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सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर पलटा फैसला, क्या बच पाएगी प्राण देने वाली पर्वतरेखा?

ढाई अरब साल पुरानी भारत की सबसे पुरानी पर्वतमाला शृंखला जिसने दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान को रेगिस्तान बनने से बचाया. सरकार और कानून की एक व्याख्या ने आज उसके अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया है

खनन के जख्म अरावली का सीना हर जगह जख्मी है. गुजरात के अंबाघांटा में पहाड़ी की हालत
अपडेटेड 6 जनवरी , 2026

सभ्यताओं से भी पहले से मौजूद भारत की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखला अरावली अपनी ऊंचाई की बदली गई परिभाषा से मुश्किल की जद में आ गई थी. केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय की सिफारिशों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की पहचान को 100 मीटर से ज्यादा ऊंचे पर्वतों तक सीमित करने का आदेश दिया था.

हालांकि, इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने बाद में पलट दिया. 5 जनवरी को अपने उस आदेश को स्थगित (अबेअन्स में) कर दिया, जिसमें अरावली की पहाड़ियों की परिभाषा में बदलाव संबंधित रिपोर्ट को स्वीकार कर ली गई थी और पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा को स्वीकार किया गया था.

अदालत ने कहा कि किसी भी कार्यान्वयन से पहले एक निष्पक्ष, स्वतंत्र और विशेषज्ञ राय पर विचार किया जाना आवश्यक है, ताकि स्पष्ट और निर्णायक मार्गदर्शन मिल सके. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने इस मुद्दे की व्यापक और समग्र जांच के लिए क्षेत्र विशेषज्ञों (डोमेन एक्सपर्ट्स) वाले एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा.

नई परिभाषा के अनुसार ये तय हुआ था कि किसी भू-आकृति को अरावली का हिस्सा तभी माना जाएगा जब उसकी ऊंचाई आस-पास के क्षेत्रों से कम से कम 100 मीटर ऊंची हो. इस फैसले ने अरावली पर मंडराते खतरों की बहस को लेकर नई दिशा दे दी थी. इंडिया टुडे हिंदी के 31 दिसंबर 2025 अंक में फैसला पलटे जाने से पहले एक स्टोरी छपी थी, जिसे नीचे हुबहू पढ़ सकते हैं-  

पर्यावरणविद् इस बात को लेकर फिक्रमंद हैं कि 100 मीटर से ऊंचे पहाड़ों को ही अगर अरावली का हिस्सा माना गया तो राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात के करीब 10,000 से ज्यादा पहाड़ अरावली के दायरे से बाहर हो जाएंगे और वहां खनन गतिविधियों को बेरोकटोक छूट मिलेगी.

फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (एफएसआइ) की रिपोर्ट के अनुसार, अरावली पर्वत शृंखला में कुल मिलाकर 12,081 छोटी-बड़ी पहाड़ियां हैं, जिनमें से सिर्फ 1,048 ही 100 मीटर से ऊंची हैं. यानी कि 91.3 फीसद पहाड़ियां ऐसी हैं जिनकी ऊंचाई 100 मीटर से कम है. केंद्र सरकार की सिफारिशों के तहत अब ये पहाड़ियां अरावली का हिस्सा नहीं होंगी.

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अरावली की एक समान परिभाषा तय करने के निर्देश दिए थे. इससे पहले फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया 2010 से अरावली की ऊंचाई तय करने के लिए तीन डिग्री ढलान का मानक इस्तेमाल कर रहा था. 2024 में पर्यावरण मंत्रालय की तकनीकी समिति ने 4.57 डिग्री ढलान और 30 मीटर ऊंचाई का मानक दिया.

बताया जा रहा है कि अगर यह मानक भी लागू रहता तो अरावली का करीब 40 फीसद हिस्सा कवर हो सकता था. एफएसआइ ने तीन डिग्री ढलान के मानक को लागू करते समय यह सिफारिश की थी कि 10 से 30 मीटर ऊंची पहाड़ियां भी रेगिस्तान और हवा को रोकने में कारगर हैं, इसलिए उन्हें भी बचाना जरूरी है.

पर्यावरण मंत्रालय ने इन सब मानकों को नकारते हुए केवल 100 मीटर ऊंचाई का ही मानक तय किया है. मंत्रालय का तर्क है कि अरावली क्षेत्र में पड़ने वाले 34 में से 12 जिलों में औसत ढलान तीन डिग्री से कम है. इसलिए एफएसआइ का 3 डिग्री का मानक यहां लागू नहीं हो सकता. हालांकि, मंत्रालय की 34 जिलों की लिस्ट में राजस्थान के चित्तौडगढ़ और सवाई माधोपुर जैसे जिले शामिल नहीं है जबकि इन दोनों जिलों में अरावली की पर्वत शृंखलाएं बहुत ऊंची और विशाल हैं. इनमें चित्तौडगढ़ का ऐतिहासिक दुर्ग और सवाई माधोपुर का रणथंभौर अभयारण्य तथा प्राचीन गणेश मंदिर शामिल हैं.

मंत्रालय ने अरावली की औसत ऊंचाई को लेकर अलग तरह का दावा किया है. उसकी सिफारिश के अनुसार, अरावली पर्वत शृंखला के अधीन आने वाले 34 में से किसी भी जिले की ऊंचाई 100 मीटर से कम नहीं है. पर्यावरणविद् सबसे बड़ा धोखा इसे ही मानते हैं क्योंकि जिलों की ऊंचाई समुद्र तल से तय होती है और पहाड़ की ऊंचाई जमीन से तय होती है. अगर कोई पहाड़ समुद्र तल से 170 मीटर ऊंचा है और आस-पास की जमीन 100 मीटर ऊंची है तो पहाड़ की वास्तविक ऊंचाई 70 मीटर ही होगी.

पथिक मैं अरावली का पुस्तक के लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी कहते हैं, ''अरावली केवल पहाड़ों की कतार नहीं, बल्कि वह हमारी सभ्यता, संस्कृति, जल, जलवायु, जीवन और इतिहास की साझा विरासत है. उत्तर भारत की करोड़ों की आबादी अरावली पर निर्भर है. अरावली में हमें आइडिया ऑफ इंडिया की झलक मिलती है मगर पिछले कुछ सालों से सरकारें और खनन माफिया देश की इस सबसे प्राचीन पर्वत सभ्यता को नष्ट करने पर तुले हैं.'' उन्हें अंदेशा है कि 100 मीटर ऊंचे पहाड़ों को ही अरावली का हिस्सा मानने का फैसला लागू हुआ तो फिर इस पर्वतमाला के बारे में किताबों में ही पढ़ने को मिलेगा.

मेघवंशी की बात में इसलिए भी दम नजर आता है क्योंकि अवैध खनन के चलते राजस्थान के जयपुर, सीकर, कोटपूतली, झुंझुनूं और अलवर जिलों में अरावली के कई पहाड़ नष्ट हो गए हैं. नीम का थाना और कोटपूतली क्षेत्र में अरावली का हिस्सा रहे कई पहाड़ जमीन से 100 मीटर नीचे तक खोद डाले गए हैं. इनमें नीम का थाना क्षेत्र के मीणा की नांगल, बेरी व भूदोली खारा और झुंझुनूं जिले की खेतड़ी तहसील के मोडी गोरीर जैसे गांव शामिल हैं.

पिछले कुछ दशकों में 692 किलोमीटर लंबी अरावली पर्वतमाला का विनाश इतने व्यापक रूप से हुआ है कि विभिन्न जगहों पर पहाड़ों के बीच की 12 दरारें खुल गई हैं जो राजस्थान में अजमेर से झुंझुनूं और दक्षिण हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले तक फैली हुई हैं. इन दरारों से थार रेगिस्तान की धूल उड़कर दिल्ली-एनसीआर तक पहुंच रही है और प्रदूषण की समस्या को बढ़ा रही है.

राजस्थान के नीम का थाना और कोटपूतली क्षेत्र में अवैध खनन के खिलाफ पिछले तीन दशक से आंदोलन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश मीणा कहते हैं, ''अरावली के पहाड़ों से पुलिस, प्रशासन और सरकार की मिलीभगत से सालाना 90 लाख टन से ज्यादा अवैध खनन हो रहा है. ऐसे में अगर 100 मीटर ऊंचाई का यह फैसला लागू हुआ तो पूरी अरावली शृंखला ही खत्म हो सकती है.''

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार की सिफारिश को अरावली का मृत्यु प्रमाणपत्र करार दिया है. गहलोत के शब्दों में, ''पहाड़ की परिभाषा उसकी ऊंचाई से नहीं बल्कि भूगर्भीय संरचना से होती है. अरावली केवल पर्वत नहीं बल्कि हमारा रक्षा कवच है. इसे 100 मीटर के दायरे में समेटना अरावली के 90 फीसद हिस्से को खत्म करना है. केंद्र सरकार ने इसकी ऊंचाई का नाप बदलकर कानूनी कवच हटा दिया है. यह फैसला खनन माफिया के लिए रेड कॉर्पेट बिछाने जैसा है.''

विश्व पर्वत दिवस पर 11 दिसंबर को भारत की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखला को बचाने के लिए जयपुर से अरावली विरासत जन अभियान की शुरुआत हुई है. दिल्ली-एनसीआर, दक्षिण हरियाणा और राजस्थान के विभिन्न जिलों से करीब 200 से ज्यादा लोग इस अभियान से जुड़े हैं.

पीपल फॉर अरावली की संस्थापक नीलम अहलूवालिया कहती हैं, ''अरावली विरासत जन अभियान का उद्देश्य विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखला अरावली को विनाश से बचाना है. ऐसे समय में जब इक्वाडोर, कोलंबिया, न्यूजीलैंड, बांग्लादेश जैसे कई देशों की अदालतों ने प्रकृति और विशिष्ट पारिस्थितिकीय तंत्रों को संरक्षित करने के लिए ऐतिहासिक निर्णय दिए हैं वहीं भारत के सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले ने दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात राज्यों में फैली ढाई अरब साल पुरानी अरावली पर्वतमाला को अस्तित्व के संकट में डाल दिया है.''

क्यों खास है अरावली?

अरावली अरा और वाली दो मूलों से बना संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है चोटियों की रेखा. 692 किलोमीटर लंबी अरावली पर्वत शृंखला गुजरात के खेड़ब्रह्म से दिल्ली की रायसीना हिल्स तक फैली है. यह भारत की प्राचीनतम पर्वतमाला है जो करीब ढाई अरब साल पुरानी बताई जाती है. यह हिमालय से भी पहले से मौजूद थी. राजस्थान की जीवन रेखा और दिल्ली-एनसीआर का 'ग्रीन लंग' मानी जाने वाली दिल्ली रिज भी अरावली का हिस्सा है. इसे कई विशेषज्ञ उत्तर भारत का प्राकृतिक एयर-कंडिशनर भी कहते हैं.

यह राजस्थान के उदयपुर, राजसमंद, चित्तौडगढ़, अजमेर, जयपुर, सीकर, अलवर, झुंझुनूं जिलों से गुजरती है और इसमें राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा और गुजरात के 37 अभयारण्य क्षेत्र स्थित हैं. अरावली की सबसे ऊंची चोटी राजस्थान के सिरोही जिले के माउंट आबू का गुरु शिखर है जिसकी ऊंचाई 1,722 मीटर है.

रह गया बस गड्ढा हरियाणा के चरखी दादरी में रामलवास गांव में खुदाई के बाद का दृश्य

अरावली ने भारतीय प्लेट के स्थिरीकरण में बड़ी भूमिका निभाई है. यहां की चट्टानें—क्वार्ट्जाइट, ग्रेनाइट, शिस्ट—भारत की सबसे पुरानी चट्टानों में हैं.

अरावली थार के मरुस्थल की ढाल और पश्चिम की ओर रेगिस्तान के फैलाव को रोकने में प्राकृतिक दीवार के तौर पर काम कर रही है. राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली में भूजल का बड़ा हिस्सा अरावली पर निर्भर है. अरावली बनास, लूणी, साबरमती, साहिबी जैसी नदियों का उद्गम स्थल है. उदयपुर को झीलों की नगरी बनाने में अरावली की भूमिका निर्णायक रही है.

अरावली थार रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकने वाली दीवार है. विशेषज्ञ मानते हैं कि 10 से 30 मीटर ऊंची छोटी पहाड़ियां (रिज) भी लू और धूल भरी आंधियों को रोकने में उतनी ही कारगर होती हैं जितनी की बड़ी पहाड़ियां. इन छोटी पहाड़ियों को खनन के लिए खोल देने का मतलब है दिल्ली और पूर्वी राजस्थान को रेगिस्तान बना देना.

अरावली पर्वतमाला 200 से ज्यादा देशी और प्रवासी पक्षियों की प्रजातियों, 100 से ज्यादा तितली प्रजातियों और कई तरह के सरीसृप और स्तनधारी प्रजातियों का घर है. तेंदुए, बाघ, लकड़बग्घे, सियार, नीलगाय, साही, सिवेट बिल्ली जैसे कई वन्यजीव अरावली की गोद में रहते हैं. पहाड़ियां और जंगल नष्ट हुए तो ये भी नष्ट होंगे. सिरोही के भाखर भीतरोट विकास मंच के लक्ष्मी और बाबू गरासिया कहते हैं, ''गरासिया जनजाति पीढ़ियों से दक्षिण राजस्थान की अरावली पर्वतमाला में रहती आ रही है. सुबह उठने से रात को सोने तक हमारा जीवन पहाड़ों और जंगलों से जुड़ा है. पहाड़ हैं तो हम हैं. खनन और विनाश आधारित परियोजनाओं के लिए हम अपने पहाड़ को नष्ट नहीं होने देंगे.''

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