटेड 22 जनवरी , 2026

जब पंजाब के रहने वाले राकेश शर्मा ने 1984 में अंतरिक्ष से तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कॉल किया और अपने देश पर नजरें डालते हुए कहा कि यह ''सारे जहां से अच्छा'' है तब न जाने कितने बच्चे अपने-अपने घरों में टीवी से चिपके उत्सुकता के साथ एक इतिहास बनते देख रहे थे.

हालांकि, कई वर्षों बाद एअर फोर्स पायलट और फिर अंतरिक्ष का सफर करने वाले दूसरे भारतीय शुभांशु शुक्ला उनमें शामिल नहीं थे क्योंकि वे इस ऐतिहासिक घटना के पूरे एक साल बाद पैदा हुए थे.

चार दशक लंबे इस सफर में अवसर, हिम्मत, महत्वाकांक्षा और वैज्ञानिक प्रतिभा शामिल थी, जिस पर खरे उतरकर लखनऊ के इस लड़के ने शर्मा का अनुसरण किया और अंतरिक्ष यात्री नंबर 634 बना. शुभांशु ने पिछले साल जुलाई में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आइएसएस) पर पहुंचकर भारत के लिए एक नया इतिहास रचा.

शुभांशु ने सितंबर में मुंबई में इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में कहा, ''सपने देखना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है.'' वे महज 17 वर्ष के थे जब एक सहपाठी उनकी डेस्क पर राष्ट्रीय रक्षा अकादमी का एक आवेदनपत्र छोड़ गया था. उन्होंने उसे उठाया, भरा और एक नए सफर की उड़ान भर दी. यहां तक कि उनके माता-पिता को भी इसकी भनक नहीं लगी. चार साल बाद उन्हें एक फाइटर पायलट के रूप में भारतीय वायु सेना में नियुक्ति मिली. एक दशक बाद भारत के पहले मानव अंतरिक्ष अभियान गगनयान कार्यक्रम के गति पकड़ते ही शुभांशु ने एक अंतरिक्ष यात्री के तौर पर प्रशिक्षण शुरू किया.

2024 काफी व्यस्तता भरा वर्ष रहा. उन्हें ग्रुप कैप्टन पद पर प्रमोट किया गया और नासा समर्थित प्राइवेट एस्ट्रोनॉट मिशन एक्सिओम-4 के लिए चुना गया. वे आइएसएस के अभियान में शामिल चार देशों के प्रतिनिधियों में से एक थे. यह मिशन अनेक कारणों से ऐतिहासिक था, स्पेस कैप्सूल के कॉकपिट में शुभांशु की मौजूदगी के जरिए 40 वर्षों बाद पोलैंड और हंगरी के साथ भारत की अंतरिक्ष में वापसी.

उन्होंने कहा, ''अंतरिक्ष अभियान से जुड़े समुदाय में एक कहावत प्रचलित है कि आप अंतरिक्ष यान अभियान के लिए तब तैयार होते हैं जब आप एक यात्रा पूरी कर लेते हैं.'' एक साल में उन्हें स्पेसएक्स के डिजाइन किए रॉकेट में सवार होना था और 28,500 किमी/घंटा की गति से सफर तय करना था. उन्होंने कहा, तब सारी उम्मीदें खिड़की से बाहर चली जाती हैं.

शुभांशु को अंतरिक्ष की कक्षा से धरती की पहली झलक एकदम अभिभूत करने वाली लगी. उन्होंने कहा, ''मुझे पहला विचार यही आया कि बाहर से देखने पर धरती बिल्कुल एक समान दिखती है. वहां कोई सीमा रेखा या देशों की सरहदें दिखाई नहीं देतीं. दूसरा विचार दिमाग में उस वक्त आया जब मैंने भारत को देखा. यह 2डी कागज के नक्शों जैसा नहीं बल्कि बहुत बड़ा और भव्य दिखता है.''

उन्हें आइएसएस में 18 दिन बिताने थे और सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण के प्रभावों पर इसरो के डिजाइन किए प्रयोग करने थे. सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण एक ऐसी हल्की अवस्था है जो अंतरिक्ष यात्रियों तथा वस्तुओं को तैरने देती है. वह (अत्यधिक पौष्टिक) सूक्ष्म-शैवाल (माइक्रोएल्गी), खाद्य फसल के बीज और मेटाबोलिक सप्लीमेंट्स पर इसके प्रभावों का अध्ययन करने वाले थे.

सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण मानव मांसपेशियों को कमजोर कर देता है. इस वजह से अभियान के दौरान शुभांशु का वजन 4.2 किलोग्राम कम होना तय था. इससे बचने के लिए अंतरिक्ष यात्रियों को हर रोज अच्छा-खासा व्यायाम करने की जरूरत पड़ती है. अभियान के दौरान उनकी रीढ़ की हड्डी की लंबाई भी कुछ सेंटीमीटर बढ़नी थी, जो माइक्रोग्रैविटी का एक सामान्य प्रभाव है और पृथ्वी पर लौटने के बाद यह अपनी पुरानी सामान्य अवस्था में आ जाता है.

शुभांशु का कहना था कि यह यात्रा एक मील का पत्थर साबित होगी. उनके शब्दों में, ''मानव अंतरिक्ष अभियान के दौरान आप ऐसी चीजें सीखते हैं जिन्हें आप किसी भी दूसरे तरीकों से नहीं सीख सकते...आप मानव जीवन के साथ अंतरिक्ष कैप्सूल लॉन्च कर रहे हैं. इससे अभियान का पैमाना और महत्व बदल जाता है.'' वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और हैम रेडियो के जरिए आइएसएस से बच्चों के साथ तीन बार संवाद के दौरान उनसे सबसे ज्यादा पूछा गया आम सवाल यही था, ''मैं एक अंतरिक्ष यात्री कैसे बन सकता हूं?'' शुभांशु कहते हैं कि यही तो ''इस अभियान की सबसे बड़ी सफलता'' है.

अंतरिक्ष तक सफर

शुभांशु महज 17 वर्ष के थे जब उन्होंने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) के लिए आवेदन भरा.

अंतरिक्ष उड़ान प्रशिक्षण 2020 में शुरू हुआ जब भारत के पहले मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान गगनयान ने जोर पकड़ा.

पिछले वर्ष अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक की उनकी सफल यात्रा कई देशों के साझा अभियान का हिस्सा थी.

शुभांशु शुक्ला ने कहा, ''जब कक्षा से पहली बार मैंने भारत को देखा तो वह काफी बड़ा और भव्य लगा. वह किसी 2डी नक्शे जैसा नहीं दिखता था.''

- अजय सुकुमारन

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